3 August 2026 The Hindu Notes In Hindi Pdf के प्रमुख संपादकीय विषयों जैसे कावेरी नदी जल विवाद और बेसिन प्रबंधन, भारत में तितलियों व पतंगों (लेपिडोप्टेरा) की जैव विविधता, और राज्यों द्वारा छात्रों पर की जाने वाली कार्रवाई के सबक को गहराई से समझाया गया है। इसके अलावा, बेहतर सार्वजनिक खर्च से स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने, भारत के शहरी अवसंरचना संकट, यूरोप में दावानल (Wildfires) व भीषण गर्मी का जलवायु परिवर्तन से संबंध, और देश में सरकारी स्कूलों के बंद होने जैसे गंभीर मुद्दों पर परीक्षोपयोगी विश्लेषणात्मक सामग्री शामिल की गई है।
कावेरी नदी जल विवाद और बेसिन प्रबंधन
Context
- घटना: कर्नाटक के काबिनी बाँध से भारी वर्षा के कारण कावेरी नदी में पानी छोड़ा गया, जो तमिलनाडु के मेट्टूर बांध में पहुँचेगा।
- प्रमुख कारक (Key Dynamics):
- नदी तल का सुखापन (Riverbed Absorption): नदी का तल सूखा होने के कारण शुरुआती जल प्रवाह को अवशोषित (Absorb) कर लेता है, जिससे पानी पहुँचने में देरी होती है।
- कृष्णराज सागर बाँध (KRS Dam) का महत्व: तमिलनाडु को पर्याप्त पानी आमतौर पर तभी मिलता है जब कर्नाटक का कृष्णराज सागर (KRS) बाँध पूरी क्षमता (49.45 tmcft) से भर जाता है और उसका सरप्लस पानी छोड़ा जाता है।
भौगोलिक एवं तकनीकी पहलू (Geographical Aspects)
| घटक / बाँध | नदी | राज्य | मुख्य कार्य/महत्व |
| काबिनी बाँध (Kabini Dam) | कबिनी नदी (कावेरी की सहायक नदी) | कर्नाटक (मैसूर) | बाढ़ नियंत्रण और कावेरी बेसिन में जल आपूर्ति |
| कृष्णराज सागर (KRS Dam) | कावेरी नदी | कर्नाटक (मांड्या) | मुख्य जल भंडारण, सिंचाई और बेंगलुरु/मैसूर पेयजल आपूर्ति |
| मेट्टूर बाँध (Mettur Dam) | कावेरी नदी | तमिलनाडु (सेलम) | तमिलनाडु के डेल्टा क्षेत्रों (Thanjavur Delta) के लिए सिंचाई का मुख्य स्रोत |
कावेरी नदी प्रणाली:
- उद्गम (Origin): तालकावेरी, ब्रह्मगिरि पहाड़ी, पश्चिमी घाट (कर्नाटक)।
- अपवाह बेसिन (Basin States): कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी।
- मुख्य सहायक नदियाँ:
- बाएँ तट (Left Bank): हरंगी (Harangi), हेमावती (Hemavati), शिमशा (Shimsha), अर्कावती (Arkavathi)।
- दाएँ तट (Right Bank): लक्ष्मणतीर्थ (Lakshmantirtha), काबिनी (Kabini), भवानी (Bhavani), नोय्यिल (Noyyal), अमरावती (Amravati)।
अंतर-राज्यीय जल विवाद और संवैधानिक प्रावधान
- संवैधानिक ढांचा:
- अनुच्छेद 262: संसद को अंतर-राज्यीय नदियों या नदी घाटियों के जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित किसी भी विवाद के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है।
- अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956: इसके तहत विवाद समाधान के लिए ट्रिब्यूनल (Tribunal) का गठन किया जाता है।
- कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) और सर्वोच्च न्यायालय का फैसला (2018):
- सर्वोच्च न्यायालय ने कावेरी नदी को “राष्ट्रीय संपत्ति” घोषित किया।
- पानी के आबंटन का अंतिम अनुपात तय किया गया और संकट के समय जल बँटवारे के लिए कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) का गठन किया गया।
कृषि एवं अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
