28 July 2026 The Hindu Notes In Hindi के इस अंक में BoB डेटा लीक, CAFE III मानक, कावेरी जल विवाद, दलबदल कानून और शहरी जल सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण UPSC टॉपिक्स का विस्तृत एवं विश्लेषणात्मक विवरण प्रस्तुत किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा शांतिपूर्ण प्रदर्शन और पुलिस आचरण पर टिप्पणियां
सामान्य अध्ययन पेपर-II: भारतीय संविधान, न्यायपालिका, और पुलिस सुधार
चर्चा में क्यों?
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने परीक्षा संबंधी मुद्दों पर हुए प्रदर्शनों (जैसे 20 जुलाई को संसद मार्च और बिहार में कथित पुलिस कार्रवाई) से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और पुलिस आचरण को विनियमित करने के लिए समान दिशा-निर्देश (Uniform Guidelines) तैयार करने का संकेत दिया है।
सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां एवं अवलोकन
- शांतिपूर्ण प्रदर्शन का संवैधानिक अधिकार: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि संविधान के तहत शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का अधिकार “पूर्ण रूप से गारंटीकृत” है।
- पुलिस ज्यादती पर रोक: केवल आंदोलन होने मात्र से पुलिस को लाठीचार्ज या ज्यादती करने का अधिकार नहीं मिल जाता। यदि पुलिस द्वारा कोई ज्यादती की जाती है, तो उसकी स्वतंत्र रूप से जांच होनी चाहिए।
- लोकतंत्र में अनुशासन: CJI ने रेखांकित किया कि “शासन और लोकतंत्र की प्रक्रिया के लिए अनुशासन अभिन्न अंग है।” विरोध प्रदर्शनकारियों और पुलिस दोनों को “आत्म-अनुशासन” (Self-imposed discipline) का पालन करना चाहिए।
- मानक संचालन प्रक्रिया (SOP): कोर्ट ने माना कि देश भर में पुलिस कार्रवाई के संबंध में एक समान मानक संचालन प्रोटोकॉल की आवश्यकता है।
याचिकाकर्ताओं की मुख्य मांगें
- समान दिशा-निर्देश: वरिष्ठ अधिवक्ताओं द्वारा देश भर में पुलिस आचरण को नियंत्रित करने के लिए समान दिशानिर्देश तैयार करने का आग्रह किया गया।
- पेलट गन (Pellet Guns) पर प्रतिबंध: सुप्रीम कोर्ट में दायर एक अन्य याचिका (सेवानिवृत्त अधिकारियों और पीड़ितों द्वारा) में भीड़ नियंत्रण के लिए पंप-एक्शन गन (PAG) या पेलट गन से दागे जाने वाले पूरी तरह या आंशिक रूप से धात्विक काइनेटिक प्रोजेक्टाइल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है।
मेकेदातु परियोजना और कावेरी जल विवाद
सामान्य अध्ययन पेपर-II: अंतर-राज्यीय संबंध, और जल विवाद
चर्चा में क्यों?
हाल ही में केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में स्पष्ट किया है कि फरवरी 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है कि कर्नाटक को कावेरी नदी पर कोई संरचना (जैसे मेकेदातु परियोजना) बनाने के लिए अन्य रिपेरियन (riparian – नदी बेसिन वाले) राज्यों की सहमति लेना अनिवार्य है।
मेकेदातु परियोजना (Mekedatu Balancing Reservoir Project)
- अवस्थिति: कर्नाटक में कावेरी नदी और उसके सहायक अर्कावती नदी के संगम के पास (बेंगलुरु दक्षिण)।
- स्वरूप: एक संतुलन जलाशय (balancing reservoir) और पनबिजली परियोजना।
- कर्नाटक का तर्क: इस परियोजना का उद्देश्य बेंगलुरु शहर के लिए पेयजल सुरक्षा सुनिश्चित करना और अतिरिक्त पानी का भंडारण करना है। कर्नाटक का दावा है कि इससे तमिलनाडु के जल हिस्से पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
- तमिलनाडु का विरोध: तमिलनाडु का तर्क है कि यह परियोजना कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) और सुप्रीम कोर्ट के अंतिम आदेश के खिलाफ है, और इससे डेल्टा क्षेत्रों में पानी का प्रवाह प्रभावित होगा।
सुप्रीम कोर्ट में दलबदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) के ‘विलय’ (Merger) अपवाद पर चुनौती
सामान्य अध्ययन पेपर-II: भारतीय संविधान, दलबदल विरोधी कानून
चर्चा में क्यों?
