यूपीएससी 2026 की तैयारी रणनीति पूरी करें

16 june 2026 pib notes for upsc in hindi

UPSC की तैयारी में UPSC की तैयारी में pib notes for upsc एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। इस लेख में हम 16 जून 2026 के PIB के प्रमुख बिंदुओं, परीक्षा-उपयोगी तथ्यों और संभावित UPSC दृष्टिकोण का सरल एवं व्यवस्थित विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं। 

विकसित भारत युवा संसद 2026

कार्यक्रम  

  • कब और कहाँ? 15-17 जून 2026 को नई दिल्ली के संविधान सदन (सेंट्रल हॉल) में हुआ।

  • किसने कराया? युवा मामले और खेल मंत्रालय ने।

  • मकसद क्या है? युवाओं को देश चलाने, नियम-कानून समझने और संसद के कामकाज का असली अनुभव देना।

  • कौन शामिल हुआ? देश के 757 यूनिवर्सिटीज से चुने गए बेहतरीन युवा।

विकसित भारत @ 2047 और देश के युवा

  • बड़ा लक्ष्य: साल 2047 तक भारत को एक अमीर और विकसित देश बनाना है। यह 140 करोड़ भारतीयों का सपना है।

  • युवा आबादी: भारत की 65% आबादी अभी 35 साल से कम उम्र की है।

  • ताकत क्या है? युवाओं की भारी तादाद ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है। नई पीढ़ी (Gen Z) का जोश और नए आइडिया ही इस सपने को पूरा करेंगे।

सरकार के बड़े कदम और योजनाएं

  • 1 लाख नए लीडर्स: पीएम के विजन के तहत देश के हर कोने (जैसे आदिवासी इलाके, कोस्टल रीजन और नॉर्थ-ईस्ट) से 1 लाख युवा लीडर्स तैयार किए जा रहे हैं।

  • ‘माय भारत’ के अहम प्रोग्राम: युवाओं को देश और समाज से जोड़ने के लिए कुछ खास प्रोग्राम चल रहे हैं:

    • विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग

    • वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम

    • विकसित भारत बजट क्विज़

    • युवा कनेक्ट (सीखने के प्रैक्टिकल प्रोग्राम

मिडिल ईस्ट-इंडिया डीपवाटर पाइपलाइन (MEIDP):

GS Paper 2: भारत और उसके पड़ोस-संबंध, द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और भारत से जुड़े और/या भारत के हितों को प्रभावित करने वाले समझौते।

GS Paper 3: बुनियादी ढांचा: ऊर्जा, बंदरगाह, सड़कें, हवाई अड्डे, रेलवे आदि।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में, भारत सरकार के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoPNG) ने उन मीडिया रिपोर्टों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है, जिनमें दावा किया जा रहा था कि भारत सरकार मिडिल ईस्ट-इंडिया डीपवाटर पाइपलाइन (MEIDP) परियोजना पर सक्रिय रूप से काम कर रही है।

मंत्रालय ने एक आधिकारिक बयान जारी कर स्पष्ट किया है कि वर्तमान में इस मंत्रालय के पास ऐसा कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है और न ही ओमान या किसी अन्य खाड़ी देश के साथ इस परियोजना पर किसी भी स्तर पर कोई बातचीत चल रही है।

मिडिल ईस्ट-इंडिया डीपवाटर पाइपलाइन (MEIDP) क्या है?

MEIDP एक प्रस्तावित 4,310 किलोमीटर लंबी गहरे समुद्र (Undersea) की गैस पाइपलाइन परियोजना है। इसका उद्देश्य मध्य पूर्व (विशेष रूप से ओमान और यूएई) के गैस समृद्ध क्षेत्रों को अरब सागर के रास्ते भारत (गुजरात तट) से जोड़ना है।

  • परिकल्पना: इस परियोजना को दक्षिण एशिया गैस एंटरप्राइज (SAGE) नामक एक वैश्विक कंसोर्टियम द्वारा प्रमोट किया जा रहा था।

  • मार्ग: यह पाइपलाइन ओमान के मस्कट और यूएई के फजैराह को भारत में गुजरात के जामनगर/पोरबंदर से जोड़ने के लिए डिज़ाइन की गई थी।

  • क्षमता: इसके माध्यम से भारत को प्रतिदिन लगभग 31.1 मिलियन मीट्रिक मानक घन मीटर (MMSCMD) प्राकृतिक गैस की आपूर्ति करने की योजना थी।

इस परियोजना का रणनीतिक और आर्थिक महत्व (यदि यह लागू होती)

