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4 August 2026 The Hindu Notes In Hindi Pdf

4 August 2026 The Hindu Notes In Hindi Pdf के प्रमुख संपादकीय व प्रासंगिक विषयों जैसे MSME विकास (संशोधन) विधेयक 2026, AI व साइबर सुरक्षा के दोहरे खतरों और जन्म व मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक पर विश्लेषणात्मक सामग्री दी गई है। इसके अलावा क्रिटिकल मिनरल्स व भारत की रणनीतिक सुरक्षा, भारत की व्यापार कूटनीति व FTAs का समालोचनात्मक मूल्यांकन, ONGC की मंगलुरु SPR परियोजना तथा LIC में सरकार द्वारा 6.5% हिस्सेदारी बिक्री (OFS) जैसे आर्थिक एवं सामरिक मुद्दों के परीक्षा-उपयोगी नोट्स शामिल हैं।

 संदर्भ (Context): संसद के उच्च सदन (राज्यसभा) ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित कर दिया है। यह नया कानून MSME विकास अधिनियम, 2006 का स्थान लेगा।

प्रमुख प्रावधान एवं विशेषताएँ (Key Provisions)

  • राष्ट्रीय डिजिटल मंच (National Digital Platform):
    • MSME इकाइयों के नि:शुल्क और स्वैच्छिक (Free & Voluntary) पंजीकरण के लिए एक राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म को अधिसूचित किया जाएगा।
  • तरलता (Liquidity) संबंधी चिंताओं का समाधान:
    • MSME क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या—भुगतान में देरी (Delayed Payments)—को दूर करने के लिए विशेष उपाय किए गए हैं।
    • सभी केन्द्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (CPSEs) के लिए MSME से माल और सेवाओं की खरीद के बाद चालान निपटान (Invoice Settlement) को TReDS (Trade Receivables Discounting System) के माध्यम से संचालित करना अनिवार्य कर दिया गया है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में MSME क्षेत्र का योगदान (Economic Significance)

  • जीडीपी में योगदान (GDP Contribution): भारत की कुल GDP में 31% हिस्सेदारी।
  • विनिर्माण उत्पादन (Manufacturing Output): कुल विनिर्माण का 36%।
  • निर्यात (Exports): भारत के कुल निर्यात में 41% योगदान।
  • ऋण उपलब्धता में वृद्धि (Credit Disbursal): MSME क्षेत्र को दिया जाने वाला बकाया ऋण वर्ष 2014-15 के ₹10 लाख करोड़ से बढ़कर 38.35 लाख करोड़ से अधिक हो गया है।

संदर्भ (Context): आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का त्वरित विकास सामान्य परिचालन तंत्र से आगे बढ़कर एक ‘अनिवार्य अवसंरचना’ (Infrastructure Mandate) बन गया है। AI और साइबर खतरों के संयोजन ने वैश्विक सुरक्षा, आधुनिक युद्ध रणनीति और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के सामने अभूतपूर्व चुनौतियाँ पैदा कर दी हैं।

उभरती तकनीकी चुनौतियाँ (Key Emerging Threats)

  • एजेंटिक AI (Agentic AI) बनाम जनरेटिव AI:
    • केवल सामग्री (Text/Images) बनाने वाले Generative AI के विपरीत, Agentic AI में स्वायत्तता से कार्य (Autonomous Operations) करने की क्षमता होती है।
    • यह साइबर खतरों के स्तर को कई गुना बढ़ा देता है क्योंकि यह बिना मानवीय हस्तक्षेप के जटिल हमलों को अंजाम दे सकता है।
  • शून्य-दिवस भेद्यता (Zero-Day Vulnerabilities):
    • आधुनिक AI मॉडल (जैसे एंथ्रोपिक का Mythos) प्रमुख ऑपरेटिंग सिस्टम और क्रिप्टोग्राफिक सॉफ़्टवेयर में ‘Zero-Day’ सुरक्षा खामियों का पता लगाने में सक्षम हैं।
  • ‘ज़ीरो ट्रस्ट’ (Zero Trust) प्रोटोकॉल को चुनौती:
    • पारंपरिक एंटी-वायरस और ‘Zero Trust’ सुरक्षा ढांचा AI-आधारित स्वायत्त मैलवेयर के सामने अप्रभावी साबित हो रहे हैं।
    • AI-संचालित मैलवेयर अपने वातावरण के अनुसार अनुकूलित (Adapt and Evolve) हो सकते हैं और आंतरिक सुरक्षा खतरों (Insider Threat Vectors) को गंभीर बना सकते हैं।
  • गैंग/अराजक समूहों का सशक्तिकरण (Democratization of Threat Capabilities):
    • नई पीढ़ी की AI प्रौद्योगिकियों के कारण ‘गैर-राज्य अभिकर्ताओं’ (Rogue Groups/Non-State Actors) को भी ऐसी क्षमताएँ मिल रही हैं जो पहले केवल संप्रभु राष्ट्रों के पास थीं।

