आज के 18 June 2026 PIB Notes for UPSC के इस विशेष अंक में प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो (PIB) की सभी प्रमुख खबरों (REWARD कार्यक्रम, PM-VBRY, 26वीं फिंगरप्रिंट कॉन्फ्रेंस, NIXI फाउंडेशन डे, और भारतीय तटरक्षक बल ACV) का यूपीएससी (UPSC) और अन्य परीक्षाओं के लिए विश्लेषण करेंगे।
प्रथम ब्रिक्स (BRICS) एमएसएमई फोरम और भारतीय अर्थव्यवस्था में MSME का महत्व
पाठ्यक्रम (Syllabus):
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GS Paper 2: द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और भारत से जुड़े और/या भारत के हितों को प्रभावित करने वाले समझौते।
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GS Paper 3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रोज़गार से संबंधित विषय।
चर्चा में क्यों?
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 19 जून 2026 को आगरा (उत्तर प्रदेश) में प्रथम ब्रिक्स एमएसएमई फोरम (1st BRICS MSME Forum) और तीसरी एसएमई कार्य समूह (3rd SME Working Group) बैठक का आयोजन किया जा रहा है।
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मुख्य विषय (Theme): “लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण” (Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability)।
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एसएमई कार्य समूह की थीम: “एमएसएमई पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण – वैश्विक मार्गों के लिए सतत जड़ें” (Building MSME Ecosystem – Sustainable Roots to Global Routes)।
ब्रिक्स (BRICS) फोरम में किन मुद्दों पर चर्चा होगी?
इस बैठक में ब्रिक्स के सदस्य और भागीदार देशों (जैसे- ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, यूएई, मलेशिया, इंडोनेशिया आदि) के नीति निर्माता और उद्यमी भाग ले रहे हैं। मुख्य विमर्श निम्नलिखित तीन स्तंभों पर केंद्रित है:
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वित्त तक पहुंच (Access to Finance): एमएसएमई क्षेत्र के लिए ऋण और वित्तीय संसाधनों को सरल बनाना।
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तकनीक तक पहुंच (Technology Access): वैश्विक स्तर पर तकनीकी ज्ञान और डिजिटल उपकरणों का आदान-प्रदान करना।
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सतत विकास (Growth of Sustainability-oriented MSME): भविष्य के लिए पर्यावरण के अनुकूल और लचीले एमएसएमई इकोसिस्टम का निर्माण करना।
भारतीय अर्थव्यवस्था में MSME क्षेत्र का योगदान
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उद्यमों की संख्या: भारत में 8.6 करोड़ से अधिक एमएसएमई उद्यम संचालित हैं।
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जीडीपी में योगदान: यह क्षेत्र राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 31.1 प्रतिशत से अधिक का योगदान देता है।
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विनिर्माण (Manufacturing): भारत के कुल विनिर्माण उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 35.4 प्रतिशत है।
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निर्यात (Exports): भारत से होने वाले कुल निर्यात में एमएसएमई क्षेत्र का योगदान 48.58 प्रतिशत (लगभग आधा) है।
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रोजगार: कृषि के बाद यह देश में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करने वाला दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र है, जो पारंपरिक कारीगरों से लेकर टेक-आधारित व्यवसायों को समेटे हुए है।
ब्रिक्स एमएसएमई सहयोग का महत्व
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वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता: यह मंच ब्रिक्स देशों के बीच सर्वोत्तम प्रथाओं, नीतिगत अनुभवों और सफल केस स्टडीज को साझा करने का अवसर देता है।
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समावेशी विकास: उभरती वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के छोटे व्यवसायों को आपस में जोड़कर वैश्विक मूल्य श्रृंखला (Global Value Chains) में उनकी भागीदारी बढ़ाई जा सकती है।
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आर्थिक लचीलापन: वैश्विक मंदी या आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) के व्यवधानों के समय छोटे उद्योगों को सशक्त बनाकर अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखा जा सकता है।
क्विक फैक्ट्स (Prelims Booster)
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BRICS का विस्तार: ध्यान रहे कि ब्रिक्स अब केवल 5 देशों का समूह नहीं है। इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और यूएई जैसे देश पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल हो चुके हैं, और कई अन्य देश (जैसे मलेशिया, थाईलैंड, वियतनाम) भागीदार देशों (Partner Countries) के रूप में इसके साथ जुड़े हैं।
MSME की नवीनतम परिभाषा और वर्गीकरण (1 अप्रैल 2025 से लागू)
भारत सरकार द्वारा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) के वर्गीकरण के लिए निवेश (Investment) और वार्षिक कारोबार (Turnover) दोनों मानदंडों को एक साथ पूरा करना अनिवार्य कर दिया गया है। यदि कोई भी इकाई किसी एक भी सीमा को पार करती है, तो वह अगली उच्च श्रेणी में चली जाएगी।
संशोधित सीमाओं के अनुसार नया वर्गीकरण इस प्रकार है:
| उद्यम की श्रेणी (Category) | संयंत्र और मशीनरी/उपकरण में निवेश (Investment) | वार्षिक टर्नओवर (Turnover) |
| सूक्ष्म उद्यम (Micro) | ₹ 2.5 करोड़ तक | ₹ 10 करोड़ तक |
| लघु उद्यम (Small) | ₹ 25 करोड़ तक | ₹ 100 करोड़ तक |
| मध्यम उद्यम (Medium) | ₹ 125 करोड़ तक | ₹ 500 करोड़ तक |
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समान वर्गीकरण: विनिर्माण (Manufacturing) और सेवा (Services) क्षेत्र के बीच के अंतर को पूरी तरह समाप्त करके दोनों को एक समान श्रेणी में रखा गया है।
REWARD कार्यक्रम और राष्ट्रीय तकनीकी दिशानिर्देश (NTG)
पाठ्यक्रम (Syllabus):
- GS Paper 3: मुख्य फसलें, विभिन्न भागों में सिंचाई के प्रकार और सिंचाई प्रणाली, कृषि उत्पाद का भंडारण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण (Degradation)।
- प्रारंभिक परीक्षा (Prelims): REWARD प्रोग्राम, NRAA, भूमि संसाधन विभाग (DoLR), विश्व बैंक।
चर्चा में क्यों?