- कावेरी डेल्टा क्षेत्र : तमिलनाडु का ‘अन्न का कटोरा’ कहलाता है।
- कुरुवई और साम्बा धान: मेत्तूर बाँध से पानी छूटने का सीधा असर तमिलनाडु के किसानों की धान (Paddy) की खेती के कैलेंडर और फसल चक्र पर पड़ता है।
भारत में लेपिडोप्टेरा (तितलियाँ और पतंगे) की जैव विविधता
संदर्भ (Context)
- प्रकाशन: ज़ूऑलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ZSI) के वैज्ञानिकों ने “Catalogue of Lepidoptera (Butterflies & Moths) of India” तैयार किया है।
- संशोधन एवं समयावधि: वैज्ञानिक नवनीत सिंह और राहुल जोशी द्वारा 12 वर्षों की विस्तृत क्षेत्र खोज (field exploration), संग्रहालय संरक्षण और साहित्य सत्यापन के बाद यह कैटलॉग तैयार किया गया।
- वैश्विक योगदान: भारत में लेपिडोप्टेरा की 13,703 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जो दुनिया भर में पाई जाने वाली कुल लेपिडोप्टेरा प्रजातियों का लगभग 8.25% है।
वर्गीकरण का विवरण (Taxonomic Breakdown)
कुल लेपिडोप्टेरा प्रजातियाँ (13,703) = 1,417 तितलियाँ (Butterflies) + 12,286 पतंगे (Moths)
- वंश और कुल: यह 13,703 प्रजातियाँ 3,705 जेनेरा (Genera), 102 फैमिलीज (Families) और 31 सुपर-फैमिलीज में वर्गीकृत हैं।
- जियोमेट्रोइडे सुपरफैमिली:
- भारत में इस सुपरफैमिली की 2,205 प्रजातियाँ सूचीबद्ध की गई हैं (जो वैश्विक स्तर पर पाई जाने वाली इस प्रजाति का 8.8% है)।
- ये रात्रिचर परागणकर्ता (Nocturnal Pollinators) होते हैं, जो रात के समय परागण का कार्य संभालते हैं।
लेपिडोप्टेरा का पारिस्थितिक महत्व (Ecological Significance)
- पारिस्थितिकी संतुलन (Ecological Equilibrium):
- शाकाहारी (Herbivores) और अपरदाहारी (Detritivores): पौधे और कार्बनिक पदार्थों के अपघटन व खाद्य श्रृंखला का संतुलन बनाए रखते हैं।
- परागणकर्ता (Pollinators): तितलियाँ दिन में और पतंगे रात में मुख्य परागणकर्ता के रूप में कार्य करते हैं।
- खाद्य जाल (Food Web): पक्षियों, चमगादड़ों और अन्य कीटभक्षी जीवों के लिए भोजन का प्रमुख स्रोत हैं।
- पर्यावरणीय संकेतक (Bio-indicators): तितलियाँ और पतंगे वायुमंडलीय और जलवायु परिवर्तन के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं, इसलिए वे पर्यावरण स्वास्थ्य के अच्छे संकेतक हैं।
ज़ूऑलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ZSI)
| पहलू | विवरण |
| स्थापना | 1 जुलाई 1916 |
| मंत्रालय | पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) |
| मुख्यालय | कोलकाता (पश्चिम बंगाल) |
| मुख्य कार्य | भारत की पशु-विविधता का सर्वेक्षण, अन्वेषण, शोध और दस्तावेजीकरण। |
राज्य अपने ही छात्रों के ख़िलाफ़: याद रखने लायक़ सबक
GS Paper-2: शासन प्रणाली/गवर्नेंस एवं संवैधानिक अधिकार
संदर्भ (Context)
- ऐतिहासिक संदर्भ: 1876 (इंडियन एसोसिएशन की स्थापना), 1976 (सोवेटो विद्रोह/भारत में आपातकाल), और 2026 (वर्तमान शिक्षा प्रणाली/परीक्षा लीक के खिलाफ छात्रों का विरोध) का एक तुलनात्मक विश्लेषण।
- मुख्य संदेश: छात्रों और युवाओं की वास्तविक शिकायतों को दबाने या उनका अपमान करने के बजाय, राज्य को संस्थागत जवाबदेही (Institutional Accountability) और पारदर्शी शासन सुनिश्चित करना चाहिए।
① 1876 — इंडियन सिविल सर्विस (ICS) आयु सीमा विवाद:
- घटना: 26 जुलाई 1876 को सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने कलकत्ता में ‘इंडियन एसोसिएशन’ की स्थापना की।
- कारण: ब्रिटिश सरकार द्वारा ICS परीक्षा में बैठने की अधिकतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष कर दी गई थी, ताकि भारतीय युवा उच्च पदों पर न पहुँच सकें।
- परिणाम: सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने इस प्रशासनिक मुद्दे को एक संवैधानिक प्रश्न में बदल दिया और देशव्यापी दौरा करके पहली अखिल भारतीय राजनीतिक लामबंदी की नींव रखी।
② 1976 — सोवेटो विद्रोह (South Africa) और भारत में आपातकाल (Emergency):
- सोवेटो (16 जून 1976): दक्षिण अफ्रीका के स्कूली बच्चों ने ‘अफ्रीकांस’ भाषा थोपे जाने के खिलाफ मार्च निकाला। पुलिस दमन के कारण सैकड़ों छात्र मारे गए। लेकिन इसने रंगभेद (Apartheid) विरोधी आंदोलन को दिशा दी और 15 वर्षों में इस पीढ़ी ने रंगभेद शासन को उखाड़ फेंका।
- भारत में आपातकाल (1976): छात्र संघों को निलंबित किया गया और छात्र कार्यकर्ताओं को MISA (Maintenance of Internal Security Act) के तहत निवारक हिरासत (Preventive Detention) में डाला गया। 1977 में यही पीढ़ी भारत का नया राजनीतिक नेतृत्व बनी।
③ 2026 — परीक्षा लीक और Gen Z का आंदोलन:
- कारण: NEET-UG पेपर लीक, अंकन में अनियमितता और लगभग 20 लाख अभ्यर्थियों का भविष्य अधर में लटकना।
- मुद्दा: संस्थागत विफलता के खिलाफ पारदर्शी सुधार और जवाबदेही की मांग।
इतिहास द्वारा राज्य (State) को दिए गए 3 मुख्य Lessons
| Lesson | विवरण एवं प्रभाव | नीतिगत सीख (Policy Takeaway) |
| 1. बल प्रयोग शिकायतों को समाप्त नहीं करता, संगठित करता है | दमन और लाठीचार्ज से एक नीतिगत विवाद (Policy Dispute) “आत्मसम्मान के प्रश्न” (Question of Dignity) में बदल जाता है। | छात्रों के विरोध को तोड़ने योग्य अवज्ञा (Defiance) मानने के बजाय शासन की विफलता मानना चाहिए। |
| 2. तिरस्कार राज्य की वैधता को समाप्त करता है | युवाओं या प्रदर्शनकारियों के खिलाफ आपत्तिजनक या अमानवीय भाषा का प्रयोग आंदोलन को एक नैतिक बढ़त (Moral High Ground) देता है। | राज्य को छात्रों को विरोधी/शत्रु के रूप में देखने के बजाय हितधारक (Stakeholders) के रूप में स्वीकार करना चाहिए। |
| 3. विरोध लक्षण है; अवरुद्ध जवाबदेही ही बीमारी है | जब संवैधानिक या संस्थागत समाधान के रास्ते बंद हो जाते हैं, तब युवा सड़कों पर उतरते हैं। | एक मजबूत जवाबदेही वास्तुकला (Accountability Architecture) ही सड़कों के विरोध को अनावश्यक बनाती है। |
परीक्षा एजेंसियों व शिक्षा सुधार हेतु आवश्यक संस्थागत कदम
- परीक्षा निकायों की स्वायत्तता: NTA (नेशनल टेस्टिंग एजेंसी) जैसे स्वायत्त परीक्षा निकायों का पूर्ण पुनर्गठन और स्वतंत्रता।
- वैधानिक पारदर्शिता (Statutory Transparency): मूल्यांकन, उत्तर कुंजी (Answer Keys) और पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रियाओं में पूर्ण पारदर्शिता।
- संसदीय oversight: परीक्षाओं के संचालन और लीक से निपटने के लिए संसदीय समितियों की नियमित समीक्षा रिपोर्ट प्रकाशित की जाए।
- जवाबदेही का निर्धारण: केवल कक्ष निरीक्षकों (Invigilators) या बिचौलियों पर नहीं, बल्कि जिम्मेदार वरिष्ठ अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
