’31 July 2026 The Hindu Notes In Hindi PDF’ के इस अंक में PM CARES Fund की पारदर्शिता, पर्यावरण संरक्षण से जुड़े बायोफार्मास्यूटिकल वेस्टवॉटर ट्रीटमेंट सिस्टम, मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) अधिनियम 2023 के प्रावधानों, आर्कटिक काउंसिल की भू-राजनीति, भारत की ‘SHANTI’ पहल के तहत बंगाल की खाड़ी के रणनीतिक महत्व, तथा जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती बादल फटने (Cloudburst) की घटनाओं का विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।
PM CARES Fund
परिचय एवं पृष्ठभूमि
- पूरा नाम: द प्राइम मिनिस्टरस सिटीजन असिस्टेंस एंड रिलीफ इन इमरजेंसी सिचुएशंस (PM CARES) फंड।
- स्थापना: मार्च 2020 (COVID-19 संकट के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थितियों और अन्य आपदाओं में राहत प्रयासों का समर्थन करने के लिए)।
- स्वरूप: यह एक सार्वजनिक चैरिटेबल ट्रस्ट (Public Charitable Trust) है, जिसे रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 के तहत पंजीकृत किया गया है। इसका ट्रस्ट डीड 27 मार्च 2020 को नई दिल्ली में पंजीकृत हुआ था।
- वित्त पोषण (Funding): यह पूरी तरह से व्यक्तियों और संगठनों के स्वैच्छिक योगदान से वित्तपोषित है। इसे कोई बजटीय सहायता नहीं मिलती है।
संरचना एवं नेतृत्व (Structure & Governance)
- पदेन अध्यक्ष (Ex-officio Chairperson): प्रधानमंत्री।
- पदेन ट्रस्टी (Ex-officio Trustees):
- केंद्रीय रक्षा मंत्री
- केंद्रीय गृह मंत्री
- केंद्रीय वित्त मंत्री
वित्तीय डेटा और आँकड़े (Financial Data & Statistics – FY 2022-23)
आरंभिक और अंतिम ऑडिट रिपोर्ट (जो PM CARES वेबसाइट पर उपलब्ध अंतिम डेटा है) के अनुसार:
- प्रारंभिक शेष (Opening Balance as on April 1, 2022): ₹5,415.65 करोड़
- स्वैच्छिक योगदान (Voluntary Contributions): ₹909.64 करोड़
- कुल प्राप्तियां (Total Receipts): ₹6,723.07 करोड़
- कुल भुगतान (Total Payments): ₹439.38 करोड़
- अंतिम शेष (Closing Balance as on March 31, 2023): ₹6,283.68 करोड़
- ऑडिटेड वित्तीय वर्ष उपलब्ध: 2019-20, 2020-21, 2021-22, और 2022-23।
- चिंता का विषय: पिछले तीन वित्तीय वर्षों से कोई भी ऑडिटेड वित्तीय विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है।
कर लाभ एवं छूट (Tax Benefits & Exemptions)
- आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80G: PM CARES फंड में दान करने पर 100% कर कटौती (Deduction) की पात्रता है।
- कंपनियां अधिनियम, 2013: इस फंड में दिए गए दान को CSR (कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व) व्यय के रूप में गिना जाने की पात्रता है।
- FCRA छूट: इसे विदेशी योगदान (नियमन) अधिनियम (FCRA) के तहत छूट प्रदान की गई है, जिससे यह निर्दिष्ट विदेशी योगदान खाते के माध्यम से विदेशी नागरिकों और संगठनों से दान प्राप्त करने में सक्षम है।
उपयोग (Utilization)
- फंड ने मुख्य रूप से भारत की COVID-19 प्रतिक्रिया और आपातकालीन स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे को वित्तपोषित किया है।