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद कपिल सिब्बल द्वारा दायर उस याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है, जिसमें संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) के तहत दलबदल विरोधी कानून के ‘विलीन’ (Merger) अपवाद की व्याख्या को चुनौती दी गई है।
याचिका का मुख्य बिंदु और कानूनी विवाद (Paragraph 4 Interpretation)
- ‘विलीन’ (Merger) की वर्तमान व्याख्या: दसवीं अनुसूची के पैरा 4 के तहत, किसी राजनीतिक दल का किसी अन्य दल में ‘विलीन’ तब मान लिया जाता है जब किसी विधायिका दल के दो-तिहाई (2/3) सदस्य यह दावा करते हैं कि ऐसा विलय हो गया है, भले ही इस बात का कोई अन्य संकेत न हो कि मूल राजनीतिक दल का वास्तव में विलय हुआ है या नहीं।
- याचिकाकर्ता की दलील:
- ऐसी व्याख्या से चुनावी बहुमत को अल्पमत में बदला जा सकता है, जो भारतीय राजनीति के लिए दूरगामी परिणाम पैदा कर सकता है।
- संविधान यह अनुमति नहीं देता कि केवल विधायी दल (Legislature Party) ही बिना किसी औपचारिक संगठनात्मक प्रक्रिया या पार्टी नेतृत्व की मंजूरी के मूल राजनीतिक दल के ‘मानित विलीन’ (Deemed Merger) को अंजाम दे दे।
अन्य संबंधित मामले (जैसे गोवा दलबदल मामला)
- गोवा प्रकरण (2022): वर्ष 2022 में कांग्रेस के 10 में से 8 विधायकों ने (कांग्रेस विधायक दल का दो-तिहाई दावा करते हुए) भाजपा में ‘विलीन’ की घोषणा की थी और दसवीं अनुसूची के तहत सुरक्षा मांगी थी।
- बॉम्बे हाईकोर्ट का निर्णय: बॉम्बे हाईकोर्ट ने 16 जनवरी, 2025 के अपने फैसले में विधायकों के इस कदम को वैध ‘विलीन’ करार दिया था।
- वर्तमान चुनौती: एक याचिका उच्च न्यायालय के इस फैसले को चुनौती देती है, जिसमें तर्क दिया गया है कि विपक्षी दलों के भीतर विधायकों का ऐसा विलय न केवल “संवैधानिक पाप” है, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे पर सीधा प्रहार भी है।
न्यायपालिका की प्रारंभिक टिप्पणियां
- संसद का क्षेत्राधिकार: सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा की पीठ ने टिप्पणी की कि दसवीं अनुसूची के कामकाज में आने वाली कमियों और कानून में सुधार से जुड़े मुद्दे आम तौर पर संसद के पटल या राजनीतिक दलों द्वारा उठाए जाने चाहिए।
- न्यायालय का रुख: हालांकि न्यायालय ने शुरू में इस पर विचार करने से अनिच्छा जताई थी, लेकिन अंततः याचिका पर नोटिस जारी करने और दलबदल कानून के तहत विलीन अपवाद की प्रतिस्पर्धी व्याख्याओं की जांच करने पर सहमति व्यक्त की।
महत्व
- दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law): 52वें संविधान संशोधन (1985) द्वारा जोड़ी गई दसवीं अनुसूची और 91वें संशोधन (2003) द्वारा ‘विज्ञप्त दल-बदल’ (Split) के प्रावधान को समाप्त किए जाने का इतिहास।
- ‘विधायी दल’ बनाम ‘राजनीतिक दल’: मूल राजनीतिक संगठन और विधानसभा/संसद के भीतर मौजूद विधायी दल के बीच अंतर और कानून की कमियों का दुरुपयोग।
- संसदीय लोकतंत्र की शुद्धता: आया राम-गया राम संस्कृति पर अंकुश लगाने और दलबदल के loopholes (कमियों) को पाटने के लिए सुधारों की आवश्यकता (जैसे दिनेश गोस्वामी समिति, विधि आयोग की सिफारिशें)।
शहरी जल सुरक्षा और सुधार (Urban Water Security and Reforms)
सामान्य अध्ययन पेपर-III: बुनियादी ढांचा, जल संसाधन प्रबंधन
संदर्भ एवं पृष्ठभूमि