  1. ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security): भारत अपनी घरेलू गैस मांग का लगभग 50% आयात (LNG के रूप में) करता है। यह पाइपलाइन भारत को सस्ती और निरंतर प्राकृतिक गैस की आपूर्ति सुनिश्चित कर सकती थी।

  2. भू-राजनीतिक लाभ (Geopolitical Advantage): यह पाइपलाइन पाकिस्तान के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) को बाईपास (Bypass) करते हुए सीधे गहरे समुद्र से गुजरती है। इससे सुरक्षा जोखिम और पाकिस्तान पर निर्भरता समाप्त हो जाती है।

  3. कम लागत: एलएनजी (LNG) के आयात और उसे पुनः गैसीकृत (Regasification) करने की तुलना में सीधे पाइपलाइन से गैस मंगाना आर्थिक रूप से अधिक किफायती माना जाता है।

परियोजना के क्रियान्वयन में मुख्य चुनौतियाँ (Challenges)

सरकार द्वारा इसे वर्तमान में आगे न बढ़ाने के पीछे कई तकनीकी, वित्तीय और भू-राजनीतिक कारण हो सकते हैं:

  • अत्यधिक तकनीकी जटिलता: अरब सागर में लगभग 3,400 मीटर की गहराई पर पाइपलाइन बिछाना और उसका रखरखाव करना बेहद कठिन और उच्च तकनीकी विशेषज्ञता की मांग करता है।

  • भारी निवेश (High Capital Cost): इस तरह की मेगा-इंजीनियरिंग परियोजना के लिए अरबों डॉलर के निवेश की आवश्यकता होती है, जिसके लिए दीर्घकालिक वित्तीय व्यवहार्यता (Financial Viability) सुनिश्चित करना जरूरी है।

  • क्षेत्रीय भू-राजनीतिक अस्थिरता: पश्चिम एशिया (West Asia) में हाल के वर्षों में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव और समुद्री व्यापार मार्गों (जैसे हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य) की सुरक्षा से जुड़े जोखिम बड़े बुनियादी ढांचा निवेशों को प्रभावित करते हैं।

भारत के वैकल्पिक ऊर्जा मार्ग

भले ही सरकार ने MEIDP पर बातचीत से इनकार किया हो, लेकिन भारत अपनी ऊर्जा टोकरी (Energy Basket) में प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी को वर्तमान ~6.7% से बढ़ाकर 2030 तक 15% करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए भारत अन्य विकल्पों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है:

  • IMEEC (इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर): भारत बहु-आयामी कनेक्टिविटी और ऊर्जा ग्रिड के लिए इस कॉरिडोर को अधिक व्यावहारिक मान रहा है।

  • तापी पाइपलाइन (TAPI Pipeline): तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइपलाइन, हालांकि यह सुरक्षा कारणों से लंबे समय से रुकी हुई है।

  • LNG इंफ्रास्ट्रक्चर: भारत अपने पश्चिमी और पूर्वी तटों पर एलएनजी टर्मिनलों की क्षमता बढ़ा रहा है और अमेरिका, कतर तथा यूएई के साथ दीर्घकालिक एलएनजी समझौते कर रहा है।

निष्कर्ष

पेट्रोलियम मंत्रालय का यह स्पष्टीकरण उन अटकलों पर विराम लगाता है जो भारत की ऊर्जा कूटनीति को लेकर लगाई जा रही थीं। यह दर्शाता है कि भारत वर्तमान में गहरे समुद्र की रणनीतिक परियोजनाओं के बजाय अधिक व्यावहारिक, सुरक्षित और त्वरित एलएनजी टर्मिनलों तथा नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) के स्रोतों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है।

UPSC मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: “गहरे समुद्र के ऊर्जा गलियारे भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर सकते हैं, लेकिन वे अभूतपूर्व तकनीकी और भू-राजनीतिक चुनौतियों के साथ आते हैं।” मिडिल ईस्ट-इंडिया डीपवाटर पाइपलाइन (MEIDP) पर हालिया घटनाक्रमों के आलोक में इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)

वीबी - जी राम जी (VB - G RAM G): 1 जुलाई 2026 से पूरे देश में लागू

16 june 2026 pib notes for upsc in hindi

विकसित भारत – रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण): ग्रामीण परिदृश्य का कायाकल्प

  • GS मुख्य परीक्षा प्रश्नपत्र-II: केंद्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के कमजोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; रोजगार से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

  • GS मुख्य परीक्षा प्रश्नपत्र-III: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित विषय; समावेशी विकास तथा इससे उत्पन्न विषय।

चर्चा में क्यों?

