NCERT Notes Class 7 Social science (Geography) Chapter 6: The Age of Reorganisation के अंतर्गत उत्तर-गुप्त काल से लेकर शुरुआती मध्यकालीन भारत में उत्तर, मध्य और दक्षिण भारत के प्रमुख राजवंशों के उत्थान को विस्तार से स्पष्ट करता है। तथा दक्षिण भारत के महान चोल साम्राज्य की अद्वितीय नौसेना, उनकी सुदृढ़ स्थानीय स्वशासन प्रणाली (ग्राम सभाएं), तथा पल्लव और चालुक्य राजवंशों के दौरान कला एवं द्रविड़ स्थापत्य कला (मंदिर निर्माण) के क्षेत्र में हुए अभूतपूर्व विकास का विश्लेषण और सामंतवाद (Feudalism) के विस्तार, भूमि अनुदान प्रथा और व्यापारिक श्रेणियों (Guilds) के पुनर्गठन से समाज और अर्थव्यवस्था पर पड़े प्रभावों पर भी प्रकाश डालता है।
शुंगों का उत्कर्ष (Surge of the Shungas)
- संस्थापक: पुष्यमित्र शुंग।
- शासन क्षेत्र: उत्तर और मध्य भारत।
- अश्वमेध यज्ञ: संप्रभुता और सर्वोच्चता साबित करने के लिए वैदिक अनुष्ठान का आयोजन किया।
- विदेशी संबंध: शुरुआती सैन्य संघर्षों के बाद यूनानियों (Greeks) के साथ मैत्रिपूर्ण संबंध बनाए।
- साम्राज्य का आकार व काल: मौर्यों से छोटा साम्राज्य था। यह वंश लगभग एक शताब्दी तक ही चला।
- वैदिक पुनरुत्थान: वैदिक अनुष्ठानों की वापसी हुई। हालाँकि, अन्य धार्मिक संप्रदाय भी साथ-साथ फलते-फूलते रहे।
- संस्कृत का उत्कर्ष: दार्शनिक और साहित्यिक कार्यों के लिए संस्कृत प्रमुख भाषा बनी।
- महर्षि पतंजलि: इसी काल में पतंजलि ने ‘योगसूत्र’ का संकलन किया।
अश्वमेध यज्ञ
- अर्थ: राजा की संप्रभुता घोषित करने वाला एक प्राचीन वैदिक अनुष्ठान।
- प्रक्रिया: सैनिकों के साथ एक घोड़ा स्वतंत्र घूमने छोड़ दिया जाता था।
- नियम: जिस राज्य से घोड़ा बिना रोके गुजरता, वह राजा की अधीनता स्वीकार कर लेता था। रोकने पर युद्ध होता था।
शुंगकालीन कला एवं वास्तुकला में योगदान
- संरक्षण: शुंग शासकों ने साहित्य, कला और वास्तुकला को बढ़ावा दिया।
- भरहुत स्तूप (मध्य प्रदेश):
- मूल रूप से अशोक के काल में बना।
- शुंगों ने बुद्ध के जीवन की कथाओं वाली नक्काशीदार वेष्टनी (Railings) और तोरण द्वार जोड़े।
- भरहुत की कलाकृतियाँ:
- नक्काशीदार रेलिंग और लक्ष्मी देवी की आकृति।
- नर्तक-गायक समूह और धम्मचक्र को धारण किए हाथी।

- शिल्प और कला साक्ष्य:
- यूनानी प्रभाव: यूनानी सैनिक के चित्र वाला स्तंभ।
- मृण्मूर्तियाँ: बाल अलंकृत महिला की टेराकोटा मूर्ति, राजपरिवार और सामान्य नागरिक (महिला-पुरुष)।
- शिल्प वस्तुएँ: हाथीदांत की कंघी, सोने की परत वाली कांस्य चूड़ियाँ, मनकों का हार और फूलदान।
शुंगकालीन योगदान
| क्षेत्र | प्रमुख तथ्य |
| धर्म व अनुष्ठान | वैदिक पुनरुद्धार और अश्वमेध यज्ञ |
| साहित्य व भाषा | संस्कृत का प्रयोग और पतंजलि का ‘योगसूत्र’ |
| स्थापत्य कला | भरहुत स्तूप का पाषाण विस्तार (Railings) |
| हस्तशिल्प | हाथीदांत नक्काशी, टेराकोटा कला व स्वर्ण-लेपित कांस्य आभूषण |
सातवाहन राजवंश (The Satavahanas)
