प्रायद्वीपीय पठार के दोनों ओर विस्तृत Coastal Plains of India (भारत के तटीय मैदान) देश की एक अत्यंत महत्वपूर्ण भौगोलिक और आर्थिक इकाई हैं। कच्छ के रन से लेकर गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा तक फैले ये मैदान मुख्य रूप से दो भागों—पश्चिमी तटीय मैदान और पूर्वी तटीय मैदान में विभाजित हैं। जहाँ पश्चिमी तट अपनी तीव्रगामी नदियों, एश्चुअरी और केरल के प्रसिद्ध ‘कयाल’ (पश्चजल) के लिए जाना जाता है, वहीं पूर्वी तट गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी बड़ी नदियों के विशाल उपजाऊ डेल्टा और चिल्का जैसी समृद्ध लैगून झीलों से संपन्न है।
तटीय मैदान
सामान्य परिचय एवं विस्तार
- विस्तार: दक्षिण के प्रायद्वीपीय पठार के किनारे पश्चिम में कच्छ के रन से लेकर कोमोरिन अन्तरिप होते हुए पूर्व में गंगा-ब्रह्मपुत्र के डेल्टाई प्रदेश तक समुद्र तटीय मैदान का विस्तार पाया जाता है।
- स्थिति: ये मैदान पश्चिमी व पूर्वी घाट एवं समुद्र के मध्य विस्तृत हैं।
- निर्माण: इनका निर्माण नदियों व लहरों द्वारा लाई गई मिट्टी एवं अन्य अवसादों के निक्षेपण द्वारा हुआ है।
- विभाजन: ये क्रमशः पश्चिमी समुद्रतटीय मैदान व पूर्वी समुद्रतटीय मैदान के रूप में जाने जाते हैं।
(1) पश्चिमी समुद्र तटीय मैदान
मुख्य विशेषताएँ
- विस्तार: यह प्रायद्वीप के पश्चिम में खम्भात की खाड़ी से कोमोरिन अन्तरीप तक सतत क्रम में फैला है।
- चौड़ाई: इसकी औसत चौड़ाई 65 कि.मी. है। नर्मदा और तापी (ताप्ती) के मुहानों के निकट यह 80 कि.मी. तक चौड़ा है।
- नदियाँ एवं जलप्रवाह: इस तटीय मैदान में बहने वाली नदियाँ छोटी और तीव्रगामी हैं। अतः इनके द्वारा पश्चिमी घाट पर होने वाली वर्षा का जल व्यर्थ ही समुद्र में चला जाता है और मिट्टी का जमाव भी नहीं हो पाता।
- मुहाना: अधिकतर नदियाँ मुहाने पर डेल्टा न बनाकर ज्वारनदमुख (एश्चुअरी) का निर्माण करती हैं।
प्रादेशिक विभाजन (चार भाग)
| भाग | क्षेत्र / विस्तार |
| (i) गुजरात का मैदान | गुजरात का तटवर्ती क्षेत्र (द्वारिका से दमन के बीच) |
| (ii) कोंकण का मैदान | दमन से गोवा के बीच |
| (iii) कन्नड़ का मैदान | गोवा से मंगलौर के बीच |
| (iv) मालाबार का मैदान | मंगलौर से कन्याकुमारी के बीच |
अनूप (Lagoon) एवं पश्चजल (Back Water)
- अनूप (Lagoon): मैदान के दक्षिणवर्ती तट (मालाबार तट) पर लम्बे और सँकरे अनूप पाए जाते हैं। इन अनूपों में सैकड़ों कि.मी. तक नावें व स्टीमर चलाये जाते हैं। कोच्चि बन्दरगाह ऐसे ही अनूप पर स्थित है।
- पश्चजल / कयाल: पश्चिमी तट पर कुछ ‘पश्चजल’ (Back Water) पाये जाते हैं जिन्हें केरल में ‘कयाल’ कहा जाता है, जैसे—बेम्बानद एवं अष्टमुडी (अस्यायमुडी)।
- निर्माण प्रक्रिया: ‘पश्चजल’ एक प्रकार का लैगून ही है जिसका निर्माण नदियों के मुहाने पर बालू के जमाव के कारण होता है।
(2) पूर्वी तटीय मैदान
मुख्य विशेषताएँ
- विस्तार: यह मैदान गंगा के मुहाने से लेकर कुमारी अन्तरीप के बीच फैला है।
- चौड़ाई: यह पश्चिमी तटीय मैदान की अपेक्षा अधिक चौड़ा है। इसकी औसत चौड़ाई 100 से 320 कि.मी. तक है।
- चौड़ाई का मुख्य कारण: गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि नदियों द्वारा पूर्वी घाट पर्वत का व्यापक अपरदन एवं मुहाने पर विस्तृत डेल्टा का निर्माण।
- मैदानी विस्तार: डेल्टा एवं बड़ी नदियों की चौड़ी घाटियों के कारण ही ऐसे भागों में तट से 400-500 कि.मी. अन्तर्देशीय भागों तक नदीकृत मैदान एवं तटीय मैदान तथा समतल डेल्टा निरन्तर फैले हुए हैं।
तटीय संरचना एवं प्रमुख झीलें
- तट की प्रकृति: तट सपाट होने से समुद्र के निकटवर्ती भागों में लहरों द्वारा निर्मित बालू की लम्बी श्रृंखला मिलती है।
- लैगून झीलें: इन रेतीले जमाओं के कारण ही ‘चिल्का’ (उड़ीसा) और ‘पुलीकट’ (आन्ध्र प्रदेश व तमिलनाडु की सीमा पर) जैसी छिछली झीलों का निर्माण हुआ। दोनों झीलें लैगून झील या अनूप झील के उदाहरण हैं।
- चिल्का झील: यह भारत की सबसे बड़ी खारे पानी की झील है। इसका क्षेत्रफल लगभग 3560 वर्ग कि.मी. है।
प्रादेशिक विभाजन (तीन भाग)
- (i) उत्कल तटीय मैदान: महानदी के उत्तर का तटीय भाग (इसे उड़ीसा तट भी कहते हैं)।
- (ii) उत्तरी सरकार: महानदी से गोदावरी के मध्य का भाग (इसे कलिंग तट भी कहा जाता है)।
- (iii) कोरोमंडल तट: कृष्णा नदी मुहाने से केप कोमोरिन (कुमारी अन्तरीप) तक का भाग।