आधुनिक रक्षा और युद्ध प्रणाली में AI का प्रयोग (AI in Modern Warfare)

  • असममित प्रभाव (Asymmetric Impact): जैसा कि रूस-यूक्रेन संघर्ष और मध्य पूर्व (यू.एस./इज़राइल-ईरान) युद्ध में देखा गया है, AI पारंपरिक सैन्य संतुलन और रणनीतियों को कमजोर कर रहा है।
  • स्मार्ट पहचान और ट्रैकिंग प्रणाली: AI सिस्टम सटीक रूप से मिसाइल प्रक्षेपवक्र (Missile Trajectories) का पता लगाने, ट्रैक करने और भविष्यवाणी करने में सक्षम हैं।
  • स्वायत्त हथियार प्रणालियाँ (Autonomous Munitions): ‘गोलकीपर’ और ‘व्हिपलैश’ जैसी प्रणालियाँ बिना इंसानी आदेश के स्वतंत्र रूप से लक्ष्यों की पहचान कर उन पर हमला कर सकती हैं।
  • बहु-आयामी खुफिया जानकारी (Multi-source Intelligence): AI छवियों, टेक्स्ट, रेडियो और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक संकेतों को संसाधित करके विरोधियों को रणनीतिक बढ़त (Tactical Advantage) लेने से रोकता है।

AI और साइबर सुरक्षा के प्रमुख जोखिम     

  • अल्गोरिद्मिक पूर्वाग्रह (Algorithmic Bias): राष्ट्रीय सुरक्षा और विशिष्ट दृष्टिकोणों के प्रति झुकाव या पक्षपात होना।
  • भ्रम (Hallucinations): AI द्वारा गलत, मनगढ़ंत या भ्रामक चेतावनियाँ व प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करना।
  • तकनीकी एकाधिकार (Corporate Monopoly): एंथ्रोपिक और पेलेंटिर जैसी कुछ बड़ी निजी फर्मों का इस क्षेत्र पर अत्यधिक प्रभुत्व होना।
  • अल्गोरिद्मिक कट्टरपंथ (Algorithmic Radicalisation): जनमत/राय निर्माताओं (Opinion Makers) को चरम और कट्टर विचारों की ओर धकेलना।

भू-राजनीतिक आयाम (Geopolitical Dimensions & Tech-Cold War)

  • शक्ति का हस्तांतरण (Power Shift): AI सैन्य और आर्थिक शक्ति का मुख्य स्रोत बनता जा रहा है।
  • तकनीकी प्रतिस्पर्धा (US-China Tech Rivalry):
    • संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बीच AI मॉडल और बौद्धिक संपदा को लेकर टकराव बढ़ रहा है (उदाहरण: चीन के ‘Moonshot’ AI द्वारा एंथ्रोपिक के ‘Fable’ मॉडल की तकनीक चुराने के आरोप)।
  • नियामक ढाँचे की कमी (Lack of Regulatory Framework):
    • AI की गति की तुलना में वैश्विक स्तर पर इसे नियंत्रित करने वाले अंतर्राष्ट्रीय नियम और नीतियाँ (Governance Rules) अभी भी बेहद शुरुआती चरण में हैं।

आगे की राह (Way Forward)