बेहतर सार्वजनिक खर्च के साथ सभी के लिए मज़बूत स्वास्थ्य प्रणालियाँ
संदर्भ (Context)
- समस्या: निम्न और मध्यम आय वाले देशों (LMICs) में प्रति व्यक्ति सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च की खाई उच्च आय वाले देशों की तुलना में तेजी से बढ़ी है।
- वर्तमान संकट: वैश्विक स्वास्थ्य विकास सहायता (Development Assistance for Health – DAH) में कटौती और बढ़ता सार्वजनिक ऋण (Public Debt)।
- समाधान की दिशा: “अधिक धन जुटाने” से अधिक महत्वपूर्ण अब “उपलब्ध धन का बेहतर उपयोग” करना है।
स्वास्थ्य वित्तपोषण के समक्ष वैश्विक चुनौतियाँ (Global Trends)
स्वास्थ्य वित्तपोषण का संकट
वैश्विक सहायता (DAH) में कटौती बढ़ता सार्वजनिक ऋण
– US (67%), UK (39%), फ्रांस (35%) – 2024 में वैश्विक ऋण: $102 Trillion
– OECD अनुमान: फंडिंग 60% तक गिर सकती है – विकासशील देशों का ब्याज भुगतान: $921 Billion
- प्रति व्यक्ति अंतर (Per Capita Gap): 2000 से 2023 के बीच उच्च आय वाले देशों और LMICs के बीच प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य खर्च का अंतर तीन गुना से अधिक बढ़ गया है।
- विकास सहायता (DAH) में गिरावट: महामारी (2021) के बाद स्वास्थ्य सहायता में भारी गिरावट आई है। अग्रणी दाता देशों (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी) ने अपने विदेशी सहायता बजट में भारी कटौती की है।
- सार्वजनिक ऋण का दबाव: विकासशील देशों द्वारा चुकाया जाने वाला शुद्ध ब्याज (Net Interest) रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया है, जिससे स्वास्थ्य जैसे सामाजिक क्षेत्रों के लिए बजट में गुंजाइश कम हो गई है।
बजट उपयोगिता एवं आवंटन: तीन-सूत्रीय रणनीति (3-Way Strategy)
सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च का अधिकतम लाभ उठाने के लिए तीन प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है:
① बजट का शत-प्रतिशत उपयोग (Spend What is Allocated):
- बजटीय विचलन: LMICs में स्वास्थ्य बजट का उपयोग सामान्य बजट और शिक्षा की तुलना में कम (लगभग 85-90%) होता है।
- भारतीय संदर्भ:
- 2024-25 में स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन का केवल दो-तिहाई आवंटन ही खर्च हो सका।
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत संक्रामक और गैर-संक्रामक रोग कार्यक्रमों के लिए आवंटित राशि का केवल 26% इस्तेमाल हो पाया।
② सही मदों में निवेश (Spend on the Right Things):
- प्राथमिक बनाम तृतीयक देखभाल: वर्तमान में अधिकांश खर्च द्वितीयक और तृतीयक (Curative/Tertiary) देखभाल पर होता है। भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य धन का 25% से भी कम हिस्सा निवारक देखभाल (Preventive Care) पर खर्च होता है।
- सार्वजनिक वस्तुएँ (Public Goods) बनाम निजी आपूर्ति: सार्वजनिक धन का सर्वश्रेष्ठ उपयोग उन क्षेत्रों में है जहाँ ‘बाज़ार विफलता’ होती है—जैसे संक्रामक रोग नियंत्रण, टीकाकरण और स्वच्छता।
- सामग्री और सेवाओं पर खर्च: वेतन/भत्ते तो पूरे बाँटे जाते हैं, लेकिन आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं के लिए बजट की कमी के कारण स्वास्थ्य कर्मी प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाते।
③ सुशासन और लोक वित्त प्रबंधन (Governance & PFM):
