सिविल सेवा और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के लिए 29 जुलाई 2026 The Hindu Notes In Hindi Pdf अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस अंक में पर्यावरण संरक्षण, अंतरिक्ष विज्ञान और राष्ट्रीय नीतियों से जुड़े कई अहम विषयों को शामिल किया गया है। इनमें बाघों के संरक्षण के लिए TOTR (Tigers Outside Tiger Reserves) पहल, पश्चिमी घाट इको-ज़ोन का नया ड्राफ्ट, ऐतिहासिक दुर्ग संरक्षण मॉडल, और ब्रह्मांड के रहस्यों को समेटे एंड्रोमेडा गैलेक्सी जैसे विषय शामिल हैं।
दुर्ग संरक्षण दृष्टिकोण: पारंपरिक वन्यजीव संरक्षण का मॉडल
- GS Paper III (पर्यावरण और पारिस्थितिकी)
- विषय:संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण।
Context
हाल ही में ‘Ecosystems and People’ जर्नल में प्रकाशित एक नए शोध लेख में “दुर्ग संरक्षण (Fortress Conservation)” मॉडल की कमियों पर प्रकाश डाला गया है और इसके विकल्प के रूप में पारंपरिक वन प्रबंधन का समर्थन किया गया है।
प्रमुख बिंदु (Key Points)
दुर्ग संरक्षण दृष्टिकोण (Fortress Conservation Approach) क्या है?
- परिभाषा: यह पारंपरिक वन्यजीव संरक्षण का एक ऐसा मॉडल है जिसमें वन्यजीवों की रक्षा के लिए जंगलों से स्थानीय समुदायों और स्वदेशी लोगों (Indigenous People) के अधिकारों को बेदखल किया जाता है या उन्हें प्रतिबंधित किया जाता है।
- प्रभाव: इसके कारण दुनिया भर में स्वदेशी समुदायों का विस्थापन, लगातार मानसिक संकट, आजीविका का नुकसान और गहरी निराशा देखी गई है।
सोलिगा जनजाति (Soliga Tribe) का मॉडल: एक बेहतर विकल्प
- क्षेत्र: कर्नाटक के पश्चिमी घाट में स्थित बिलिगिरि रंगस्वामी मंदिर वन्यजीव अभयारण्य (BRT Sanctuary)।
- सह-अस्तित्व: सोलिगा जनजाति के लोग सहस्रों वर्षों से बाघों, हाथियों और तेंदुओं जैसे वन्यजीवों के साथ सामंजस्य बिठाकर रह रहे हैं और वन संसाधनों का प्रबंधन कर रहे हैं।
- पारंपरिक प्रबंधन तकनीकें:
- मोज़ेक लिटर बर्निंग (Mosaic Litter Burning): पत्थरों और कचरे को छोटे-छोटे हिस्सों में नियंत्रित रूप से जलाना।
- लघु-स्तरीय झूम कृषि (Small-scale Swidden Agriculture): कुछ वर्षों के लिए भूमि पर खेती करना, जिससे बाद में स्वादिष्ट घास उगती है जो शाकाहारी और मांसाहारी (विशेषकर बाघों) दोनों के लिए भोजन का कार्य करती है।
- हस्तक्षेप रहित वन: इन पारंपरिक तरीकों के कारण जंगल में Lantana camara जैसे हानिकारक आक्रामक खरपतवारों (Invasive Weeds) का प्रसार नहीं होता है।
इस मॉडल के लाभ (Benefits)
- Win-Win Situation: स्थानीय लोगों के पारंपरिक ज्ञान और कौशल को शामिल करने से एक ओर जहाँ जनजातीय समुदायों की आजीविका और कल्याण सुनिश्चित होता है, वहीं दूसरी ओर सरकारों के लिए प्रबंधन लागत कम होती है और वन्यजीवों की सुरक्षा बेहतर होती है।
- मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व: “हम सदियों से बाघों के साथ रह रहे हैं। हम बाघों और हाथियों के व्यवहार को जानते हैं, और वे हमारे व्यवहार को जानते हैं।”—यह दृष्टिकोण मानव-वन्यजीव संघर्ष को न्यूनतम करने में मददगार है।
