New NCERT Notes Class 6 Social Science: भूगोल (Geography) पाठ्यक्रम में पृथ्वी की मौलिक संरचना के अंतर्गत Oceans and Continents को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस लेख में, हम पूरी तरह प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर पृथ्वी पर जल और स्थल के वितरण, महाद्वीपों की विभिन्न भौगोलिक गणनाओं, महत्वपूर्ण द्वीप समूहों, अंटार्कटिका में भारत के वैज्ञानिक अभियानों और वर्तमान में समुद्री पर्यावरण के समक्ष खड़े प्रदूषण जैसे गंभीर संकटों का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।
सामान्य परिचय: नीला ग्रह (The Blue Planet)
अंतरिक्ष या चंद्रमा से देखने पर पृथ्वी का रंग मुख्य रूप से नीला दिखाई देता है। इस विशिष्ट रंग के कारण ही प्रारंभिक अंतरिक्ष यात्रियों ने इसे ‘नीला ग्रह’ नाम दिया था।
- जल का विस्तार: पृथ्वी की सतह का लगभग तीन-चौथाई (3/4) भाग जल से ढका हुआ है। पृथ्वी के इन विशालतम जल निकायों को महासागर (Oceans) कहा जाता है।
- स्थल का विस्तार: पृथ्वी की सतह का एक-चौथाई (1/4) से थोड़ा अधिक भाग भूमि (स्थल) से घिरा है। भूमि के इस बड़े हिस्से को ‘भूभाग’ (Landmass) और इसके निरंतर विस्तृत फैलाव को महाद्वीप (Continent) कहा जाता है।
- महत्व: महासागर और महाद्वीप संयुक्त रूप से पृथ्वी की जलवायु को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनका प्रभाव पौधों, पशुओं, मानव इतिहास, संस्कृति तथा हमारे दैनिक जीवन पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
विशेष तथ्य (Don’t Miss Out): भारतीय नौसेना का आदर्श वाक्य भारतीय नौसेना के प्रतीक चिह्न (Emblem) में अंकित आदर्श वाक्य है— “शं नो वरुणः”। इसका अर्थ है, “हे वरुण देव, हमारे लिए शुभ और मंगलकारी हों।” वैदिक संस्कृति में ‘वरुण’ को महासागर, आकाश और समग्र जल का देवता माना गया है।
जल के प्रकार और उनका वितरण
पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्धों (Northern and Southern Hemispheres) के बीच महासागरों और महाद्वीप का वितरण समान रूप से नहीं है। वैश्विक जल संसाधनों को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है:
- खारा जल (Salty Water): पृथ्वी पर उपलब्ध अधिकांश जल महासागरों और उनके छोटे विस्तारित रूपों— जैसे ‘समुद्र’ (Sea), ‘खाड़ी’ (Bay/Gulf) आदि में संचित है। यह समुद्री जल खारा होने के कारण मनुष्यों और अधिकांश स्थलीय जीवों के उपभोग के लिए अनुपयुक्त है।
- मीठा जल (Freshwater): पृथ्वी पर मीठे पानी का अनुपात अत्यंत कम है। यह मुख्य रूप से हिमनदों (Glaciers), नदियों, झीलों, वायुमंडल और भूमि के नीचे ‘भूजल’ (Groundwater) के रूप में पाया जाता है।
विश्व के महासागर और समुद्री पारिस्थितिकी (Oceans & Marine Ecology)
मानचित्र पर भौगोलिक रूप से पाँच महासागरों को चिह्नित किया गया है, जो प्राकृतिक रूप से एक-दूसरे से पूरी तरह अलग न होकर आपस में जुड़े हुए हैं। इनके बीच की सीमाएं केवल प्रशासनिक या व्यावहारिक परंपराओं पर आधारित हैं।

आकार के अनुसार महासागरों का क्रम (घटते क्रम में):
- प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) – विश्व का सबसे बड़ा महासागर।
- अटलांटिक महासागर (Atlantic Ocean)
- हिंद महासागर (Indian Ocean) – विश्व का तीसरा सबसे बड़ा महासागर।