प्रमुख चिंताएं, मुद्दे और चुनौतियाँ (Key Concerns & Transparency Issues)
- पारदर्शिता का अभाव (Lack of Transparency): पिछले 3 वर्षों से ऑडिटेड वित्तीय विवरणों को सार्वजनिक न किए जाने पर कार्यकर्ताओं ने गहरी चिंता जताई है।
- RTI अधिनियम के दायरे से बाहर: सरकार का यह रुख रहा है कि यह ट्रस्ट आरटीआई अधिनियम (RTI Act) के तहत “सार्वजनिक प्राधिकरण” (Public Authority) नहीं है। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने कंपनियों अधिनियम के तहत नियमों में संशोधन भी किया है। वर्तमान में यह फंड आरटीआई अधिनियम, संसदीय जांच और भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के ऑडिट के दायरे से बाहर है।
- सरकारी जुड़ाव बनाम निजी स्वरूप: इस फंड को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया था कि यह केंद्र सरकार द्वारा स्थापित किया गया है (जिससे यह सार्वजनिक प्राधिकरण जैसा प्रतीत हुआ और सरकारी कर्मचारियों ने भी अपने वेतन से इसमें योगदान दिया), किंतु कानूनी रूप से इसे सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं माना गया।
- विवादास्पद तुलना (Electoral Bonds Comparison): जानकारों के अनुसार, चुनावी बांड मामले की तरह इसमें भी गोपनीयता के कारण ‘क्विड प्रो को’ (quid pro quo – कुछ पाने के बदले कुछ देना), नियामक निष्क्रियता और जबरन वसूली जैसी स्थितियां पैदा होने की आशंका जताई जा रही है।
शोधकर्ताओं ने बायोफार्मास्युटिकल वेस्टवॉटर के ट्रीटमेंट के लिए कम ऊर्जा वाला सिस्टम विकसित किया
संदर्भ
- संस्थान: BITS पिलानी, हैदराबाद परिसर
- नवीनतम विकास: शोधकर्ताओं ने कम ऊर्जा वाली अपशिष्ट जल उपचार तकनीक विकसित की है।
- उद्देश्य: बायोफार्मास्युटिकल अपशिष्ट जल को कीटाणुरहित करना तथा साथ ही पुनर्चक्रण योग्य पानी और मीथेन-समृद्ध बायोगैस का पुनर्प्राप्ति करना।
- औद्योगिक सहयोग: इस तकनीक को प्रयोगशाला स्तर पर प्रदर्शित करने के बाद, हैदराबाद स्थित वैक्सीन निर्माता कंपनी Biological E. Ltd. के साथ मिलकर औद्योगिक स्तर पर तैनाती (industrial deployment) के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है।
- वित्त पोषण एवं समर्थन: यह परियोजना विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के जल प्रौद्योगिकी पहल कार्यक्रम के तहत समर्थित है।
- पैटेंट: इस कोर डिसइन्फेक्शन (कीटाणुशोधन) तकनीक के लिए भारतीय पेटेंट आवेदन दाखिल किया गया है।
अपशिष्ट जल की चुनौतियाँ (Challenges in Biopharmaceutical Wastewater)
बायोफार्मास्युटिकल किण्वन अपशिष्ट जल (Biopharmaceutical fermentation wastewater) को उपचारित करना सबसे कठिन औद्योगिक अपशिष्टों में माना जाता है:
- इसमें बड़ी मात्रा में लाइव प्रोडक्शन सूक्ष्मजीवहोते हैं।
- इसमें अवशिष्ट एंटीबायोटिक्स और एंटीबायोटिक प्रतिरोध जीन मौजूद होते हैं।
- पारंपरिक तरीके: वर्तमान में उद्योग बायो-सुरक्षा जोखिमों को समाप्त करने के लिए रासायनिक उपचार और स्टीम-आधारित ऑटोक्लेविंग पर निर्भर हैं, जो अत्यधिक ऊर्जा-गहन और खर्चीले हैं।