हाल ही में भूमि संसाधन विभाग (DoLR) के अंतर्गत राष्ट्रीय वर्षासिंचित क्षेत्र प्राधिकरण (NRAA) द्वारा नई दिल्ली में दो दिवसीय राष्ट्रीय परामर्श बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य विश्व बैंक द्वारा सहायता प्राप्त ‘REWARD’ कार्यक्रम के तहत ‘बेहतर जलसंभर प्रबंधन’ (Improved Watershed Management) के लिए राष्ट्रीय तकनीकी दिशानिर्देशों (NTG) के मसौदे को अंतिम रूप देना था।
विशेष संयोग: यह बैठक 17 जून को ‘विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस’ (World Day to Combat Desertification and Drought) के अवसर पर आयोजित की गई। इस दौरान मृदा संरक्षण पर केंद्रित एक लघु फिल्म “मेरी मिट्टी, मेरा फर्ज” भी लॉन्च की गई।
REWARD कार्यक्रम क्या है?
- पूरा नाम: Rejuvenating Watersheds for Agricultural Resilience through Innovative Development (नवाचार विकास के माध्यम से कृषि लचीलेपन के लिए जलसंभर का कायाकल्प)।
- सहयोग: यह भारत सरकार और विश्व बैंक (World Bank) की एक संयुक्त पहल है।
- नोडल मंत्रालय: ग्रामीण विकास मंत्रालय का भूमि संसाधन विभाग (DoLR)।
- तकनीकी भागीदार: राष्ट्रीय वर्षासिंचित क्षेत्र प्राधिकरण (NRAA)।
- शामिल राज्य (REWARD States): वर्तमान में मुख्य रूप से कर्नाटक और ओडिशा में इसे लागू किया जा रहा है।
- उद्देश्य: वर्षासिंचित क्षेत्रों में आधुनिक तकनीकों के माध्यम से जल प्रबंधन को सुधारना, कृषि उत्पादकता बढ़ाना और जलवायु परिवर्तन के प्रति किसानों को लचीला (Resilient) बनाना।
राष्ट्रीय तकनीकी दिशानिर्देश (NTG) के मुख्य स्तंभ
दिशानिर्देशों को अधिक वैज्ञानिक, व्यावहारिक और सुलभ बनाने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर विशेष ध्यान दिया गया है:
1. विज्ञान और समुदाय का समन्वय
- जलसंभर प्रबंधन पूरी तरह से विज्ञान आधारित होना चाहिए।
- इसमें स्थानीय समुदाय और पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है।
- प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल (Administrative Simplicity) रखा जाएगा ताकि जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन आसान हो।
2. अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग
- डेटा-संचालित दृष्टिकोण: योजना बनाने के लिए उच्च-रिज़ॉल्यूशन इमेजरी हेतु ड्रोन तकनीक का उपयोग।
- LRI और हाइड्रोलॉजी-लाइट: लैंड रिसोर्स इन्वेंट्री (LRI) और हाइड्रोलॉजी-लाइट दृष्टिकोण को अपनाना ताकि मिट्टी और जल की सटीक स्थिति का पता चल सके।
- AI और चैटबॉट्स: किसानों की सहायता के लिए तकनीकों को चैटबॉट्स से जोड़ना।
- निगरानी: रियल-टाइम ट्रैकिंग के लिए वेब पोर्टल और ‘निर्णय समर्थन प्रणाली’ (Decision Support Systems – DSS) का विकास।
3. स्थिरता और निजी क्षेत्र की भागीदारी
- परियोजना के पूरा होने के बाद भी जलसंभर संपत्तियों (Watershed Assets) का रखरखाव हो सके, इसके लिए निजी क्षेत्र (Private Sector) और एनजीओ (NGOs) को जोड़ा जाएगा।
- इसके मॉडल को ‘स्केलेबल’ (Scalable) बनाया जा रहा है ताकि इसे देश के अन्य हिस्सों में भी लागू किया जा सके।
जलसंभर प्रबंधन का महत्व
- जल सुरक्षा: यह भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) को बढ़ावा देता है।
- कृषि उत्पादकता: फसल की सघनता (Cropping Intensity) और पैदावार में सुधार होता है।
- जलवायु लचीलापन: मौसम के बदलते पैटर्न और सूखे के प्रभाव से फसलों की रक्षा होती है।
- मृदा संरक्षण: यह भूमि क्षरण (Land Degradation) को रोकता है और मरुस्थलीकरण के खिलाफ लड़ाई में मदद करता है।
क्विक फैक्ट्स (Prelims Booster)
- राष्ट्रीय वर्षासिंचित क्षेत्र प्राधिकरण (NRAA): यह भारत के वर्षासिंचित क्षेत्रों की समस्याओं के समाधान के लिए एक विशेषज्ञ निकाय है।