- दक्षिणी या अंटार्कटिक महासागर (Southern or Antarctic Ocean)
- आर्कटिक महासागर (Arctic Ocean) – विश्व का सबसे छोटा महासागर।
समुद्री जैव विविधता:
महासागरों का जल निरंतर एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में प्रवाहित होता रहता है, जिससे एक समृद्ध समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण होता है।
- समुद्री वनस्पति (Marine Flora): इसमें सूक्ष्म पौधे जैसे शैवाल (Algae) और विभिन्न प्रकार की समुद्री घास (Seaweeds) शामिल हैं।
- समुद्री जीव (Marine Fauna): इसमें रंग-बिरंगी मछलियाँ, डॉल्फ़िन, व्हेल और गहरे समुद्र में रहने वाले अनगिनत रहस्यमय जीव पाए जाते हैं।
हिंद महासागर की भौगोलिक स्थिति और भारत:
- हिंद महासागर की मुख्य सीमाएं उत्तर में एशिया, पश्चिम में अफ्रीका, पूर्व में ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण में दक्षिणी महासागर से निर्धारित होती हैं।
- भारत के दोनों ओर हिंद महासागर के दो प्रमुख भाग स्थित हैं— पश्चिम में अरब सागर (Arabian Sea) और पूर्व में बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal)।
महासागर और प्राकृतिक आपदाएं (Oceans and Disasters)
महासागर जहाँ एक ओर पृथ्वी पर जीवन का आधार हैं, वहीं दूसरी ओर ये कई विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं के केंद्र भी हैं।
मानसून और चक्रवात:
अंतरिक्ष से दिखने वाले बादलों के बड़े समूह महाद्वीपों पर वर्षा लाते हैं। भारत में हर गर्मी में आने वाली मानसूनी बारिश की उत्पत्ति महासागरों से ही होती है, जिसके बिना कृषि और जीवन चक्र का चलना असंभव है। इसके विपरीत, महासागर तीव्र हवाओं और अत्यधिक वर्षा वाले हिंसक चक्रवातों (Cyclones) को भी जन्म देते हैं, जो तटीय क्षेत्रों में भारी तबाही मचाते हैं।
सुनामी (Tsunami):
यह एक विशाल और अत्यंत शक्तिशाली समुद्री लहर होती है, जो सामान्यतः महासागर की तलहटी में आने वाले शक्तिशाली भूकंप या ज्वालामुखी विस्फोट के कारण उत्पन्न होती है। ये लहरें हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर तटीय क्षेत्रों को जलमग्न कर देती हैं।
- 26 दिसंबर 2004 की सुनामी: इंडोनेशिया में आए भूकंप के कारण हिंद महासागर में एक अत्यंत विनाशकारी सुनामी उत्पन्न हुई थी। इसने भारत सहित हिंद महासागर के 13 देशों को प्रभावित किया, जिसमें 2 लाख से अधिक लोगों की जान गई थी। भारत में इसका सबसे गंभीर प्रभाव अंडमान और निकोबहार द्वीप समूह, तमिलनाडु और केरल के तटीय क्षेत्रों पर पड़ा था।
आपदा प्रबंधन और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Disaster Management)
जान-माल के नुकसान को कम करने के लिए आपदाओं से पहले और उनके बाद किए जाने वाले उपायों को आपदा प्रबंधन (Disaster Management) के तहत संभाला जाता है।
- प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning System): सुनामी जैसी विनाशकारी आपदाओं की तटीय क्षेत्रों से टकराने से पहले पहचान की जा सकती है। इसके लिए कई देश आपस में सहयोग करते हैं। वर्तमान में क्रियाशील ‘हिंद महासागर सुनामी चेतावनी प्रणाली’ (Indian Ocean Tsunami Warning System) में भारत सहित कई देश अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
- राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA): भारत में सभी प्रकार की प्राकृतिक और मानव-निर्मित आपदाओं से निपटने तथा सुरक्षात्मक नीतियां बनाने के लिए सर्वोच्च संस्था के रूप में ‘राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण’ कार्यरत है।
महाद्वीप: गणना के विभिन्न दृष्टिकोण (Continents and Their Counts)
ग्लोब पर महाद्वीपों की संख्या का निर्धारण इस बात पर निर्भर करता है कि हम भूभागों (Landmasses) को किस प्रकार देखते हैं। भौगोलिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोणों के कारण महाद्वीपों की संख्या 4 से लेकर 7 तक मानी जा सकती है।
- एशिया और यूरोप (Eurasia): मानचित्र पर ये दोनों एक ही निरंतर भूभाग दिखाई देते हैं, इसलिए भूवैज्ञानिक (Geologists) इन्हें संयुक्त रूप से ‘यूरेशिया’ (Eurasia) कहते हैं। हालांकि, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विकास पूरी तरह भिन्न होने के कारण इन्हें व्यावहारिक रूप से दो अलग महाद्वीप माना जाता है।
- उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका: इन्हें सामान्यतः दो अलग महाद्वीप माना जाता है, लेकिन एक एकल भूभाग के रूप में देखने पर इन्हें एक ‘अमेरिका’ महाद्वीप भी कहा जा सकता है।
- अफ्रीका और यूरेशिया: इन्हें आम तौर पर दो अलग महाद्वीप माना जाता है, परंतु कुछ वर्गीकरणों में इन्हें मिलाकर एक गिना जाता है।
महाद्वीपों की गणना की तालिका (वर्णानुक्रम में):
| महाद्वीपों की संख्या | महाद्वीपों के नाम |
| चार महाद्वीप | अंटार्कटिका, अफ्रीका-यूरेशिया, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया |
| पाँच महाद्वीप | अंटार्कटिका, अफ्रीका, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, यूरेशिया |
| छह महाद्वीप | अंटार्कटिका, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, यूरेशिया |
| सात महाद्वीप | अंटार्कटिका, अफ़्रीका, एशिया, ऑस्ट्रेलिया, उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, यूरोप |
मुख्य तथ्य: व्यावहारिक और सामान्य उपयोग में सात महाद्वीपों वाली प्रणाली को ही वैश्विक स्तर पर सबसे व्यापक रूप से अपनाया और स्वीकार किया गया है।
द्वीप (Islands)
महाद्वीपों के अतिरिक्त पृथ्वी पर भूमि के ऐसे छोटे हिस्से भी मौजूद हैं जो चारों ओर से पूरी तरह जल से घिरे हुए हैं। इन्हें द्वीप (Islands) कहा जाता है। चूंकि महाद्वीप आकार में बहुत बड़े होते हैं, इसलिए चारों तरफ पानी से घिरे होने के बावजूद उन्हें द्वीप नहीं माना जाता है।
- विश्व का सबसे बड़ा द्वीप: ग्रीनलैंड (Greenland) विश्व का सबसे बड़ा द्वीप है। इसका विशाल आकार भारत के १० सबसे बड़े राज्यों के कुल क्षेत्रफल को मिलाकर बनने वाले क्षेत्र के बराबर है।
- भारतीय द्वीप समूह: भारत के पास 1300 से अधिक छोटे-छोटे द्वीप हैं। इनमें दो मुख्य द्वीप समूह शामिल हैं:
- अंडमान और निकोबार द्वीप समूह – बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) में स्थित।
- लक्षद्वीप द्वीप समूह – अरब सागर (Arabian Sea) में स्थित।
अंटार्कटिका और भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधान (Indian Antarctica Programme)
अंटार्कटिका एक अत्यंत ठंडा महाद्वीप है जो मुख्य रूप से बर्फ की मोटी चादर से ढका हुआ है। यहाँ का पर्यावरण और जलवायु बेहद विषम है।
- भारतीय अंटार्कटिक कार्यक्रम: भारत वर्ष 1981 से इस सुदूर महाद्वीप पर वैज्ञानिक अन्वेषण और अनुसंधान कर रहा है।
