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25 June 2026 PIB Summary for UPSC in Hindi Pdf

आज का 25 June 2026 PIB Summary for UPSC in Hindi यूपीएससी (UPSC) परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों को समेटे हुए है। इसमें सतत विकास के लिए क्लीन कोल टेक्नोलॉजी और अर्बन रिवर मैनेजमेंट प्लान (URMP), प्रशासन में सुधार हेतु ‘VIP कल्चर इन इंडिया’ पुस्तक विमोचन, आर्थिक संकेतकों में सेवा उत्पादन सूचकांक (ISP), तथा युवाओं और कृषि को वैश्विक मंच देने वाले यूथ को:लैब चैलेंज‘भारती’ (BHARATI) कार्यक्रम शामिल हैं।

चर्चा में क्यों? (Why in News?)

हाल ही में भारत के उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने उपराष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में VIP Culture in India: Power, Privilege and the Distance from Democracy” नामक पुस्तक का विमोचन किया। यह पुस्तक भारतीय लोकतंत्र और सार्वजनिक जीवन में ‘वीआईपी संस्कृति’ के प्रभावों की पड़ताल करती है।

मुख्य बिंदु

पुस्तक के बारे में और उसके संदर्भ

  • लेखक: अरुणाचल प्रदेश से पूर्व राज्यसभा सदस्य श्री नबाम रेबिया (Shri Nabam Rebia) और सह-लेखक श्री संदीप कुमार
  • मूल विषय: यह पुस्तक इस बात का विश्लेषण करती है कि कैसे वीआईपी संस्कृति (विशेषाधिकार और शक्ति) लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों (समानता और न्याय) से दूरी पैदा करती है।
  • सांस्कृतिक और बौद्धिक संदर्भ: पुस्तक में भारत की सभ्यतागत परंपराओं जैसे उपनिषद, रामचरितमानस, भगवान बुद्ध की शिक्षाओं और पंचतंत्र का हवाला देकर जनसेवा और सादगी के महत्व को समझाया गया है।

लोकतंत्र बनाम वीआईपी संस्कृति (Vice-President’s Observations)

  • संवैधानिक दृष्टिकोण: हमारा संविधान न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित समाज की कल्पना करता है। लोकतंत्र की ताकत इस बात में है कि सार्वजनिक पद को ‘विशेषाधिकार’ के बजाय एक ‘जिम्मेदारी’ (Responsibility) के रूप में देखा जाए।
  • संत तिरुवल्लुवर का संदर्भ: महान तमिल संत-कवि तिरुवल्लुवर के अनुसार— सच्चा नेतृत्व वही है जो सुलभता (Accessibility), करुणा (Compassion) और जवाबदेही (Accountability) से परिभाषित हो।
  • सेवा ही परम धर्म: राजनीति और प्रशासन में “सेवा ही अंतिम धर्म” (Seva is the ultimate Dharma) होना चाहिए। ऐतिहासिक उदाहरण के तौर पर पूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री की सादगी और जनसेवा के लोकाचार को रेखांकित किया गया।

नागरिक-प्रथम शासन (Citizen-First Governance) के उदाहरण

उपराष्ट्रपति ने वर्तमान सरकार द्वारा वीआईपी संस्कृति को समाप्त करने के लिए उठाए गए कदमों और उदाहरणों का उल्लेख किया:

  • पदाधिकारियों की गाड़ियों से लाल बत्ती (Red Beacon Lights) को हटाना।
  • प्रधानमंत्री द्वारा यातायात प्रतिबंधों के कारण नीट (NEET) परीक्षार्थियों को होने वाली असुविधा से बचाने के लिए अपने प्रस्थान (Departure) में देरी करने का निर्णय।
  • मूल मंत्र: “हर भारतीय विशेष है, हर भारतीय एक वीआईपी है।”

चर्चा में क्यों? (Why in News?)

हाल ही में कोयला मंत्रालय (Ministry of Coal) ने ‘क्लीन कोल टेक्नोलॉजी’ (Clean Coal Technologies) पर एक BRICS साइड इवेंट का आयोजन किया, जिसका मुख्य फोकस कोल गैसीफिकेशन (Coal Gasification – कोयला गैसीकरण) पर था। इस कार्यक्रम में भारत सहित रूस, इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के ब्रिक्स प्रतिनिधिमंडलों ने भाग लिया।

मुख्य बिंदु व तकनीकी तथ्य

कोल गैसीकरण क्या है और इसका महत्व?

  • प्रक्रिया (Process): यह एक ऐसी तकनीक है जिसके तहत कोयले को आंशिक ऑक्सीकरण (Partial Oxidation) के माध्यम से सिनगैस (Syngas – सिंथेटिक गैस) में परिवर्तित किया जाता है। सिनगैस मुख्य रूप से कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), हाइड्रोजन (H2), कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), प्राकृतिक गैस और जल वाष्प का मिश्रण होती है।
  • विविध अनुप्रयोग (Applications): सिनगैस का उपयोग रासायनिक उद्योगों में अमोनिया, मेथनॉल, हाइड्रोजन, सिंथेटिक ईंधन और डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (DRI – स्पंज आयरन निर्माण) जैसे उच्च मूल्य वर्धित उत्पादों के उत्पादन के लिए किया जाता है।
  • ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security): यह घरेलू कोयला संसाधनों के कुशल उपयोग को बढ़ावा देकर प्राकृतिक गैस, कच्चे तेल और रसायनों के आयात पर भारत की निर्भरता को काफी कम कर सकता है।

