Give The Best…..Take The Best

29 July 2026 The Hindu Notes In Hindi Pdf

29 July 2026 The Hindu Notes In Hindi Pdf के इस अंक में हड़प्पा सभ्यता के पतन और पर्यावरण बदलाव के नए खुलासे, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूर्वव्यापी पर्यावरणीय मंजूरी (Ex post facto EC) पर सुनाया गया ऐतिहासिक फैसला, और गीग इकोनॉमी से जुड़े अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के कन्वेंशन नंबर 193 पर भारत की स्थिति जैसे प्रासंगिक विषय शामिल हैं। इसके अलावा, E20 ईंधन वाहन अनुकूलता, अमेरिकी प्रतिबंध विधेयक और देश में अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय की बदलती संरचना जैसे मुख्य आर्थिक व तकनीकी मुद्दों का गहन विश्लेषण इस लेख में प्रस्तुत किया गया है, जो मुख्य परीक्षा (Mains) और प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) दोनों के लिए अति उपयोगी है।

In News

  • संदर्भ: विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले स्वायत्त संस्थान बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज (BSIP) के शोधकर्ताओं ने हाल ही में हड़प्पा सभ्यता/सिंधु घाटी सभ्यता (IVC) के पतन और संकुचन से संबंधित नए जलवायु साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं।
  • मुख्य निष्कर्ष: हड़प्पा सभ्यता के संकुचन और लोगों के पलायन का मुख्य कारण अचानक हुआ जलवायु परिवर्तन (ACC) था, विशेष रूप से लगभग 4200 वर्ष पूर्व कमजोर भारतीय ग्रीष्म मानसून (ISM)।

अध्ययन के मुख्य बिंदु (Key Highlights of the Study)

  • अध्ययन स्थल: गढ़वाल हिमालय में स्थित देवरिया ताल की झील से तलछट कोर (sediment core) की जांच की गई।
  • काल-निर्धारण (Dating): ट्रेपा बीज (सिंघाड़ा) के खोलों पर 10 एएमएस रेडियोकार्बन (14C) तिथियों का उपयोग करके उच्च-रिज़ॉल्यूशन पराग-आधारित रिकॉर्ड विकसित किया गया।
  • प्रमुख घटना (4.2k Event): लगभग 4250 कैलेंडर वर्ष बीपी (Before Present) के आसपास ‘ओक/पाइन’ अनुपात में अचानक वृद्धि देखी गई, जो 4.2 हजार वर्ष पुरानी घटना” (4.2k event – मेघालय युग) से मेल खाती है। यह दुनिया भर में एक अल्पकालिक शुष्क जलवायु स्थिति थी।

हड़प्पा सभ्यता के संकुचन के कारण (Causes of IVC Contraction & Migration)

  • मानसून का कमजोर होना: लगभग 5100 और 4000 कैलेंडर वर्ष पूर्व के बीच भारतीय ग्रीष्म मानसून (ISM) कमजोर हो गया था।
  • नदी प्रणालियों का सूखना: थार रेगिस्तान के किनारे बहने वाली नदियों (विशेषकर सिंधु और घग्गर-हाकरा नदी घाटियों) में नियमित मौसमी बाढ़ आनी बंद हो गई।
  • पलायन (Migration): जल और कृषि संकट के कारण सिंधु घाटी सभ्यता के लोग सिंधु और घग्गर-हाकरा घाटियों से पूर्व की ओर गंगा के मैदानी इलाकों (Gangetic Plains) के नए क्षेत्रों की तरफ पलायन कर गए।
  • भौगोलिक व वायुमंडलीय कारक:
    • आईटीसीजेड (ITCZ) का दक्षिण की ओर खिसकना: उत्तरी गोलार्ध में गर्मियों के सौर विकिरण में कमी के कारण अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) दक्षिण की ओर खिसक गया।
    • एल-नीनो और IOD: अल-नीनो का मजबूत चरण और हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) की प्रबल ऋणात्मक अवस्था ने भी मानसून को कमजोर करने में भूमिका निभाई।