- विश्व मरुस्थलीकरण दिवस: हर साल 17 जून को मनाया जाता है।
रेलवे द्वारा फ्लाई एश का परिवहन और सर्कुलर इकोनॉमी
पाठ्यक्रम (Syllabus):
- GS Paper 3: बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर: रेलवे), पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, सर्कुलर इकोनॉमी (अपशिष्ट से धन)।
- प्रारंभिक परीक्षा (Prelims): फ्लाई एश के उपयोग, भारतीय रेलवे की हरित पहल।
चर्चा में क्यों?
हाल ही में केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव की अध्यक्षता में हुई एक समीक्षा बैठक में भारतीय रेलवे के माध्यम से बड़े पैमाने पर फ्लाई एश (Fly Ash) के परिवहन की एक नई हरित पहल (Green Initiative) को मंजूरी दी गई। इसके तहत थर्मल पावर प्लांटों से निकलने वाली फ्लाई एश को बुनियादी ढांचा उद्योगों (जैसे सीमेंट, ईंट और सड़क निर्माण) तक कुशलतापूर्वक पहुँचाने के लिए एक समर्पित लॉजिस्टिक्स नेटवर्क तैयार किया जा रहा है।

भारत में फ्लाई एश की चुनौती और रेलवे का समाधान
1. ‘ग्रे बर्डन’ (धूसर बोझ) के आंकड़े
- भारत के थर्मल पावर प्लांटों से हर साल लगभग 340 मिलियन टन फ्लाई एश उत्पन्न होती है।
- दशकों से यह बिजली संयंत्रों के आसपास जमा होकर वायु और जल प्रदूषण का एक बड़ा कारण बनी हुई थी।
2. रेलवे का ‘लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर’
- भारतीय रेलवे इसके सुरक्षित परिवहन के लिए विशेष कंटेनरों (Specialised Containers) और समर्पित रेल गलियारों का निर्माण कर रहा है।
- उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि फ्लाई एश का परिवहन पूरी तरह से बंद (Contained) वैगनों में हो, ताकि यह रास्ते में प्रदूषक न बने।
फ्लाई एश: अपशिष्ट से संपदा (Waste to Wealth)
यह पहल सर्कुलर इकोनॉमी (Circular Economy) का एक आदर्श उदाहरण है, जहां एक उद्योग का कचरा दूसरे उद्योग के लिए मूल्यवान कच्चा माल बनता है।
- सीमेंट और कंक्रीट उद्योग: फ्लाई एश का उपयोग पोर्टलैंड सीमेंट के पूरक के रूप में किया जाता है, जिससे सीमेंट की ताकत और स्थायित्व बढ़ता है।
- सस्ते आवास (Affordable Housing): फ्लाई एश की आसान उपलब्धता से ईंटों और ब्लॉकों के निर्माण की लागत कम होगी। इसका सीधा फायदा शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ते घरों के निर्माण में मिलेगा।
- सड़क और बुनियादी ढांचा: राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण में फ्लाई एश का बड़े पैमाने पर भराव (Embankment) के रूप में उपयोग किया जा रहा है।
इस पहल के बहुआयामी लाभ
- पर्यावरणीय लाभ: बिजली संयंत्रों के पास ‘एश पॉन्ड्स’ (राख के तालाबों) की जरूरत कम होगी, जिससे भूमि क्षरण और वायु प्रदूषण (PM 2.5 और PM 10) में कमी आएगी।
- कार्बन फुटप्रिंट में कमी: सीमेंट उत्पादन में फ्लाई एश के उपयोग से CO₂ उत्सर्जन में भारी कमी आती है।
- लॉजिस्टिक्स दक्षता: ट्रकों के बजाय रेलवे द्वारा परिवहन करने से सड़कों पर भीड़ कम होगी और कार्बन उत्सर्जन में गिरावट आएगी।
- आर्थिक मूल्य: यह कचरे को एक मूल्यवान आर्थिक संसाधन में बदलकर ‘सस्टेनेबल इन्फ्रास्ट्रक्चर’ को बढ़ावा देता है।
क्विक फैक्ट्स (Prelims Booster)
- फ्लाई एश (Fly Ash) क्या है? यह कोयले के दहन (Combustion) से उत्पन्न होने वाला एक महीन पाउडर है, जिसमें मुख्य रूप से सिलिका, एल्युमिनियम और आयरन के ऑक्साइड होते हैं।
- पर्यावरणीय नियम: पर्यावरण मंत्रालय के नियमों के अनुसार, थर्मल पावर प्लांटों के लिए उत्पन्न होने वाली फ्लाई एश का 100% उपयोग (Eco-friendly utilization) करना अनिवार्य है।
फ्लाई एश (Fly Ash) – संरचना एवं उपयोग
फ्लाई एश क्या है?