भारत सरकार का लक्ष्य और नीतिगत प्रयास

  • राष्ट्रीय लक्ष्य: भारत सरकार ने वर्ष 2030 तक 100 मिलियन टन (MT) कोयले के गैसीकरण का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है।
  • सहायता प्रणाली: इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सरकार वित्तीय प्रोत्साहन (Financial Incentives), नीतिगत समर्थन, सुनिश्चित कोयला लिंकेज (Assured Coal Linkages) और विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय प्रदान कर रही है।
  • प्रमुख परियोजनाएं और हितधारक:
    • BHEL: स्वदेशी कोल गैसीकरण तकनीक विकसित करने में सक्रिय।
    • Coal India Limited (CIL): नए गैसीकरण प्रोजेक्ट्स और कोयला आवंटन नियमों को सुगम बना रही है।
    • ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ECL): इसके तहत कास्टा (Kasta) भूमिगत कोयला गैसीकरण (UCG) पायलट प्रोजेक्ट पर तेजी से काम चल रहा है।
    • निजी क्षेत्र: जिंदल स्टील लिमिटेड (JSL) और ग्रेटा एनर्जी जैसी कंपनियां भी इस तकनीक को अपनाने में आगे हैं।

चुनौतियाँ (Challenges in India)

  • भारतीय कोयले में उच्च राख की मात्रा (High-Ash Content) होती है, जिसके लिए विशेष और उन्नत प्रसंस्करण तकनीकों की आवश्यकता होती है।
  • परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता (Project Economics), जटिल भूगर्भीय स्थितियां और व्यापक स्तर पर अपनाने के लिए निरंतर वित्तीय सहायता की आवश्यकता प्रमुख बाधाएं हैं।

  • सिनगैस (Syngas): यह मुख्य रूप से CO और H2 का मिश्रण है।
  • कास्टा पायलट प्रोजेक्ट (Kasta Pilot Project): यह भारत का एक प्रमुख भूमिगत कोयला गैसीकरण (Underground Coal Gasification – UCG) प्रोजेक्ट है जो ECL द्वारा संचालित किया जा रहा है।
  • ब्रिक्स (BRICS) के नए सदस्य: इस बैठक में इथियोपिया और UAE के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया, जो ब्रिक्स के हालिया विस्तार (BRICS+) को दर्शाता है।
  • नोडल मंत्रालय: राष्ट्रीय कोयला गैसीकरण मिशन कोयला मंत्रालय के अंतर्गत आता है, जिसका लक्ष्य 2030 तक 100 MT का है।

चर्चा में क्यों? (Why in News?)

हाल ही में राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स (NIUA) के सहयोग से नदी-केंद्रित शहरी नियोजन की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इसके तहत पहले चरण में 13 शहरों के लिए अर्बन रिवर मैनेजमेंट प्लान (URMPs – शहरी नदी प्रबंधन योजना) पूरे कर लिए गए हैं। अब इसका विस्तार गंगा बेसिन के 63 शहरों (प्रथम चरण में 27 और द्वितीय चरण में 33 नए शहर) तक किया जा रहा है।

मुख्य बिंदु

पृष्ठभूमि और दृष्टिकोण

  • नदी-केंद्रित विकास (River-Centric Approach): यह पहल प्रधानमंत्री द्वारा दिसंबर 2019 में कानपुर में आयोजित राष्ट्रीय गंगा परिषद की बैठक में दिए गए विजन पर आधारित है। इसका उद्देश्य विकास को ‘शहर-केंद्रित’ से बदलकर ‘नदी-केंद्रित’ बनाना है।
  • वित्तपोषण: यह नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत संचालित है, जिसे विश्व बैंक (World Bank) का सहयोग प्राप्त है। इसका दीर्घकालिक लक्ष्य गंगा की मुख्य धारा पर स्थित सभी 97 शहरों को कवर करना है।

25 June 2026 PIB Summary for UPSC in Hindi Pdf

URMP फ्रेमवर्क के तीन मुख्य स्तंभ और 10-सूत्रीय एजेंडा

यह योजना तीन मुख्य स्तंभों—पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक पर टिकी है। इसके 10-सूत्रीय एजेंडे में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • बाढ़ क्षेत्र (Floodplain) विनियमन और प्रदूषण नियंत्रण।
  • आर्द्रभूमि (Wetlands) और जल निकायों का पुनरुद्धार।
  • तटीय बफ़र्स (Riparian Buffers) का विकास और उपचारित जल (Treated Water) का पुन: उपयोग।
  • पारिस्थितिकी-संवेदनशील रिवरफ्रंट विकास और नदी संसाधनों का आर्थिक उपयोग।
  • सतत नागरिक भागीदारी और सामुदायिक जुड़ाव।

राज्यों के अनुसार प्रमुख रणनीतियाँ और केस स्टडीज

यह योजना उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार लागू की जा रही है:

राज्य शामिल शहर (प्रमुख) मुख्य फोकस क्षेत्र व नवीन पहलें
उत्तराखंड हल्द्वानी-काठगोदाम, रामनगर, ऋषिकेश रामनगर: कोसी नदी को कॉर्बेट इको-टूरिज्म कॉरिडोर से जोड़ना (एवियन पार्क और वॉच टॉवर)।
ऋषिकेश: हिमालयी शहरों में पर्यावरण, सीवरेज अपग्रेड और अध्यात्म का सह-अस्तित्व।
उत्तर प्रदेश गोरखपुर, शाहजाहनपुर, बिजनौर, प्रयागराज गोरखपुर: बाढ़ से निपटने के लिए ‘ब्लू-ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर’ (स्पंज पार्क, बायोस्वैल्स)।
शाहजाहनपुर: “मेरी नदी, मेरा शहर” जन अभियान।
प्रयागराज: नदियों को “लिविंग हेरिटेज कॉरिडोर” के रूप में विकसित करना।
बिहार बक्सर, छपरा, गया छपरा: बाढ़ और नदी के बदलते मार्ग (Morphology) के लिए फ्लडप्लेन ज़ोनिंग।
गया: फाल्गु नदी के हाइड्रो-इकोलॉजी को बहाल करने के लिए भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge)।

कानपुर पायलट प्रोजेक्ट और जमीनी क्रियान्वयन

योजनाओं को केवल कागजों तक सीमित न रखकर जमीन पर उतारने के लिए प्रदर्शन परियोजनाएं (Demonstration Projects) शुरू की गई हैं:

  • COD (Central Ordnance Depot) ड्रेन का पुनरुद्धार: कानपुर में एक अत्यधिक प्रदूषित शहरी नाले को पारिस्थितिक रूप से कार्यात्मक गलियारे में बदला जा रहा है।
  • LAMAS तकनीक: जल निकायों के पुनरुद्धार के लिए लेक असेसमेंट एंड मॉनिटरिंग एनालिसिस सिस्टम (LAMAS) तकनीक का उपयोग किया जा रहा है।

प्रोत्साहन प्रणाली (Incentive Mechanism)

  • शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को इन योजनाओं को लागू करने के लिए प्रेरित करने हेतु NMCG-विश्व बैंक साझेदारी के तहत परफॉर्मेंस बेस्ड इंसेंटिव ग्रांट (PBIG) व्यवस्था तैयार की गई है।

चर्चा में क्यों? (Why in News?)

हाल ही में टी-हब (T-Hub), हैदराबाद में आयोजित एक समारोह में भारत के 6 युवा नेतृत्व वाले स्टार्टअप्स को ‘यूथ को:लैब’ नेशनल इनोवेशन चैलेंज 2026 (Youth Co:Lab National Innovation Challenge 2026) के आठवें संस्करण के विजेताओं के रूप में सम्मानित किया गया है।

मुख्य बिंदु

यूथ को:लैब (Youth Co:Lab) क्या है?

  • स्थापना और उद्देश्य: इसे 2017 में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और सिटी फाउंडेशन (Citi Foundation) द्वारा संयुक्त रूप से शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों में युवाओं को सशक्त बनाना और निवेश करना है ताकि वे सामाजिक नवाचार और उद्यमिता के माध्यम से सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति को गति दे सकें।
  • भारतीय भागीदार: भारत में यह पहल अटल इनोवेशन मिशन (AIM – नीति आयोग) की साझेदारी में संचालित की जाती है। इस वर्ष इसका क्रियान्वयन टी-हब फाउंडेशन द्वारा किया गया।

इनोवेशन चैलेंज 2026 के प्रमुख विषय (Thematic Areas)

इस वर्ष देश के 28 राज्यों से आए 350 से अधिक आवेदकों में से स्टार्टअप्स को मुख्य रूप से तीन महत्वपूर्ण पर्यावरण-अनुकूल क्षेत्रों में उनके काम के लिए चुना गया:

  • सतत वस्त्र और फैशन (Sustainable Textiles and Fashion)
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था नवाचार (Circular Economy Innovations)
  • सतत खाद्य प्रणालियाँ और जल संरक्षण (Sustainable Food Systems and Water Conservation)

विजेता

कड़े मूल्यांकन के बाद शीर्ष 6 स्टार्टअप्स को वित्तीय अनुदान (Seed Grant) और क्षमता निर्माण सहायता प्रदान की गई।

भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम में असमानताएँ (Distribution Challenges)

नीति आयोग (AIM) के अनुसार, वर्तमान में भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम में ‘वितरण की समस्या’ (Distribution Problem) है, जिसे यूथ को:लैब जैसे कार्यक्रम ठीक करने का प्रयास कर रहे हैं:

  • पूंजी का संकेंद्रण: निवेश का बड़ा हिस्सा केवल बेंगलुरु और दिल्ली जैसे महानगरों तक सीमित है।
  • मेंटरशिप की कमी: टियर-3 शहरों और उत्तर-पूर्वी राज्यों (North-East) में सही मार्गदर्शन की पहुंच बहुत कम है।
  • लैंगिक व सामाजिक अंतर: महिलाओं, दिव्यांगों और सामाजिक रूप से पिछड़े पृष्ठभूमि के संस्थापकों के लिए अवसर सीमित हैं।
  • सकारात्मक बदलाव: इस वर्ष चुने गए उद्यमों में 40% से अधिक स्टार्टअप महिलाओं के नेतृत्व वाले हैं।

प्रमुख संगठन

1. यूथ को:लैब (Youth Co:Lab)