होलोसीन युग की अन्य प्रमुख जलवायु घटनाएं (Other Global Climate Events in Holocene)

  1. रोमन वार्म पीरियड (RWP: 2500–1450 कैलेंडर वर्ष बीपी):
    1. उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र के गर्म होने और सौर परिवर्तनशीलता के कारण ISM मजबूत रहा।
    1. इससे कृषि उत्पादकता में वृद्धि हुई, जिसे भारत के स्वर्ण युग” के उदय से जोड़ा जाता है।
  2. मध्यकालीन जलवायु विसंगति (MCA: 1050–650 कैलेंडर वर्ष बीपी):
    1. ITCZ के उत्तर की ओर खिसकने, उच्च सौर विकिरण और अरब सागर में हवा की बढ़ी हुई शक्ति के कारण तीव्र ISM और भारत में अधिक नमी दर्ज की गई।
  3. लघु हिमयुग (LIA: 650–100 कैलेंडर वर्ष पूर्व / 1350–1850 ईस्वी):
    1. इस दौरान ISM सबसे कमजोर था। इसका कारण पश्चिमी जेट स्ट्रीम का तीव्र होना, उत्तरी अटलांटिक दोलन (NAO) और अल-नीनो का गर्म चरण था।

In News

  • संदर्भ: सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के 2021 के कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum – OM) को खारिज कर दिया है, जिसके तहत बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को पूर्वव्यापी पर्यावरणीय मंजूरी दी जाती थी।
  • निर्णय का स्वरूप: यह निर्णय संभावी (prospective) प्रभाव से लागू किया गया है, ताकि AIIMS, विजयपुरा एयरपोर्ट और सिंचाई जैसी चल रही सार्वजनिक परियोजनाओं पर इसका प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य तर्क एवं टिप्पणियां (Key Highlights & Observations)

  • प्रशासनिक आदेश बनाम प्रत्यायोजित विधान: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 2021 का ओएम (OM) एक मात्र प्रशासनिक आदेश है, जो पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत बनाई गई 2006 की मूल अधिसूचना (जो पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी को अनिवार्य बनाती है) को प्रतिस्थापित (supplant) नहीं कर सकता।
  • स्थायी एम्सनेस्टी‘ (माफी) मार्ग अवैध: पूर्वव्यापी मंजूरी की व्यवस्था कोई स्थायी या समानांतर रास्ता नहीं बन सकती। ऐसी माफी योजनाएं दुर्लभ अपवाद (rare exception) होनी चाहिए, जिनकी अवधि सीमित हो।
  • अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन: 2021 का ओएम बिना किसी तार्किक वर्गीकरण के सभी परियोजनाओं पर लागू होता था। यह ‘विवेक और आनुपातिकता’ के पैमाने पर खरा नहीं उतरा और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन करता है।
  • प्रदूषण फैलाओ और भुगतान करोका सिद्धांत: न्यायालय ने कहा कि 2021 के ओएम ने ‘सतत विकास’ के बजाय ‘प्रदूषण फैलाओ और मामूली जुर्माना देकर छूट पालो’ के सिद्धांत को बढ़ावा दिया, जिससे पूर्व EC व्यवस्था निष्प्रभावी हो गई।

न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्देश (Important Directions)

  • भविष्य की माफी योजनाएं: यदि भविष्य में कोई ‘एम्सनेस्टी योजना’ लाई जाती है, तो उसमें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्तिगत लोक सेवकों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई और व्यक्तिगत दायित्व जैसे प्रभावी निवारक उपाय होने चाहिए।
  • अनुच्छेद 142 का दायरा: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय सर्वोच्च न्यायालय को अपने अनुच्छेद 142 के तहत निहित शक्तियों का उपयोग करके असाधारण मामलों में पूर्वव्यापी मंजूरी देने से नहीं रोकता है।
  • पूर्व की मंजूरियों की स्थिति:
    • 2017 की अधिसूचना (जो ‘वन-टाइम एम्सनेस्टी’ प्रदान करती थी) और 2021 के ओएम के तहत पहले दी गई पूर्वव्यापी मंजूरियां वैध बनी रहेंगी, जब तक कि उन्हें कानून के अनुसार अलग से चुनौती न दी जाए।