- काल एवं क्षेत्र: दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व (2nd century BCE) से दक्कन क्षेत्र में शासन किया। इनका साम्राज्य मुख्य रूप से आधुनिक आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र में विस्तृत था।
- उपनाम: अभिलेखों और पुराणों में इन्हें ‘आंध्र’ भी कहा गया है।
- प्रमुख राजधानियाँ: अमरावती और प्रतिष्ठान / पैठन।
- पड़ोसियों से संघर्ष: सीमित साक्ष्यों के अनुसार उत्तर के शुंग वंश के साथ इनका निरंतर सैन्य संघर्ष चलता रहा।
व्यापार, अर्थव्यवस्था एवं नौकायन प्रौद्योगिकी
- सिक्कों का वितरण: गुजरात से लेकर आंध्र प्रदेश तक (पश्चिम से पूर्वी तट) इनके सिक्के मिले हैं।
- समुद्री व्यापार का साक्ष्य: सिक्कों पर दो मस्तूलों वाले जहाजों (seafaring ships with two masts) के चित्र अंकित हैं। यह विकसित जहाज निर्माण (Shipbuilding) और नौवहन तकनीक को दर्शाता है।
- कृषि का आधार: कृष्णा-गोदावरी नदी घाटी की उपजाऊ भूमि ने साम्राज्य को आर्थिक स्थिरता दी।
- रोमन साम्राज्य से व्यापार: रोम के साथ सक्रिय व्यापारिक संबंध थे।
- निर्यात (Exports): मसाले, वस्त्र, चंदन, सोने की परत वाले मोती, हाथीदांत।
- आयात (Imports): कांच का सामान और सुगंधित लेप (Perfumed ointments)।
- नानेघाट गुफाएं: पुणे के पास प्रमुख व्यापारिक मार्ग पर स्थित गुफाएं, जिनका उपयोग चुंगी/कर संग्रह (Tolls and taxes) और व्यापारियों के विश्राम स्थल के रूप में होता था।
सातवाहन काल में जीवन व समाज
- मातृ-नाम की परंपरा: सातवाहन शासक अपने नाम के आगे माता का नाम लगाते थे।
- उदाहरण: गौतमीपुत्र सातकर्णी अपनी माता गौतमी बालश्री के नाम पर जाने गए।
- नासिक अभिलेख: गौतमी बालश्री का नासिक में एक महत्वपूर्ण अभिलेख मिलता है, जो बौद्ध भिक्षुओं को भूमि दान और उनके राजनीतिक प्रभाव को दर्शाता है।
- नानेघाट अभिलेख:
- एक सातवाहन विधवा रानी द्वारा उत्कीर्ण कराया गया। इसमें रानी द्वारा अश्वमेध यज्ञ कराने का उल्लेख है।
- वैदिक देवताओं (इंद्र, चंद्र, सूर्य) का उल्लेख।
- दान का साक्ष्य: ब्राह्मणों, विद्वानों और भिक्षुओं को भूमि, गाय, घोड़े, हाथी और चाँदी के सिक्के दान में दिए गए।
- ब्राह्मी लिपि व अंक: इन अभिलेखों में ब्राह्मी लिपि के साथ ऐसे संख्यात्मक चिह्न (Numerals) मिले हैं जो आधुनिक भारतीय अंकों के प्राचीन मूल स्रोत हैं।
- धार्मिक नीति व भूमि अनुदान:
- सातवाहन वासुदेव (श्रीकृष्ण) के उपासक थे।
- धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई। वैदिक विद्वानों, जैन और बौद्ध भिक्षुओं को कर-मुक्त कृषि भूमि (Tax-free land grants) प्रदान की।
- कला एवं वास्तुकला साक्ष्य:
- कार्ला गुफाएं: लोनावाला (महाराष्ट्र) के पास स्थित बौद्ध भिक्षुओं के लिए निर्मित शैलकृत (Rock-cut) गुफाएं। इसमें विशाल स्तंभ और पत्थर का स्तूप शामिल है।
- पीतलखोरा गुफाएं: यहाँ से प्राप्त यक्ष प्रतिमा पर कण्हादासेन हिरणकरेण काटा (स्वर्णकार काण्हादास द्वारा निर्मित) अंकित है। यह दर्शाता है कि उस समय शिल्पी (जैसे सुनार) पत्थर की तराशी में भी कुशल थे।