  • सह-संस्थापक: संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और सिटी फाउंडेशन (Citi Foundation) द्वारा 2017 में सह-निर्मित।
  • क्षेत्रीय दायरा: इसका मुख्य फोकस एशिया-प्रशांत (Asia-Pacific) क्षेत्र के देशों पर है।
  • मुख्य उद्देश्य: युवाओं में नेतृत्व, सामाजिक नवाचार (Social Innovation) और उद्यमिता (Entrepreneurship) को बढ़ावा देकर सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के कार्यान्वयन में तेजी लाना।

2. अटल इनोवेशन मिशन (AIM)

  • नोडल एजेंसी: यह नीति आयोग (NITI Aayog) के तहत भारत सरकार की एक प्रमुख पहल है, जिसमें SETU (Self-Employment and Talent Utilisation) कार्यक्रम भी शामिल है।
  • उद्देश्य: देश में नवाचार और उद्यमिता की संस्कृति को बढ़ावा देना।
  • कार्यप्रणाली: यह वैश्विक स्तर के ‘इनोवेशन हब्स’, ग्रैंड चैलेंजेस, और तकनीकी क्षेत्रों में स्टार्टअप व्यवसायों तथा स्वरोजगार गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए एक साझा मंच के रूप में कार्य करता है।

3. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP)

  • वैश्विक उपस्थिति: यह 170 से अधिक देशों और क्षेत्रों में गरीबी उन्मूलन, असमानता और बहिष्कार (Exclusion) को कम करने के लिए काम करता है।
  • भारत में भूमिका: भारत सरकार के साथ मिलकर SDGs के स्थानीयकरण (Localization) और उसे गति देने का कार्य।
  • मुख्य कार्यक्षेत्र: सतत और समावेशी विकास, जलवायु कार्रवाई (Climate Action), मजबूत ऊर्जा व पर्यावरण प्रणाली का निर्माण, तथा सभी राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों में स्वास्थ्य प्रणालियों को सुदृढ़ करना।

4. सिटी फाउंडेशन (Citi Foundation)

  • मिशन: दुनिया भर के कम आय वाले समुदायों में आर्थिक प्रगति को बढ़ावा देना और लोगों के जीवन स्तर में सुधार करना।
  • रणनीति: वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) बढ़ाना, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना और आर्थिक रूप से जीवंत समुदायों का निर्माण।
  • दृष्टिकोण: यह “More than Philanthropy” (परोपकार से परे) दृष्टिकोण पर काम करता है, जिसमें सिटी ग्रुप के विशेषज्ञों की विशेषज्ञता का लाभ उठाया जाता है।

5. टी-हब (T-Hub)

  • पहचान: यह विश्व का सबसे बड़ा स्टार्टअप हब है, जो हैदराबाद (तेलंगाना) में स्थित है।
  • कार्य: यह स्टार्टअप्स को उनके विचार (Ideation) के स्तर से लेकर बड़े पैमाने पर विस्तार (Scale) करने तक सहायता प्रदान करता है।
  • पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem): यह स्टार्टअप्स, कॉर्पोरेट्स, शैक्षणिक संस्थानों, सरकारी निकायों और निवेशकों को एक मंच पर लाता है ताकि संस्थागत संरचित सहायता (Structured Support) प्रदान की जा सके।


चर्चा में क्यों? (Why in News?)

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) जुलाई 2026 में एक नया व्यापक आर्थिक संकेतक— सेवा उत्पादन सूचकांक (Index of Services Production – ISP) लॉन्च करने की तैयारी कर रहा है। यह सूचकांक सेवा क्षेत्र (Services Sector) में अल्पकालिक विकास और बदलावों को मापने का काम करेगा।

मुख्य बिंदु व आर्थिक तथ्य

ISP क्या है और इसकी आवश्यकता क्यों है?

  • परिभाषा: ISP एक अल्पकालिक संकेतक (Short-term indicator) है, जो एक निर्दिष्ट आधार वर्ष (Base Period) के सापेक्ष सेवा क्षेत्र द्वारा उत्पादित आउटपुट की मात्रा (Volume of Output) में समय के साथ होने वाले परिवर्तनों को मापता है। यह वास्तविक उत्पादन (Real Output) में बदलाव को ट्रैक करता है।
  • IIP का समकक्ष: जिस प्रकार औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) औद्योगिक क्षेत्र की वृद्धि को मापता है, उसी प्रकार ISP औपचारिक सेवा क्षेत्र (Formal Services Sector) की वृद्धि को मापेगा। यह मासिक आधार पर जारी किया जाएगा।
  • महत्व: वर्ष 2013-14 से भारत के सकल मूल्य वर्धित (GVA) में सेवा क्षेत्र का योगदान 50% से अधिक रहा है। इस क्षेत्र की बढ़ती अहमियत को देखते हुए नीति निर्माताओं के लिए एक उच्च-आवृत्ति संकेतक (High-frequency indicator) आवश्यक था।

संस्थागत ढांचा और क्रियान्वयन टाइमलाइन

  • तकनीकी सलाहकार समिति (TAC): मई 2025 में नीति आयोग की विशिष्ट फेलो सुश्री देबजानी घोष की अध्यक्षता में एक TAC का गठन किया गया था, जिसकी रिपोर्ट जुलाई 2026 के पहले पखवाड़े में जारी होगी।
  • आधार वर्ष (Base Year): ISP का आधार वर्ष 2024-25 तय किया गया है।
  • रिलीज शेड्यूल: वर्ष 2025-26 और अप्रैल 2026 के परीक्षण (Trial) मासिक सूचकांक 14 जुलाई, 2026 को जारी किए जाएंगे। इसके बाद, प्रत्येक महीने की 29 तारीख को 60 दिनों के अंतराल (Lag) के साथ इसे नियमित रूप से जारी किया जाएगा।