In News)

  • संदर्भ: केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने संसद में जानकारी दी है कि E20 ईंधन (20% इथेनॉल और 80% पेट्रोल का मिश्रण) का उपयोग करने पर BS-III वाहनों के कुछ रबर पार्ट्स और गैसकेट को बदलने की आवश्यकता हो सकती है।
  • अध्ययनकर्ता संस्थान: इस अध्ययन को इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (IOCL), भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (IIP, देहरादून), SIAM और ARAI द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था।

अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष (Key Findings)

  • BS-III वाहनों पर प्रभाव: 1 अप्रैल, 2005 से शुरू किए गए और 2016 से पहले निर्मित BS-III वाहनों में E20 ईंधन के इस्तेमाल से कुछ रबर के पुर्जे और गैसकेट प्रभावित हो सकते हैं। इन्हें वाहन की नियमित सर्विसिंग के दौरान आसानी से बदला जा सकता है।
  • अन्य वाहनों पर प्रभाव: BS-III के अलावा अन्य आधुनिक वाहनों (जैसे BS-IV, BS-VI आदि) की कारों और दो-पहिया वाहनों के इंजन में किसी भी बदलाव की आवश्यकता नहीं है।
  • ईंधन दक्षता (Fuel Efficiency): सरकार का कहना है कि ईंधन दक्षता केवल ईंधन के प्रकार पर नहीं, बल्कि ड्राइविंग और रखरखाव के तरीकों तथा एसी (AC) के लोड जैसे कई अन्य कारकों पर भी निर्भर करती है।

मुख्य विषय (Topic in News)

  • संदर्भ: अमेरिकी सेनेट ने लिंडसे . ग्राहम सेंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026′ को तेजी से पारित करने के लिए क्लोजर मोशन पर मतदान किया।
  • मुख्य प्रावधान: इस विधेयक के तहत रूसी तेल और प्राकृतिक गैस के सबसे बड़े आयातक देशों पर 100% तक का टैरिफ लगाया जा सकता है।
  • उद्देश्य: रूस-यूक्रेन युद्ध के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने से रूसी राष्ट्रपति को रोकना और रूस के ऊर्जा क्षेत्र तथा राजस्व पर दबाव बनाना।

भारत के संदर्भ में प्रभाव (Impact on India)

  • प्रस्तावित टैरिफ:
    • 2025 में पेश किए गए मूल विधेयक में 500% का भारी टैरिफ प्रस्तावित था, जिसे संशोधित करके 100% तक कर दिया गया है।
    • यह नियम रूसी कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के शीर्ष 5 खरीदारों पर लागू करने की योजना है।
  • रूस के प्रमुख खरीदार:
    • चीन: 47% – 50% (रूसी कच्चे तेल का निर्यात)
    • भारत: 36% – 38% (रूसी कच्चे तेल का निर्यात)
  • भारत का कच्चा तेल आयात (जून 2026): भारत के कुल कच्चा तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 50% से अधिक हो चुकी है।
  • अर्थव्यवस्था पर प्रभाव:
    • रियायती दरों पर रूसी क्रूड ऑयल मिलने से भारत का आयात बिल (Import Bill) कम हुआ है।
    • इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) सुनिश्चित हुई है और घरेलू मुद्रास्फीति (Inflation) को नियंत्रित करने में मदद मिली है।
    • 100% टैरिफ लागू होने से भारत के अमेरिकी व्यापार और घरेलू ऊर्जा लागत पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।

छूट का प्रावधान (Carve-out / Exemption Clause)