केंद्रीय ग्रामीण विकास और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री द्वारा यह घोषणा की गई है कि ऐतिहासिक विकसित भारत – गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025—जिसे लोकप्रिय रूप से वीबी – जी राम जी (VB – G RAM G) कहा जा रहा है—1 जुलाई 2026 से पूरे देश में लागू होने जा रहा है।

यह परिवर्तन भारत के ग्रामीण विकास ढांचे में एक ऐतिहासिक संरचनात्मक बदलाव का प्रतीक है, जो दो दशक पुराने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), 2005 को आधिकारिक रूप से प्रतिस्थापित (Replace) कर रहा है।

VB – G RAM G अधिनियम, 2025 के मुख्य स्तंभ

यह अधिनियम ग्रामीण रोजगार को केवल एक ‘मांग-आधारित सुरक्षा जाल’ (Demand-driven safety net) से हटाकर, विकसित भारत @2047 के राष्ट्रीय लक्ष्य के अनुरूप एक उत्पादकता-उन्मुख और भविष्य के लिए तैयार ग्रामीण परिवर्तन मॉडल में बदल देता है।

1. बढ़ी हुई आजीविका गारंटी

  • 125 दिनों का कार्य: पात्र ग्रामीण परिवारों को अब एक वित्तीय वर्ष में 100 दिनों (मनरेगा के तहत) के स्थान पर 125 दिनों का वैधानिक (Statutory) रोजगार अधिकार मिलेगा। यह उन परिवारों के लिए है जिनके वयस्क सदस्य स्वेच्छा से अकुशल शारीरिक श्रम करना चाहते हैं।

  • “रोजगार भी, सम्मान भी”: यह ढांचा सम्मानजनक रोजगार पर जोर देता है। इसके तहत मजदूरी का भुगतान प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से सीधे श्रमिकों के बैंक खातों में साप्ताहिक या पाक्षिक रूप से सुनिश्चित किया जाएगा।

2. चार विषयगत परिसंपत्ति स्टैक (Thematic Asset Stacks)

पिछले शासन के तहत बिखरे हुए कार्यों के विपरीत, इस मिशन के तहत बनाई जाने वाली सभी ग्रामीण सार्वजनिक संपत्तियों को विकसित भारत नेशनल रूरल इंफ्रास्ट्रक्चर स्टैक (VB-NRIS) के तहत चार प्रमुख क्षेत्रों में संरचित किया गया है:

  • जल सुरक्षा: जल संचयन, जल निकायों के पुनरुद्धार और चेक डैम के निर्माण को प्राथमिकता।

  • मूलभूत ग्रामीण अवसंरचना: ग्रामीण सड़कों और सामुदायिक भवनों जैसी टिकाऊ ग्रामीण संपत्तियों का निर्माण।

  • आजीविका संबंधी अवसंरचना: प्राथमिक क्षेत्रों के लिए बुनियादी ढांचा, जैसे सॉर्टिंग सेंटर, कोल्ड स्टोरेज और नकदी फसलों (जैसे कॉफी बागान) के लिए सहायता।

  • प्रतिकूल मौसमीय प्रभावों का न्यूनीकरण: चरम मौसम की घटनाओं और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने वाली आपदा-अनुकूल संपत्तियों का निर्माण।

3. संतुलित कृषि कैलेंडर (Statutory Pause Window)

  • कृषि कार्यों के लिए वैधानिक रोक: फसल की बुवाई और कटाई के चरम मौसम (Peak Seasons) के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में श्रमिकों की कमी को रोकने के लिए, राज्य सरकारों को एक वित्तीय वर्ष में कुल 60 दिनों तक की अवधि के लिए कार्य रोकने (Pause Window) की अधिसूचना जारी करने का कानूनी अधिकार दिया गया है।

  • श्रमिकों का 125 दिनों का अधिकार सुरक्षित रहेगा, जिसका दावा वे वर्ष के शेष 305 दिनों में कर सकेंगे।

तुलनात्मक विश्लेषण: मनरेगा बनाम VB – G RAM G

विशेषताएं

मनरेगा (MGNREGA, 2005)

VB – G RAM G अधिनियम (2025)

वैधानिक गारंटी

प्रति परिवार 100 दिन

प्रति परिवार 125 दिन

वित्तपोषण तंत्र

मांग-आधारित (Demand-driven), असीमित बजटीय आवंटन

मानकीय आवंटन (Normative Allocation) (केंद्र द्वारा पूर्व-निर्धारित बजटीय सीमा)

लागत-साझेदारी (Cost-Sharing)