- भ्रष्टाचार में कमी: कमजोर शासन व्यवस्था में केवल बजट बढ़ा देने से स्वास्थ्य परिणामों (जैसे बाल मृत्यु दर) में सुधार नहीं होता।
- उप-राष्ट्रीय (Subnational) शासन: स्वास्थ्य सेवा वितरण के विकेंद्रीकरण के साथ राज्य और स्थानीय स्तर पर शासन क्षमता बढ़ाना अनिवार्य है।
- सार्वजनिक वित्त प्रबंधन (PFM): बजटीय विश्वसनीयता (Budget Credibility), समय पर नकद वितरण (Cash Disbursement) और पारदर्शी खरीद प्रक्रियाओं (Procurement Systems) को मजबूत करना।
निष्कर्ष एवं सुझाव
“स्वास्थ्य परिणामों में सबसे बड़ा सुधार वहीं होता है जहाँ स्थितियाँ सबसे खराब हों; इसलिए सही दिशा में किया गया सीमित निवेश भी वैश्विक और क्षेत्रीय असमानताओं को समाप्त कर सकता है।”
- प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल (PHC) पर ध्यान: आयुष्मान भारत – आरोग्य मंदिरों के माध्यम से निवारक (Preventive) और प्राथमिक स्वास्थ्य पर आवंटन बढ़ाना।
- सार्वजनिक वित्त प्रबंधन (PFM) में सुधार: बजटीय आवंटन के समय पर निष्पादन हेतु वित्त मंत्रालय और स्वास्थ्य विभागों के बीच समन्वय।
- लचीला बजट (Flexible Budgeting): भविष्य की महामारियों और स्वास्थ्य आपातकाल से निपटने के लिए बजटीय ढाँचे में लचीलापन।
भारत में शहरी अवसंरचना संकट
संदर्भ (Context)
- घटना: भिवंडी (महाराष्ट्र) में कोहिनूर इमारत के ढहने से 10 लोगों की मौत हो गई। यह इमारत 6 साल से ‘खतरनाक’ इमारतों की सूची में थी।
- मूल समस्या: यह त्रासदी प्रशासनिक विफलता (Failure of Enforcement), खराब शहरी नियोजन, विस्थापन विकल्पों के अभाव और रखरखाव (Maintenance) की अनदेखी का एक ज्वलंत उदाहरण है।
भिवंडी त्रासदी और प्रणालीगत विफलताएँ (Systemic Issues)
भिवंडी इमारत हादसे की विफलताएँ
- 1. प्रवर्तन की विफलता: – खतरनाक घोषित होने के बावजूद अवैध मरम्मत जारी
- 2. वैकल्पिक आवास का अभाव: कोई ट्रांजिट कैंप/अस्थायी आवास नहीं
- 3. केवल कागजी कानूनी खानापूर्ति– खाली कराने के नोटिस जारी कर प्रशासन उत्तरदायित्व से बचता है
- पूर्वानुमान बनाम प्रवर्तन (Anticipation vs. Enforcement):
- 2020 का जिलानी भवन हादसा पूर्वानुमान की विफलता था (क्योंकि वह ‘खतरनाक’ सूची में नहीं था)।
- कोहिनूर भवन हादसा प्रवर्तन की विफलता है (क्योंकि यह 6 साल से सूची में होने के बावजूद अवैध रूप से संचालित था)।
- सामाजिक-आर्थिक बाधाएँ: भिवंडी जैसे पावरलूम हब में कम आय वाले प्रवासी मजदूर रहते हैं। बिना ट्रांजिट कैंप के, वे बेघर होने के डर से असुरक्षित मकानों में रहने को मजबूर हैं।
- प्रतिक्रियात्मक रवैया (Reactive State Response): अधिकारियों को निलंबित करना, ठेकेदारों पर प्राथमिकी दर्ज करना और मुआवज़े की घोषणा करना – ये केवल प्रतिक्रियात्मक कदम हैं, जो मूल समस्या को हल नहीं करते।
भारत में व्यापक अवसंरचनात्मक संकट (Macro Infrastructure Crisis)
| क्षेत्र / घटना | विफलता का प्रकार | कारण |
| हवाई अड्डे (दिल्ली, जबलपुर, राजकोट – 2024) | छत/कैनोपी ढहना | निर्माण गुणवत्ता में कमी एवं रखरखाव का अभाव |
| बिहार (2024-26) | पुलों का ढहना | घटिया निर्माण सामग्री, ऑडिट की कमी |
| मेट्रो शहर (दिल्ली/राजेंद्र नगर, कोलकाता, पुणे) | सड़कों का धंसना, बेसमेंट में जलभराव | शहरी नियोजन और क्षमता से अधिक शहरीकरण (Urban Sprawl) |
