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1 August 2026 The Hindu Notes In Hindi Pdf

1 August 2026 The Hindu Notes In Hindi Pdf में देश और दुनिया की कई महत्वपूर्ण समसामयिक घटनाओं को शामिल किया गया है। इसमें सरकारी योजनाओं जैसे प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना (पीएम-एसएसवाई), ‘समुद्र मंथन’ (राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना), संशोधित खेलो इंडिया योजना और प्रधानमंत्री-किसान (PM-KISAN) के साथ-साथ विशेषाधिकार प्रस्ताव, शिक्षा प्रणाली में सुधार, पश्चिमी घाट संरक्षण और स्पेन के स्यूटा क्षेत्र से जुड़े अवैध प्रवास जैसे समसामयिक मुद्दों का गहराई से विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

  • क्षमता लक्ष्य: 5,000 मेगावाट फ्लोटिंग सोलर फोटोवोल्टिक (FSPV) प्रोजेक्ट + 10,000 मेगावाट-घंटे (कम से कम 2 घंटे की क्षमता) ऊर्जा भंडारण प्रणाली (ESS)।
  • कार्यान्वयन अवधि:
    • परियोजना मंजूरी: वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31।
    • वित्तीय सहायता संवितरण: वित्त वर्ष 2032-33 तक।
  • क्षमता आकलन: नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोलर एनर्जी (NISE) के अनुसार देश के जलाशयों व अंतर्देशीय जल निकायों में फ्लोटिंग सोलर क्षमता लगभग 102.18 गीगावॉट है।
  • केंद्रीय वित्तीय सहायता (CFA):
    • सफल कमीशनिंग पर: ₹1 करोड़ प्रति मेगावाट।
    • व्यवहार्यता अध्ययन (बाथिमेट्री, हाइड्रोग्राफी, पर्यावरण अध्ययन आदि) हेतु: ₹50 लाख तक प्रति परियोजना।
  • वर्तमान स्थिति: देश में मौजूदा फ्लोटिंग सोलर PV क्षमता लगभग 700 मेगावाट है, जिसमें 5,000 मेगावाट की वृद्धि होगी।
  • प्रमुख लाभ व प्रभाव:
    • पर्यावरण: प्रति वर्ष लगभग 10 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी।
    • रोजगार: मूल्य श्रृंखला में लगभग 16,000 – 17,000 पूर्णकालिक समकक्ष रोजगार अवसर।
    • अन्य लाभ: दुर्लभ भूमि संसाधनों पर दबाव कम होना, ग्रिड की विश्वसनीयता बढ़ना, और घरेलू विनिर्माण (सोलर सेल, मॉड्यूल, फ्लोटेशन सिस्टम आदि) को प्रोत्साहन।
  • मंत्रालय: पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की केन्द्रीय क्षेत्र की योजना
  • कुल परिव्यय: ₹84,084 करोड़।
  • कार्यान्वयन अवधि: वित्त वर्ष 2030-31 तक।
  • पृष्ठभूमि: इस योजना की परिकल्पना प्रधानमंत्री द्वारा 2025 के स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से आधुनिक ‘समुद्र मंथन’ के रूप में की गई थी।
  • योजना के प्रमुख घटक/दायरे:
    • उच्च गुणवत्ता वाले भूकंपीय (सिस्मिक) डेटा का बड़े पैमाने पर संग्रहण, विश्लेषण एवं व्याख्या।
    • गहरे पानी व बहुत गहरे पानी में तेजी से अन्वेषण ड्रिलिंग तथा नए/कम खोजे गए बेसिन में वैज्ञानिक ड्रिलिंग।
    • अपतटीय उत्पादन व निकासी हेतु साझा बुनियादी ढांचे का विकास।
    • एकीकृत तेल एवं गैस मैन्यूफैक्चरिंग तथा सेवा परिक्षेत्र की स्थापना।
    • डिजिटल कार्यक्रम प्रबंधन, क्षमता विकास और तकनीकी एकीकरण।
  • अपेक्षित परिणाम व प्रभाव:
    • भंडार क्षमता: 600 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट (MMTOE) से अधिक का भंडार जमा होने की प्रक्रिया में तेजी।
    • ऊर्जा सुरक्षा: घरेलू तेल और गैस उत्पादन में वृद्धि के साथ देश की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती।