  • यूरोपीय देशों को राहत: नए विधेयक में उन देशों को छूट (Carve-out) दी गई है जो रूस के कुल प्राकृतिक गैस निर्यात का 15% से कम आयात करते हैं और आयात को कम करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठा रहे हैं।
  • लाभार्थी: इस छूट का मुख्य लाभ कई यूरोपीय देशों को मिलेगा जो अभी भी पाइपलाइन या एलएनजी (LNG) के माध्यम से रूसी गैस पर निर्भर हैं।

In News

  • संदर्भ: संसद के मानसून सत्र के दौरान विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (FCRA Amendment Bill, 2026) को विचार के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
  • पृष्ठभूमि: इस विधेयक को पिछले सत्र में व्यापक विरोध (विशेषकर गैर-सरकारी संगठनों और ईसाई संगठनों द्वारा) के बाद स्थगित कर दिया गया था, लेकिन सरकार ने इसे आगे बढ़ाने की अपनी प्रतिबद्धता स्पष्ट की है।

भारत में FCRA कानून का ऐतिहासिक विकास (Evolution of FCRA)

  • 1976 का पहला कानून: इंदिरा गांधी सरकार के कार्यकाल में आपातकाल के दौरान पहली बार विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 1976 लाया गया था, ताकि विदेशी ताकतों द्वारा भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली को अस्थिर करने से रोका जा सके।
  • 2010 का अधिनियम: 2010 में पुराने कानून को प्रतिस्थापित किया गया, जिसका मुख्य फोकस राजनीति, चुनावी उम्मीदवारों, मीडियाकर्मियों, जजों और सरकारी कर्मचारियों द्वारा विदेशी फंड के लेन-देन पर रोक लगाना था।
  • कानून की प्रकृति: अब तक के सभी कानून विनियामक (regulatory) प्रकृति के थे, जो स्वास्थ्य, शिक्षा और राहत कार्यों के लिए विदेशी फंड के प्रवाह की अनुमति देते थे, बशर्ते वे निर्धारित नियमों का पालन करें।

2026 के संशोधन विधेयक के प्रमुख प्रावधान एवं चिंताएं

  • परिसंपत्तियों का निहित होना (Vesting of Assets):
    • यदि किसी संगठन का पंजीकरण प्रमाणपत्र रद्द कर दिया जाता है, तो उसे मिले विदेशी फंड और उससे बनाई गई संपूर्ण परिसंपत्तियां (चाहे वे आंशिक रूप से विदेशी फंड से ही क्यों न बनाई गई हों) एक नामित प्राधिकारी में निहित हो जाएंगी।
    • प्रमाणपत्र का नवीनीकरण न होने पर इन परिसंपत्तियों को सरकार या स्थानीय प्राधिकरण को स्थानांतरित किया जा सकता है या नीलाम करके उसकी आय भारत की संचित निधि में जमा की जा सकती है।
  • रद्द करने के कठोर आधार:
    • यदि किसी व्यक्ति या संगठन पर जबरन या प्रलोभन द्वारा धार्मिक रूपांतरण का आरोप या मुकदमा दर्ज होता है, या सांप्रदायिक तनाव पैदा करने का आरोप हो, तो पंजीकरण रद्द किया जा सकता है।
    • आलोचकों का मानना है कि ‘सार्वजनिक हित’ शब्द की अस्पष्टता और इस प्रावधान के दुरुपयोग की संभावना अल्पसंख्यक धार्मिक समूहों के खिलाफ बढ़ जाती है।
  • प्रमाणपत्र सरेंडर करने पर भी जब्ती:
    • यदि कोई संगठन खुद अपना FCRA प्रमाणपत्र सरेंडर करता है (क्योंकि उसे अब विदेशी फंड की आवश्यकता नहीं है), तब भी उसके द्वारा पूर्व में बनाए गए सभी आस्तियों (Assets) को सरकार द्वारा जब्त किए जाने का प्रावधान रखा गया है।
  • छूट का खंड (Exemption Clause – Clause 16L):
    • सरकार को यह अधिकार है कि वह ‘सार्वजनिक हित’ में किसी भी संगठन या व्यक्ति को इस विधेयक से छूट दे सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रावधान बिना किसी स्पष्ट और तार्किक वर्गीकरण के होने के कारण संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के तहत चुनौती के दायरे में आ सकता है।