केंद्र ने पश्चिमी घाट इको-ज़ोन पर ड्राफ्ट फिर से जारी किया।
- GS Paper III (पर्यावरण और संरक्षण)
- विषय: पर्यावरण संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA), और विकास बनाम पर्यावरण की बहस।
Context
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने पश्चिमी घाट (Western Ghats) में एक पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) प्रस्तावित करने वाले अपने मसौदे (Draft Notification) को एक दशक से अधिक समय में सातवीं बार फिर से जारी किया है। पिछला मसौदा 27 जुलाई 2026 को अंतिम रूप दिए बिना ही समाप्त (lapse) हो गया था।
प्रमुख बिंदु (Key Points)
ताजा मसौदे के मुख्य प्रावधान और प्रतिबंध
- समय सीमा: यह ताजा मसौदा (27 जुलाई 2026 को जारी) केंद्र सरकार द्वारा अंतिम अधिसूचना पर विचार करने से पहले 60 दिनों तक सार्वजनिक आपत्तियों के लिए खुला रहेगा।
- प्रतिबंधित गतिविधियाँ: अंतिम रूप दिए जाने के बाद इस क्षेत्र में खनन (Mining), उत्खनन (Quarrying), बालू खनन, नए ताप विद्युत संयंत्र (Thermal Power Plants), कुछ विशेष उद्योग और बड़े निर्माण प्रोजेक्ट पूरी तरह प्रतिबंधित होंगे।
- विनियमित गतिविधियाँ: जलविद्युतउत्पादन जैसी गतिविधियों को विनियमित (Regulate) किया जाएगा।
राज्यों के साथ लंबे समय से विवाद के कारण
- असहमति: केंद्र सरकार और पश्चिमी घाट के छह राज्यों (गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु) के बीच सटीक गांवों और क्षेत्रों को ईको-सेंसिटिव जोन में शामिल करने को लेकर लंबे समय से मतभेद बने हुए हैं।
- राज्य सरकारों की चिंताएँ: राज्यों का तर्क है कि ESA घोषित होने से कृषि, बागवानी (Plantations), बुनियादी ढांचे के विकास और स्थानीय आजीविका पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
- विशेषज्ञ समिति: वर्ष 2022 में गठित एक विशेषज्ञ समिति अभी भी राज्यों द्वारा सुझाए गए गांवों के सही नामों और क्षेत्रों के संबंध में आपत्तियों की जांच कर रही है।
प्रस्तावित क्षेत्रफल और वितरण (State-wise Breakdown)
ताजे मसौदे में ESA का कुल क्षेत्रफल 56,825.7 वर्ग किमी रखा गया है, जिसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है:
- कर्नाटक: 20,668 वर्ग किमी
- महाराष्ट्र: 17,340 वर्ग किमी
- केरल: 9,993.7 वर्ग किमी
- तमिलनाडु: 6,914 वर्ग किमी
- गोवा: 1,461 वर्ग किमी
- गुजरात: 449 वर्ग किमी
- (नोट: केरल ने अपनी स्वतंत्र मैदानी जाँच के बाद कस्तूरीरंगन समिति की 13,108 वर्ग किमी की सिफारिश को घटाकर 9,993.7 वर्ग किमी कर लिया था।)
पश्चिमी घाट ESA विवाद की पृष्ठभूमि:
- माधव गाडगिल समिति (2011): इस पैनल ने सिफारिश की थी कि पूरे 1,29,000 वर्ग किमी के पर्वतीय क्षेत्र को विभिन्न स्तरों के संरक्षण के साथ ‘पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील’ माना जाना चाहिए।
- के. कस्तूरीरंगन समिति: राज्यों की आपत्तियों के बाद गठित इस उच्च-स्तरीय कार्य समूह ने सिफारिश की थी कि पश्चिमी घाट के लगभग 37% हिस्से (59,940 वर्ग किमी प्राकृतिक परिदृश्य) को ESA घोषित किया जाना चाहिए।
ESZs क्या हैं और इनकी क्या भूमिका है?