सातवाहन साम्राज्य का पतन
- समय: तीसरी शताब्दी ईस्वी (3rd century CE)।
- कारण: कमजोर केंद्रीय नियंत्रण और क्रमिक आर्थिक गिरावट (Economic Decline)।
- परिणाम: साम्राज्य का विघटन हुआ और नए क्षेत्रीय राज्यों का अभ्युदय हुआ।
सातवाहन राजवंश: एक नजर में
| पहलू | मुख्य विवरण |
| प्रमुख राजधानियाँ | अमरावती और प्रतिष्ठान (पैठन) |
| प्रसिद्ध शासक | गौतमीपुत्र सातकर्णी |
| प्रमुख अभिलेख | नासिक अभिलेख (गौतमी बालश्री), नानेघाट अभिलेख (विधवा रानी) |
| प्रमुख गुफा स्थापत्य | कार्ला गुफाएं (बौद्ध), नानेघाट (व्यापारिक कर/विश्राम), पीतलखोरा (यक्ष प्रतिमा) |
| विशेषता | सिक्कों पर जहाजों के चित्र, मातृ-नाम परंपरा, कर-मुक्त भूमि दान की शुरुआत |
चेदियों का आगमन (Coming of the Chedis)
- पृष्ठभूमि: कलिंग युद्ध के बाद मौर्य साम्राज्य का पतन हुआ। इसके बाद कलिंग में चेदि राजवंश के तहत एक नई शक्ति का उदय हुआ।
- राजा खारवेल: चेदि वंश के सबसे महान और प्रसिद्ध शासक।
- धार्मिक पहचान: खारवेल जैन धर्म के अनुयायी थे। उन्हें ‘भिक्षु-राज’ या मुनि-राजा भी कहा जाता था।
- धार्मिक सहिष्णुता: जैन धर्म का पालन करते हुए भी वे सभी संप्रदायों का सम्मान करते थे।
उदयगिरि-खंडगिरि गुफाएं
- स्थान: भुवनेश्वर (ओडिशा) के पास।
- उद्देश्य: मुख्य रूप से जैन भिक्षुओं के निवास और साधना के लिए निर्मित।
- वास्तुकला: यह प्राचीन भारत की शैलकृत वास्तुकला (Rock-cut Architecture) का बेहतरीन उदाहरण है।
- विशेषता: पत्थरों को काटकर विशाल कमरे, जटिल नक्काशीदार पैनल और प्रतिमाएं बनाई गई हैं। इनमें रामायण के दृश्यों को भी दर्शाया गया है।
हाथीगुम्फा अभिलेख
- स्थान व लिपि: उदयगिरि की हाथीगुम्फा में स्थित, जो ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण है।
- विषय-वस्तु: इसमें राजा खारवेल की प्रति वर्ष की सैन्य विजयाभियानों और जन-कल्याणकारी कार्यों का क्रमबद्ध विवरण मिलता है।
- प्रशासनिक व धार्मिक घोषणाएं:
- खारवेल ने सौ क्षेत्रों के साधुओं की ‘तपस्वियों एवं ऋषियों की परिषद’ का गठन किया।
- स्वयं को सर्व-संप्रदाय पूजक (सभी पंथों का सम्मान करने वाला) और सर्व-देवायतन-संस्कारक (सभी मंदिरों का जीर्णोद्धार कराने वाला) घोषित किया।
- भारतीय दर्शन (Indian Ethos): राजा द्वारा सभी विचारधाराओं को संरक्षण देना भारतीय संस्कृति का मूल आधार रहा है।
चेदि राजवंश व खारवेल: मुख्य बिंदु
| क्षेत्र | मुख्य विवरण |
| राजवंश व क्षेत्र | चेदि राजवंश, कलिंग (ओडिशा) |
| प्रसिद्ध शासक | खारवेल (उपाधि: भिक्षु-राज) |
| प्रमुख अभिलेख | हाथीगुम्फा अभिलेख (ब्राह्मी लिपि) |
| स्थापत्य | उदयगिरि-खंडगिरि की शैलकृत गुफाएं (जैन धर्म) |
| मूल विचार | सर्वधर्म समभाव और सर्व-संप्रदाय संरक्षण |
दक्षिण में साम्राज्य और जन-जीवन (Kingdoms and Life in the South)
- कालखण्ड: 2nd/3rd century BCE से 3rd century CE तक।