- अनुसंधान स्टेशन: भारत ने वर्ष 1983 में यहाँ अपना पहला वैज्ञानिक बेस स्टेशन स्थापित किया था, जिसका नाम ‘दक्षिण गंगोत्री’ (Dakshin Gangotri) रखा गया था (इसके बाद दो और बेस स्टेशन स्थापित किए गए)।
- अनुसंधान का क्षेत्र: अब तक भारत के लगभग 40 वैज्ञानिक दल इस दूरस्थ क्षेत्र में जलवायु और पर्यावरण के क्रमिक विकास (Evolution) पर शोध कर चुके हैं। इस वैज्ञानिक बस्ती में रहने वाले शोधकर्ताओं के लिए एक पुस्तकालय और एक डाकघर (Post Office) की सुविधा भी उपलब्ध है।
महासागर और जीवन का अंतर्संबंध (Oceans and Life)
महासागर पृथ्वी के पर्यावरण का एक अनिवार्य हिस्सा हैं जो अदृश्य रूप से मानव जीवन के लगभग सभी पहलुओं को नियमित और प्रभावित करते हैं।
- वैश्विक जल चक्र (Water Cycle): महासागर ही महाद्वीपों पर वर्षा भेजने का मुख्य स्रोत हैं। यदि महासागर न हों, तो पृथ्वी पर कोई वर्षा नहीं होगी और संपूर्ण ग्रह एक मरुस्थल (Desert) में बदल जाएगा।
- धरती के फेफड़े (Planet’s Lungs): विश्व की आधे से अधिक ऑक्सीजन (>50%) का उत्पादन महासागरों में पाई जाने वाली वनस्पतियों (Flora) द्वारा किया जाता है। इसी कारण महासागरों को ‘ग्रह का फेफड़ा’ कहा जाता है।
- मानव सभ्यता पर प्रभाव: प्राचीन काल से ही मनुष्यों ने प्रवास (Migration), व्यापार, सैन्य अभियानों और भोजन (मछली पकड़ने) के स्रोत के रूप में महासागरों का उपयोग किया है। तटीय क्षेत्रों की संस्कृतियों में समुद्र, समुद्री देवताओं और समुद्री खजानों से जुड़ी अनगिनत लोककथाएं और पौराणिक कहानियां रची गई हैं।
विशेष तथ्य (Don’t Miss Out): विश्व महासागर दिवस
संयुक्त राष्ट्र (United Nations) द्वारा प्रत्येक वर्ष 8 जून को ‘विश्व महासागर दिवस’ के रूप में घोषित किया गया है। इसका उद्देश्य हमारे दैनिक जीवन में महासागरों की प्रमुख भूमिका, जैवमंडल (Biosphere) में उनके महत्व और दवा व भोजन के स्रोत के रूप में उनकी उपयोगिता के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाना है।
महासागरीय प्रदूषण और संरक्षण की आवश्यकता (Marine Pollution)
वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि मानवीय गतिविधियों के कारण वर्तमान में समुद्री पर्यावरण पर गंभीर संकट मंडरा रहा है।
- प्लास्टिक अपशिष्ट का संकट: मनुष्य हर साल लाखों टन प्लास्टिक कचरा महासागरों में फेंक देते हैं, जो समुद्री जीवों के जीवन को खतरे में डाल रहा है और उनका दम घोंट रहा है।
- अत्यधिक मस्यन (Overfishing): समुद्र से अत्यधिक मात्रा में मछलियां पकड़ने के कारण समुद्री जीवों की संख्या में तेजी से गिरावट आ रही है।
- निष्कर्ष: पृथ्वी और संपूर्ण मानवता के सुरक्षित भविष्य के लिए महासागरों का संरक्षण करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
Quick Revision Points
- पृथ्वी की सतह पर विशाल जल निकाय ‘महासागर’ और बड़े भूभाग ‘महाद्वीप’ कहलाते हैं।
- उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) में दक्षिणी गोलार्ध की तुलना में भूमि का विस्तार अधिक है।
- महासागर वैश्विक जलवायु को संतुलित रखने के साथ-साथ दुनिया की आधी से अधिक ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं।
- मानवीय हस्तक्षेप, प्लास्टिक प्रदूषण और ओवरफिशिंग के कारण समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र गंभीर खतरे में है।