    • आर्थिक व अन्य लाभ: बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन, ‘मेक इन इंडिया’ व ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा, और मूल्य श्रृंखला में व्यापक निवेश।
  • पूर्ववर्ती सुधार: पिछले दशक में अपस्ट्रीम सेक्टर में सुधार (जैसे अन्वेषण हेतु लगभग पूरे अपतटीय क्षेत्र को खोलना, अनुबंध ढांचे का आधुनिकीकरण और राष्ट्रीय डेटा रिपॉजिटरी को सुदृढ़ करना) के क्रम में यह रणनीतिक सार्वजनिक निवेश का अगला बड़ा कदम है।
  • अवधि: वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31।
  • संयुक्त परिव्यय: ₹36,441 करोड़ (पिछली खेलो इंडिया योजना की तुलना में लगभग आठ गुना अधिक)।
  • मुख्य उद्देश्य व लक्ष्य:
    • स्कूली व ग्रामीण स्तर से लेकर ओलंपिक पोडियम तक प्रतिभाशाली युवाओं के लिए सहज मार्ग बनाना।
    • 2030 राष्ट्रमंडल खेलों, ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों की मेजबानी की दावेदारी सहित भारत की दीर्घकालिक खेल महत्वाकांक्षाओं को समर्थन देना (खेल भारत नीति 2025 और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप)।
  • एथलीट विकास व विस्तार:
    • इमर्जिंग खेलो इंडिया एथलीट (E-KIA): इस नई श्रेणी के सृजन से एथलीट पूल का लगभग दस गुना विस्तार होगा।
    • स्कूली खेल पहल: ‘खेलो इंडिया फीडर स्कूल (KIFS)’ और ‘खेलो इंडिया उत्कृष्ट विद्यालय (KIUV)’ की शुरुआत।
  • प्रमुख संस्थागत व ढांचागत पहल:
    • राष्ट्रीय कोच प्रत्यायन बोर्ड (NCAB): कोचिंग योग्यताओं को मानकीकृत करने और क्षमता सुदृढ़ करने हेतु।
    • एकीकृत डिजिटल स्पोर्ट्स प्लेटफ़ॉर्म: एथलीट डेटाबेस, बुनियादी ढांचे, वित्तपोषण और फिट इंडिया को एकीकृत करने हेतु।
    • प्रतिभा पहचान ढांचा: प्रतिभा पहचान विकास समितियां, क्षेत्रीय समितियां, स्काउट्स, और उच्च प्रदर्शन निदेशकों/प्रबंधकों की नियुक्ति।
  • फिट इंडिया मूवमेंट का विस्तार: सक्रिय जीवनशैली, महिलाओं की भागीदारी, दूरदराज के क्षेत्रों में पहुंच और मादक द्रव्यों के सेवन के खिलाफ खेल-आधारित पहल।
  • राष्ट्रीय खेल महासंघों (ANSFs) के लिए सहायता: 2026-31 की अवधि के लिए कोचों, खेल विज्ञान, आधुनिक उपकरणों, अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन, विदेशी विशेषज्ञों और ग्लोबल साउथ के साथ खेल सहयोग के वित्तपोषण हेतु संशोधित और अधिक कारगर सहायता योजना।
  • अवधि व वित्तीय आवंटन: 2026-27 से 2030-31 तक जारी रखने हेतु कुल 3.15 लाख करोड़ रुपये का वित्तीय परिव्यय।
  • योजना का परिचय व स्वरूप:
    • शुरुआत: फरवरी 2019।
    • लाभ: पात्र भूमिधारक किसान परिवारों को प्रति वर्ष 6,000 रुपये की वित्तीय सहायता (तीन समान किस्तों में सीधे बैंक खातों में – प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण/DBT)।
  • प्रमुख उपलब्धियां व आंकड़े:
    • अब तक 23 किस्तों में किसानों के खातों में सीधे 4.47 लाख करोड़ रुपये से अधिक हस्तांतरित।
    • 23वीं किस्त के तहत: 9.49 करोड़ से अधिक किसानों को लाभ, 18,984 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जारी।
    • कोविड-19 महामारी के दौरान: 1.71 लाख करोड़ रुपये से अधिक का वितरण।
    • महिला सशक्तिकरण: महिला किसानों को 1.06 लाख करोड़ रुपये से अधिक प्राप्त (लाभार्थियों में लगभग प्रत्येक चार में से एक महिला)।