- तीन प्रमुख राजवंश: चोल, चेर और पांड्य।
- स्वतंत्र अस्तित्व: अशोक के अभिलेखों से ज्ञात होता है कि मौर्य साम्राज्य की सीमाएँ इन दक्षिणी राज्यों से पहले ही समाप्त हो जाती थीं। ये राज्य मौर्य काल में भी स्वतंत्र थे।
- खारवेल से संबंध: चेदि राजा खारवेल ने दक्षिण भारतीय राजाओं के एक संघ को हराने का दावा किया, लेकिन उसने दक्षिण पर आक्रमण नहीं किया।
संगम साहित्य (Sangam literature)
- शब्द उत्पत्ति: ‘संगम’ शब्द संस्कृत के ‘संघ’ से बना है, जिसका अर्थ है संस्था, सभा या ‘एक साथ आना’ (Assembly of poets)।
- महत्व: यह दक्षिण भारत का सबसे प्राचीन उपलब्ध साहित्य है, जो उस काल के समाज, संस्कृति और मूल्यों का ज्ञान देता है।
- प्रमुख विषय:
- अम: व्यक्तिगत भावनाएँ व प्रेम।
- पुरम्: सामाजिक मूल्य, वीरता (Heroism) और उदारता (Generosity)।
- तीन मुवेन्दर (Three Crowned Kings): संगम साहित्य में चोल, चेर और पांड्य को ‘तीन मुकुटधारी राजा’ कहा गया है।

चोल राजवंश (The Cholas)
- शासन काल: 3rd century BCE से 13th century CE तक।
- प्रसिद्ध शासक: करिकाल। उसने चेर और पांड्य शासकों की संयुक्त सेना को पराजित कर अपनी संप्रभुता स्थापित की।
सिलप्पदिकारम: पायस की कथा
- रचना: संगम काल के तुरंत बाद रचित प्रसिद्ध तमिल महाकाव्य।
- मुख्य पात्र: कोवलन, कन्नगि, और माधवी (नर्तकी)।
- कहानी का सार:
- कोवलन और कन्नगि चोल राजधानी पुहार / कावेरीपट्टिनम में रहते थे।
- व्यापार के पुनरुद्धार हेतु वे पांड्य राजधानी मदुरै गए।
- पांड्य राजा द्वारा कोवलन को चोरी के झूठे आरोप में मृत्युदंड दिया गया।
- कन्नगि ने दूसरी पायल दिखाकर अपने पति की निर्दोषता सिद्ध की। शोक से पांड्य राजा की मृत्यु हुई और कन्नगि के श्राप से मदुरै जल गया।
- अंत में कन्नगि चेर राज्य गईं, जहाँ उन्हें देवी के रूप में पूजा गया।
- सांस्कृतिक संदेश: न्याय, राजा का धर्म, तत्कालीन समृद्ध व्यापारिक नगर और धार्मिक सहिष्णुता।
कल्लणै बांध
- निर्माता: चोल राजा करिकाल।
- स्थान: श्रीरंगम द्वीप के नीचे कावेरी नदी पर निर्मित जल-व्ययपवर्तन प्रणाली (Water diversion system)।
- महत्व: कावेरी डेल्टा को सिंचाई का जल मिला, जिससे यह क्षेत्र ‘दक्षिण का धान का कटोरा’ (Rice bowl of the South) कहलाया।
- प्रासंगिकता: यह प्राचीन अभियांत्रिकी का अद्भुत नमूना है जो आज भी तमिलनाडू में सिंचाई हेतु कार्यरत है।
चेर राजवंश (The Cheras)
- अन्य नाम: केरलापुत्र (Sons of Kerala)।
- क्षेत्र व राजधानी: पश्चिमी तमिलनाडु व केरल; राजधानी वंजी / करूर।
- सांस्कृतिक योगदान: तमिल साहित्य और संगम कवियों को बड़ा संरक्षण दिया।
- विदेश व्यापार: रोमन साम्राज्य और पश्चिमी एशिया के साथ सक्रिय समुद्री व्यापार।
- निर्यात वस्तुएं: मसाले (Spices), लकड़ी (Timber), हाथीदांत (Ivory) और मोती (Pearls)।
- सिक्के: चेर राजाओं ने अपने राजचिह्न (धनुष-बाण) वाले सिक्के जारी किए।
पांड्य राजवंश (The Pandyas)