एकीकृत 3-चरणीय उपचार प्रणाली (Integrated Three-Stage Treatment System)
चुनौतियों से निपटने के लिए विकसित की गई प्रणाली:
- इलेक्ट्रिकल डिसइन्फेक्शन: पारंपरिक स्टीम स्टरलाइज़ेशन के स्थान पर electrical pulses का उपयोग।
- जैविक उपचार: कार्बनिक प्रदूषकों का अपघटन।
- ऊर्जा रिकवरी और जल पुनर्चक्रण: पानी को शुद्ध करने के साथ-साथ बायोगैस का उत्पादन।
CEC नियुक्ति अधिनियम और सुप्रीम कोर्ट सुनवाई
G.S. Paper-2: राजव्यवस्था
परिचय एवं संदर्भ
- मामला: मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाएं।
- केंद्र सरकार का पक्ष: सॉलिसिटर-जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि प्रधानमंत्री के फैसले पर अविश्वास जताने का मतलब है कि कैबिनेट मंत्रियों की नियुक्ति में भी किसी “बाहरी” या पूर्व न्यायाधीश को सलाहकार के रूप में रखना चाहिए।
कानूनी और वैधानिक पृष्ठभूमि (Legal & Constitutional Background)
- अनूप बरनवाल मामला (2023): मार्च 2023 के संविधान पीठ के फैसले में कहा गया था कि CEC ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो “fierce independence” (प्रचंड स्वतंत्रता), तटस्थता और ईमानदारी का प्रतीक हो। इस फैसले ने चुनाव निकाय पर सरकार के “एकाधिकार” को खत्म करने की बात कही थी।
- मूल चयन समिति (Anoop Baranwal Judgment Panel):
- प्रधानमंत्री (अध्यक्ष)
- लोकसभा में विपक्ष के नेता (LOP)
- भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI)
- 2023 का नया अधिनियम: अनूप बरनवाल फैसले के महीनों बाद संसद द्वारा पारित 2023 के इस अधिनियम ने चयन पैनल से CJI को हटाकर प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर लिया।
दोनों पक्षों के मुख्य तर्क (Key Arguments)
- केंद्र सरकार के तर्क (सॉलिसिटर-जनरल तुषार मेहता द्वारा):
- संवैधानिक विश्वास: प्रधानमंत्री का पद संवैधानिक विश्वास और उच्च पवित्रता रखता है (मनोज नरूला मामला, 2014 के फैसले के अनुसार)।
- सत्ता के दुरुपयोग की पूर्व-धारणा नहीं: क्या कोई संवैधानिक न्यायालय किसी कानून में समिति की संरचना तय करते समय संवैधानिक पदाधिकारियों की ओर से सत्ता के दुरुपयोग, बुरे इरादे (mala fide) या दुर्भावना की पूर्व-कल्पना कर सकता है?
- संसद की विधायी बुद्धिमत्ता: अनूप बरनवाल का फैसला संसद की इस शक्ति को सीमित नहीं कर सकता कि वह CJI को कैबिनेट मंत्री से प्रतिस्थापित कर सके। संविधान ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता की तरह विधायिका और कार्यपालिका की स्वतंत्रता की भी परिकल्पना की है।
- सुप्रीम कोर्ट/न्यायालय के तर्क और टिप्पणियां:
- तटस्थता का अभाव: अदालत ने सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री की समिति में “एक भी पूरी तरह से निष्पक्ष व्यक्ति” क्यों नहीं है? एक कैबिनेट मंत्री शायद ही प्रधानमंत्री की अवज्ञा कर पाएगा, जिससे पैनल में कार्यपालिका का “प्रभुत्व” दिखता है।
- न्याय दिखना चाहिए: न्यायमूर्ति दत्ता ने स्पष्ट किया कि यह प्रधानमंत्री में “विश्वास की कमी” का सवाल नहीं है, बल्कि “न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए” के सिद्धांत पर आधारित है।