यह कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांटों (Thermal Power Plants) में कोयले के दहन (Combustion) से उत्पन्न होने वाला एक अवांछित महीन पाउडर (By-product) है। यह चिमनियों से निकलने वाली गैसों (Flue Gases) के साथ ऊपर उड़ता है, जिसे इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर (ESP) या बैग फिल्टर का उपयोग करके वातावरण में फैलने से पहले ही एकत्र कर लिया जाता है।
1. रासायनिक संरचना (Chemical Composition)
फ्लाई एश रासायनिक रूप से पोर्टलैंड सीमेंट जैसी दिखती है, लेकिन इसके घटक भिन्न होते हैं:
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मुख्य घटक (Major Oxides): सिलिकॉन डाइऑक्साइड, एल्युमिनियम ऑक्साइड, फेरिक ऑक्साइड और कैल्शियम ऑक्साइड।
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विषाक्त तत्व (Toxic Elements): इसमें भारी और विषैली धातुएं जैसे आर्सेनिक, सीसा (Lead), पारा (Mercury), बेरिलियम और कैडमियम भी सूक्ष्म मात्रा में पाई जाती हैं। (ध्यान रखें: यह पूरी तरह विष-मुक्त नहीं होती है)।
वर्गीकरण (Types)
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Class F: इसमें कैल्शियम की मात्रा कम होती है। यह एंथ्रेसाइट और बिटुमिनस कोयले से बनती है (भारतीय कोयले में यह अधिक होती है)।
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Class C: इसमें कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है और यह मुख्य रूप से लिग्नाइट या सब-बिटुमिनस कोयले से उत्पन्न होती है।
2. फ्लाई एश के बहुआयामी उपयोग (Applications)
कंक्रीट और सीमेंट उद्योग
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सीमेंट का विकल्प: यह कंक्रीट में पोर्टलैंड सीमेंट के आंशिक प्रतिस्थापन (Replacement) के रूप में कार्य करती है। इसकी ‘पोज़ोलानिक’ (Pozzolanic) प्रकृति पानी के साथ मिलकर कंक्रीट को अधिक मजबूत और टिकाऊ बनाती है।
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फ्लाई एश ईंटें: पर्यावरण के अनुकूल ईंटों के निर्माण में, जो पारंपरिक लाल मिट्टी की ईंटों की तुलना में हल्की और अधिक मजबूत होती हैं। इससे कृषि योग्य ऊपरी मिट्टी (Topsoil) का संरक्षण होता है।
बुनियादी ढांचा और निर्माण
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सड़क और बांध निर्माण: राजमार्गों के तटबंधों (Embankments) के निर्माण और निचले इलाकों को भरने के लिए भराव सामग्री के रूप में।
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खदानों की भराई: कोयला निकालने के बाद छोड़ी गई खाली खदानों (Abandoned Mines) को सुरक्षित रूप से भरने के लिए।
कृषि क्षेत्र (Controlled Application)
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यह मिट्टी की जल धारण क्षमता (Water Holding Capacity) और वायुसंचार (Aeration) में सुधार करती है।
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मिट्टी को आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व (Fe, Zn, Mo) प्रदान करती है।
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क्षारीय और लवणीय मिट्टी (Saline Alkali Soil) के सुधार में जिप्सम के विकल्प के रूप में उपयोगी।
प्रधानमंत्री का विवाटेक (VivaTech) 2026 संबोधन और भारत का डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र
पाठ्यक्रम (Syllabus):
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GS Paper 3: सूचना प्रौद्योगिकी (IT), अंतरिक्ष, कंप्यूटर और डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI)। भारत में स्टार्टअप इकोसिस्टम और नवाचार।
चर्चा में क्यों?