भारत की व्यापक वृद्धि और विकास की महत्वाकांक्षाएं (जैसे ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य) इस बात पर निर्भर करती हैं कि हमारे शहर अपने जल संसाधनों का प्रबंधन कैसे करते हैं। शहरी भारत इस दशक में जीडीपी वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा संचालित करने की उम्मीद है, लेकिन कई शहरों में जल प्रणालियां अभी भी काफी नाजुक स्थिति में हैं।
शहरी जल क्षेत्र की वर्तमान चुनौतियां
- गैर-राजस्व जल (Non-Revenue Water – NRW): यूटिलिटीज (जल प्रदाय इकाइयां) उपभोक्ताओं तक पानी पहुंचने या बिल बनने से पहले ही उत्पादित पानी का 30% से अधिक हिस्सा खो देती हैं।
- अपशिष्ट जल का कम उपचार: केवल लगभग 27% सीवेज का उपचार किया जाता है, जिससे पुनर्चक्रण (Reuse) की बड़ी क्षमता का उपयोग नहीं हो पाता है।
- कम लागत वसूली: कई यूटिलिटीज उपयोगकर्ता शुल्कों के माध्यम से अपनी परिचालन और रखरखाव (O&M) लागत का 55% से भी कम वसूल पाती हैं।
- दूरदराज के स्रोतों पर निर्भरता: भारतीय शहर तेजी से दूर की नदियों और भूजल पर निर्भर हो रहे हैं, जिससे ऊर्जा के बिल बढ़ रहे हैं और सूखा व संदूषण (Contamination) का खतरा बढ़ रहा है।
एक राजनीतिक कार्यकाल (एक चक्र) के भीतर सुधार का एजेंडा
शहरी जल सेवाओं को स्थिर करने के लिए चार प्रमुख प्रश्नों के आधार पर एक केंद्रित एजेंडा अपनाया जा सकता है:
(क) पानी कहाँ से आता है? (Where does the water come from?)
- विकल्पों की विविधता: शहर पूरी तरह से दूर के स्रोतों को छोड़ नहीं सकते, लेकिन अपनी निर्भरता कम कर सकते हैं।
- वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting): छतों, सड़कों और खुली जगहों पर गिरने वाले बारिश के पानी का प्रभावी संचयन।
- अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण (Wastewater Reuse): औद्योगिक कूलिंग, निर्माण, भूदृश्य (Landscaping) और फ्लशिंग जैसे गैर-पेय उपयोगों के लिए उपचारित अपशिष्ट जल का मार्ग निर्धारण।
(ख) पानी को कितनी कुशलता से ले जाया जाता है? (How efficiently is water moved?)
- उत्तरदायित्व स्पष्ट करना: राज्य सरकार और स्थानीय निकायों के बीच बेहतर समन्वय।
- रिसाव और नुकसान का मापन: नेटवर्क को ‘जिला मीटर क्षेत्रों’ (District Metered Areas) में मैप करना और प्रमुख बिंदुओं पर बल्क मीटर लगाना।
- ग्राहक-केंद्रित सेवाएं: बड़े उपभोक्ताओं के लिए सार्वभौमिक मीटरिंग (Universal Metering) और बेहतर बिलिंग प्रणालियाँ।
(ग) किसे क्या मिलता है? (समानता का मुद्दा – Equity)
- गारंटीड न्यूनतम जल: पड़ोस या सामाजिक स्थिति के बावजूद प्रत्येक निवासी के लिए सुरक्षित पानी की एक निश्चित मात्रा सुनिश्चित करना।
- टैरिफ और सब्सिडी का पुनरुत्थान: सब्सिडी को इस तरह डिजाइन करना कि वह बुनियादी जरूरतों की रक्षा करे और बर्बादी को हतोत्साहित करे।
(घ) इसका भुगतान कौन करता है? (वित्तपोषण और मूल्यांकन)
- प्रमुख परियोजनाओं को मंजूरी देने से पहले पूर्ण जीवनकाल लागत (ऊर्जा, रखरखाव और जलवायु जोखिम) का आकलन करना।
- ‘लाइटहाउस’ (Lighthouse) परियोजनाओं के माध्यम से बेहतर योजना और वित्तपोषण के तरीकों का परीक्षण करना।
निष्कर्ष
भारत को जल प्रबंधन में केवल “कनेक्शन गिनने” (Counting connections) से आगे बढ़कर “प्रदर्शन और लचीलेपन” (Performance and Resilience) के प्रबंधन की ओर बढ़ना होगा। जल, ऊर्जा, वित्त और संस्थाओं को एक ‘ एकल प्रणाली’ के रूप में देखना और परिचालन क्षमताओं में समान रूप से निवेश करना आवश्यक है।
कॉर्पोरेट औसत ईंधन दक्षता (CAFE III) मानक और भारत की ऊर्जा सुरक्षा
सामान्य अध्ययन पेपर-III: पर्यावरण, ऊर्जा सुरक्षा
चर्चा में क्यों?