- असंतुलन (2 vs 1): समिति की संरचना एक पक्ष (कार्यपालिका) के पक्ष में झुकती है (दो सदस्य कार्यपालिका से और एक विपक्ष से)। देश के सबसे महत्वपूर्ण कार्यालयों में से एक की नियुक्ति में निष्पक्षता दिखाई देनी चाहिए।
- वर्तमान स्थिति (Current Status)
- निर्णय सुरक्षित: अदालत ने इस बात पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है कि क्या इस मामले को पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए या नहीं।
- याचिकाकर्ताओं का रुख: याचिकाकर्ताओं के वकील (अधिवक्ता कालीश्वरम राज) के अनुसार, मामले को पांच जजों की बेंच के पास भेजना अनावश्यक है क्योंकि अनूप बरनवाल फैसले में पहले ही इन पर विचार किया जा चुका है।
संसदीय समिति द्वारा पोलर और आर्कटिक मामलों के लिए एक समर्पित अधिकारी नियुक्त करने की मांग
परिचय एवं संदर्भ (Introduction & Context)
- समिति: 18वीं लोकसभा की विदेश मामलों की समिति (Committee on External Affairs)।
- मुख्य सिफारिश: ध्रुवीय और आर्कटिक से संबंधित नीतिगत मामलों पर संबंधित देशों के साथ समन्वय स्थापित करने के लिए एक समर्पित प्रतिनिधि या राजदूत की नियुक्ति की जाए।
समिति की प्रमुख सिफारिशें एवं सुझाव (Key Recommendations & Suggestions)
1. समर्पित पोलर/आर्कटिक मामलों का राजदूत और डेस्क (Dedicated Ambassador & Desk)
- रिपोर्ट में बताया गया कि सभी आर्कटिक काउंसिल के सदस्य देश और अधिकांश गैर-आर्कटिक ऑब्जर्वर देश (जैसे जापान, चीन, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया) के पास एक समर्पित पोलर/आर्कटिक अफेयर्स डेस्क के साथ पोलर/आर्कटिक एंबेसडर मौजूद हैं।
2. आर्कटिक काउंसिल में सदस्यता का दर्जा बढ़ाना (Upgradation of Status)
- समिति ने सुझाव दिया कि जब भी आर्कटिक काउंसिल की समीक्षा हो, भारत को काउंसिल में अपने वर्तमान ‘ऑब्जर्वर स्टेटस’ (पर्यवेक्षक का दर्जा) को उन्नत करके ‘सदस्यता का दर्जा’ (Member Status) प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।
- समिति ने माना कि ऑब्जर्वर देशों पर कई सीमाएं होती हैं क्योंकि वे निर्णय लेने की प्रक्रिया में भाग नहीं ले सकते। हालांकि, समिति ने आर्कटिक काउंसिल के हिस्से के रूप में भारत के प्रदर्शन पर संतोष व्यक्त किया।
भारत के लिए आर्कटिक और ध्रुवीय नीति का महत्व (Importance for India)
- तीसरा ध्रुव: हिमालयी श्रृंखला को उसके विशाल बर्फ भंडारों के कारण “तीसरा ध्रुव” माना जाता है, जिसका वैश्विक महत्व है। इसी वजह से आर्कटिक मामलों में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
- वर्तमान दृष्टिकोण: विदेश मंत्रालय के अनुसार, वह ऐसे मुद्दों पर एक “केंद्रित और निरंतर” (Focused and sustained) दृष्टिकोण अपनाने के लिए भारतीय दूतावासों और अन्य मंत्रालयों के साथ परामर्श करता है।
आर्कटिक काउंसिल (Arctic Council)
- स्वरूप: यह आर्कटिक क्षेत्र के पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के लिए बनाया गया एक उच्च-स्तरीय अंतर-सरकारी मंच (Intergovernmental Forum) है।