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेरिस (फ्रांस) में आयोजित यूरोप के सबसे बड़े प्रौद्योगिकी कार्यक्रम ‘विवाटेक 2026’ (VivaTech 2026 के 10वें संस्करण) को संबोधित किया। इस वर्ष भारत इस एक्सपो में ‘AI कंट्री पार्टनर’ (AI Country Partner) के रूप में भाग ले रहा है, जो वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती तकनीकी साख को दर्शाता है।
भारत का डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI) और वैश्विक नेतृत्व
प्रधानमंत्री ने वैश्विक मंच पर भारत के सफल डिजिटल मॉडलों (Digital Public Goods) को रेखांकित किया:
1. डिजिटल भुगतान (UPI)
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भारत वर्तमान में दुनिया के 50% वास्तविक समय (Real-time) के डिजिटल लेनदेन का संचालन करता है।
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वैश्विक विस्तार: यूपीआई (UPI) का दायरा अब फ्रांस तक बढ़ गया है, जिसका उपयोग पेरिस हवाई अड्डे और एफिल टॉवर पर किया जा सकता है।
2. डिजीलॉकर (DigiLocker)
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यह दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल दस्तावेज़ वॉलेट में से एक है, जिसके 700 मिलियन (70 करोड़) से अधिक उपयोगकर्ता हैं। यह भौतिक दस्तावेजों (जैसे ड्राइविंग लाइसेंस, वाहन पंजीकरण) को ले जाने की आवश्यकता को समाप्त करता है।
3. गतिशक्ति (Gatishakti) प्लेटफॉर्म
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बुनियादी ढांचे की योजना के लिए यह एक ‘संपूर्ण-सरकार’ (Whole-of-government) डेटा-संचालित मंच है। यह एक एकल GIS-आधारित मानचित्र पर 1,600 से अधिक भौगोलिक डेटा परतों को एकीकृत करता है, जिससे महीनों में होने वाले प्रोजेक्ट सर्वे अब हफ्तों में पूरे हो जाते हैं।
4. स्वामित्व (SVAMITVA) योजना
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ग्रामीण क्षेत्रों में ड्रोन और जियोस्पेशियल मैपिंग के माध्यम से 31 मिलियन (3.1 करोड़) से अधिक संपत्ति कार्ड तैयार किए गए हैं, जो ग्रामीण परिवारों को वित्तीय संपत्ति के रूप में अपनी जमीन का उपयोग करने की शक्ति देते हैं।
जमीनी स्तर पर तकनीकी नवाचार और स्टार्टअप्स
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समावेशी AI (सरलाबेन): ‘सरलाबेन’ नामक एक एआई एप्लिकेशन लाखों महिला डेयरी किसानों को उनकी स्थानीय भाषा में पशुधन स्वास्थ्य और प्रबंधन पर विशेषज्ञ मार्गदर्शन प्रदान कर रहा है। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि भारत के लिए AI का अर्थ है “ऑल इंक्लूसिव” (सबके लिए समावेशी)।
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ड्रोन दीदी और कृषि: भारतीय महिलाओं को उर्वरक छिड़काव और फसल निगरानी के लिए ड्रोन पायलट के रूप में प्रशिक्षित किया जा रहा है।
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अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा फ्रंटियर: भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला पहला देश बना। हाल ही में भारत के प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने क्रिटिकल स्थिति (Criticality) हासिल की, जो भारत के विशाल थोरियम भंडार का उपयोग करने के थ्री-स्टेज न्यूक्लियर विजन के करीब है।
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स्टार्टअप हब: 2,00,000 से अधिक स्टार्टअप्स के साथ भारत दुनिया का सबसे जीवंत इकोसिस्टम है, जो 3D प्रिंटेड रॉकेट इंजन और कैंसर का पता लगाने वाले AI समाधानों का निर्माण कर रहा है।
सरकार की नीति: ‘इनेबलर’ के रूप में (Government as an Enabler)
भारत सरकार निजी उद्यमों को सहयोग देने के लिए 50 बिलियन डॉलर से अधिक के लक्षित प्रोत्साहन (Targeted Incentives/PLI) प्रदान कर रही है। सरकार का दृष्टिकोण स्पष्ट है: “सरकार सक्षम करेगी (Enable), उद्योग नवाचार (Innovate) करेगा, स्टार्टअप्स बदलाव लाएंगे और वैश्विक भागीदार इसे स्केल करेंगे।”
स्मार्ट सीड कोटिंग टेक्नोलॉजी
पाठ्यक्रम (Syllabus):
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GS Paper 3: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-तकनीक, जैव-तकनीक (Biotechnology)। मुख्य फसलें- देश के विभिन्न भागों में कृषि प्रतिरूप, सिंचाई प्रणाली।
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प्रारंभिक परीक्षा (Prelims): ICAR-IIOR, बायोपॉलिमर, स्मार्ट सीड तकनीक, वर्षासिंचित कृषि।
चर्चा में क्यों?