अकुशल मजदूरी का 100% केंद्र वहन करता था; बेरोजगारी भत्ता राज्य देते थे

केंद्र प्रायोजित योजना पैटर्न: 60:40 (सामान्य राज्य), 90:10 (पूर्वोत्तर/हिमालयी राज्य), 100% (केंद्र शासित प्रदेश)

कृषि संरक्षण

फसल सीजन के दौरान कार्य रोकने का कोई औपचारिक वैधानिक प्रावधान नहीं था

चरम कृषि मौसम के लिए अधिकतम 60 दिनों की वैधानिक रोक (Pause)

नियोजन ढांचा (Planning)

ग्राम पंचायत स्तर पर अलग-अलग और बिखरी हुई योजनाएं

पीएम गति शक्ति से एकीकृत स्थानिक (Spatial) विकसित ग्राम पंचायत योजनाएं

तकनीकी और गवर्नेंस इकोसिस्टम

पारदर्शिता सुनिश्चित करने और भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए इस मिशन में मजबूत डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) को शामिल किया गया है:

  • जियोस्पेशियल ट्रैकिंग (Geo-Tagging): फर्जी संपत्तियों (Ghost Assets) को समाप्त करने के लिए 100% सार्वजनिक कार्यों की सैटेलाइट और जीपीएस मैपिंग की जाएगी।

  • बायोमेट्रिक और फेस रिकग्निशन: श्रमिकों की उपस्थिति और सत्यापन के लिए आधार-लिंक्ड बायोमेट्रिक टूल्स और उन्नत फेशियल रिकग्निशन (चेहरा पहचान प्रणाली) का उपयोग किया जाएगा ताकि मजदूरी चोरी को रोका जा सके।

  • साप्ताहिक सार्वजनिक प्रकटीकरण: वास्तविक समय (Real-time) की निगरानी के लिए डिजिटल डैशबोर्ड के माध्यम से हर हफ्ते डेटा सार्वजनिक किया जाएगा, जिससे सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) को बढ़ावा मिलेगा।

मुख्य चुनौतियाँ और आलोचनात्मक दृष्टिकोण यद्यपि यह अधिनियम ग्रामीण बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण और परिसंपत्ति निर्माण पर केंद्रित है, नागरिक समाज और अर्थशास्त्रियों ने कुछ संरचनात्मक चिंताओं को भी रेखांकित किया है:

  • “काम के अधिकार” का संभावित कमजोर होना: ‘मांग-आधारित’ प्रणाली से हटकर बजट-सीमित ‘आपूर्ति-संचालित’ (Supply-driven) या मानकीय आवंटन मॉडल पर जाने से ग्रामीण संकट (जैसे अचानक सूखा या आर्थिक मंदी) के दौरान श्रमिकों को समय पर काम मिलने में कठिनाई हो सकती है।

  • राज्यों पर राजकोषीय बोझ: नई 60:40 की लागत-साझेदारी प्रणाली के कारण राज्यों को अपने राजस्व का एक बड़ा हिस्सा मजदूरी के लिए देना होगा। साथ ही, केंद्र द्वारा तय बजटीय सीमा से अधिक होने वाले किसी भी अतिरिक्त खर्च का पूरा बोझ राज्य को खुद उठाना होगा।

  • डिजिटल अपवर्जन (Digital Exclusion) का जोखिम: इंटरनेट की खराब कनेक्टिविटी या बिजली की समस्या वाले सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में बायोमेट्रिक और फेशियल रिकग्निशन प्रणालियों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण वास्तविक गरीब और जरूरतमंद श्रमिक रोजगार के लाभ से वंचित हो सकते हैं।

आगे की राह (Way Forward)

‘वीबी-जी राम जी’ अधिनियम को विकसित भारत @2047 के विजन के अनुरूप ग्रामीण अर्थव्यवस्था का इंजन बनाने के लिए तकनीकी प्रगति के साथ-साथ ‘प्रशासनिक संवेदनशीलता’ की भी आवश्यकता है। इसके सफल कार्यान्वयन के लिए तकनीकी विफलताओं (Digital Downtime) के दौरान श्रमिकों के कानूनी अधिकारों की रक्षा करना, राज्यों को वित्तीय लचीलापन प्रदान करना और जमीनी स्तर पर विकेंद्रीकृत योजना को बनाए रखना अनिवार्य होगा।

भारत और जापान द्वारा पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6.2 के तहत संयुक्त क्रेडिटिंग तंत्र (JCM) के कार्यान्वयन नियमों को मंजूरी

  • GS मुख्य परीक्षा प्रश्नपत्र-III: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA); बुनियादी ढांचा; निवेश मॉडल।

  • GS मुख्य परीक्षा प्रश्नपत्र-II: द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और भारत से जुड़े और/या भारत के हितों को प्रभावित करने वाले समझौते।

चर्चा में क्यों?