  • ‘इंसानी नियंत्रण’ (Human-in-the-Loop) अनिवार्य करना: रक्षा पहचान और चेतावनी प्रणालियों (Defence Sensing & Warning) में मशीनों को पूरी तरह स्वायत्त बनाने के बजाय इंसानी विवेक और नियंत्रण बनाए रखना आवश्यक है।
  • साइबर सुरक्षा नियमों का पुनर्लेखन: एजेंटिक AI के युग से निपटने के लिए वैश्विक साइबर सुरक्षा ढाँचे को पूरी तरह से नए सिरे से तैयार करने की आवश्यकता है।
  • सामूहिक वैश्विक नियमन (Global AI Governance): AI के खतरों से पूरी सभ्यता को बचाने के लिए राष्ट्र-राज्यों और वैश्विक टेक कंपनियों को साझा नियामक तंत्र पर सहमत होना होगा।
  • रणनीतिक यथार्थवाद और सतर्कता: नई तकनीक के अंधानुकरण के बजाय चीनी कहावत-“पत्थरों को महसूस करते हुए नदी पार करना”—की नीति अपनानी चाहिए, ताकि नवाचार और सुरक्षा के बीच संतुलन बना रहे।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न (Mains Practice Question)

संदर्भ (Context): ऊर्जा संक्रमण, डिजिटलीकरण, EV, सेमीकंडक्टर और रक्षा उद्योग के विस्तार के साथ ‘खनिज सुरक्षा’ (Mineral Security) अब तेल सुरक्षा (Oil Security) जितनी ही महत्वपूर्ण हो गई है। वैश्विक स्तर पर इन खनिजों का प्रसंस्करण (Processing) अत्यधिक केंद्रित है, जिससे आपूर्ति श्रृंखला पर गंभीर भू-राजनीतिक जोखिम मंडरा रहा है।

वैश्विक स्थिति एवं भू-राजनीतिक जोखिम (Global Landscape & Geopolitical Risks)

  • प्रसंस्करण का अत्यधिक संकेंद्रण (High Concentration):
    • वर्ष 2024 तक शीर्ष 3 रिफाइनिंग देशों का औसत बाजार शेयर बढ़कर 86% (2020 में 82%) हो गया है।
    • चीन 20 में से 19 रणनीतिक खनिजों का अग्रणी रिफाइनर है, जिसका औसत बाजार शेयर लगभग 70% है।
    • दुर्लभ मृदा तत्वों (Rare Earth Elements – REEs) और ग्रेफाइट के प्रसंस्करण में चीन का हिस्सा 90% से अधिक, कोबाल्ट में ~75% और लिथियम रसायनों में ~70% है।
  • सप्लाई गैप और निर्यात नियंत्रण:
    • तांबे (Copper) में 2035 तक 30% आपूर्ति की कमी का अनुमान है।
    • 2025 में चीन द्वारा लगाए गए दुर्लभ मृदा तत्वों (Rare Earths) के निर्यात प्रतिबंधों ने दुनिया भर के EV, AI, रक्षा और सेमीकंडक्टर उद्योगों के लिए चिंता पैदा कर दी है।
  • वैश्विक प्रतिक्रियाएँ:
    • यूरोपीय संघ (EU): Critical Raw Materials Act लागू किया, जिसमें 2030 तक 10% घरेलू निष्कर्षण, 40% प्रसंस्करण और 25% रीसाइक्लिंग का लक्ष्य रखा गया है (किसी एक देश पर निर्भरता 65% से अधिक न हो)।
    • अमेरिका (US): वैश्विक साझेदारियों के माध्यम से आपूर्ति श्रृंखला का विविधीकरण (Diversification) कर रहा है।

भारतीय संदर्भ: मांग, क्षमता और कमियाँ (India’s Scenario)

  • मांग का अनुमान: ‘Net Zero 2070’ परिदृश्य के तहत, भारत की महत्वपूर्ण ऊर्जा संक्रमण खनिजों की संचयी मांग 169 मिलियन टन तक पहुँच सकती है।
  • घरेलू संसाधन भंडार:
    • कोबाल्ट: 44.9 मिलियन टन | तांबा: 163.9 मिलियन टन | ग्रेफाइट: 211.6 मिलियन टन | निकल: 189 मिलियन टन। इसके अलावा ओडिसा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में मोनाज़ाइट (Monazite) निक्षेप (REEs के लिए)।
  • प्रमुख कमियाँ (Structural Bottlenecks):
    • मिडस्ट्रीम/प्रसंस्करण क्षमता का अभाव: भारत में कच्चे खनिज (Bulk Minerals) का अनुभव तो है, लेकिन उच्च-शुद्धता वाले परिष्कृत उत्पादों (High-purity refined products) के प्रसंस्करण की क्षमता कम है।
    • भारत लिथियम, कोबाल्ट और निकेल के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर (Import Dependent) है।
    • रीसाइक्लिंग तकनीक और फीडस्टॉक एकत्रीकरण का सीमित होना।