मुख्य कारण:
- रखरखाव पर ध्यान न देना: निर्माण क्रांति (Construction Boom) के बाद प्रशासनिक देखरेख और मेंटेनेंस पिछड़ गया।
- नगर निकायों की क्षमता में कमी: तकनीक (जैसे- निरंतर संरचनात्मक निगरानी/Structural Health Monitoring) उपलब्ध होने के बावजूद निकायों के पास इसे लागू करने की क्षमता नहीं है।
- मानसून का तनाव: अत्यधिक वर्षा पुरानी और कमजोर इमारतों के लिए उत्प्रेरक (Trigger) का काम करती है।
नीतिगत समाधान
- संरचनात्मक ऑडिट और तकनीक : Structural Health Monitoring और IoT-आधारित सेंसर से रियल-टाइम मॉनिटरिंग
- व्यापक शहरी पुनरुद्धार (Urban Renewal): केवल पुरानी इमारतों को गिराना या नोटिस देना पर्याप्त नहीं है; शहरी क्षेत्रों के व्यापक जीर्णोद्धार (Rehabilitation) की आवश्यकता है।
- संस्थागत सुधार एवं जवाबदेही:
- – नियमित थर्ड-पार्टी सेफ्टी ऑडिट और सख्त नियामक प्रवर्तन
- स्थानीय निकायों (ULBs) में तकनीकी कर्मियों की संख्या और क्षमता बढ़ाना।
- नोटिस जारी करने से आगे बढ़कर पुलिस समन्वय के साथ खतरनाक इमारतों को खाली कराना।
- सामाजिक सुरक्षा और ट्रांजिट आवास: ‘खतरनाक’ इमारतों के निवासियों के लिए किफायती ट्रांजिट कैंप सुनिश्चित करना ताकि वे असुरक्षित घरों में रहने को मजबूर न हों।
- लाइफ-साइकिल एसेट मैनेजमेंट (Asset Life-Cycle Management): अवसंरचना परियोजनाओं के लिए निर्माण के साथ-साथ अगले 20-30 वर्षों के रखरखाव का अनिवार्य बजट और अनुबंध होना चाहिए।
यूरोप में दावानल (Wildfires), भीषण गर्मी और जलवायु परिवर्तन
संदर्भ (Context)
- समस्या: यूरोप में रिकॉर्ड-तोड़ गर्मी (Heatwave) के कारण फ्रांस और स्पेन में अभूतपूर्व दावानल (Wildfires) की घटनाएँ देखी जा रही हैं।
- मुख्य तथ्य:
- फ्रांस में इस वर्ष (2026) दावानल से 91,209 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र नष्ट हो चुका है, जिसने 1980 के बाद के सभी रिकॉर्ड (पूर्व रिकॉर्ड: 1989 में 75,566 हेक्टेयर) तोड़ दिए हैं।
- फ्रांस के बोर्दो (Bordeaux) क्षेत्र में लगी आग ने अकेले 42,000 हेक्टेयर से अधिक चीड़ (Pine) के जंगलों को नष्ट किया और 2.2 लाख से अधिक लोगों को विस्थापित किया।
- यूरोपीय संघ (EU) का जून 2026 तक का कुल जले हुआ क्षेत्र पिछले 10 वर्षों के कुल औसत को पार कर गया है।
यूरोप में आग फैलने के कारण: जलवायु विज्ञान (Scientific Causes)
वैज्ञानिक संस्था वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन (WWA) और यूरोपीय आयोग के ज्वाइंट रिसर्च सेंटर (JRC) के अनुसार, दावानल के पीछे मुख्य कारक:
अत्यधिक शीतकालीन वर्षा ➔ तेजी से वनस्पति वृद्धि ➔ ग्रीष्मकालीन तीव्र गर्मी/लू ➔ मिट्टी में नमी की कमी ➔ दावानल (Wildfire)
- शीतकालीन नमी और वनस्पति वृद्धि : दक्षिण-पश्चिम फ्रांस और स्पेन में सर्दियों के दौरान औसत से अधिक वर्षा हुई, जिससे झाड़ियों और वनस्पतियों का तेजी से विकास हुआ (Fuel Biomass का निर्माण)।
- तीव्र ग्रीष्मकालीन गर्मी और निर्जलीकरण: इसके बाद आई रिकॉर्ड गर्मी ने मिट्टी की नमी को पूरी तरह सुखा दिया और पेड़ों/झाड़ियों में जल तनाव (Water Stress) उत्पन्न कर दिया, जिससे वे अत्यधिक ज्वलनशील हो गए।
- यूरोप – सबसे तेजी से गर्म होता महाद्वीप (Fastest Warming Continent):