वैश्विक ऑटोमोबाइल उद्योग में आंतरिक दहन इंजन (ICE) से विद्युतीकृत पावरट्रेन (Electrified powertrains) की ओर हो रहे बदलाव के बीच, भारत के प्रस्तावित कॉर्पोरेट औसत ईंधन दक्षता (CAFE III) मानदंड पर बहस तेज हो गई है। यह नियम भारत की ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु प्रतिबद्धताओं को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
CAFE मानदंड क्या हैं?
- परिभाषा: CAFE मानदंड व्यक्तिगत मॉडल के बजाय निर्माताओं के यात्री वाहन बेड़े (Fleets) के लिए वार्षिक बिक्री-भारित औसत ईंधन-दक्षता लक्ष्य निर्धारित करते हैं।
- उत्पत्ति: इन्हें सबसे पहले 1975 में संयुक्त राष्ट्र (अमेरिका) में 1973 के अरब तेल प्रतिबंध के बाद तेल निर्भरता को कम करने के लिए पेश किया गया था।
- उद्देश्य: 1990 के दशक से इनका उपयोग ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने और स्वच्छ प्रौद्योगिकियों (जैसे संकर/हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहन) को बढ़ावा देने के लिए भी किया जाने लगा।
CAFE III प्रस्ताव की मुख्य विशेषताएं (भारत के संदर्भ में)
- लक्ष्य: वर्तमान प्रस्ताव का लक्ष्य वित्त वर्ष 2031-32 तक औसत उत्सर्जन को लगभग 113 ग्राम CO2/किमी से घटाकर 77 ग्राम CO2/किमी करना है।
- उद्योग के भीतर अलग-अलग दृष्टिकोण: मारुति सुजुकी, टाटा मोटर्स और महिंद्रा एंड महिंद्रा जैसी कंपनियों के बीच हल्के छोटी कारों या ईवी पोर्टफोलियो को लेकर अलग-अलग व्यावसायिक प्राथमिकताएं रही हैं।
CAFE III के संशोधित ढांचे में ‘लचीलेपन’ के उपाय (Flexibility Mechanisms)
समीक्षकों का तर्क है कि मसौदे में शामिल निम्नलिखित लचीलेपन के उपाय इसके वास्तविक प्रभाव को कम करते हैं:
- कार्बन न्यूट्रलिटी फैक्टर: उच्च इथेनॉल मिश्रण और अन्य ईंधनों के अनुकूल वाहनों के लिए अनुपालन लाभ (Compliance benefits)।
- सुपर क्रेडिट (Super Credits): बैटरी ईवी, प्लग-इन हाइब्रिड, स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बेड़े की गणना में अतिरिक्त महत्व देना।
- क्रेडिट की बैंकिंग और ट्रेडिंग: बेहतर प्रदर्शन करने वाली कंपनियां क्रेडिट जमा कर सकती हैं और दूसरों को बेच सकती हैं।
- ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (BEE) से खरीद: यदि व्यापार के बाद घाटा रहता है, तो कंपनियां प्रशासनिक रूप से तय कीमतों पर सीधे BEE से क्रेडिट खरीद सकती हैं (जो कि वास्तविक दंड से कम प्रतीत होती है)।
- बहु-वर्षीय ब्लॉक: अनुपालन का आकलन वार्षिक के बजाय तीन-वर्षीय (बाद में दो-वर्षीय) ब्लॉकों में किया जाता है।
वैश्विक अनुभव: चीन का ‘डुअल क्रेडिट सिस्टम’ (Dual Credit System)
- चीन ने 2018 में डुअल क्रेडिट सिस्टम पेश किया, जिसके तहत निर्माताओं को कॉर्पोरेट औसत ईंधन खपत (CAFC) मानकों और नई ऊर्जा वाहन (NEV) क्रेडिट आवश्यकताओं दोनों को पूरा करना होता है।
- जो कंपनियां ईवी नहीं बनातीं, उन्हें अन्य कंपनियों (जैसे टेटा या अन्य ईवी निर्माताओं) से एनईवी क्रेडिट खरीदना पड़ता है।
- इसी का परिणाम है कि 2025 में चीन में नई यात्री कार बिक्री में इलेक्ट्रिक कारों की हिस्सेदारी लगभग 55% तक पहुंच गई, जबकि भारत में यह लगभग 4% है।
महत्व
- ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security): भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों के लिए भारी मात्रा में आयात पर निर्भर है। कड़े ईंधन दक्षता मानक भू-राजनीतिक झटकों और मुद्रा के दबाव को कम करने में मदद करते हैं।