- स्थापना: 19 सितंबर 1996 को ओटावा घोषणा के द्वारा।
- मुख्यालय/सचिवालय: ट्रोम्सो (Tromsø), नॉर्वे।
संरचना एवं सदस्य देश
- आर्कटिक काउंसिल मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बंटी हुई है:
- आठ मुख्य सदस्य देश (Member States): वे देश जो आर्कटिक वृत्त (Arctic Circle) के भीतर भू-भाग पर संप्रभुता रखते हैं—
- कनाडा
- डेनमार्क (ग्रीनलैंड और फरो आइलैंड्स सहित)
- फिनलैंड
- आइसलैंड
- नॉर्वे
- रूस
- स्वीडन
- संयुक्त राज्य अमेरिका (USA)
- स्थायी प्रतिभागी (Permanent Participants): आर्कटिक क्षेत्र के स्थानीय और स्वदेशी (Indigenous) लोगों के 6 संगठन, जिन्हें नीति-निर्माण प्रक्रिया में सक्रिय परामर्श का अधिकार प्राप्त है।
- पर्यवेक्षक देश (Observer States): इसमें भारत (वर्ष 2013 से) के अलावा चीन, जापान, ब्रिटेन और कई अन्य देश शामिल हैं।
मुख्य कार्य एवं उद्देश्य
- पर्यावरण संरक्षण: आर्कटिक क्षेत्र की नाज़ुक पारिस्थितिकी, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों और प्रदूषण की निगरानी करना।
- सतत विकास: आर्कटिक क्षेत्र के स्थानीय समुदायों और जनजातियों के सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक हितों की रक्षा करना।
- सैन्य सुरक्षा का दायरा बाहर: ओटावा घोषणा के नियमों के तहत इस मंच के आधिकारिक एजेंडे में सैन्य सुरक्षा या भू-राजनीतिक संघर्ष से जुड़े मुद्दों को शामिल नहीं किया जाता है, ताकि क्षेत्रीय सहयोग बना रहे।
भारत के लिए ‘SHANTI’ पहल के आधार के तौर पर बंगाल की खाड़ी
- G.S. पेपर-2: अंतर्राष्ट्रीय संबंध एवं सुरक्षा (International Relations & Security)
- टॉपिक: बंगाल की खाड़ी, भारत की समुद्री कूटनीति और ‘SHANTI’ पहल
परिचय (Introduction)
- पृष्ठभूमि: बंगाल की खाड़ी दुनिया के सबसे अधिक आपदा-प्रवण क्षेत्रों में से एक है। यहाँ जलवायु परिवर्तन, अवैध मछली पकड़ने, साइबर कमजोरियों और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान जैसी गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियाँ बढ़ रही हैं।
- SHANTI पहल: 13 जुलाई को विदेश मंत्री ने UNSC के 2028-29 कार्यकाल के लिए भारत की उम्मीदवारी की घोषणा के दौरान Securing Holistic Advancement through Norms, Trust and Integrity पहल की शुरुआत की।
- महत्व: यह पहल ‘SAGAR’ और ‘MAHASAGAR’ की तर्ज पर समुद्री क्षेत्रों के लिए एक मानक ढांचा प्रदान करती है। बंगाल की खाड़ी को इसे व्यापक इंडो-पैसिफिक में लागू करने से पहले एक ‘प्रयोगशाला’ के रूप में देखा जा रहा है।
बंगाल की खाड़ी का सामरिक महत्व (Centrality of the Bay of Bengal)
- ऐतिहासिक संबंध: यह क्षेत्र लंबे समय से व्यापार, संस्कृति और धर्म के माध्यम से दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया को आपस में जोड़ता रहा है।
- नीतियों का संगम: यह भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ को आसियान से जोड़ता है और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मलक्का जलडमरूमध्य तक पहुंच प्रदान करता है।
- भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा: चीन की मलक्का जलडमरूमध्य पर भारी निर्भरता (“मलक्का दुविधा”) और बंदरगाह परियोजनाओं के माध्यम से उसकी बढ़ती उपस्थिति इस क्षेत्र में भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को तेज करती है।
- SHANTI की भूमिका: यह ढांचा सैन्य शक्ति (Tonnage) के बजाय मानदंडों, विश्वास और अखंडता (Norms, Trust and Integrity) को प्राथमिकता देता है।
भारत की समुद्री सुरक्षा का क्रमिक विकास : तीन चरण-
| पहल (Initiative) | वर्ष | उद्देश्य एवं प्रकृति |
| SAGAR (Security and Growth for All in the Region) | 2015 | यह विकास में समानता का दृष्टिकोण प्रदान करने वाला इरादे का बयान (Statement of Intent) था। |
| MAHASAGAR | 2025 | इसने व्यापक इंडो-पैसिफिक और ग्लोबल साउथ में सुरक्षा की परस्पर निर्भरता को पहचानते हुए सुरक्षा दायरे का विस्तार किया । |
| SHANTI | 2026 | यह सहयोग के लिए नियमों और मानकों को तय करता है, जो सुरक्षा को प्रतिस्पर्धा से मांग-संचालित सहयोग में बदलता है। |
बंगाल की खाड़ी में सहयोग की आवश्यकता और चुनौतियाँ
- साझा चुनौतियाँ: बंगाल की खाड़ी एक अंतःसंबंधित प्रणाली है, जहाँ चक्रवात, मछली स्टॉक, शिपिंग लेन और प्रदूषण राष्ट्रीय सीमाओं को पार करते हैं। तटीय देशों की समस्याएँ एक जैसी हैं (जैसे- आपदा जोखिम न्यूनीकरण, तटीय कटाव, मत्स्य पालन प्रबंधन, और जलवायु अनुकूलन)।
- संस्थागत विखंडन (Institutional Fragmentation): पश्चिमी हिंद महासागर (जो सक्रिय संघर्षों और नाजुक अर्थव्यवस्थाओं से ग्रस्त है) के विपरीत, बंगाल की खाड़ी की भौगोलिक स्थिति सहयोग के अनुकूल है। यहाँ समस्या संस्थानों की कमी नहीं, बल्कि संस्थागत विखंडन की है।
- भारत की भूमिका: भारत की भौगोलिक स्थिति इसे एक प्राकृतिक संयोजक बनाती है, जिसका उद्देश्य प्रभुत्व स्थापित करना नहीं बल्कि क्षेत्रीय संरक्षकता निभाना है।
सिद्धांत से व्यवहार तक (Principles to Practice)
- BIMSTEC की भूमिका: नई दिल्ली में जुलाई 2026 में आयोजित BIMSTEC राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों (NSAs) की बैठक में सदस्य-देशों ने समुद्री कानून प्रवर्तन और मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) के लिए सामान्य सिद्धांतों को अपनाया।
- भविष्य की योजनाएं:
- नवंबर 2026 में बंगाल की खाड़ी में पहला संयुक्त समुद्री सुरक्षा अभ्यास आयोजित किया जाना तय हुआ।
- व्हाइट शिपिंग सूचना-साझाकरण समझौता विचाराधीन है।
निष्कर्ष (Conclusion)
- SHANTI का दीर्घकालिक योगदान केवल भारत के समुद्री शब्दकोश में एक नया संक्षिप्त नाम (Acronym) जोड़ना नहीं है, बल्कि सुरक्षा की परिभाषा में बदलाव लाना है:
- अवरोध से लचीलेपन (Resilience) की ओर
- प्रतिस्पर्धा से साझा जिम्मेदारी की ओर
- संकट प्रबंधन (Crisis management) से साझा समुद्री कॉमन्स के शासन (Governance) की ओर
बादल फटना (Cloudburst)

- G.S. पेपर 1 : भूगोल एवं आपदा प्रबंधन (Geography & Disaster Management)
- टॉपिक: बादल फटना (Cloudburst): परिभाषा, कारण, चुनौतियाँ और उत्तरदायित्व
बादल फटना क्या है? (What is a Cloudburst?)