  • स्वतंत्र मूल्यांकन (नीति आयोग का DMEO मूल्यांकन):
    • 92% से अधिक लाभार्थियों ने सहायता राशि का उपयोग कृषि गतिविधियों और निवेश के लिए किया।
    • लगभग 85% ने कृषि आय में सुधार और अनौपचारिक ऋण पर निर्भरता घटने की पुष्टि की।
  • कृषि क्षेत्र की वृद्धि (2020-21 से 2025-26):
    • कृषि क्षेत्र में वृद्धि: लगभग 9.65%
    • उत्पादकता में वृद्धि: लगभग 10.53%
    • कुल खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि: लगभग 21.18%
  • मुख्य विशेषताएं: आधार प्रमाणीकरण, डिजिटल सत्यापन और मजबूत DBT प्रणाली के माध्यम से पारदर्शिता व दक्षता सुनिश्चित करना।
  • घटना व प्रस्ताव: कांग्रेस महासचिव (संगठन) के.सी. वेणुगोपाल द्वारा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव (Privilege Motion) का नोटिस प्रस्तुत किया गया।
  • आरोप: मंत्री पर लोकसभा में ‘जानबूझकर गलत जानकारी देने’ और ‘सदन को गुमराह करने’ का आरोप।
  • संदर्भित विषय: 29 जुलाई 2026 को ‘लोक परीक्षाओं (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ पर बहस के दौरान मंत्री का यह बयान कि “छात्र विरोध प्रदर्शनों के दौरान कोई गोलीबारी (firing) नहीं हुई, केवल आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया।”
  • मांग: सदन को गुमराह करना संसद की अवमानना और विशेषाधिकार का हनन है, अतः अध्यक्ष से इस मामले को जांच व आवश्यक कार्रवाई हेतु विशेषाधिकार समिति (Committee of Privileges) को भेजने का आग्रह किया गया।
  • परिभाषा: यह संसद (लोकसभा या राज्यसभा) के किसी सदस्य द्वारा किसी मंत्री या अन्य सदस्य के खिलाफ लाया जाने वाला एक विशेष प्रस्ताव है, जब यह आरोप लगाया जाता है कि उसने सदन या उसके किसी सदस्य के विशेषाधिकारों का हनन (Breach of Privilege) किया है या सदन को गलत/भ्रामक जानकारी दी है।
  • संसदीय विशेषाधिकार (Parliamentary Privileges):
    • ये संविधान के अनुच्छेद 105 (संसद और उसके सदस्यों के लिए) और अनुच्छेद 194 (राज्य विधानमंडलों के लिए) के तहत प्रदत्त विशेष अधिकार हैं।
    • इनका मुख्य उद्देश्य सांसदों को अपने कर्तव्यों का निर्वहन बिना किसी बाधा या भय के करने की स्वतंत्रता देना है।
  • सदन की अवमानना (Contempt of the House): जब कोई व्यक्ति या सदस्य सदन के अधिकारों, विशेषाधिकारों या सम्मान का उल्लंघन करता है, तो उसे सदन की अवमानना माना जाता है, जो विशेषाधिकार हनन का ही एक रूप है।
  • प्रस्ताव लाने की प्रक्रिया:
    • नोटिस: सदस्य को संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी (लोकसभा में अध्यक्ष / राज्यसभा में सभापति) को लिखित में नोटिस देना होता है।
    • सहमति: प्रस्ताव पेश करने से पहले पीठासीन अधिकारी की सहमति अनिवार्य है।
    • पीठासीन अधिकारी की भूमिका:
      • अनुमति मिलने के बाद, अध्यक्ष/सभापति या तो स्वयं मामले पर निर्णय ले सकते हैं या उसे जांच के लिए ‘विशेषाधिकार समिति’ (Committee of Privileges) के पास भेज सकते हैं।
  • विशेषाधिकार समिति (Committee of Privileges):
    • संरचना: लोकसभा की समिति में आमतौर पर 15 सदस्य होते हैं, जबकि राज्यसभा की समिति में 10 सदस्य होते हैं।
    • कार्य: यह समिति मामले की जांच करती है, साक्ष्य जुटाती है और सदन को अपनी संस्तुति के साथ रिपोर्ट सौंपती है, जिसके आधार पर सदन अंतिम कार्रवाई तय करता है।