- क्षेत्र व राजधानी: तमिलनाडु का सुदूर दक्षिणी भाग; राजधानी मदुरै।
- प्राचीनता: इनका उल्लेख सिकंदर के बाद मेगस्थनीज की ‘इंडिका’ में भी मिलता है।
- व्यापारिक महत्व: मोती (Pearls) के व्यापार के लिए सुप्रसिद्ध। ग्रीक और रोमन साम्राज्य से व्यापक व्यापार।
- नौसेना शक्ति: उपमहाद्वीप की एक प्रमुख नौसैनिक शक्ति (Naval power)।
- अभिलेख व नीतियाँ: अभिलेखों में लोक-कल्याण और सभी धार्मिक संप्रदायों को संरक्षण देने का उल्लेख मिलता है।
सुदूर दक्षिण के तीन राजवंश:
| राजवंश | राजधानी | प्रमुख क्षेत्र | प्रमुख पहचान / योगदान |
| चोल | पुहार / उरैयूर | कावेरी डेल्टा (तमिलनाडु) | राजा करिकाल, कल्लणै बांध (Grand Anicut) |
| चेर | वंजी (करूर) | केरल व पश्चिमी तमिलनाडु | रोमन व्यापार, मसाले व लकड़ी का निर्यात |
| पांड्य | मदुरै | सुदूर दक्षिण (तमिलनाडु) | मोती व्यापार, नौसेना, सिलप्पदिकारम |
इंडो-ग्रीक आक्रमण (Invasions of the Indo-Greeks)
- उत्पत्ति: सिकंदर के आक्रमण के बाद उसके द्वारा छोड़े गए क्षत्रपों ने स्वतंत्र राज्य स्थापित किए, जो इंडो-ग्रीक कहलाए।
- भौगोलिक विस्तार: मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद उत्तर-पश्चिम क्षेत्र (आधुनिक पाकिस्तान और अफगानिस्तान) पर अधिकार किया।
- सांस्कृतिक प्रभाव: ये विजेता के रूप में आए, लेकिन स्थानीय संस्कृति से प्रभावित होकर भारतीय और यूनानी तत्वों का अनूठा सम्मिश्रण (Blend) प्रस्तुत किया।
- सिक्कों की प्रणाली:
- सोने, चाँदी, तांबे और निकल के सिक्के जारी किए।
- एक तरफ राजा का चित्र और दूसरी तरफ यूनानी देवताओं के चित्र अंकित होते थे।
- कई सिक्कों पर भारतीय देवी-देवताओं जैसे वासुदेव-कृष्ण और लक्ष्मी के चित्र भी मिलते हैं।
- शासन का अंत: शकों (Śhakas / Indo-Scythians) के आक्रमण से इनका शासन समाप्त हुआ।
हेलियोडोरस स्तंभ
- स्थान: विदिशा (मध्य प्रदेश)।
- ऐतिहासिक संदर्भ: इंडो-ग्रीक राजदूत हेलियोडोरस द्वारा स्थापित।
- धार्मिक महत्व: अभिलेख में वासुदेव (विष्णु) को ‘देवताओं का देव’ कहा गया है। यह वैष्णव धर्म के प्रसार का प्रत्यक्ष साक्ष्य है।
- नैतिक उपदेश: अभिलेख में तीन अमर नियमों का उल्लेख है जो स्वर्ग की ओर ले जाते हैं: आत्म-नियंत्रण (Self-restraint), दान (Charity), और जागरूकता/चेतना (Consciousness)।
शक वंश और शक संवत
- शक (Indo-Scythians): इंडो-ग्रीकों के बाद उत्तर-पश्चिम भारत पर शासन करने वाली मध्य एशियाई जनजाति।
- शासन काल: दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्ध से 5वीं शताब्दी ईस्वी तक (कुषाणों के आगमन तक प्रभाव)।
- शक संवत:
- शुरुआत: 78 CE में प्रारंभ।
- गणितीय अंतर: यह ग्रेगोरियन कैलेंडर से 78 वर्ष पीछे चलता है (जनवरी से मार्च के दौरान 79 वर्ष)।
- राष्ट्रीय मान्यता: इसे 1957 में भारत के राष्ट्रीय कैलेंडर (Indian National Calendar) के रूप में अपनाया गया।
इंडो-ग्रीक और शक: मुख्य बिंदु
| पहलू | इंडो-ग्रीक | शक (Indo-Scythians) |