भारत की नीतिगत पहल (Key Policy Initiatives): भारत की महत्वपूर्ण खनिज रणनीति     

  • 30 महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) की पहचान: 30 महत्वपूर्ण खनिजों को चिह्नित कर देश के नियामक ढांचे (Regulatory Framework) को मजबूत किया गया।
  • राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल मिशन (National Critical Mineral Mission):
    • घरेलू अन्वेषण: 2030-31 तक 1,200 घरेलू अन्वेषण परियोजनाओं का लक्ष्य।
    • उत्पादन लक्ष्य: कम से कम 15 महत्वपूर्ण खनिजों के स्थानीय उत्पादन की योजना।
    • विदेशी संपत्तियां: विदेशी खनन संपत्तियों के अधिग्रहण पर बल।
    • REE कॉरिडोर (बजट 2026-27): ओड़िशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में रेयर अर्थ एलिमेंट्स (REE) कॉरिडोर का प्रस्ताव।
  • KABIL और विदेशी अधिग्रहण (Overseas Acquisition): खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL) द्वारा अर्जेंटीना के केटामार्का में 15,703 हेक्टेयर क्षेत्र पर लिथियम अन्वेषण कार्य
  • अंतर्राष्ट्रीय समझौते और कूटनीति (Diplomatic Levers):
    • भारत-अमेरिका समझौता: मई 2026 में भारत और अमेरिका द्वारा क्रिटिकल मिनरल्स और REE फ्रेमवर्क पर हस्ताक्षर।

आगे की राह (Way Forward)

  1. प्रसंस्करण (Processing & Refining) को प्राथमिकता: प्रसंस्करण को राष्ट्रीय औद्योगिक प्राथमिकता घोषित कर इंफ्रास्ट्रक्चर और इंसेंटिव (Incentives) दिए जाएं।
  2. निजी पूंजी और भूवैज्ञानिक डेटा: निजी क्षेत्र को आकर्षित करने के लिए बेहतर जियोलॉजिकल डेटा, त्वरित नियामक मंजूरियां (Approvals) और जोखिम साझाकरण ढांचा तैयार किया जाए।
  3. रणनीतिक भंडार (Strategic Stockpiles): आपातकालीन आपूर्ति व्यवधान से बचने के लिए महत्वपूर्ण खनिजों का ‘स्ट्रैटेजिक स्टॉकपाइल’ बनाया जाए।
  4. आरएंडडी और रीसाइक्लिंग (R&D & Circular Economy): उद्योग-अकादमिक साझेदारी के माध्यम से उच्च-शुद्धता शोधन तकनीक विकसित की जाए और रीसाइक्लिंग को आपूर्ति नियोजन में एकीकृत किया जाए।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न (Mains Practice Question)

 संदर्भ (Context): लोक सभा ने ‘जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026’ पारित किया है, जो 1969 के मूल अधिनियम की धारा 13(3) में संशोधन करता है। यह विधेयक जन्म प्रमाण पत्र की बढ़ती प्रशासनिक महत्ता और धोखाधड़ी (Fraudulent Registrations) के जोखिम को नियंत्रित करने के उद्देश्य से लाया गया है।

प्रमुख प्रावधान एवं त्रि-स्तरीय ढांचा (Key Provisions)

संशोधित विधेयक में पंजीकरण में होने वाली देरी के आधार पर एक त्रि-स्तरीय मंजूरी ढांचा पेश किया गया है:

देरी की अवधि  आवश्यक प्राधिकरण / प्राधिकारी (Required Authority)
नियत समय के भीतरसामान्य रजिस्ट्रार प्रक्रिया (प्रशासनिक)।
2 वर्ष तक की देरीजिला, उप-विभागीय या अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट (Executive Magistrate) का आदेश।
2 वर्ष से अधिक की देरीन्यायिक मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate) द्वारा घटना का सत्यापन और आदेश पारित करना अनिवार्य।

