प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र (Peninsular Drainage System) भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे प्राचीन और सुव्यवस्थित नदी तंत्र है, जो हिमालयी नदी प्रणाली से भी पुराना माना जाता है। इस तंत्र में मुख्य जल-विभाजक की भूमिका ‘पश्चिमी घाट’ निभाता है। यहाँ की नदियाँ मुख्य रूप से दो दिशाओं में बहती हैं—महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी बड़ी नदियाँ पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में डेल्टा बनाती हैं, जबकि नर्मदा और तापी जैसी नदियाँ अपवादस्वरूप पश्चिम की ओर भ्रंश घाटी में बहती हुई अरब सागर में एश्चुअरी (ज्वारनदमुख) का निर्माण करती हैं।
प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र (Peninsular Drainage System)
मुख्य विशेषताएँ एवं सामान्य परिचय
- प्राचीनता: हिमालयी नदी तंत्र की तुलना में प्रायद्वीपीय नदी तंत्र प्राचीन है।
- मुख्य जल-विभाजक: पश्चिमी घाट प्रायद्वीपीय भारत में प्रमुख जल-विभाजक है।
- प्रवाह की दिशा: अधिकांश नदियाँ पश्चिमी घाट से निकलकर पूर्व व दक्षिण-पूर्व की ओर प्रवाहित होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं, जिसमें महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी प्रमुख हैं।
- पश्चिम की ओर बहने वाली मुख्य नदियाँ: नर्मदा और तापी (ताप्ती) प्रायद्वीपीय भारत की दो मुख्य नदियाँ हैं, जो अपवाद स्वरूप पश्चिम की ओर बहती हुई अरब सागर में गिरती हैं (इसका कारण इन नदियों का भ्रंश घाटी में प्रवाहित होना है)।
- अन्य प्रवाह: कुछ अन्य नदियाँ प्रायद्वीपीय पठार से निकलकर उत्तर की तरफ गंगा नदी तंत्र का भाग बनती हैं। इसके अतिरिक्त, अरावली और मध्य भारत से निकलने वाली कुछ नदियाँ (लूनी, साबरमती, माही) कच्छ के रण और खम्बात की खाड़ी में गिरती हैं।
- तीव्र ढाल: पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढाल से कई छोटी-छोटी नदियाँ निकलती हैं और तीव्र ढाल बनाती हुई अरब सागर में गिरती हैं।
निकासी के आधार पर नदियों का वर्गीकरण
प्रायद्वीपीय नदियों को हम सुविधा के लिए इनकी निकासी के आधार पर निम्नलिखित भागों में बाँटकर अध्ययन कर सकते हैं:
- बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ: दामोदर, स्वर्णरेखा, ब्राह्मणी, महानदी, गोदावरी, मंजरा, वेनगंगा, वर्धा, सबरी (कोलाब), इन्द्रावती, प्राणहिता, कृष्णा, कावेरी, पेन्नार आदि।
- अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ: नर्मदा, तापी व अन्य छोटी नदियाँ।
- खम्भात की खाड़ी व कच्छ के रण में गिरने वाली नदियाँ: माही, बनास, लूनी व साबरमती आदि।
- गंगा नदी प्रणाली में सम्मिलित होने वाली नदियाँ: चम्बल, काली सिन्ध, बेतवा, केन, दक्षिण टोंस, सोन, पुनपुन, दामोदर आदि।
बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली प्रमुख नदियाँ
क. गोदावरी (दक्षिण की गंगा / वृद्ध गंगा)
- उद्गम: यह नदी दक्षिणी पठार (या दक्षिण भारत) की सबसे बड़ी नदी है, जो महाराष्ट्र के नासिक से दक्षिण-पश्चिम की ओर ‘त्रयंबक’ नामक स्थान से (1067 मी. की ऊँचाई से) निकलती है।
- प्रवाह व निकास: इसकी लम्बाई 1465 कि.मी. तथा अपवाह क्षेत्र 3,12,812 वर्ग कि.मी. है। यह आन्ध्र प्रदेश में अमलापुरम् के निकट बंगाल की खाड़ी में गिरती है। डेल्टाई प्रदेश में यह नाव्य (नौगम्य) है।
- सहायक नदियाँ: इसका जाल महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओड़िशा और आन्ध्र प्रदेश में फैला है, जिसमें प्रवरा, पूर्णा, मंजरा, पेनगंगा, वेनगंगा, दुधवा, वर्धा, प्राणहिता, इन्द्रावती, मानरे, ताल और सबरी प्रमुख हैं।