आलोचना

  • विश्लेषकों का मानना है कि यह संशोधन विधेयक NGOs, सांस्कृतिक और धार्मिक संगठनों पर अत्यधिक कड़ा शिकंजा कसता है।
  • इससे उन गैर-लाभकारी संगठनों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है जो शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और मानवाधिकार के क्षेत्रों में विदेशी सहायता के माध्यम से कार्य कर रहे हैं।

In News

  • संदर्भ: जिनेवा में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन (ILC) में कन्वेंशन नंबर 193 – ‘प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था में सभ्य कार्य‘ (Decent Work in the Platform Economy) को अपनाया गया है।
  • महत्व: यह ऐप के माध्यम से आजीविका कमाने वाले राइडर्स, ड्राइवर्स, पिकर्स और डेटा-लेबलर्स के लिए बनाया गया पहला कानूनी रूप से बाध्यकारी (Binding) अंतरराष्ट्रीय संधि है।
  • मतदान की स्थिति: 406 पक्ष में, 8 विपक्ष में और 36 अनुपस्थित (Abstentions)। भारत अनुपस्थित (Abstained) रहा (हालांकि भारत के नियोक्ता और श्रमिक प्रतिनिधियों ने इसके पक्ष में मतदान किया)।

2. कन्वेंशन नंबर 193 के मुख्य प्रावधान  

  • अधिकारों का न्यूनतम स्तर (Floor of Rights): यह कन्वेंशन प्लेटफॉर्म वर्कर्स को उनकी वर्गीकरण स्थिति (चाहे उन्हें ‘कर्मचारी’ कहा जाए या ‘स्वतंत्र साझेदार’) से परे न्यूनतम सुरक्षा प्रदान करता है। इसमें न्यूनतम वेतन, समय पर भुगतान, व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य शामिल हैं।
  • एल्गोरिथम प्रबंधन का नियमन: यह संधि पहली बार अपारदर्शी सॉफ्टवेयर (एल्गोरिदम) को नियंत्रित करती है जो काम आवंटित करता है, वेतन तय करता है और खातों को निष्क्रिय (Deactivate) करता है। प्लेटफॉर्म्स को अब स्वचालित निर्णयों का खुलासा करना होगा और मानव हस्तक्षेप (Human in the loop) रखना होगा।
  • सही वर्गीकरण: इसके अनुच्छेद 9 के तहत सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि श्रमिकों का वर्गीकरण सही ढंग से हो, जो मुख्य रूप से काम की वास्तविक प्रकृति पर आधारित हो।

भारत में गीग इकोनॉमी की स्थिति और चुनौतियां (Gig Economy in India)

  • कार्यबल का आकार: नीति आयोग के अनुमान के मुताबिक, भारत का गीग कार्यबल 2020-21 के लगभग 77 लाख से बढ़कर 2029-30 तक 2.35 करोड़ हो जाएगा, जो गैर-कृषि कार्यबल का लगभग 6.7% होगा।
  • आर्थिक सामाजिक स्थिति:
    • नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 39% गीग वर्कर ₹10,000–₹25,000 और 34% ₹25,000–₹40,000 प्रति माह कमाते हैं।
    • उन्हें 12 घंटे की लंबी शिफ्ट में काम करना पड़ता है, ईंधन का खर्च खुद उठाना पड़ता है और ओवरटाइम का प्रावधान नहीं है।
    • केवल लगभग 15% के पास किसी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा है; बाकियों के पास दुर्घटना कवर, बीमार होने पर मिलने वाला वेतन (Sick pay) या पेंशन नहीं है।

भारत का रुख और घरेलू कानूनी ढांचा (India’s Stance & Domestic Framework)