भारत सरकार और जापान सरकार ने आधिकारिक रूप से 8 जून 2026 को संयुक्त क्रेडिटिंग तंत्र—ज्वाइंट क्रेडिटिंग मैकेनिज्म (Joint Crediting Mechanism – JCM) के ‘कार्यान्वयन नियमों’ (Rules of Implementation) को अपना लिया है। यह समझौता संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6.2 (Article 6.2) के तहत संपन्न हुआ है।

यह कदम पिछले वर्ष दोनों देशों के बीच हस्ताक्षरित सहयोग ज्ञापन (MoC) को एक व्यावहारिक और परिचालन ढांचा (Operational Framework) प्रदान करता है।

मुख्य बिंदु: JCM और कार्यान्वयन नियम (Rules of Implementation)

1. यह मैकेनिज्म (JCM) कैसे काम करता है?

  • इस तंत्र के तहत, कोई जापानी कंपनी या संस्था भारत में ऐसी परियोजनाओं में निवेश और कम-कार्बन तकनीक (Low-carbon technologies) प्रदान कर सकती है जो ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन को कम या समाप्त करती हैं (जैसे- दिल्ली मेट्रो या अन्य हरित ऊर्जा परियोजनाएं)।

  • इन परियोजनाओं से होने वाले उत्सर्जन में कमी का स्वतंत्र रूप से सत्यापन किया जाएगा और उन्हें कार्बन क्रेडिट में बदला जाएगा।

  • इन कार्बन क्रेडिट को दोनों देशों के बीच साझा किया जा सकता है, जिससे दोनों देशों को अपने-अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) यानी जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद मिलेगी।

2. कार्यान्वयन नियमों के प्रमुख तत्व:

अपनाए गए नए नियम इस द्विपक्षीय व्यापार के लिए एक मजबूत शासन ढांचा (Governance Arrangement) तैयार करते हैं:

  • संयुक्त समिति (Joint Committee): नियमों के प्रबंधन के लिए दोनों सरकारों के प्रतिनिधियों वाली एक संयुक्त समिति का गठन किया गया है।

  • पारदर्शी परियोजना स्वीकृति: निवेश और परियोजनाओं को मंजूरी देने के लिए पारदर्शी और स्पष्ट प्रक्रियाएं बनाई गई हैं।

  • थर्ड-पार्टी सत्यापन: उत्सर्जन में कमी की मात्रा की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के लिए तीसरे पक्ष (Third-party) द्वारा सत्यापन (Validation and Verification) की व्यवस्था होगी।

  • राष्ट्रीय रजिस्ट्रियां: दोनों देशों में क्रेडिट के जारी होने और उनके हस्तांतरण (Transfer) पर नजर रखने के लिए डेटाबेस/रजिस्ट्री प्रणालियां काम करेंगी।

  • सतत विकास सुरक्षा उपाय (Safeguards): यह सुनिश्चित किया जाएगा कि ये परियोजनाएं भारत में सामाजिक और पर्यावरणीय रूप से सतत विकास को नुकसान न पहुँचाएँ।

पेरिस समझौते का अनुच्छेद 6.2 क्या है?

पेरिस समझौते का अनुच्छेद 6.2 (Article 6.2) देशों को द्विपक्षीय या स्वैच्छिक सहयोग समझौतों के माध्यम से उत्सर्जन कटौती के व्यापार की अनुमति देता है। इसके तहत हस्तांतरित होने वाले क्रेडिट को ‘इंटरनेशनली ट्रांसफर्ड मिटिगेशन आउटकम्स’ (ITMOs) कहा जाता है।

महत्व: यह देशों को भारी लागत वाली तकनीकों को साझा करने और वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए बाजार-आधारित दृष्टिकोण (Market-based approach) अपनाने की सुविधा देता है।

भारत के लिए इसका महत्व :

  • अत्याधुनिक तकनीकों का हस्तांतरण: भारत ने 2070 तक नेट-जीरो (Net-Zero) उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। JCM के जरिए भारत को जापान से उच्च-स्तरीय, कम-कार्बन वाली जापानी तकनीकें मिल सकेंगी, जो आमतौर पर काफी महंगी (Cost-intensive) होती हैं।

  • निवेश और क्षमता निर्माण: यह व्यवस्था देश के भीतर हरित परियोजनाओं (Green projects) में विदेशी निजी निवेश को आकर्षित करेगी और तकनीकी क्षमता निर्माण (Capacity-building) को बढ़ावा देगी।