पृष्ठभूमि  

  • प्रमाण पत्र की ‘गेटकीपिंग’ शक्ति (Gatekeeping Power):
    • 2023 के संशोधन ने जन्म प्रमाण पत्र को स्कूल प्रवेश, मतदाता सूची, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस और सरकारी नौकरियों के लिए प्राथमिक और लगभग निर्णायक प्रमाण बना दिया।
  • डिजिटल डेटाबेस का एकीकरण: इसने केंद्र और राज्यों को डिजिटल डेटाबेस बनाने तथा रजिस्ट्रार जनरल के साथ डेटा साझा करने की अनुमति दी।
  • धोखाधड़ी में वृद्धि का जोखिम: जैसे-जैसे इस दस्तावेज़ का महत्व बढ़ा, इसे धोखाधड़ी से प्राप्त करने के प्रयास भी बढ़े, जिसके परिणामस्वरूप 2026 के इस नए संशोधन की आवश्यकता पड़ी।

विधेयक से जुड़ी प्रमुख चिंताएँ एवं विश्लेषण (Critical Analysis & Concerns)

1. 2026 संशोधन से जुड़े प्रमुख मुद्दे

  • न्यायिक बोझ एवं जटिलता (Judicial Burden):
    • मामलों को सीधे न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास भेजने से अदालतों में लंबित मामलों का बोझ बढ़ेगा और प्रक्रिया अधिक जटिल हो जाएगी।
  • साक्ष्य संबंधी नियमों में कोई बदलाव नहीं (Evidentiary Rules Unchanged):
    • सरकार ने धोखाधड़ी रोकने के लिए सबूतों और दस्तावेजों के मानकों को कठोर बनाने के बजाय केवल निर्णय लेने वाले प्राधिकारी (कार्यपालिका से न्यायपालिका) को बदला है।
  • वंचित वर्गों के लिए पहुँच का संकट (Access Issues):
    • दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों और बिना कागजी दस्तावेजों वाले हाशिए के समूहों के लिए अदालतों के चक्कर लगाना अत्यधिक कठिन और खर्चीला साबित होगा।
  • गलत अपवर्जन बनाम गलत समावेश (Exclusion vs Inclusion):
    • अयोग्य या गलत लोगों को शामिल होने से रोकने की होड़ में वास्तविक और योग्य नागरिकों को उनके अधिकारों से वंचित करने का गंभीर जोखिम बना रहेगा।

2. नीतिगत एवं प्रशासनिक विश्लेषण

  • प्रशासकीय निष्पक्षता बनाम न्यायिक बोझ:
    • न्यायिक जांच की व्यवस्था से निर्णय कार्यपालिका के प्रभाव से स्वतंत्र हो जाता है, जिससे पक्षपात के आरोप कम होते हैं। हालाँकि, यदि कोई गलत निर्णय होता है, तो उसे सुधारना गरीब और वंचित आवेदकों के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
  • 2 वर्ष की सीमा का अस्पष्ट वैज्ञानिक आधार:
    • इस बात का कोई प्रकाशित साक्ष्य या आधिकारिक स्पष्टीकरण मौजूद नहीं है कि 2 वर्ष बाद अचानक धोखाधड़ी का जोखिम कैसे बढ़ जाता है और क्या इसके लिए कम जटिल/बोझिल विकल्पों पर विचार किया गया था या नहीं।
  • नीतिगत दर्शन का संकट (Philosophical Dilemma):
    • यह संशोधन उस सोच व नीतिगत प्रवृत्ति को उजागर करता है जिसके तहत गलत समावेश को रोकने के लिए वैध नागरिकों का गलत अपवर्जन एक स्वीकार्य कीमत मान ली जाती है।”

आगे की राह (Way Forward)

  1. संसदीय बहस और समीक्षा: राज्य सभा को इस विधेयक पर व्यापक बहस करनी चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि न्यायिक हस्तक्षेप का निर्णय पर्याप्त साक्ष्यों पर आधारित है या नहीं।
  2. साक्ष्य मानकों का सुदृढ़ीकरण: केवल न्यायपालिका पर बोझ डालने के बजाय सत्यापन प्रक्रिया और दस्तावेजी साक्ष्यों को सुगम तथा फूलप्रूफ बनाया जाना चाहिए।
  3. वंचित वर्गों के लिए पहुँच योग्य विकल्प: दूरदराज के क्षेत्रों या कानूनी जागरूकता की कमी वाले नागरिकों के लिए विशेष प्रशासनिक शिविर (Special Administrative Camps) आयोजित किए जाने चाहिए ताकि उन्हें न्यायिक जटिलताओं से बचाया जा सके।