कवरेज और डेटा स्रोत (सकारात्मक व नकारात्मक सूची)

ISP मुख्य रूप से तीन प्रमुख डेटा स्रोतों— प्रशासनिक डेटा, GST डेटा और ASISSE पर निर्भर करेगा।

  • शामिल क्षेत्र (Covered Sub-sectors): थोक और खुदरा व्यापार, परिवहन (हवाई और रेलवे), बैंकिंग, बीमा, दूरसंचार, होटल और रेस्तरां, रियल एस्टेट, व्यावसायिक, वैज्ञानिक और तकनीकी सेवाएं, मनोरंजन आदि।
  • बाद में शामिल होने वाले क्षेत्र: स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाएं (गैर-सरकारी) को ASISSE (Annual Survey of Incorporated Services Sector Enterprises) के परिणाम आने के बाद शामिल किया जाएगा, क्योंकि ये GST से मुक्त हैं।
  • बाहर रखे गए क्षेत्र (Exclusions): ISP अनौपचारिक सेवा क्षेत्र (Informal Sector) और मुख्य सरकारी गतिविधियों को कवर नहीं करेगा। बाहर रखे गए प्रमुख क्षेत्र हैं:
    • लोक प्रशासन और रक्षा (Public administration and Defence)
    • केंद्रीय बैंक (RBI) जैसी वित्तीय गतिविधियां
    • व्यक्तिगत सेवाएं और निजी घरों में काम करने वाले घरेलू नौकरों की गतिविधियां
    • सट्टा और सट्टेबाजी (Gambling and betting)

कार्यप्रणाली: संकेतक और डिफ्लेटर (Deflator)

चूंकि सेवाएं अमूर्त (Intangible) होती हैं, इसलिए उनके उत्पादन को मापना जटिल होता है:

  • मात्रा-आधारित संकेतक (Quantity-based): केवल दो उप-क्षेत्रों— हवाई परिवहन और रेलवे में आउटपुट भौतिक मात्रा (जैसे पैसेंजर-किलोमीटर) में मापा जाएगा, इसलिए इन्हें किसी डिफ्लेटर की आवश्यकता नहीं है।
  • मूल्य-आधारित संकेतक (Value-based): शेष क्षेत्रों में GST रिटर्न (GSTR-1) से प्राप्त सर्विस अकाउंटिंग कोड (SAC) के अनुसार बिक्री मूल्य के आंकड़ों का उपयोग किया जाएगा।
  • डिफ्लेटर (Deflator) का उपयोग: सांकेतिक मूल्य (Nominal Value) से मुद्रास्फीति के प्रभाव को हटाकर वास्तविक मात्रा (Real Volume) प्राप्त करने के लिए डिफ्लेटर का उपयोग होता है:
    • थोक व्यापार के लिए WPI (Wholesale Price Index)
    • बैंकिंग और बीमा के लिए CPI General
    • जहां विशिष्ट CPI उपलब्ध नहीं है, वहां CPI Non-Food (गैर-खाद्य) को प्रॉक्सी माना गया है, क्योंकि गैर-खाद्य मुद्रास्फीति का 80% से अधिक हिस्सा सीधे सेवाओं या उनकी लागत बढ़ाने वाले कारकों (जैसे ईंधन, आवास) से जुड़ा होता है।
  • सूचकांक फॉर्मूला: ISP को स्थिर-भार वाले लेस्पियरेस वॉल्यूम इंडेक्स (Laspeyres Volume Index) फॉर्मूले का उपयोग करके संकलित किया जाएगा, जहां भार (Weights) राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी से प्राप्त GVA योगदान पर आधारित होंगे।

  • नोडल मंत्रालय: MoSPI (सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय)।
  • आधार वर्ष और आवृत्ति: आधार वर्ष 2024-25 है और यह एक मासिक सूचकांक है (IIP की तरह)।
  • लेस्पियरेस इंडेक्स (Laspeyres Index): यह अर्थशास्त्र का एक फॉर्मूला है जो आधार वर्ष के भार (Base-weighted) का उपयोग करता है।
  • SAC (Service Accounting Code): यह भारत की GST प्रणाली के तहत सेवाओं के वर्गीकरण की व्यवस्था है, जो संयुक्त राष्ट्र के ‘सेंट्रल प्रोडक्ट क्लासिफिकेशन’ (CPC) का संशोधित रूप है।
  • ASISSE: वार्षिक निगमित सेवा क्षेत्र उद्यम सर्वेक्षण, जो स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों का डेटा प्रदान करेगा।


चर्चा में क्यों? (Why in News?)

हाल ही में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के तहत संचालित कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) ने अपने प्रमुख निर्यात त्वरण कार्यक्रम ‘भारती’ (BHARATI) के पहले बैच (First Cohort) का सफलतापूर्वक समापन किया है।

मुख्य बिंदु

भारती (BHARATI) कार्यक्रम क्या है?