- जलवायु परिवर्तन प्रतिबद्धताएं: भारत की ग्लासगो प्रतिबद्धताओं (पंचामृत लक्ष्य) और नेट-जीरो लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में एक कदम।
- औद्योगिक नीति और नवाचार: ऑटोमोबाइल सेक्टर को पारंपरिक ICE इंजन से हरित और निम्न-कार्बन गतिशीलता (Low-carbon mobility) की ओर ले जाना।
भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और लैंगिक समावेशी विकास
- सामान्य अध्ययन पेपर-II: सामाजिक न्याय, कमजोर वर्गों के लिए नीतियां;
- सामान्य अध्ययन पेपर-III: विज्ञान और प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास
संदर्भ एवं पृष्ठभूमि
वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य की प्राप्ति इस बात पर निर्भर करती है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से मिलने वाले उत्पादकता लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से पहुंचे। वर्तमान में AI कृषि, स्वास्थ्य सेवा और वित्तीय सेवाओं जैसी मूल्य श्रृंखलाओं को बदल रहा है। यदि इसका डिज़ाइन समावेशी नहीं हुआ, तो यह संरचनात्मक असमानताओं को और बढ़ा सकता है।
अनौपचारिक क्षेत्र और महिलाएं
- अनौपचारिक रोजगार: अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 82% कामकाजी महिलाएं अनौपचारिक रोजगार में हैं (कृषि, घरेलू उत्पादन, घरेलू सेवाएं और सूक्ष्म उद्यम)।
- कृषि में भागीदारी: आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2023-24 के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों की 76.9% महिलाएं कृषि में संलग्न हैं, जो AI पहलों के लिए एक प्राथमिक वर्ग (Constituency) बनाती हैं।
- सकारात्मक उदाहरण: 12 राज्यों में तैनात ‘Farmer.Chat’ के 2024 के अध्ययन से पता चला कि 61% महिला उपयोगकर्ताओं ने 45 दिनों के भीतर जीवन की बेहतर गुणवत्ता की सूचना दी, जिनकी सहभागिता पुरुष उपयोगकर्ताओं से दोगुनी-तीन गुनी थी।
भारत के AI शासन दिशानिर्देश (AI Governance Guidelines)
- नवंबर 2025 में जारी भारत के AI शासन दिशानिर्देशों में निष्पक्षता और समता (Fairness and Equity) सहित सात मार्गदर्शक सिद्धांत निर्धारित किए गए हैं।
- संयुक्त राष्ट्र महिला (UN Women) की चेतावनियों के अनुसार, बिना लिंग-उत्तरदायी (Gender-responsive) डिज़ाइन और परीक्षण के, AI रूढ़ियों और डिजिटल हिंसा को बढ़ावा दे सकता है।
आवश्यक शासन प्राथमिकताएं (Governance Priorities)
(क) लिंग प्रभाव आकलन (Gender Impact Assessments)
- AI प्रणालियों के लिए आनुपातिक लिंग प्रभाव आकलन अनिवार्य होना चाहिए जो आर्थिक अवसरों और कल्याणकारी पहुंच को प्रभावित करते हैं।
- लैंगिक उत्तरदायी बजट (Gender Responsive Budgeting): किसी भी प्रमुख AI निवेश के लिए यह जांचना आवश्यक है कि इससे कौन सी महिलाएं लाभान्वित होंगी और कौन सी बाधाएं (भाषा, सुरक्षा, पहुंच) दूर की जा रही हैं।
(ख) सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के रूप में AI साक्षरता
- महिलाओं के समय के प्रतिबंधों और साक्षरता स्तर के अनुरूप प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार किए जाने चाहिए।