पृष्ठभूमि और उभरता रुझान

  • द्विपक्षीय व्यापार कूटनीति पर बल: हाल के वर्षों में भारत ने अपने आर्थिक और सामरिक हितों को बढ़ावा देने के लिए मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) में गहरी रुचि दिखाई है।
  • हालिया व प्रस्तावित समझौते:
    • UAE, ऑस्ट्रेलिया, ओमान, यूके (U.K.), यूरोपीय संघ (EU) और न्यूजीलैंड के साथ FTAs पर कार्य/हस्ताक्षर।
    • अमेरिका (U.S.), खाड़ी देशों और कनाडा के साथ चल रही व्यापार वार्ताएँ।
  • नीति निर्माताओं का मानना है कि FTAs बाज़ार पहुँच (Market Access), मूल्य श्रृंखला एकीकरण (Value Chain Integration) और आर्थिक गतिशीलता बढ़ाने के मुख्य साधन हैं।

एशियाई देशों के साथ FTAs का अनुभव: बढ़ता व्यापार घाटा

  • आयात-संचालित व्यापार: एशियाई अर्थव्यवस्थाओं (ASEAN, दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुर) के साथ भारत का व्यापार निर्यात के बजाय मुख्य रूप से आयात-संचालित (Import-driven) रहा है।
  • व्यापार घाटे में भारी वृद्धि:
    • आसियान (ASEAN) के साथ भारत का व्यापार घाटा 2012 के $10.4 बिलियन से तेज़ी से बढ़कर 2025 में $51.2 बिलियन हो गया।
    • सिंगापुर के साथ भारत का पूर्ववर्ती व्यापार अधिशेष (Trade Surplus) अब व्यापार घाटे (Trade Deficit) में बदल गया है।
    • जापान और दक्षिण कोरिया के मामले में भी निर्यात की तुलना में आयात बहुत तेज़ी से बढ़ा है।

निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता में गिरावट (Export Underperformance)

FTAs के बावजूद प्रमुख साझेदार देशों के कुल आयात बास्केट (Import Basket) में भारत की हिस्सेदारी या तो ठप्प हो गई है या घटी है (2012 से 2025 का डेटा):

  • ASEAN: आयात हिस्सेदारी 3.42% से घटकर 1.71% (आधी) हो गई।
  • सिंगापुर: आयात हिस्सेदारी 2.27% से घटकर 1.71% हो गई।
  • दक्षिण कोरिया: आयात हिस्सेदारी 1.33% से घटकर 1.02% हो गई।
  • भारत केवल टैरिफ/शुल्क में छूट देकर अपनी कमजोर घरेलू औद्योगिक क्षमताओं, लॉजिस्टिक कमियों और बुनियादी ढाँचे की बाधाओं से पार नहीं पा सकता।

वैश्विक मूल्य श्रृंखला (GVC) एकीकरण पर असर

  • GVC में कमज़ोर उपस्थिति: यह माना जाता था कि FTAs से वैश्विक मूल्य श्रृंखला (GVC) में भारत की

हिस्सेदारी बढ़ेगी, लेकिन कुल व्यापार के प्रतिशत के रूप में भारत का वैश्विक मूल्य श्रृंखला (GVC) व्यापार 37.13% से घटकर 34.38% हो गया।

  • देशवार स्थिति:
    • गिरावट दर्ज की गई: दक्षिण कोरिया, जापान, इंडोनेशिया, थाईलैंड, वियतनाम और कंबोडिया।
    • वृद्धि दर्ज की गई: केवल मलेशिया, सिंगापुर और फिलीपींस।
  • धारणा बनाम वास्तविकता: यह आंकड़े दर्शाते हैं कि व्यापार उदारीकरण या केवल FTAs करने से स्वचालित रूप से GVC एकीकरण नहीं होता।

मुख्य चुनौतियाँ एवं नीतिगत सबक

  • मूल कारण: भारत की मुख्य चुनौती नए FTAs पर हस्ताक्षर करना नहीं, बल्कि अपनी घरेलू उत्पादक क्षमताओं (Domestic Productive Capabilities) को मजबूत करना है।
  • जोखिम: पर्याप्त औद्योगिक परिवर्तन (Industrial Transformation) के बिना, FTAs केवल आयात को बढ़ावा देंगे, जिससे भारत का व्यापार घाटा और संरचनात्मक कमियाँ बढ़ेंगी।

आगे की राह (Way Forward)