- परिभाषा:इन्हें ‘इको-फ्रैगाइल एरिया’ भी कहा जाता है। ये राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के चारों ओर का वह क्षेत्र है जहाँ मानवीय प्रभाव को कम करने के लिए विशेष नियम लागू किए जाते हैं।
- शॉक एब्जॉर्बर के रूप में कार्य: ये क्षेत्र मुख्य कोर क्षेत्रों (Core Ecosystems) और अत्यधिक मानवीय गतिविधियों वाले क्षेत्रों के बीच संक्रमण क्षेत्र (Transition Zones) के रूप में कार्य करते हैं, जिससे जंगलों और वन्यजीवों पर दबाव कम होता है।
कानूनी दर्जा और नियामक आधार (Legal Status)
- महत्वपूर्ण तथ्य: आश्चर्यजनक रूप से, “इको-संवेदनशील जोन” शब्द का प्रत्यक्ष उल्लेख वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 में नहीं है।
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986: ESZs को पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3(2)(v) के तहत केंद्र सरकार(पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय-MoEFCC) द्वारा आधिकारिक रूप से अधिसूचित किया जाता है, जो सरकार को विशिष्ट क्षेत्रों में औद्योगिक और अन्य गतिविधियों को प्रतिबंधित करने की शक्ति देता है।
10-किलोमीटर का नियम (The 10-km Rule)
- दायरा: राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना (2002–2016) के अनुसार, ESZs आमतौर पर किसी संरक्षित क्षेत्र के चारों ओर 10 किलोमीटर के दायरे तक फैले होते हैं।
- अपवाद: यदि किसी क्षेत्र में महत्वपूर्ण पारिस्थितिक गलियारे (Ecological Corridors) या विशेष रूप से संवेदनशील प्रजातियाँ मौजूद हैं, तो सरकार 10 किलोमीटर की सीमा से परे भीESZ के दायरे को बढ़ा सकती है।
एंड्रोमेडा गैलेक्सी (Andromeda Galaxy)
खगोलविदों ने हबल स्पेस टेलीस्कोप (Hubble Space Telescope) के डेटा का उपयोग करके एंड्रोमेडा गैलेक्सी (Andromeda Galaxy) के अधिकांश हिस्से में पिछले 500 मिलियन (50 करोड़) वर्षों में हुए तारों के निर्माण (Star Formation) का अब तक का सबसे स्पष्ट मानचित्र तैयार किया है।
प्रमुख बिंदु (Key Points)
एंड्रोमेडा गैलेक्सी (Andromeda Galaxy) से जुड़े मुख्य निष्कर्ष
- आकार और टक्कर की संभावना: एंड्रोमेडा आकाशगंगा, हमारी अपनी आकाशगंगा (Milky Way) से 2 से 2.5 गुना चौड़ी है। दोनों आकाशगंगाओं के अगले 10 अरब वर्षों के भीतर आपस में टकराने की संभावना है।
- तारों के निर्माण में गिरावट: एंड्रोमेडा में तारों के बनने की दर (Star Formation Rate) में लगातार गिरावट आई है, विशेषकर पिछले 40 मिलियन वर्षों में। हाल ही में तारों का निर्माण मुख्य रूप से आकाशगंगा की वलय संरचनाओं (Ring Structures) में केंद्रित था, और वहीं पर निर्माण की दर में सबसे अधिक गिरावट भी दर्ज की गई है।
- ‘डेड ज़ोन’ की खोज: एंड्रोमेडा की एक छोटी उपग्रह आकाशगंगा (Satellite Galaxy) M32 के पास एक ‘डेड ज़ोन’ पाया गया है। M32 के सबसे करीब वाले हिस्से में नए तारों का बनना लगभग पूरी तरह बंद हो गया है। यह इस बात का संकेत है कि M32 हाल ही में एंड्रोमेडा की तारों की डिस्क से गुजरी होगी या टकराई होगी, जिससे उन गैस बादलों को विक्षोभ (Disrupt) हुआ जिनसे नए तारे बनते हैं।
आकाशगंगाओं का जीवन चक्र और ‘मध्य आयु’ (Middle Age)