वर्तमान शिक्षा प्रणाली की मुख्य चुनौतियाँ (Challenges)

  • एकल-अवसर (Single-shot) और उच्च दबाव वाली परीक्षाएँ: अंकों, रैंक और एक ही परीक्षा को बुद्धिमत्ता और भविष्य का एकमात्र पैमाना माना जाता है।
  • छात्र आत्महत्याओं और तनाव में वृद्धि: कोचिंग माफिया का दबाव, ऋण का बोझ और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव।
  • कोचिंग उद्योग का वर्चस्व: परीक्षाएँ वास्तविक योग्यता का परीक्षण करने के बजाय केवल कोचिंग संस्थानों द्वारा सिखाई गई तकनीकों और पैटर्न को परखती हैं।
  • केंद्रीकृत प्रणाली की विफलता: ‘वन-साइज-फिट्स-ऑल’ मॉडल (जैसे NTA) भारत जैसी विविधतापूर्ण और बहुभाषी सामाजिक व्यवस्था के अनुकूल नहीं है।
  • सामाजिक और जनसांख्यिकीय असमानता: भाषा, भूगोल, डिजिटल पहुँच और स्कूली पृष्ठभूमि के आधार पर छात्रों को नुकसान उठाना पड़ता है।

बहु-आयामी मूल्यांकन प्रणाली (Multi-dimensional Assessment)

प्रवेश परीक्षाओं को न्यायसंगत और तनावमुक्त बनाने के लिए निम्नलिखित उपाय सुझाए गए हैं:

  • व्यापक मूल्यांकन: इसमें केवल परीक्षा के अंक नहीं, बल्कि स्कूल का प्रदर्शन, अनुशासन-विशिष्ट योग्यता, और विश्लेषणात्मक लेखन (Analytical Writing) शामिल होना चाहिए।
  • विविध मापदंड: संरचित साक्षात्कार, व्यावहारिक/परिदृश्य-आधारित टास्क (Scenario-based tasks)।
  • पोर्टफोलियो आधारित चयन: सत्यापित पोर्टफोलियो, प्रोजेक्ट, इंटर्नशिप, सामुदायिक कार्य और सह-पाठ्यचर्या (Co-curricular) की उपलब्धियों को महत्व देना।

नीतिगत और संरचनात्मक सुधार (Policy & Structural Reforms)