- आर्कटिक के बाद यूरोप विश्व का सबसे तेज़ी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन गया है।
- 1955 को समाप्त दशक (1991-2020 के औसत से 1.08°C कम) की तुलना में 2025 को समाप्त दशक में तापमान 0.87°C अधिक दर्ज किया गया।
- यूरोप की वार्मिंग दर एशिया, उत्तरी अमेरिका, अफ्रीका और वैश्विक औसत से काफी अधिक है।
दावानल के प्रभाव (Ecological & Socio-Economic Impacts)
| प्रभाव का क्षेत्र | विवरण |
| पारिस्थितिकी एवं कार्बन उत्सर्जन | WWA के अनुसार, 2026 की आग से 300 किलोटन कार्बन उत्सर्जन दर्ज हुआ, जो 2003 और 2022 के पिछले चरम उत्सर्जन स्तरों से अधिक है। |
| जनसांख्यिकीय विस्थापन | अकेले बोर्दो आग ने पिछले 5 वर्षों (61,000 व्यक्ति) में विस्थापित हुए कुल लोगों से अधिक (~2.2 लाख) लोगों को बेघर किया। |
| आर्थिक और ढांचागत क्षति | सैकड़ों घर नष्ट हुए, तथा धुआँ 400 किमी दूर तक फैलने से वायु गुणवत्ता (Air Quality) में गंभीर गिरावट आई। |
आपदा प्रबंधन एवं नीतिगत समाधान
- यूरोपीय वन अग्नि सूचना प्रणाली (EFFIS) का सुदृढ़ीकरण: वास्तविक समय (Real-time) की उपग्रह निगरानी और शुरुआती चेतावनी प्रणाली को स्थानीय आपदा दस्तों से जोड़ना।
- वन प्रबंधन में सुधार (Controlled Burning & Firebreaks): अत्यधिक वनस्पति वृद्धि वाले क्षेत्रों में नियंत्रित सफाई (Prescribed Burning) करना ताकि अनियंत्रित आग का “ईंधन” (Fuel) कम हो सके।
- संवर्धित जलवायु अनुकूलन (Climate Adaptation): पेरिस समझौते (1.5°C लक्ष्य) का सख्त अनुपालन और जंगलों के आसपास जलवायु-सहनशील बुनियादी ढाँचे का निर्माण।
भारत में सरकारी स्कूलों का बंद होना
GS Paper-2: सामाजिक न्याय, शिक्षा, गवर्नेंस, और RTE अधिनियम
संदर्भ (Context)
- NITI Aayog और यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस (UDISE+) रिपोर्ट:
- पिछले एक दशक में भारत में लगभग 94,000 सरकारी स्कूल बंद या मर्ज (Rationalized) किए गए हैं (औसतन 25 स्कूल प्रतिदिन)।
- राष्ट्रीय स्तर पर सरकारी स्कूलों की संख्या 2014-15 में 11.07 लाख से घटकर 2023-24 में 10.17 लाख रह गई है।
- इसके विपरीत, निजी स्कूलों की संख्या इसी अवधि में 2.88 लाख से बढ़कर 3.31 लाख हो गई।
- नामांकन में गिरावट (Enrolment Drop):
- कुल नामांकन में सरकारी स्कूलों की हिस्सेदारी 2005 में 71% से गिरकर 2024-25 में 49.24% पर आ गई है।
- इस अवधि में सरकारी स्कूलों में नामांकन में कुल 2.26 करोड़ की कमी दर्ज की गई है।
2. सर्वाधिक प्रभावित राज्य और जमीनी स्थिति (State-wise Analysis)
मध्य प्रदेश (MP) उत्तर प्रदेश (UP) जम्मू और कश्मीर
– 2018-19 में ~22,600 स्कूल बंद – 2018-19 में ~25,000 स्कूल बंद – 4,300+ स्कूल बंद/मर्ज
– 11.38 लाख बच्चे ‘Drop Box’ में – निजीकरण की ओर झुकाव – बच्चों को 4-6 किमी दूर जाना – 7.37 लाख बच्चों का कोई रिकॉर्ड नहीं
- मध्य प्रदेश: दिसंबर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में 11.38 लाख बच्चे ‘ड्रॉप बॉक्स’ (Drop Box – ड्रॉपआउट के जोखिम वाले बच्चे) श्रेणी में हैं। ‘स्कूल चलें हम’ जैसे अभियानों के बावजूद 7.37 लाख बच्चों का कोई स्कूल रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
- जम्मू और कश्मीर: स्कूलों के विलय (Merger) के कारण बच्चों को 4 से 6 किमी पैदल चलना पड़ रहा है, जो निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के मानदंडों का सीधा उल्लंघन है।