- सेवानिवृत्ति की ओर संक्रमण: शोधकर्ताओं का मानना है कि एंड्रोमेडा गैलेक्सी वर्तमान में एक जीवंत, सक्रिय आकाशगंगा से अपनी ‘मध्य आयु’ (Middle Age) में प्रवेश कर रही है और सेवानिवृत्ति (Quiescent State) जैसी शांत स्थिति की ओर बढ़ रही है।
- खगोल विज्ञान के लिए महत्व: शोधकर्ताओं के अनुसार, यदि किसी आकाशगंगा की सक्रियता तेजी से बदल रही है, तो दूर की आकाशगंगाओं को मापने के पारंपरिक उपकरण उसकी स्वास्थ्य का भ्रामक चित्र दिखा सकते हैं। इसलिए, एंड्रोमेडा को समझना विशाल आकाशगंगाओं के जीवन को बेहतर ढंग से समझने का मार्ग प्रशस्त करता है।
शहर का डरावना सपना — आग जिससे बचने का कोई रास्ता नहीं
- GS Paper II:शासन व्यवस्था (Governance), पारदर्शिता और जवाबदेही, ई-गवर्नेंस, और 74वें संविधान संशोधन के कार्यान्वयन की चुनौतियाँ।
- GS Paper III:आपदा प्रबंधन (Disaster Management), शहरी नियोजन (Urban Planning), और शहरी क्षेत्रों में अग्नि सुरक्षा (Fire Safety)।
Context
लखनऊ (अलीगंज) और दिल्ली (मालवीय नगर) जैसी जगहों पर हाल ही में हुई भीषण आग की दुर्घटनाओं और देश के अन्य शहरी केंद्रों (नोएडा, इंदौर, बेंगलुरु, मुंबई) में बुनियादी नागरिक विफलताओं ने भारत के शहरी प्रशासन और शासन (Urban Governance) की पोल खोल दी है।
प्रमुख बिंदु (Key Points)
1. शहरी शासन में विफलता और “मृत्यु जाल” (Death Traps)
- अवैध निर्माण और अग्नि सुरक्षा की अनदेखी: वाणिज्यिक प्रतिष्ठान और आवासीय क्षेत्रों में बिना अग्नि निकास (Fire Escape) और उचित लाइसेंस के चल रहे कार्यस्थल “डेथ ट्रैप” बन चुके हैं।
- आंकड़े और रुझान: भारत में हर साल लगभग 13,000 से 15,000 लोगों की मौत आग से जुड़ी दुर्घटनाओं में होती है। चरम हीटवेव और विद्युत शॉर्ट-सर्किट के कारण यह संकट और गंभीर होता जा रहा है।
- राजनीतिक संरक्षण और भ्रष्टाचार: नियमों की अनदेखी के पीछे राजनीतिक संरक्षण, वोट-बैंक की राजनीति, अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (Informal economies) और व्यापक भ्रष्टाचार मुख्य कारण हैं। उदाहरण के लिए, लखनऊ की जिस इमारत में आग लगी, उसे 2016 में विध्वंस का नोटिस मिला था, जिसे राजनीतिक प्रभाव के कारण वापस ले लिया गया था।
2. प्रौद्योगिकी की उपलब्धता बनाम क्रियान्वयन की कमी
- आज भारत के पास अंतरिक्ष तकनीक और संसाधन मौजूद हैं—उपग्रह चित्र (Satellite imagery) से अतिक्रमण की पहचान, ड्रोन से अवैध निर्माण की मैपिंग, जीआईएस (ज्योग्राफिक इंफॉर्मेशन सिस्टम) से भूमि उपयोग में बदलाव, और एआई (AI) से विसंगतियों का पता लगाया जा सकता है।
- इसके बावजूद, जवाबदेही तय करने और कार्रवाई करने के बजाय केवल समितियां बनाने और रिपोर्ट सौंपने की संस्कृति (Closed-loop bureaucracy) हावी है।
3. शहरी शासन की संरचनात्मक कमियाँ (Structural Deficits)
- 74वाँ संविधान संशोधन (1992):तीन दशक बीत जाने के बाद भी शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को वास्तविक रूप से सशक्त नहीं बनाया गया है।
- बिना अधिकार के उत्तरदायित्व : हर राज्य में मुख्यमंत्री ही व्यावहारिक रूप से सभी शहरों के ‘डिफ़ैक्टो मेयर’ होते हैं। निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास दृश्यता तो है पर शक्ति नहीं।