  • पूरा नाम: भारत का हब फॉर एग्रीटेक, रेजिलिएंस, एडवांसमेंट एंड इनक्यूबेशन फॉर एक्सपोर्ट इनोवेशन (Bharat’s Hub for Agritech, Resilience, Advancement and Incubation for Export Innovation)।
  • नोडल एजेंसी: APEDA (वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय)।
  • मुख्य उद्देश्य: कृषि-खाद्य (Agri-food) निर्यात क्षेत्र में नवाचार आधारित विकास को बढ़ावा देना और स्टार्टअप्स को वैश्विक बाजार के अनुकूल बनाना।
  • दीर्घकालिक लक्ष्य: वर्ष 2030 तक APEDA के अनुसूचित उत्पादों के निर्यात को 50 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचाने के भारत के लक्ष्य को हासिल करना।

पहले बैच (Inaugural Cohort) की विशेषताएं

  • कवरेज: देश के 22 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों के 100 स्टार्टअप्स ने इस 120 घंटे के निर्यात-केंद्रित त्वरण कार्यक्रम को पूरा किया।
  • वर्गीकरण: इन 100 स्टार्टअप्स में शामिल थे:
    • 68 कृषि-खाद्य उत्पाद स्टार्टअप।
    • 26 निर्यात-सक्षम तकनीक और सेवा प्रदाता।
    • 6 स्वच्छता और पादप-स्वच्छता (SPS – Sanitary and Phytosanitary) उपायों, ट्रैसेबिलिटी (Traceability) और गुणवत्ता अनुपालन पर काम करने वाले नवाचारी।
  • विविधता: इसमें 17 से लेकर 75 वर्ष तक की आयु के उद्यमियों ने भाग लिया, जिसमें तकनीकी अपनाव की बढ़ती स्वीकार्यता दिखती है।
  • वैश्विक प्रदर्शन: शीर्ष 8 स्टार्टअप्स को दुबई में आयोजित विश्व की सबसे बड़ी खाद्य प्रदर्शनी ‘गल्फूड 2026’ (Gulfood 2026) में भाग लेने का अवसर मिला।

कार्यक्रम के तहत दर्ज की गई प्रमुख निर्यात सफलताएं (Case Studies)

कार्यक्रम शुरू होने के मात्र 3 महीनों के भीतर भारतीय स्टार्टअप्स और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs/FPCs) ने वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं:

  • दुबई (UAE): दो एग्री-टेक स्टार्टअप्स ने मिलकर GI-टैग्ड जर्दालू आम (Jardalu Mangoes) का लगभग 37 मीट्रिक टन (MT) निर्यात किया। साथ ही मध्य प्रदेश के एक जैविक उत्पाद स्टार्टअप ने यूएई की एक बड़ी सुपरमार्केट श्रृंखला के साथ समझौता (MoU) किया।
  • न्यूजीलैंड: पहली बार न्यूट्रास्यूटिकल-आधारित और वनस्पति-युक्त रागी (मिल्ट्स) रेडी-टू-कुक फंक्शनल फूड की समुद्री खेप ऑकलैंड भेजी गई। इसके लिए बाजरा कर्नाटक के FPOs से लिया गया था।
  • सिंगापुर: फल-बैगिंग तकनीक और बाग प्रबंधन सेवाओं से जुड़े स्टार्टअप ने 5 MT आम सिंगापुर भेजे।
  • अमेरिका और ब्रिटेन: महाराष्ट्र की एक किसान उत्पादक कंपनी (FPC) ने GI-टैग्ड अंजीर के रस (Fig Juice) और जामुन के रस का निर्यात किया।
  • यूरोपीय संघ (EU) व ओमान: कर्नाटक के एक स्टार्टअप (1,600+ किसानों का नेटवर्क) ने 40 MT जैविक उत्पाद व स्वदेशी चावल की किस्में (जैसे इंद्रायणी चावल) निर्यात कीं। केरल के एक स्टार्टअप को ओमान से मिलेट आधारित उत्पादों का ऑर्डर मिला।

  • APEDA: कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण, यह वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के तहत एक वैधानिक निकाय (Statutory Body) है।
  • जर्दालू आम और इंद्रायणी चावल: ये दोनों भौगोलिक संकेतक (GI Tag) प्राप्त उत्पाद हैं। जर्दालू आम का संबंध मुख्य रूप से बिहार (भागलपुर) से है।
  • SPS उपाय (Sanitary and Phytosanitary Measures): यह विश्व व्यापार संगठन (WTO) का एक समझौता है जिसके तहत मानव, पशु और पौधों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए निर्यातित खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और सुरक्षा मानक तय किए जाते हैं।
  • 2030 का लक्ष्य: कृषि निर्यात को 50 बिलियन डॉलर तक पहुँचाना।

24 June 2026 PIB Summary पढ़ें


चर्चा में क्यों? (Why in News?)

हाल ही में भारतीय भेषजसंहिता आयोग (Indian Pharmacopoeia Commission – IPC) ने गाजियाबाद स्थित अपने परिसर में ओरल लिक्विड प्रिपरेशन्स (जैसे कफ सिरप आदि) में एथिलीन ग्लाइकोल (EG) और डायथिलीन ग्लाइकोल (DEG) की पहचान के लिए गैस क्रोमैटोग्राफी (GC) तकनीक पर आधारित दूसरा व्यावहारिक प्रशिक्षण कार्यक्रम (22-23 जून 2026) सफलतापूर्वक आयोजित किया।

मुख्य बिंदु

एथिलीन ग्लाइकोल (EG) और डायथिलीन ग्लाइकोल (DEG) क्या हैं?