| मूल स्रोत | सिकंदर के यूनानी क्षत्रप | मध्य एशियाई जनजाति |
| मुख्य साक्ष्य | द्विभाषी सिक्के (वासुदेव व लक्ष्मी चित्र), हेलियोडोरस स्तंभ | शक संवत, शिलालेख |
| सांस्कृतिक योगदान | यूनानी-भारतीय कला व सिक्के | भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर (78 CE) |
कुषाणों का उदय (The Emergence of the Kushanas)
- मूल निवास: मध्य एशिया (Central Asia)।
- भारत में आगमन: लगभग 2nd century CE।
- साम्राज्य विस्तार: मध्य एशिया से लेकर संपूर्ण उत्तर भारत तक फैला विशाल साम्राज्य।
- ऐतिहासिक प्रभाव: व्यापक सांस्कृतिक सम्मिश्रण (Cultural intermixing) का काल।
राजा कनिष्क
- स्थिति: कुषाण वंश का सबसे शक्तिशाली शासक।
- बिना सिर वाली मूर्ति (Headless Statue): मथुरा से प्राप्त 1.85 मीटर ऊँची मूर्ति।
- ब्राह्मी अभिलेख: मूर्ति पर दर्ज उपाधि – ‘महाराज राजाधिराज देवपुत्र कनिष्क’ (‘The great king, king of kings, son of God, Kanishka’)।
- सिक्कों की विशेषता:
- सिक्का 1: एक तरफ कनिष्क हाथ में भाला लिए हुए; दूसरी तरफ बुद्ध की आकृति और ग्रीक लिपि में ‘BOΔΔO’ (Buddha) अंकित।
- सिक्का 2: एक तरफ कनिष्क; दूसरी तरफ नंदी बैल के साथ भगवान शिव की आकृति।
- धार्मिक नीति: बौद्ध और हिंदू धर्म का सम्मान व सह-अस्तित्व।
- सिल्क रूट: रेशम मार्ग के प्रमुख भागों पर नियंत्रण, जिससे भारत, मध्य एशिया और पश्चिमी देशों के बीच व्यापार बढ़ा।
कला की शैलियाँ: गांधार एवं मथुरा (Gandhara & Mathura Schools of Art)
- सामूहिक विशेषता: भारतीय और ग्रीक शैली का संगम। सूर्य देव जैसी आकृतियों का मानवीकरण (Human form)।
1. गांधार कला शैली
- क्षेत्र: पंजाब और उत्तर-पश्चिम भारत।
- प्रभाव: ग्रीको-रोमन प्रभाव स्पष्ट।
- सामग्री: मुख्य रूप से स्लेटी-काले शिस्ट पत्थर (Grey-black schist stone) का प्रयोग।
- विशेषता: बुद्ध और बोधिसत्व की यथार्थवादी शारीरिक बनावट (Realistic anatomy) और बहती हुई सलवटों वाले वस्त्र (Flowing robes)।
2. मथुरा कला शैली
- क्षेत्र: मथुरा (उत्तर प्रदेश)।
- प्रभाव: पूर्णतः स्वदेशी/भारतीय शैली (Greco-Roman प्रभाव नगण्य)।
- सामग्री: लाल बलुआ पत्थर (Red sandstone) का प्रयोग।


- चित्रण: बुद्ध, कुबेर, लक्ष्मी, शिव, यक्ष और यक्षिणियों की आकृतियां। मूछों का स्पष्ट अंकन और उभरी/भरी हुई शारीरिक बनावट (Fuller figures)।
सांस्कृतिक एवं साहित्यिक पुनर्जागरण
- संस्कृत साहित्य: इस काल में संस्कृत साहित्य का तीव्र विकास हुआ।
- महाकाव्य: महाभारत और रामायण जैसे महान ग्रंथों का संकलन व विस्तार।
गांधार और मथुरा कला:
| आधार | गांधार कला | मथुरा कला |
| क्षेत्र | उत्तर-पश्चिम भारत (पंजाब/अफगानिस्तान) | मथुरा (उत्तर प्रदेश) |
| मुख्य पत्थर | स्लेटी शिस्ट | लाल बलुआ पत्थर (Red Sandstone) |
| शिल्प प्रभाव | यूनानी-रोमन (Greco-Roman) | पूर्णतः स्वदेशी (Indian) |
| मुख्य विषय | बुद्ध व बोधिसत्व की यथार्थवादी मूर्तियां | बुद्ध, हिंदू देवी-देवता, यक्ष-यक्षिणी |