- एजेंसियों का विखंडन (Fragmentation): सड़क एक एजेंसी की, नाली दूसरी की, भूमि तीसरी की और प्रवर्तन (Enforcement) चौथी एजेंसी का होता है। इस बिखराव के कारण एक खतरनाक जवाबदेही का निर्वात (Accountability Vacuum) पैदा होता है।
आगे की राह (Way Forward)
- नई योजनाओं के बजाय शासन सुधार: भारत में योजनाओं या स्कीमों की कमी नहीं है, बल्कि सुशासन और क्रियान्वयन की कमी है।
- सशक्त स्थानीय निकाय: शहरी संस्थानों को वित्तीय और प्रशासनिक रूप से स्वायत्त और पेशेवर रूप से प्रबंधित बनाना होगा।
- प्रवर्तन में राजनीतिक इच्छाशक्ति: राजनीतिक निहित स्वार्थों से ऊपर उठकर कानूनों का कड़ाई से पालन कराना होगा।
- प्रौद्योगिकी का उपयोग: तकनीक का उपयोग केवल आधुनिकीकरण दिखाने के लिए नहीं, बल्कि अनुपालन (Compliance) सुनिश्चित करने के लिए किया जाना चाहिए।
🎯 प्रारंभिक परीक्षा (Prelims): महत्वपूर्ण तथ्य
- शहरी स्थानीय निकाय (ULBs) और संवैधानिक प्रावधान: भारतीय संविधान का भाग IX-A (अनुच्छेद 243P से 243ZG) और 74वाँ संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1992 नगरपालिकाओं के गठन और शक्तियों से संबंधित है।
- नियामक ढांचा: भारत में अग्नि सुरक्षा और भवन उपनियम (Building Bye-laws) मुख्य रूप से राज्य सरकारों और स्थानीय नगर निगमों/विकास प्राधिकरणों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
- पर्यावरण और आपदा प्रबंधन: शहरी बाढ़ (Urban Flooding) और शहरी आगजनी जैसी मानव-निर्मित आपदाएं राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के दिशानिर्देशों के दायरे में आती हैं।
रिज़र्व के बाहर बाघों के साथ सह-अस्तित्व
- GS Paper III (पर्यावरण और पारिस्थितिकी)
- विषय:संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, जैव विविधता, और मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict)।
Context
भारत में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ (Project Tiger) की सफलता के परिणामस्वरूप देश में बाघों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। इसके साथ ही, एक नई संरक्षण चुनौती सामने आई है—संरक्षित क्षेत्रों से बाहर (Outside Protected Areas) रहने वाले बाघों की बढ़ती संख्या, जिसके समाधान के लिए पर्यावरण मंत्रालय ने TOTR (Tigers Outside Tiger Reserves) पहल शुरू की है।
प्रमुख बिंदु (Key Points)
भारत की बाघ संरक्षण की सफलता और नई सीमा (New Conservation Frontier)
- प्रोजेक्ट टाइगर (1973): इसके तहत देश में बाघ आरक्षित क्षेत्रों (Tiger Reserves) का दायरा 9 रिजर्व (18,278 वर्ग किमी) से बढ़कर 58 रिजर्व (84,488 वर्ग किमी) हो गया है, जो भारत के भूभाग का लगभग 2.6% है।
- बाघों की संख्या: देश में बाघों की संख्या 2006 के 1,411 से बढ़कर 2022 में 3,682 हो गई है, जो दुनिया के कुल जंगली बाघों का 70% से अधिक है।
- बढ़ता संकट: राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के अनुसार, भारत की 35-40% बाघ आबादी अब नामित टाइगर रिजर्व से बाहर रहती है। जब कोर habitat संतृप्त (Saturated) हो जाते हैं, तो प्रादेशिक मांसाहारी होने के कारण बाघ स्वाभाविक रूप से मानव-प्रभुत्व वाले क्षेत्रों की ओर फैलते हैं।
TOTR (Tigers Outside Tiger Reserves) पहल क्या है?