  • विकेंद्रीकृत प्रणाली (Decentralized System): विश्वविद्यालयों या संस्थानों के समूहों को यूजीसी (UGC) के व्यापक मानदंडों के तहत अपनी स्वयं की मूल्यांकन प्रक्रियाएँ डिजाइन करने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए।
  • परीक्षा सुरक्षा और पवित्रता:
    • एन्क्रिप्टेड डिजिटल पेपर ट्रांसमिशन।
    • एल्गोरिथम रैंडमराइजेशन के साथ बहु-स्तरीय प्रश्न बैंक (Question Banks)।
    • स्वतंत्र ऑडिट, बायोमेट्रिक सत्यापन और कड़े दंडात्मक प्रावधान।
  • उद्योग और अभिभावकों की भूमिका:
    • स्कूलों स्तर पर करियर मेले, इंटर्नशिप और मेंटरशिप के माध्यम से उद्योगों का जुड़ाव बढ़ाना।
    • स्थानीय भाषाओं में संरचित परामर्श (Counselling) के माध्यम से अभिभावकों और छात्रों को पारंपरिक करियर के अलावा अन्य विकल्पों के प्रति जागरूक करना।

संवैधानिक और राज्य की जिम्मेदारी (Constitutional Role)

  • शिक्षा एक सार्वजनिक भलाई (Public Good): संविधान के अनुसार शिक्षा कोई व्यावसायिक रेस नहीं है; राज्य का यह कर्तव्य है कि वह समानता, गरिमा और शिक्षा के अधिकार की रक्षा करे।
  • कोचिंग संस्कृति का नियमन (Regulation): फीस, विज्ञापन, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, हॉस्टल के मानकों और धोखाधड़ी से निपटने के लिए संसद और राज्य विधानसभाओं द्वारा कड़े कानून बनाए जाने चाहिए।

Way Forward

  • रैंक-आधारित निष्कासन से क्षमता-आधारित मान्यता की ओर: शिक्षा प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जो केवल उच्च दबाव में सबसे अधिक अंक लाने वाले को नहीं, बल्कि चुने हुए क्षेत्र में बढ़ने की क्षमता, नैतिक गंभीरता और लचीलेपन (Resilience) को पहचाने।
  • मानवीय दृष्टिकोण: भय, कर्ज और मनोवैज्ञानिक संकट को बढ़ावा देने वाली व्यवस्था को समाप्त करके एक holistic (समग्र) और सहानुभूतिपूर्ण मूल्यांकन प्रणाली अपनानी होगी, जिससे युवा आत्मविश्वास के साथ अपने करियर का चुनाव कर सकें।

वर्तमान स्वास्थ्य परिदृश्य और चुनौतियाँ (Challenges)

  • कुपोषण की दोहरी चुनौती: भारत में जहाँ एक ओर स्टंटिंग और पारंपरिक कुपोषण अभी भी चिंता का विषय हैं, वहीं दूसरी ओर वयस्कों में अत्यधिक वजन (Overweight), मोटापा (Obesity) और आहार-संबंधी चयापचय (Metabolic) स्थितियों में तेजी से वृद्धि हुई है।
  • बच्चों में बढ़ता मोटापा: ICMR-NIN की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 1.7 करोड़ से अधिक बच्चे और किशोर मोटापे से ग्रस्त हैं, और वर्ष 2030 तक यह संख्या 2.7 करोड़ को पार कर सकती है।
  • शिशु आहार में चीनी: शिशु खाद्य पदार्थों (Baby foods) में अत्यधिक चीनी की मात्रा का उपयोग शुरुआती उम्र से ही स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की नींव रख रहा है।

नीतिगत सुझाव और प्रमुख सिफारिशें (Key Recommendations)

हाल ही में दो प्रमुख विकासक्रम सामने आए हैं, जो उपभोक्ताओं को सही विकल्प चुनने के लिए प्रेरित करते हैं:

  • संसदीय स्थायी समिति के सुझाव (Parliamentary Standing Committee):
    • पैक किए गए खाद्य उत्पादों पर अनिवार्य फ्रंट-ऑफ-पैक न्यूट्रिशन लेबलिंग (Front-of-Pack Labelling) लागू करना, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि उत्पाद में चीनी, वसा या नमक की मात्रा अधिक (HFSS) है या नहीं।
    • शिशु आहार में भी चीनी की मात्रा को शामिल करने और स्पष्ट रूप से दर्शाने की सिफारिश।
  • राष्ट्रीय कंसोर्टियम (‘Let’s Fix Our Food’ – ICMR-NIN):
    • उच्च वसा, नमक और चीनी (HFSS) वाले खाद्य पदार्थों पर स्वास्थ्य कर (Health Tax) लगाने की सिफारिश।
    • अस्वस्थ खाद्य पदार्थों के विज्ञापनों पर कड़े नियम लागू करना।
    • स्कूलों में स्वस्थ खाद्य वातावरण सुनिश्चित करना।

वैश्विक सर्वोत्तम अभ्यास (Global Best Practices)

  • स्वास्थ्य कर (Health Tax): विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 2017 से कम से कम 133 देशों ने स्वास्थ्य कर बढ़ाया या नया कर लगाया है।
  • कोलंबिया का ‘जंक फूड कानून’ (2023): पैक किए गए खाद्य पदार्थों की खपत से निपटने के लिए अतिरिक्त कर 10% से शुरू होकर क्रमिक रूप से 20% तक बढ़ाया गया।
  • अन्य देश: नॉर्वे, हंगरी, डेनमार्क, बरमूडा और डोमिनिका आदि ने प्रसंस्कृत चीनी और चीनी-युक्त खाद्य पदार्थों पर विशेष कर लागू किए हैं।

सरकार के लिए आवश्यक कदम (Way Forward)

  • व्यापक रणनीति (Comprehensive Strategy): सरकार के नेतृत्व में मोटापे और आहार-संबंधी गैर-संचारी रोगों (NCDs) के बढ़ते बोझ से निपटने के लिए एक बहु-आयामी रणनीति की आवश्यकता है।
  • उपभोक्ता जागरूकता: पैकेजिंग पर स्पष्ट लेबलिंग के माध्यम से उपभोक्ताओं को शिक्षित करना ताकि वे जागरूक और स्वस्थ खाद्य विकल्प चुन सकें।
  • कड़े विज्ञापन मानक: बच्चों को लक्षित करने वाले जंक फूड के विज्ञापनों पर सख्त नियंत्रण।

पश्चिमी घाट और इसका महत्व

  • वैश्विक मान्यता: पश्चिमी घाट भारत के छह तटीय राज्यों में फैला हुआ है और अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है।
  • यूनेस्को (UNESCO) विश्व धरोहर स्थल: 2012 में घोषित राष्ट्रीय उद्यानों, आरक्षित वनों और वन्यजीव अभ्यारण्यों सहित 39 जैव विविधता हॉटस्पॉट क्षेत्र इसमें शामिल हैं।

पश्चिमी घाट संरक्षण से जुड़ी प्रमुख समितियाँ

  • गाडगिल समिति (WGEEP, 2010):
    • पारिस्थितिकीविद् माधव गाडगिल की अध्यक्षता में गठित।
    • पश्चिमी घाट के 44 जिलों के 142 तालुकों को पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने और इसे तीन क्षेत्रों (ESZ-1, 2, 3) में बांटने की सिफारिश की।
  • कस्तूरीरंगन उच्च स्तरीय कार्य समूह (2012):
    • गाडगिल रिपोर्ट के कड़े विरोध के बाद केंद्र सरकार द्वारा गठित।
    • मानवीय और आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिबंधों को केवल पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील प्राकृतिक परिदृश्यों तक सीमित किया, जिससे ESA का दायरा घटाकर पश्चिमी घाट का केवल 37% कर दिया गया।
  • संजय कुमार विशेषज्ञ पैनल (2022):
    • संबंधित राज्यों की चिंताओं की समीक्षा के लिए गठित। इसके बाद से राज्यों (जैसे गुजरात, गोवा आदि) के साथ सहमति और अनंतिम रूपरेखा पर कार्य जारी है।