  • घरेलू कार्बन बाजार को बढ़ावा: यह समझौता भारत के अपने घरेलू कार्बन बाजार और पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को वैश्विक मानकों के अनुरूप मजबूत बनाने में मदद करेगा, बिना भारत के अपने खुद के एनडीसी (NDC) लक्ष्यों को प्रभावित किए।

मुख्य चुनौतियाँ (Key Challenges)

  • समय की कमी (Temporal Limitation): अनुच्छेद 6.2 के तहत उत्पादित इन क्रेडिट्स (ITMOs) के उपयोग की समय-सीमा फिलहाल 2030 तक ही सीमित है। परियोजनाओं के पंजीकरण से लेकर क्रेडिट जारी होने तक की प्रक्रिया जटिल होने के कारण वास्तविक कार्यान्वयन के लिए बेहद कम समय (लगभग 3-4 वर्ष) बचा है।

  • तकनीकी जटिलता: वास्तविक रूप से उत्सर्जन में कितनी कटौती हुई, इसका सही-सही मापन (Methodology) और दोहरी गणना (Double counting) को रोकना हमेशा से एक जटिल प्रशासनिक चुनौती रही है।

आगे की राह (Way Forward)

भारत और जापान के बीच कार्यान्वयन नियमों का अपनाया जाना कागजी समझौतों से धरातल पर उतरने की दिशा में एक बड़ा कदम है। भविष्य में इस साझेदारी को सफल बनाने के लिए दोनों देशों को परियोजना स्वीकृति की प्रक्रिया को सरल (Streamlined) रखना होगा ताकि 2030 की समय-सीमा से पहले अधिकतम पर्यावरणीय और आर्थिक लाभ उठाया जा सके। यह मॉडल भारत के लिए अन्य विकसित देशों के साथ भी इसी प्रकार के तकनीकी सहयोग के द्वार खोल सकता है।

किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना: यमुना पुनरुद्धार और छह राज्यों के बीच ऐतिहासिक समझौता

  • GS मुख्य परीक्षा प्रश्नपत्र-II: संघवाद (Federalism) और अंतर-राज्यीय संबंध; जल विवाद और बुनियादी ढांचा नीतियां।

  • GS मुख्य परीक्षा प्रश्नपत्र-III: बुनियादी ढांचा: ऊर्जा, बांध और जल संसाधन; पर्यावरण संरक्षण और नदियों का पुनरुद्धार (Yamuna Rejuvenation)।

चर्चा में क्यों?

नई दिल्ली में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह की अध्यक्षता में आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक में, लंबे समय से लंबित किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना (Kishau Multipurpose Dam Project) पर छह भागीदार राज्यों के बीच एक ऐतिहासिक आम सहमति (Consensus) बन गई है।

‘संवाद के माध्यम से समाधान’ के सिद्धांत पर चलते हुए हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान इस परियोजना के कार्यान्वयन के लिए एक सहयोग ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर करने के लिए सहमत हो गए हैं। इस समझौते के बाद परियोजना को अंतिम मंजूरी के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल (Union Cabinet) के समक्ष रखा जाएगा।

किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना के प्रमुख बिंदु (Geographical & Technical Details)

  • नदी और अवस्थिति (Location): यह परियोजना उत्तराखंड के देहरादून जिले और हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले की सीमा पर टोंस नदी (Tons River) पर प्रस्तावित है। टोंस नदी, यमुना नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है।

  • बांध की संरचना: इसके तहत टोंस नदी पर 236 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी बांध बनाया जाएगा। पूरा होने के बाद यह टिहरी बांध के बाद भारत का दूसरा सबसे ऊंचा बांध हो सकता है।

  • क्षमता: इस परियोजना की स्थापित जल विद्युत क्षमता 660 मेगावाट (4×165 MW) है और इसकी जीवंत भंडारण क्षमता (Live Storage) लगभग 1,324 मिलियन क्यूबिक मीटर (MCM) है।

  • उद्देश्य: इसका प्राथमिक उद्देश्य भागीदार राज्यों को पेयजल आपूर्ति, लगभग 97,076 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई और जल विद्युत उत्पादन सुनिश्चित करना है।

वित्तीय संरचना और जल-साझेदारी का फॉर्मूला (Funding & Water Sharing)

इस बैठक में परियोजना के दो मुख्य घटकों (जल और बिजली) के लिए वित्तीय भार के बंटवारे पर महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए:

1. जल घटक (Water Component)

  • 90:10 का अनुपात: पानी से जुड़े बुनियादी ढांचे की कुल लागत का 90% हिस्सा केंद्र सरकार द्वारा ‘केंद्रीय सहायता’ के रूप में वहन किया जाएगा।