सामाजिक-आर्थिक और लैंगिक प्रभाव (Socio-Economic Impacts)
“सरकारी स्कूल भारत में एक तटस्थ सार्वजनिक सुविधा नहीं हैं, वे मुख्य रूप से समाज के सबसे गरीब, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और पिछड़े वर्गों के बच्चों के अध्ययन का एकमात्र साधन हैं।”
- लैंगिक प्रभाव (Impact on Girls): जब पास का स्कूल बंद होता है या दूर शिफ्ट होता है, तो सबसे पहले लड़कियों को पढ़ाई से हटाया जाता है (सुरक्षा और दूरी के कारणों से)।
- पहुँच में असमानता (Unequal Access): NSSO (2019) विश्लेषण के अनुसार, मुफ्त शिक्षा तक पहुँच में भारी गिरावट आई है, जिससे मुस्लिम, SC और ST परिवार अपने पड़ोस के स्कूलों से सबसे अधिक वंचित हुए हैं।
- शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट: कई स्थानों पर एकल-शिक्षक (Single-Teacher) 5 कक्षाओं को एक साथ संभाल रहे हैं, जिससे शिक्षण गुणवत्ता और pupil-teacher ratio (PTR) के नियमों का उल्लंघन हो रहा है।
नीतिगत चुनौतियाँ और ‘RTE’ की सीमाएँ (Governance & RTE Challenges)
1. पड़ोस के स्कूल का सिद्धांत (Neighbourhood School Mandate)
- बंद होने/विलय से 1-3 किमी का मानक टूट रहा है।
- केंद्र का तर्क: शिक्षा समवर्ती सूची (Concurrent List) में है; जिम्मेदारी राज्यों की।
2. लागू करने की क्षमता का अभाव (Lack of Justiciability)
- गरीब माता-पिता के पास कानूनी/संस्थागत क्षमता नहीं।
- स्कूल प्रबंधन समितियाँ (SMC) निष्क्रिय या अप्रभावी हैं।
- ‘युक्तीकरण’ (Rationalisation) की आड़ में बंद: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 पड़ोस के स्कूलों की अवधारणा को प्रभावित किए बिना स्कूलों के एकीकरण की वकालत करती है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर इसे केवल लागत काटने के रूप में लागू किया जा रहा है।
- संवैधानिक एवं कानूनी दायित्व: यद्यपि शिक्षा समवर्ती सूची (Concurrent List) का विषय है, लेकिन RTE अधिनियम एक केंद्रीय कानून है। केंद्र सरकार Samagra Shiksha Abhiyan के तहत फंड आवंटन को NEP/नीतियों से जोड़ती है, इसलिए वह इस प्रवृत्ति से पूरी तरह पल्ला नहीं झाड़ सकती।
- शिक्षा की गुणवत्ता पर मौन: RTE अधिनियम कक्षा के भीतर दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता पर कोई बाध्यकारी मानदंड लागू नहीं करता है।
नीतिगत समाधान
- RTE के ‘पड़ोस के स्कूल’ (Neighbourhood School) मानक का सख्ती से पालन: किसी भी स्कूल को बंद करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाए कि छात्रों के लिए वैकल्पिक परिवहन या पास में प्राथमिक स्कूल उपलब्ध हो।
- स्कूल प्रबंधन समितियों (SMC) का सशक्तिकरण: ग्रामीण और गरीब माता-पिता को निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदार बनाना ताकि SMC केवल कागजों पर न रहे।
- शिक्षकों की भर्ती और गुणवत्ता सुधार: केवल बुनियादी ढाँचा ही नहीं, बल्कि रिक्त पदों (जैसे J&K में 13,000+ पद) को भरना और शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त करना।
- केंद्र-राज्य समन्वय: केंद्र सरकार को केवल NEP फंड रोकने के बजाय उन राज्यों को सहायता देनी चाहिए जहाँ ड्रॉपआउट और ‘ड्रॉप बॉक्स’ वाले बच्चों की संख्या अधिक है।