मुख्य चुनौतियाँ और विरोध के कारण

  • राज्यों की आपत्तियाँ (विशेषकर कर्नाटक):
    • कर्नाटक (जहाँ 10 जिलों में ESA का प्रस्ताव है) सहित अन्य राज्यों ने कृषि, बागवानी (प्लांटेशन), खनन और बुनियादी ढांचे के विकास पर पड़ने वाले प्रभाव का हवाला देते हुए इसका विरोध किया है।
  • स्थानीय समुदायों की चिंताएँ:
    • विस्थापन और आजीविका का संकट: बफर जोन के नियमों और वनों पर निर्भरता (लघु वनोपज संग्रहण और कृषि) पर प्रतिबंध।
    • वन अधिकार (Forest Rights): गैर-आदिवासियों के लंबे समय से निवास के बावजूद वन अधिकार दावों की अस्वीकृति।
    • तकनीकी खामियाँ: उपग्रह चित्रों के उपयोग पर आपत्ति, क्योंकि इसके जरिए अरेका नट (सुपारी), छाया में उगने वाली कॉफी, रबर और नारियल को प्राकृतिक वनों से अलग नहीं पहचाना जा सकता।
    • भौतिक सत्यापन का अभाव: जमीनी स्तर पर समितियों द्वारा गांवों का दौरा न करना।

संरक्षण और नीतिगत आवश्यकता  

  • राजनीतिक इच्छाशक्ति और पारिस्थितिक संतुलन: पर्यावरण संरक्षण में अत्यधिक देरी से पारिस्थितिकी को अपूरणीय क्षति हो सकती है, क्योंकि पारिस्थितिक तंत्र प्रशासनिक सीमाओं से बंधे नहीं होते।
  • स्वदेशी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी: जंगलों के भीतर रहने वाले स्वदेशी समुदायों को ESA में शामिल किया जाना चाहिए, क्योंकि वे प्रकृति के साथ पारंपरिक रूप से टिकाऊ संबंध बनाए रखते हैं।
  • सहानुभूतिपूर्ण और व्यावहारिक दृष्टिकोण: उपग्रह डेटा के साथ-साथ जमीनी हकीकत का सत्यापन किया जाना चाहिए। स्थानीय लोगों की आजीविका की रक्षा करते हुए पर्यावरण के अनुकूल नीतियां (जैसे पत्थर की खदानों और अनियोजित पर्यटन का नियमन) लागू की जानी चाहिए।

घटना  

  • स्थान: स्पेन का उत्तरी अफ्रीका स्थित छोटा स्वायत्त क्षेत्र – स्यूटा (Ceuta) (जो मोरक्को की सीमा से लगा हुआ है)।
  • संकट का पैमाना: कुछ ही घंटों में लगभग 50,000 से 60,000 प्रवासियों द्वारा मोरक्को से स्यूटा में प्रवेश, जो इस शहर की कुल आबादी का लगभग 70% है।
  • मानवीय क्षति: इस खतरनाक यात्रा के दौरान कम से कम 57 प्रवासियों की मौत।
  • स्वैच्छिक वापसी: स्पेनिश सरकार के अनुसार, अराजकता और मानवीय संकट के बाद लगभग आधे प्रवासियों ने स्वेच्छा से वापस लौटना शुरू कर दिया।

वैश्वीकृत प्रवासन संकट के मुख्य कारण

  • आर्थिक असमानता: अफ्रीका और यूरोप के बीच बढ़ते आर्थिक अंतर और बेहतर जीवन की तलाश।
  • संघर्ष और असुरक्षा: उत्तरी अफ्रीकी और मध्य पूर्वी देशों में राजनीतिक अस्थिरता।
  • दलाल और तस्कर नेटवर्क: सीमा सुरक्षा तंत्र की कमियों का फायदा उठाने वाले अवैध नेटवर्क।

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