  • प्रकृति: ये दोनों अत्यधिक विषाक्त और रंगहीन रसायन हैं, जिन्हें किसी भी फार्मास्युटिकल फॉर्मूलेशन (दवाइयों) में शामिल करने की अनुमति नहीं है।
  • स्रोत: ये संदूषक (Contaminants) दवाइयों में इस्तेमाल होने वाले सॉल्वैंट्स या एक्सीपिएंट्स (Excipients – जैसे ग्लिसरीन, प्रोपलीन ग्लाइकोल, सॉर्बिटोल और पॉलीइथाइलीन ग्लाइकोल) के मिलावटी या घटिया होने के कारण अनजाने में दवाओं में शामिल हो जाते हैं।
  • स्वास्थ्य जोखिम: इनकी सूक्ष्म मात्रा भी मानव शरीर के लिए घातक हो सकती है। इसके सेवन से एक्यूट किडनी इंजरी (AKI – तीव्र गुर्दे की चोट), केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS) का ठप होना और रोगी की मृत्यु तक हो सकती है। (विगत वर्षों में वैश्विक स्तर पर कफ सिरप से बच्चों की मौत के मामलों में यही रसायन जिम्मेदार पाए गए थे)।

गैस क्रोमैटोग्राफी (Gas Chromatography – GC) तकनीक

  • कार्यप्रणाली: यह एक उन्नत विश्लेषणात्मक पद्धति (Advanced Analytical Method) है जिसका उपयोग किसी जटिल मिश्रण में मौजूद रसायनों/घटकों को अलग करने, उनकी पहचान करने और उनकी मात्रा मापने के लिए किया जाता है।
  • प्रशिक्षण का फोकस: राज्य दवा परीक्षण प्रयोगशालाओं के विश्लेषकों को सैंपल तैयार करने, इंस्ट्रूमेंट ऑपरेशन, कैलिब्रेशन और क्रोमैटोग्राम विश्लेषण (Data Analysis) का व्यावहारिक अनुभव प्रदान करना।

विनियामक संदर्भ और अनिवार्यता (Regulatory Framework)

  • IP-2022 का संशोधन सूची 09: भारतीय भेषजसंहिता (Indian Pharmacopoeia) 2022 में किए गए संशोधन (संशोधन सूची 09), जो 10 अक्टूबर 2025 से प्रभावी है, के तहत अब भारत में बनने वाले सभी ओरल लिक्विड फॉर्मूलेशन (तरल दवाइयों) में EG और DEG की अनिवार्य जांच का प्रावधान किया गया है।
  • क्षमता निर्माण: इस प्रशिक्षण में हरियाणा, गोवा, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम और मेघालय जैसे राज्यों की सरकारी प्रयोगशालाओं के विश्लेषकों ने भाग लिया ताकि जमीनी स्तर पर मानकों का कड़ाई से पालन हो सके।


चर्चा में क्यों? (Why in News?)

हाल ही में संचार मंत्रालय के दूरसंचार विभाग (DoT) के प्रमुख दूरसंचार अनुसंधान एवं विकास केंद्र C-DOT (सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ टेलीमैटिक्स) ने IIT हैदराबाद (IITH) के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके तहत IIT हैदराबाद में उत्कृष्टता केंद्र (Centre of Excellence – CoE) की स्थापना की जाएगी।

मुख्य बिंदु

उत्कृष्टता केंद्र (CoE) के मुख्य उद्देश्य और फोकस क्षेत्र

  • स्वदेशी अनुसंधान (Indigenous R&D): इसका उद्देश्य उन्नत संचार के क्षेत्रों में स्वदेशी अनुसंधान, नवाचार और क्षमता निर्माण (Capacity Building) को गति देना है।
  • अकादमिक-उद्योग तालमेल (Academia-Industry Synergy): यह केंद्र IIT हैदराबाद की शैक्षणिक उत्कृष्टता और C-DOT की तकनीकी विशेषज्ञता को मिलाकर एक समर्पित हब के रूप में कार्य करेगा।
  • प्रमुख तकनीकी फोकस क्षेत्र:
    • 5G एडवांस्ड और 6G तकनीक: भारत के ‘भारत 6G विज़न’ को मजबूत करना।
    • क्वांटम और पोस्ट-क्वांटम संचार: सुरक्षित संचार प्रणालियों (जैसे QKD – क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन) का विकास।
    • एआई-संचालित नेटवर्क और उपकरण: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित संचार ढांचा।
    • साइबर सुरक्षा: उन्नत सुरक्षा प्रणालियों का विकास।
    • व्यापक स्तर पर MIMO (Multiple-Input Multiple-Output) सिस्टम और एकीकृत सेंसिंग व संचार प्रणालियाँ।

C-DOT का राष्ट्रीय नेटवर्क और स्टार्ट-अप सहयोग

  • चौथा CoE: IIT हैदराबाद में स्थापित होने वाला यह केंद्र C-DOT द्वारा स्थापित चौथा CoE है। इससे पहले IIT कानपुर, IIT गांधीनगर और IIT रुड़की में ऐसे केंद्र स्थापित किए जा चुके हैं।
  • स्टार्ट-अप सहयोग: C-DOT पहले से ही IIT हैदराबाद द्वारा इनक्यूबेट किए गए स्टार्ट-अप ‘WISIG’ के साथ मिलकर विघटित 5G ओ-रैन (O-RAN – Open Radio Access Network) समाधानों के विकास और तैनाती पर काम कर रहा है। यह नया CoE भविष्य में अन्य स्टार्ट-अप्स और बौद्धिक संपदा (IPR) निर्माण को और बढ़ावा देगा।