- अभिसरण (Convergence): दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM), दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना (DDU-GKY) और स्किल इंडिया को मिशन शक्ति के ‘सखी नेटवर्क’ के साथ जोड़ा जाना चाहिए।
(ग) डिजिटल सुरक्षा (Digital Safety)
- डीपफेक, ऑनलाइन उत्पीड़न और गैर-सहमति वाली छवियों जैसी तकनीक-सुविधा प्राप्त लिंग-आधारित हिंसा महिलाओं को डिजिटल आर्थिक स्थान से दूर करती है।
- आईटी (संशोधन) नियम, 2021 और MeitY द्वारा AI-उत्पादित सिंथेटिक सामग्री की अनिवार्य लेबलिंग का प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक है।
निष्कर्ष
भारत ने इंडियाएआई मिशन, भाषिणी और AI शासन दिशानिर्देशों के माध्यम से मजबूत बुनियादी ढांचा तैयार किया है।
वर्ष 2047 तक भारत की सफलता का पैमाना केवल सकल आर्थिक संकेतक नहीं होना चाहिए, बल्कि यह होना चाहिए कि अनौपचारिक क्षेत्र की महिलाओं को AI सक्षम उपकरणों और अवसरों तक सार्थक और उत्पाद यही पहुंच मिली है या नहीं।
बैंक ऑफ बड़ौदा (BoB) डेटा लीक मामला
सामान्य अध्ययन पेपर-3 (साइबर सुरक्षा, डेटा गवर्नेंस)
मुख्य घटना (Context)
- घटना: सार्वजनिक क्षेत्र के प्रमुख ऋणदाता बैंक ऑफ बड़ौदा (BoB) को एक बड़े साइबर सुरक्षा उल्लंघन (Cyber Breach) का सामना करना पड़ा है।
- लीक डेटा: रिपोर्ट्स के अनुसार, लगभग 1 टेराबाइट (1 TB) संवेदनशील डेटा डार्क वेब पर मुफ्त में लीक किया गया है।
- लीक हुआ डेटा क्या है?: इसमें ग्राहकों के बचत/चालू खाते के रिकॉर्ड, ऋण (Loan) से जुड़े दस्तावेज, नेटबैंकिंग उपयोगकर्ताओं के विवरण, एनआरआई और कॉर्पोरेट बैंकिंग रिकॉर्ड, तथा ग्राहकों के व्यक्तिगत पहचान दस्तावेज (जैसे [Aadhaar Redacted] विवरण, पैन आदि) शामिल हैं। इसके अलावा शाखा ऑडिट रिपोर्ट, आंतरिक संचार और सतर्कता (Vigilance) रिकॉर्ड भी शामिल हैं।
उल्लंघन का कारण और तकनीकी पक्ष (Technical Details)
- प्रवेश बिंदु (Access Vector): बैंक के अनुसार, यह उल्लंघन किसी कोर बैंकिंग सिस्टम की विफलता के कारण नहीं, बल्कि एक कर्मचारी के ईमेल खाते (Employee’s Email Account) के compromise (प्रभावी रूप से हैक/अनधिकृत पहुंच) होने के कारण हुआ।
- कोर बैंकिंग सुरक्षित: बैंक ने स्पष्ट किया है कि उसका कोर बैंकिंग सॉल्यूशन (CBS) सुरक्षित है और उस तक कोई पहुंच नहीं बनाई गई है।
- डार्क वेब (Dark Web) की भूमिका: लीक हुआ डेटा डार्क वेब पर अपलोड किया गया है—जो इंटरनेट का एक ऐसा गुप्त हिस्सा है जो सामान्य सर्च इंजन द्वारा अनुक्रमित (Indexed) नहीं होता और जहां उपयोगकर्ताओं की पहचान छिपाई जाती है।
भारत की वित्तीय और साइबर सुरक्षा के लिए चिंताएं
- वित्तीय धोखाधड़ी और पहचान की चोरी (Identity Theft): ग्राहकों के व्यक्तिगत डेटा और केवाईसी दस्तावेजों के सार्वजनिक होने से साइबर अपराधी इनका उपयोग फर्जी ऋण लेने, सिम-स्वैप हमलों और खातों को हथियाने के लिए कर सकते हैं।
- एआई-संचालित फ़िशिंग (AI-driven Phishing): इतने बड़े पैमाने पर लीक डेटा का उपयोग कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के साथ मिलकर अत्यधिक सटीक और विश्वासपोषक फ़िशिंग कैंपेन चलाने के लिए किया जा सकता है।
- वित्तीय संस्थानों की कमजोरियां: यह घटना बड़े कॉर्पोरेट और वित्तीय संस्थानों में मजबूत साइबर सुरक्षा प्रोटोकॉल, आंतरिक नेटवर्क निगरानी और डिजिटल हाइजीन (Digital Hygiene) की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है।