- आधिकारिक परिभाषा (IMD): भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, जब किसी छोटे क्षेत्र (लगभग 20-30 वर्ग किलोमीटर) में एक घंटे में 10 सेमी (100 मिमी) या उससे अधिक वर्षा होती है, तो उसे ‘बादल फटना’ कहा जाता है।
- उदाहरण के लिए, इंदौर में औसतन सालाना 1,062 मिमी बारिश होती है, जबकि बादल फटने की घटना में इसका लगभग 10% हिस्सा केवल 60 मिनट में बरस सकता है।
- मिनी-क्लाउडबर्स्ट: कुछ वैज्ञानिक समान क्षेत्र में एक घंटे में 5 सेमी बारिश के लिए ‘मिनी-क्लाउडबर्स्ट’ श्रेणी की वकालत करते हैं, जो स्थानीय भूभाग (Topography) के आधार पर विनाशकारी हो सकती है।
बादल फटना कैसे बनता है? (Formation Mechanism)
- संवहन (Convection): प्रक्रिया गर्म और नम हवा के तेजी से वायुमंडल में ऊपर उठने से शुरू होती है। पहाड़ी क्षेत्रों में इसे ऑरोग्राफिक लिफ्टिंग कहा जाता है, जहाँ मानसूनी हवाओं को ढलानों द्वारा ऊपर जाने के लिए मजबूर किया जाता है।
- संघनन (Condensation): ऊपर उठने वाली हवा ठंडी होकर कपासी–वर्षी मेघ (क्युमुलोनिब्स) बादलों में बदल जाती है (जो 15 किमी तक ऊँचे हो सकते हैं)।
- जल बूंदों का निलंबन: ऊपर उठने वाली गर्म हवा की तेज धाराएँ (Updrafts) बारिश की बूंदों को लंबे समय तक हवा में रोके रखती हैं।
- अचानक मूसलाधार बारिश: अंत में, पानी की बूंदों का भार बहुत अधिक हो जाता है या अपड्राफ्ट कमजोर पड़ जाते हैं, जिससे पानी समुद्र के गिरने जैसा सीधे जमीन पर आ गिरता है।
भारत में इसकी स्थिति और बारंबारता (Frequency in India)
- ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव: गर्म होता वायुमंडल अधिक नमी धारण करता है, जिससे इनकी बारंबारता बढ़ रही है।
- भौगोलिक क्षेत्र: उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में विशेष रूप से जुलाई और अगस्त के महीनों में ऐसी घटनाओं में वृद्धि देखी गई है।
- डेटा की कमी: अधिकांश बादल फटने की घटनाएँ दूरदराज के उच्च-तुंगता (High-altitude) वाले क्षेत्रों में होती हैं, जहाँ रेन गेज और मौसम स्टेशन कम होते हैं, जिससे सटीक गिनती कठिन हो जाती है।
क्या ‘क्लाउडबर्स्ट’ लेबल जवाबदेही को धुंधला करता है? (Accountability Issue)
- प्राकृतिक आपदा की आड़ में लापरवाही: भारी बारिश को ‘बादल फटना’ बताकर अधिकारी इसे एक अप्रत्याशित प्राकृतिक कृत्य (Act of nature) करार दे देते हैं, जिससे मानवीय लापरवाही छिप जाती है।
- उदाहरण (2025 उत्तरकाशी, धराली बाढ़): शुरुआती रिपोर्टों में इसे बादल फटना बताया गया, लेकिन बाद में डेटा से पता चला कि वर्षा की दर सीमा से बहुत कम थी। असली कारण नदी के किनारों पर अवैध निर्माण, वनों की कटाई और ‘ऑल-वेदर’ सड़कों के पास जल निकासी बुनियादी ढांचे का अभाव था।
पूर्वानुमान में कठिनाइयाँ (Forecasting Challenges)
- हाइपर-लोकल घटना: मौसम मॉडल ग्रिड के रूप में औसत मौसम का अनुमान लगाते हैं, जबकि बादल फटना ग्रिड सेल से भी छोटे क्षेत्र में होता है।
- पहाड़ी बाधाएँ: डॉप्लर वेदर रडार बीम छोड़ते हैं जिन्हें पहाड़ अवरुद्ध कर देते हैं, जिससे ‘ब्लाइंड स्पॉट’ बन जाते हैं।
- तकनीकी समाधान:
- Nowcasting: IMD शॉर्ट-थर्म अलर्ट (हर कुछ घंटों में) जारी करने की तकनीक पर काम कर रहा है।
- Mission Mausam: सरकार की इस नई पहल के तहत रडार नेटवर्क को दोगुना करने और हाइपर-लोकल घटनाओं की भविष्यवाणी के लिए AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का उपयोग करने की योजना है।
निष्कर्ष (Conclusion)
- यद्यपि तकनीक (जैसे AI और बेहतर रडार) में सुधार हो रहा है, फिर भी बादल फटना एक अप्रत्याशित मौसमी घटना बनी हुई है।
- अतः आपदा जोखिम को कम करने के लिए केवल प्राकृतिक आपदाओं को दोष देने के बजाय विनियमित निर्माण (Regulated construction), मजबूत ड्रेनेज सिस्टम और प्रभावी अर्ली वार्निंग सिस्टम पर ध्यान केंद्रित करना अनिवार्य है।