हाल ही में हैदराबाद स्थित ICAR-भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान (ICAR-IIOR) ने एक अभिनव, जैव-अपघटनीय (Biodegradable) और बायोपॉलिमर-आधारित “स्मार्ट सीड कोटिंग टेक्नोलॉजी” (Smart Seed Coating Technology) का विकास और सफल प्रदर्शन किया है। इस स्वदेशी तकनीक (भारतीय पेटेंट) का उद्देश्य फसल के शुरुआती चरण में बीज की गुणवत्ता और उत्पादकता में सुधार करना है।
स्मार्ट सीड कोटिंग तकनीक क्या है?
यह एक बहुआयामी बीज संवर्द्धन (Seed Enhancement) प्रणाली है। इसमें पारंपरिक एकल-उद्देश्यीय बीज उपचारों के विपरीत, बीजों के चारों ओर एक सुरक्षात्मक बायोपॉलिमर परत (Multilayer) बनाई जाती है।
यह तकनीक कैसे काम करती है?
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वाहक प्रणाली (Carrier System): यह परत बीज और मिट्टी के इंटरफेस (Seed-Soil Interface) पर सीधे आवश्यक तत्व पहुँचाती है।
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एकीकृत इनपुट: इस कोटिंग में निम्नलिखित घटकों को एक साथ शामिल किया जाता है:
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लाभकारी सूक्ष्मजीव (Beneficial Microorganisms)
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मुख्य और सूक्ष्म पोषक तत्व (Nutrients & Micronutrients)
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फसल सुरक्षा एजेंट (Biotic/Abiotic Stress Protectors)
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पौधों की वृद्धि बढ़ाने वाले यौगिक (Growth-Promoting Compounds)
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इस तकनीक के प्रमुख लाभ और प्रभाव
1. फसल उत्पादकता में भारी वृद्धि
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असाधारण परिणाम: तेलंगाना में किसानों के खेतों पर किए गए परीक्षणों में पारंपरिक तरीकों की तुलना में मूंगफली (Groundnut) और सोयाबीन की पैदावार में लगभग 30% तक की वृद्धि दर्ज की गई।
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व्यापक परीक्षण (AICRP-Seed Trials): मक्का, चना, कपास, सरसों और अरहर जैसी विभिन्न फसलों पर देश के अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में किए गए परीक्षणों में 12% से 37% तक की उत्पादकता वृद्धि देखी गई।
2. वर्षासिंचित कृषि (Rainfed Agriculture) के लिए गेम-चेंजर
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भारत के कुल कृषि क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा वर्षा आधारित है, जो मानसून की अनिश्चितता और सूखे के प्रति संवेदनशील है।
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यह तकनीक शुरुआती चरण में बीजों को नमी के तनाव (Moisture Stress) और कीटों से बचाकर शुष्क भूमि में भी मजबूत अंकुरण (Seedling Emergence) सुनिश्चित करती है।
3. इनपुट दक्षता (Resource-Use Efficiency)
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पोषण और सुरक्षा को सीधे बीज के पास लक्षित (Targeted Delivery) करने से खाद और कीटनाशकों की बर्बादी कम होती है, जिससे किसानों की इनपुट लागत (Input Cost) घटती है और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुँचता।
बड़े पैमाने पर अपनाने की रणनीति (Adoption & Public-Private Partnerships)
तकनीक को प्रयोगशाला से खेतों तक पहुँचाने के लिए ICAR-IIOR सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के साथ साझेदारी को बढ़ावा दे रहा है:
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हितधारक: राष्ट्रीय बीज निगम (NSC), राज्य बीज विकास निगम, किसान उत्पादक संगठन (FPOs), बीज प्रसंस्करण इकाइयाँ और निजी बीज कंपनियाँ।
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रणनीति: इन संस्थाओं के माध्यम से ‘कस्टम बीज उपचार केंद्र’ स्थापित किए जाएंगे ताकि आम किसानों को गुणवत्ता-संवर्द्धित स्मार्ट बीज आसानी से मिल सकें।
क्विक फैक्ट्स (Prelims Booster)
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ICAR-IIOR: भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान (Indian Institute of Oilseeds Research) हैदराबाद (तेलंगाना) में स्थित है, जो देश में तिलहन फसलों के अनुसंधान के लिए सर्वोच्च निकाय है।
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बायोपॉलिमर (Biopolymer): ये जीवित जीवों (जैसे पौधों या सूक्ष्मजीवों) से प्राप्त प्राकृतिक पॉलिमर होते हैं, जो पूरी तरह से इको-फ्रेंडली और पर्यावरण में आसानी से विघटित (Biodegradable) हो जाते हैं।
जलीय जिंक-आयन बैटरी (AZIBs) और इलेक्ट्रोलाइट इंजीनियरिंग
पाठ्यक्रम (Syllabus):
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GS Paper 3: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास एवं दैनिक जीवन में इनका अनुप्रयोग और प्रभाव। बुनियादी ढांचा (ऊर्जा)। पर्यावरण और सतत विकास।
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प्रारंभिक परीक्षा (Prelims): AZIBs, INST मोहाली, लिथियम-आयन बनाम जिंक-आयन, BDIM एडिटिव।
चर्चा में क्यों?