  • बाज़ार पहुँच से परे सोच: भारत को अपनी FTA रणनीति को केवल ‘टैरिफ दरों में कटौती’ या ‘बाज़ार पहुँच’ तक सीमित नहीं रखना चाहिए।
  • व्यापक औद्योगिक नीति से जोड़ना: FTAs को देश की व्यापक औद्योगिक नीति (Industrial Policy) के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए, जिसमें निम्नलिखित पर ध्यान केंद्रित हो:
    • तकनीक का उन्नयन (Technological Upgrading)।
    • रणनीतिक निवेश (Strategic Investment)।
    • आपूर्ति श्रृंखला का पुनर्गठन (Supply Chain Realignment)।
    • घरेलू मूल्य संवर्धन (Domestic Value Addition) और आंतरिक सुधार।

मंगलुरु भंडारण सुविधा का आवंटन

  • कुल क्षमता: ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ONGC) मंगलुरु में 1.75 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) क्षमता की तेल भंडारण सुविधा विकसित कर रहा है।
  • 50:50 मॉडल:
    • 50% (रणनीतिक भंडारण): देश की रणनीतिक जरूरतों/आपातकाल के लिए आरक्षित रहेगा।
    • 50% (व्यावसायिक उपयोग): ONGC के व्यावसायिक संचालन (Commercial Operations) के लिए उपलब्ध रहेगा।
  • फंडिंग: इस परियोजना का पूरा खर्च ONGC द्वारा स्व-वित्तपोषित (Entirely Funded) किया जाएगा।

भारत की वर्तमान कच्चे तेल भंडारण स्थिति

  • आयात निर्भरता व सुरक्षा: भारत की वर्तमान कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की भंडारण क्षमता देश की 74 दिनों की निवल कच्चा तेल (Net Crude) आयात आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम है।

आगामी विस्तार योजनाएँ (6.5 MMT)

  • कुल नया लक्ष्य: सरकार ने कुल 6.5 MMT की अतिरिक्त भंडारण क्षमता बनाने की योजना तैयार की है।
  • प्रमुख नए स्थान (4 MMT):
    • चांदीखोल (Chandikhol): ओड़िशा (Odisha)
    • पादुर (Padur): कर्नाटक (Karnataka)

ऑफ़र फॉर सेल (OFS)( प्रमोटर):     

  • कुल हिस्सेदारी की बिक्री: केंद्र सरकार लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन (LIC) में अपनी 6.5% तक की हिस्सेदारी बेचेगी।
    • बेसिक ऑफ़र: 2.5% इक्विटी।
    • ग्रीन शू ऑप्शन (Green Shoe Option): अतिरिक्त 4% हिस्सेदारी।
  • फ्लोर प्राइस (Floor Price): प्रति शेयर 382 तय किया गया है (जो BSE पर सोमवार के बंद भाव ₹424.35 से 10% डिस्काउंट पर है)।
  • सब्सक्रिप्शन:
    • गैर-रिटेल निवेशक (Non-Retail Investors)
    • रिटेल निवेशक (Retail Investors)
  • अनुमानित आय (Disinvestment Kitty): पूर्ण सब्सक्रिप्शन (82.22 करोड़ से अधिक शेयर) होने पर सरकार को लगभग 31,000 करोड़ प्राप्त होंगे।

न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता (SEBI MPS Mandate)

  • SEBI का नियम: इस हिस्सेदारी बिक्री से LIC को बाज़ार नियामक SEBI द्वारा अनिवार्य न्यूनतम 10% सार्वजनिक शेयरधारिता (Minimum Public Shareholding – MPS) का लक्ष्य समय से पहले हासिल करने में मदद मिलेगी।
  • समय-सीमा: SEBI ने LIC को 10% सार्वजनिक शेयरधारिता हासिल करने के लिए 16 मई 2027 तक का समय दिया था।

वर्तमान स्थिति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • वर्तमान शेयरधारिता: इस बिक्री से पहले सरकार के पास LIC में 96.5% हिस्सेदारी है।
  • LIC IPO (मई 2022): सरकार ने मई 2022 में ₹902-949 के प्राइस बैंड पर 3.5% हिस्सेदारी बेचकर लगभग 21,000 करोड़ जुटाए थे।
  • मार्केट कैप: वर्तमान में LIC का बाजार पूंजीकरण (Market Capitalisation) 5.36 लाख करोड़ से अधिक है।

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