  • भारत का रुख: भारत ने इस पर मतदान से दूरी (Abstention) बनाई, जो इसकी पुरानी नीति के अनुरूप है कि राष्ट्रीय कानून पूरी तरह से संगत होने के बाद ही अंतरराष्ट्रीय संधियों का अनुसमर्थन (Ratification) किया जाए।
  • घरेलू कानून (सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020): नवंबर 2025 में लागू चार श्रम संहिताओं में से एक, ‘सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020’ दुनिया के पहले केंद्रीय कानूनों में शामिल है, जिसमें “गीग वर्कर” और “प्लेटफॉर्म वर्कर” को परिभाषित किया गया है। यह एग्रीगेटर्स से उनके वार्षिक कारोबार का 1%–2% (श्रमिक भुगतानों के अधिकतम 5% तक) सामाजिक सुरक्षा कोष में देने का निर्देश देता है।
  • कार्यान्वयन की कमी और राज्य स्तर की पहल: केंद्र स्तर पर योजनाओं का संचालन अभी प्रभावी नहीं हुआ है, जबकि कुछ राज्यों ने इस दिशा में कदम उठाए हैं— जैसे राजस्थान का प्लेटफॉर्मआधारित गीग वर्कर अधिनियम, 2023, तथा कर्नाटक और तेलंगाना में कल्याण बोर्डों का गठन।

भारत के इस रुख का प्रभाव (Implications of Abstention)

  • कानूनी सुरक्षा का अभाव: जब तक देश ऐसी संधियों को अपनाकर घरेलू कानून में नहीं बदलते, तब तक श्रमिक प्लेटफॉर्म कंपनियों के खिलाफ कानूनी redressal (निवारण) नहीं पा सकते।
  • एल्गोरिथमिक नियंत्रण जारी रहना: इससे कंपनियों को मनमाने ढंग से खातों को बंद करने और गलत वर्गीकरण जारी रखने की छूट मिलती है।

In News

  • संदर्भ: विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा लोकसभा में दिए गए उत्तर के अनुसार, वर्ष 2021-22 में भारत का अनुसंधान और विकास (R&D) व्यय बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 0.83% हो गया है। यह पहली बार है जब देश ने 0.8% के आंकड़े को पार किया है (इससे पहले 2009-10 में ऐसा देखा गया था)।
  • प्रमुख बदलाव: पहली बार निजी उद्योगों का R&D में योगदान सरकार और अन्य सभी क्षेत्रों के संयुक्त योगदान से अधिक हो गया है।

अध्ययन के मुख्य आंकड़े (Key Data & Trends)

  • GDP के प्रतिशत के रूप में R&D व्यय (GERD):
    • यह लगातार गिरकर वर्ष 2020-21 में अपने सबसे निचले स्तर (0.64%) पर पहुंच गया था, जो 2021-22 में उछलकर 0.83% हो गया।
  • वैश्विक तुलना (अन्य देशों की स्थिति):
    • तुलनात्मक रूप से, चीन (2.4%), जापान (3.3%), दक्षिण कोरिया (4.8%), अमेरिका (3.5%) और इज़राइल (लगभग 5%) अपनी जीडीपी का एक बहुत बड़ा हिस्सा R&D पर खर्च करते हैं।
  • सकल अनुसंधान एवं विकास व्यय (GERD) में वृद्धि:
    • कोविड के कारण 2020-21 में गिरकर यह ₹1.27 लाख करोड़ हो गया था, जो बढ़कर 2021-22 में 1.95 लाख करोड़ और 2023-24 में 2.45 लाख करोड़ पहुंच गया।

निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका (Structural Shift – Private Industry)

  • निजी क्षेत्र का योगदान:
    • निजी उद्योग ने 2020-21 में राष्ट्रीय R&D खर्च का 36.4% हिस्सा दिया था, जो तेजी से बढ़कर 2021-22 में 45.5%, 2022-23 में 48.0% और 2023-24 में 51.8% हो गया।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top