- उद्देश्य: संरक्षित क्षेत्रों के बाहर बाघों के संरक्षण और मानव जीवन व आजीविका की सुरक्षा के लिए एक वैज्ञानिक रूप से आधारित, परिदृश्य-आधारित (Landscape-based) ढांचा स्थापित करना।
- दृष्टिकोण में बदलाव: यह पहल केवल घटना के बाद प्रतिक्रिया (Reactive Crisis Management) देने के बजाय तकनीक, तत्परता और सामुदायिक भागीदारी पर आधारित सक्रिय (Proactive) शासन की वकालत करती है।
- पहला चरण (Pilot Phase): इसे एक लक्षित पायलट प्रोजेक्ट के रूप मेंशुरू किया गया है। अखिल भारतीय बाघ अनुमान (2022) के आधार पर 9 राज्यों के 40 वन मंडलों (Forest Divisions) को पहले चरण के लिए चुना गया है।
- शामिल राज्य: उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना और असम।
TOTR के दो पूरक स्तंभ (Two Complementary Pillars)
- मानव-बाघ संघर्ष को कम करना और क्षेत्र सुरक्षा: संचार प्रणालियों को उन्नत करना, त्वरित प्रतिक्रिया दल (Rapid Response Teams) तैनात करना, बचाव के बुनियादी ढांचे में सुधार करना और आपात स्थिति में समन्वित कार्रवाई सुनिश्चित करना।
- दीर्घकालिक सह-अस्तित्व (Long-term Coexistence):
- स्थानीय समुदायों का विश्वास और भागीदारी हासिल करना।
- जागरूकता कार्यक्रम, समय पर मुआवजा (Compensation mechanisms) देना और ग्रामीणों को संरक्षण में साझीदार बनाना।
प्रौद्योगिकी और संस्थागत क्षमता की भूमिका
- आधुनिक तकनीक: निगरानी मजबूत करने और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों में सुधार के लिएकैमरा ट्रैप, जीपीएस-सक्षम निगरानी प्रणाली, ड्रोन और एआई (AI) का उपयोग।
- संस्थागत क्षमता: प्रौद्योगिकी के साथ-साथ अच्छी तरह से प्रशिक्षित वन कर्मचारियों, पशु चिकित्सकों और बचाव दलों की आवश्यकता है जो संकट की स्थिति में तेजी से प्रतिक्रिया दे सकें।
🎯 Revision points
- TOTR (Tigers Outside Tiger Reserves) पहल: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा शुरू की गई।
- All-India Tiger Estimation 2022:
- भारत में कुल बाघ: 3,682 (दुनिया के 70% से अधिक)।
- संरक्षित क्षेत्रों के बाहर रहने वाले बाघ: कुल आबादी का 35-40%।
- प्रोजेक्ट टाइगर: वर्ष 1973 में शुरू किया गया था। वर्तमान में देश में कुल 58 टाइगर रिजर्व हैं।