  • शेष 10% वित्तीय भार सभी छह भागीदार राज्यों (हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान) द्वारा आपस में साझा किया जाएगा।

2. बिजली घटक और अभिनव जल-सौदा (Power Component)

  • हिमाचल-दिल्ली-राजस्थान समझौता: बैठक में एक विशेष रणनीतिक सहमति बनी है, जिसके तहत हिमाचल प्रदेश अपने हिस्से का पानी दिल्ली और राजस्थान को आवंटित करेगा

  • इसके बदले में, दिल्ली और राजस्थान मिलकर परियोजना के बिजली घटक (Power Component) में हिमाचल प्रदेश के हिस्से में आने वाली वित्तीय लागत का वहन करेंगे।

  • यह फॉर्मूला हिमाचल प्रदेश पर पड़ने वाले अतिरिक्त वित्तीय बोझ (लगभग ₹2,000 करोड़) को कम करेगा, क्योंकि बांध के कारण वहां की आबादी का विस्थापन और पर्यावरण पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ना है।

यमुना नदी के पुनरुद्धार में इसका महत्व 

यह निर्णय केवल जल और बिजली आपूर्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यमुना नदी के पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के लिए एक बड़ा गेम-चेंजर साबित होगा:

  • निरंतर जल प्रवाह (E-Flow): शुष्क मौसम (दिसंबर से जून) के दौरान यमुना में पानी का प्रवाह बेहद कम हो जाता है, जिससे प्रदूषण का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ जाता है। किशाऊ बांध के बनने से ऊपरी यमुना बेसिन से नदी में स्वच्छ पानी का निरंतर प्रवाह सुनिश्चित होगा।

  • प्रदूषण में कमी: नदी में पानी की मात्रा (Volume) बढ़ने से संदूषकों का प्राकृतिक रूप से कम होना (Dilution) संभव हो पाएगा, जो ‘स्वच्छ यमुना अभियान’ के लक्ष्यों को प्राप्त करने में मील का पत्थर साबित होगा।

  • दिल्ली के लिए वरदान: यह परियोजना दिल्ली की दीर्घकालिक पेयजल संकट की समस्या को दूर करने के लिए नियोजित तीन प्रमुख बांधों (लखवार, व्यासी और रेणुकाजी के साथ) में से एक है।

मुख्य चुनौतियाँ (Key Challenges Ahead)

  • विस्थापन और पुनर्वास (R&R): इस परियोजना के कारण उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कुल 17 गांव पूर्ण या आंशिक रूप से जलमग्न हो जाएंगे, जिससे लगभग 5,500 से अधिक लोग प्रभावित होंगे। उनका उचित पुनर्वास सुनिश्चित करना सबसे संवेदनशील कार्य होगा।

  • पर्यावरणीय प्रभाव: लगभग 2,438 हेक्टेयर वन भूमि इस जलाशय के अंतर्गत जलमग्न हो जाएगी, जिससे स्थानीय जैव विविधता प्रभावित हो सकती है।

  • समय और लागत वृद्धि (Cost Overrun): दशकों से अटकी होने के कारण परियोजना की लागत पहले ही ₹15,000 करोड़ के पार पहुंच चुकी है। कैबिनेट की मंजूरी के बाद इसे समयबद्ध तरीके से पूरा करना एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती होगी।

आगे की राह (Way Forward)

सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का परिचय देते हुए छह राज्यों का एक मंच पर आना भारत के जल-गवर्नेंस के लिए एक सकारात्मक संकेत है। अब आगे की राह इस बात पर निर्भर करेगी कि पर्यावरण और वन मंजूरी (Environmental Clearance) की प्रक्रियाओं को गति दी जाए और प्रभावित स्थानीय समुदायों को विश्वास में लेकर एक पारदर्शी पुनर्वास नीति लागू की जाए। यह परियोजना सिद्ध करती है कि जटिल अंतर-राज्यीय जल विवादों को राजनीतिक इच्छाशक्ति और निरंतर संवाद के माध्यम से सुलझाया जा सकता है।

स्टाटाथॉन (STATATHON) 2026: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के जरिए भारत की सांख्यिकीय प्रणाली का आधुनिकीकरण

  • GS मुख्य परीक्षा प्रश्नपत्र-II: ई-गवर्नेंस- अनुप्रयोग, मॉडल, सफलताएं, सीमाएं और संभावनाएं; विकास प्रक्रियाएं तथा विकास उद्योग।

  • GS मुख्य परीक्षा प्रश्नपत्र-III: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास और रोजमर्रा के जीवन में इसके अनुप्रयोग और प्रभाव; सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-प्रौद्योगिकी, बायो-प्रौद्योगिकी से संबंधित विषय।

चर्चा में क्यों?