‘विकसित भारत’ के लिए C-DOT के स्वदेशी समाधान

C-DOT के पास कई महत्वपूर्ण तकनीकी समाधान हैं, जिनका उपयोग इस नेटवर्क को मजबूत करने में किया जाएगा:

  • TRINETRA: C-DOT का उन्नत साइबर सुरक्षा सूट (Cybersecurity Suite)।
  • संचार साथी (Sanchar Saathi): एआई-सक्षम नागरिक-केंद्रित एप्लिकेशन और धोखाधड़ी पहचान प्रणाली (Fraud Detection System)।
  • मिशन क्रिटिकल कम्युनिकेशन (MCX): आपातकालीन और रणनीतिक परिस्थितियों के लिए आपदा प्रबंधन प्लेटफॉर्म।

1. C-DOT (सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ टेलीमैटिक्स)

  • परिचय: यह भारत सरकार के संचार मंत्रालय के दूरसंचार विभाग (DoT) के तहत देश का शीर्ष स्वायत्त (Autonomous) दूरसंचार अनुसंधान और विकास (R&D) केंद्र है। इसकी स्थापना 1984 में हुई थी।
  • उद्देश्य: भारत में स्वदेशी दूरसंचार तकनीकों का डिजाइन, विकास और उन्हें जमीन पर उतारना (जैसे 4G/5G कोर नेटवर्क, राउटर आदि)।

2. ओ-रैन (Open RAN / Open Radio Access Network)

  • अवधारणा: पारंपरिक दूरसंचार नेटवर्क में ‘रेडियो एक्सेस नेटवर्क’ (वह हिस्सा जो आपके फोन को मोबाइल टावर से जोड़ता है) के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों किसी एक ही कंपनी (जैसे नोकिया, एरिक्सन या हुआवेई) के होते हैं। ओ-रैन (Open RAN) इस एकाधिकार को तोड़ता है।
  • यह कैसे काम करता है? ओ-रैन नेटवर्क के विभिन्न हिस्सों के बीच के इंटरफेस को ‘ओपन’ (खुला) कर देता है। इसके तहत सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर को अलग (Disaggregate) कर दिया जाता है। इसका मतलब है कि कोई टेलीकॉम ऑपरेटर किसी एक कंपनी का सॉफ्टवेयर और दूसरी कंपनी का हार्डवेयर (जैसे टावर का एंटीना) एक साथ मिलाकर इस्तेमाल कर सकता है।
  • UPSC के लिए महत्व: यह भारत जैसे विकासशील देशों के लिए नेटवर्क निर्माण की लागत (Cost) घटाता है, सुरक्षा बढ़ाता है और घरेलू स्टार्टअप्स (जैसे WISIG) को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने का मौका देता है।

3. माईमो तकनीक (MIMO – Multiple-Input Multiple-Output)

  • तकनीक क्या है? यह वायरलेस संचार (जैसे 4G, 5G और आगामी 6G) की एक रेडियो एंटीना तकनीक है। पारंपरिक प्रणालियों में सिग्नल भेजने और प्राप्त करने के लिए एक-एक एंटीना का उपयोग होता था, जिससे डेटा स्पीड कम रहती थी।
  • कार्यप्रणाली: MIMO तकनीक में ट्रांसमीटर (सिग्नल भेजने वाला) और रिसीवर (सिग्नल प्राप्त करने वाला) दोनों स्तरों पर एक साथ कई एंटेना का उपयोग किया जाता है।
  • फायदे: * बिना अतिरिक्त स्पेक्ट्रम (फ्रीक्वेंसी) खरीदे, एक ही चैनल पर डेटा ट्रांसफर की गति (Speed) कई गुना बढ़ जाती है।
    • नेटवर्क की क्षमता (Capacity) और सिग्नल की गुणवत्ता मजबूत होती है, जिससे घने शहरी इलाकों में भी कॉल ड्रॉप और स्लो इंटरनेट की समस्या कम होती है।

4. QKD (क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन)

  • परिचय: यह क्वांटम मैकेनिक्स (भौतिकी) के सिद्धांतों पर आधारित एक अत्यंत सुरक्षित संचार पद्धति है। इसका उपयोग मुख्य रूप से रक्षा, बैंकिंग और रणनीतिक सरकारी डेटा को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है।
  • यह कैसे काम करता है? सामान्य डिजिटल सुरक्षा में डेटा को गणितीय एल्गोरिदम (क्रिप्टोग्राफी) से सुरक्षित किया जाता है, जिसे सुपरकंप्यूटर द्वारा भविष्य में हैक किया जा सकता है। QKD में सुरक्षा चाबियों (Cryptographic Keys) को फोटॉन (प्रकाश के कणों) के रूप में भेजा जाता है।
  • हैक-प्रूफ होने का कारण: क्वांटम भौतिकी का नियम (No-cloning theorem) कहता है कि यदि कोई तीसरा व्यक्ति (हैकर) इन फोटॉन्स को बीच में टैप या मापने (Measure) की कोशिश करेगा, तो फोटॉन्स की मूल स्थिति तुरंत बदल जाएगी और मुख्य डेटा नष्ट/परिवर्तित हो जाएगा। इससे सेंडर और रिसीवर को तुरंत पता चल जाता है कि नेटवर्क से छेड़छाड़ हुई है।

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