हाल ही में इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी (INST), मोहाली (विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग का एक स्वायत्त संस्थान) के वैज्ञानिकों ने जलीय जिंक-आयन बैटरी (Aqueous Zinc Ion Batteries – AZIBs) के लिए एक अभिनव इलेक्ट्रोलाइट एडिटिव ‘BDIM’ विकसित किया है। यह तकनीक महंगी बैटरी सामग्रियों के पुनर्गठन (Redesign) के बजाय इंटरफेस इंजीनियरिंग (Interface Engineering) के माध्यम से बैटरी को अधिक सुरक्षित, टिकाऊ और किफायती बनाती है।
जलीय जिंक-आयन बैटरी (AZIBs) के लाभ और चुनौतियाँ
लिथियम-आयन के मुकाबले यह क्यों बेहतर है?
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सुरक्षा: लिथियम-आयन बैटरियों में आग लगने का खतरा होता है, जबकि जलीय (Aqueous/जल-आधारित) होने के कारण AZIBs अत्यधिक सुरक्षित हैं।
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कम लागत और प्रचुरता: जिंक (जस्ता) पर्यावरण में लिथियम की तुलना में बहुत अधिक मात्रा में उपलब्ध है, जिससे इसकी निर्माण लागत बेहद कम आती है।
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सतत विकास: यह ग्रिड-पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा (जैसे सौर और पवन ऊर्जा) के दीर्घकालिक भंडारण के लिए एक टिकाऊ विकल्प है।
वाणिज्यिकरण में मुख्य बाधाएँ (The Challenges):
जिंक बैटरियों के व्यावसायिक उपयोग में अब तक निम्नलिखित तीन बड़ी समस्याएं थीं:
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जिंक डेंड्राइट्स (Zinc Dendrites): चार्जिंग के दौरान जिंक एनोड की सतह पर सुई जैसी नुकीली संरचनाएं बन जाती हैं, जो बैटरी को शॉर्ट-सर्किट कर देती हैं।
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हाइड्रोजन इवोल्यूशन रिएक्शन (HER): पानी के टूटने से हाइड्रोजन गैस निकलती है, जिससे बैटरी फूल जाती है।
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जंग (Corrosion): जल की उपस्थिति के कारण एनोड की सतह का क्षरण होता है।
INST का समाधान: ‘BDIM’ एडिटिव कैसे काम करता है?
वैज्ञानिकों ने एक नए रासायनिक पाउडर BDIM [1,3-bis (1,3-dicarboxypropyl)-1H-imidazole-3-ium chloride] का विकास किया है।
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इनर हेल्महोल्ट्ज़ प्लेन (IHP) का विनियमन: यह एडिटिव जिंक धातु की सतह पर चुनिंदा रूप से सोख लिया (Adsorbs) जाता है और इलेक्ट्रोकेमिकल रिएक्शन वाले क्षेत्र (IHP) पर कब्जा कर लेता है।
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पानी के अणुओं का विस्थापन: यह परत एनोड सतह से पानी के अणुओं को हटा देती है। पानी न होने से हाइड्रोजन का निकलना (HER) और जंग लगना पूरी तरह रुक जाता है, जिससे डेंड्राइट्स नहीं बनते।
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अध्ययन की नई तकनीक: शोधकर्ताओं ने इस पूरी प्रक्रिया और जिंक-जमाव के तंत्र को समझने के लिए अल्ट्रामिक्रोइलेक्ट्रोड (UME) और फास्ट-स्कैन साइक्लिक वोल्टामेट्री (FSCV) तकनीक का उपयोग किया, जो सूक्ष्म स्तर पर चार्ज-ट्रांसफर को दृश्यात्मक (Visualize) बनाती है।
इस तकनीक का अनुप्रयोग और महत्व
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ग्रिड-स्केल ऊर्जा भंडारण: यह नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) के उतार-चढ़ाव को संभालने के लिए ग्रिड-स्तरीय बिजली भंडारण प्रणालियों को अधिक विश्वसनीय बनाएगा।
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कम रखरखाव लागत: बैटरी का जीवनकाल (Cycling Stability) बढ़ने से टिकाऊ ऊर्जा बुनियादी ढांचे की रखरखाव लागत में भारी कमी आएगी।
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आत्मनिर्भर भारत: लिथियम के लिए आयात (जैसे चीन और दक्षिण अमेरिकी देशों) पर निर्भरता कम होगी और भारत में स्वच्छ ऊर्जा भंडारण का मार्ग प्रशस्त होगा।
राष्ट्रीय इंटरनेट एक्सचेंज ऑफ इंडिया (NIXI) और भारत का डिजिटल इकोसिस्टम
NIXI क्या है?