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के तहत राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) ने शिक्षा मंत्रालय के इनोवेशन सेल के सहयोग से राष्ट्रीय स्तर के हैकाथॉन “स्टाटाथॉन – विकसित भारत के लिए एक डेटा यात्रा” (STATATHON – A Data Journey for Viksit Bharat) के 36 घंटे के ग्रैंड फिनाले का आयोजन 17-18 जून 2026 को मानव रचना इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च एंड स्टडीज (MRIIRS), फरीदाबाद के परिसर में किया है। यह NSO इंडिया द्वारा आयोजित हैकाथॉन श्रृंखला का तीसरा संस्करण है।

स्टाटाथॉन 2026 के 5 प्रमुख समस्या विवरण (Problem Statements)

आधिकारिक सांख्यिकीय प्रणालियों को अधिक चुस्त, सुरक्षित और सटीक बनाने के लिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक डिजिटल तकनीकों से जुड़े 5 प्रमुख क्षेत्रों की पहचान की गई है:

1. सर्वेक्षण डेटा संग्रह के लिए AI-संचालित स्मार्ट सर्वे टूल

  • उद्देश्य: बुद्धिमानी से प्रश्नावली का संचालन (Intelligent Questionnaire Administration), रियल-टाइम डेटा सत्यापन, स्वचालित निगरानी और बहुभाषी क्षमताओं के माध्यम से सर्वेक्षण डेटा संग्रह की दक्षता, सटीकता और गुणवत्ता को बढ़ाना।

2. स्वचालित डेटा तैयारी, अनुमान और रिपोर्ट लेखन के लिए एप्लीकेशन

  • उद्देश्य: सर्वेक्षण डेटा के सांख्यिकीय प्रसंस्करण (Statistical Processing) में लगने वाले समय और मानवीय श्रम को कम करना, जिससे विश्वसनीय अनुमान और विश्लेषणात्मक रिपोर्ट तेजी से तैयार की जा सकें।

3. NSS यूनिट-लेवल डेटा के लिए डेटा एन्क्रिप्शन/अनामकरण (Anonymisation) टूल का विकास

  • उद्देश्य: राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण (NSS) के यूनिट-स्तरीय डेटा की गोपनीयता और सुरक्षा को मजबूत करना, ताकि शोधकर्ताओं को सुरक्षित डेटा प्रदान करते हुए नागरिकों की व्यक्तिगत पहचान पूरी तरह गुप्त रखी जा सके।

4. सर्वे डेटासेट पर SQL क्वेरी चलाने और JSON जैसे प्रारूपों में परिणाम प्राप्त करने के लिए API गेटवे बनाना

  • उद्देश्य: आधिकारिक सांख्यिकी तक अनुकूलित (Customised) पहुंच को आसान बनाना, विभिन्न प्रणालियों के बीच अंतर-संचालनीयता (Interoperability) को बढ़ावा देना और साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण (Evidence-based decision-making) का समर्थन करना।

5. राष्ट्रीय व्यावसायिक वर्गीकरण (NCO) के लिए AI-सक्षम सेमेंटिक सर्च (Semantic Search)

  • उद्देश्य: प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (NLP) आधारित खोज के माध्यम से राष्ट्रीय व्यावसायिक वर्गीकरण की खोज क्षमता और उपयोगिता को बढ़ाना।

भागीदारी और मूल्यांकन प्रक्रिया

इस हैकाथॉन को देश भर के छात्रों और स्टार्टअप्स से व्यापक प्रतिक्रिया मिली है, जिसमें कुल 5,000 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए।

  • प्रथम चरण: विषय और तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा मूल्यांकन के बाद 50 टीमों (प्रत्येक समस्या विवरण के लिए 10 टीमें) को शॉर्टलिस्ट और मेंटर किया गया।

  • ग्रैंड फिनाले: कड़े मूल्यांकन के बाद 25 फाइनलिस्ट टीमों (प्रत्येक समस्या विवरण के लिए 5 टीमें) का चयन 36 घंटे के ग्रैंड फिनाले के लिए किया गया। इन 25 टीमों में से 21 शैक्षणिक संस्थानों का प्रतिनिधित्व करती हैं और 4 स्टार्टअप्स हैं।

  • समापन: यह हैकाथॉन 18 जून 2026 को फाइनलिस्ट टीमों की प्रस्तुतियों और विजेताओं की घोषणा के साथ समाप्त होगा।

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