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प्रकृति: यह इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के तहत काम करने वाला एक गैर-लाभकारी संगठन (Not-for-profit organization) है।
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मुख्य कार्य:
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इंटरनेट एक्सचेंज सर्विसेज: घरेलू इंटरनेट ट्रैफिक के कुशल आदान-प्रदान को सुगम बनाना।
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डोमेन प्रबंधन: भारत के कंट्री-कोड टॉप-लेवल डोमेन (ccTLD) जैसे ‘.IN’ और ‘.भारत’ का प्रबंधन करना।
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IP एड्रेस आवंटन: ‘भारतीय इंटरनेट नाम और नंबर रजिस्ट्री’ (IRINN) के माध्यम से देश में IPv4 और IPv6 एड्रेस आवंटित करना।
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IPv6 एड्रेस को अपनाना (IPv6 Adoption)
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भारत में IPv6 पैठ (Penetration) लगभग 78.34% तक पहुँच गई है। यह वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक दरों में से एक है, जो भारत के नेटवर्क को भविष्य की तकनीकों (जैसे IoT, AI) के लिए पूरी तरह तैयार (Future Ready) बनाता है।
डिजिटल समावेशन और कनेक्टिविटी
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भाषाई विविधता: NIXI वर्तमान में 22 आधिकारिक भारतीय भाषाओं में डोमेन नामों का समर्थन करता है, जो स्थानीय भाषाओं में इंटरनेट के उपयोग (Local Language Internet Ecosystem) को बढ़ावा देता है।
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इंटरनेट एक्सचेंज पॉइंट्स (IXPs): देश भर में 79 IXPs संचालित हैं, जो स्थानीय स्तर पर इंटरनेट ट्रैफिक को रूट करके इंटरनेट की गति (Speed) बढ़ाते हैं और बैंडविड्थ लागत को कम करते हैं।
भारतीय तटरक्षक बल (ICG) में स्वदेशी 'एयर कुशन व्हीकल' (ACV) शामिल
18 जून 2026 को गोवा में भारतीय तटरक्षक बल (Indian Coast Guard – ICG) की परिचालन क्षमता (Operational Effectiveness) को मजबूत करने के लिए पहले स्वदेशी ‘एयर कुशन व्हीकल’ (ACV – होवरक्राफ्ट) को सेवा में शामिल (Inducted) किया गया है।
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निर्माण: इसका निर्माण रक्षा मंत्रालय और चौगुले एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड (Chowgule & Company Private Limited) के बीच हस्ताक्षरित अनुबंध के तहत किया जा रहा है।
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परियोजना का दायरा: कुल 6 स्वदेशी होवरक्राफ्ट (ACVs) का निर्माण किया जाना है, जिनमें से यह पहला है।
एयर कुशन व्हीकल (ACV) / होवरक्राफ्ट क्या है?
यह एक बहुमुखी (Versatile) वाहन है, जो पानी, दलदल, कीचड़ और उथले तटीय इलाकों (Shallow Waters) में समान रूप से चल सकता है। यह पानी की सतह के ऊपर हवा के दबाव (Air Cushion) पर तैरते हुए गति करता है।
भारत बिल्डकॉन 2026
हाल ही में नई दिल्ली के यशोभूमि कन्वेंशन सेंटर में भवन निर्माण सामग्री और निर्माण उद्योग की एक विशाल प्रदर्शनी ‘भारत बिल्डकॉन 2026’ (Bharat Buildcon 2026) का उद्घाटन किया गया।
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मुख्य विषय (Theme): “एक राष्ट्र, एक एक्सपो” (One Nation, One Expo)।
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भागीदारी: इस वैश्विक मंच पर 90 से अधिक देशों और भारत के 100 से अधिक शहरों के प्रतिनिधियों (वास्तुकारों, बिल्डरों, नीति निर्माताओं और अंतरराष्ट्रीय खरीदारों) ने हिस्सा लिया।
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प्रदर्शित क्षेत्र: इसमें निर्माण क्षेत्र के 24 विभिन्न खंडों (जैसे- सिरेमिक, सीमेंट, स्टील, निर्माण तकनीक, इलेक्ट्रिकल और पेंट्स) में नवाचारों को प्रदर्शित किया गया।