- घाटी व कन्दरा: जब यह पूर्वी घाट की ओर प्रवाहित होती है तो आन्ध्र प्रदेश में इसकी घाटी संकरी हो जाती है, यहाँ पोलावरम् के निकट यह कन्दरा में होकर बहती है।
- विस्तार व बाँध: पूर्वी घाट को पार करने के बाद अन्तिम 90 कि.मी. में यह फैलकर इतनी चौड़ी हो जाती है कि इसमें अनेक द्वीप और प्रायद्वीप बन जाते हैं। राजमुंडी के निकट यह लगभग 2.8 कि.मी. चौड़ी हो जाती है। यहाँ इसके आधार पर लगभग 4 कि.मी. लम्बा ‘एनीकाट’ बांध बनाया गया है।
- क्षेत्रीय वितरण: गोदावरी घाटी का 49% भाग महाराष्ट्र, 20% मध्य प्रदेश एवं 23% आन्ध्र प्रदेश में अवस्थित है। आयु, आकार और लम्बाई के कारण इसे ‘दक्षिण की गंगा’ या ‘वृद्ध गंगा’ भी कहा जाता है।
ख. महानदी
- उद्गम: यह नदी छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले में सिहावा के निकट 942 मीटर की ऊँचाई से निकलकर दक्षिण-पूर्व की ओर प्रवाहित होती है।
- प्रवाह व डेल्टा: यह नदी मध्य प्रदेश के आधे भाग और आन्ध्र प्रदेश के कुछ भाग का जल संग्रहित कर लगभग 858 कि.मी. प्रवाहित होकर उड़ीसा में बड़े ‘डेल्टा’ का निर्माण करती है।
- सहायक नदियाँ: डेल्टा क्षेत्र में ही बाँयी ओर से ‘बैतरणी’ (उड़ीसा की क्योंझर पहाड़ी से निकली) और ‘ब्राह्मणी’ (कोयल एवं शंख नदियों का संगम) नदियाँ मिलती हैं। अन्य प्रमुख सहायक नदियाँ—बाये तट से शिवनाथ, हसदेव, मांद और ईब तथा दाँयी ओर से जॉक, ओंग, और तेल हैं।
ग. कृष्णा
- उद्गम व विस्तार: कृष्णा नदी पूर्व की ओर प्रवाहित होने वाली प्रायद्वीपीय नदियों में दूसरी सबसे बड़ी नदी है। यह महाबलेश्वर के पास पश्चिमी घाट से 1337 मीटर की ऊँचाई से निकलती है। इसकी कुल लम्बाई 1400 कि.मी. और द्रोणी का क्षेत्रफल 2,58,948 वर्ग कि.मी. है।
- सहायक नदियाँ: इसकी सहायक नदियों में कोयना, येरला, पंचगंगा, दूध गंगा, घाटप्रभा, मालप्रभा, भीमा, तुंगभद्रा और मूसी हैं।
- निकास: पूर्वी घाट के पास दो शाखाओं में बँटकर समुद्र में गिरती है।
घ. पेन्नार
- उद्गम व विस्तार: यह नदी कर्नाटक में नन्ददुर्ग पहाड़ी से निकलकर पूर्व की ओर 970 किलोमीटर बहते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसका अपवाह क्षेत्र 55,213 वर्ग कि.मी. है, तथा यह कृष्णा और कावेरी के बीच अवस्थित है।
- खड्ड व सहायक नदियाँ: यह गंडीकोटा (कुडप्पा) के निकट एक गहरा खड्ड बनाती है। इसकी सहायक नदियों में जयनंगली, कुन्देरू, समिलेरू, चित्रावती, पापाधनी प्रमुख हैं।
ङ. कावेरी (दक्षिणी गंगा)
- उद्गम व विस्तार: यह नदी कर्नाटक के कुर्ग जिले की ब्रह्मगिरि पहाड़ियों से (1341 मी.) प्रवाहित होती हुई कावेरी पत्तन के निकट बंगाल की खाड़ी में विसर्जित होती है। इसकी लम्बाई 805 कि.मी. और अपवाह क्षेत्र 80,290 वर्ग कि.मी. है। कावेरी को ‘दक्षिणी गंगा’ भी कहा जाता है।
- जलप्रपात व उद्यान: शिवसमुद्रम के निकट यह जलप्रपात बनाती है। इसके डेल्टा में ही तंजावुर का उपजाऊ मैदान है जिसे ‘दक्षिण का उद्यान’ भी कहा जाता है।
- सहायक नदियाँ: इसमें बाँयी ओर से हेमावती, लोकपावनी, शिम्शा, हेरंगी और अर्कावती तथा दाँयी ओर से लक्ष्मण तीर्थ, कब्बानी, भवानी, नोइल, सुवर्णवती एवं अमरावती प्रमुख हैं।
अरब सागर, खम्भात की खाड़ी व कच्छ के रण में गिरने वाली नदियाँ
क. नर्मदा
- उद्गम व मार्ग: अमरकण्टक पहाड़ी से 1057 मी. की ऊँचाई से निकलकर नर्मदा एक तंग गहरी और सीधी भ्रंश घाटी में (विन्ध्याचल और सतपुड़ा श्रेणी के मध्य) बहती हुई ‘भरूच’ के दक्षिण ‘एश्चुअरी’ बनाती हुई अरब सागर में गिरती है।
- दर्शनीय स्थल: जबलपुर के पास भेड़ाघाट की संगमरमर चट्टानों और कपिलधारा (धुँआधार) प्रपात (23 मी.) का दृश्य बहुत मनोरम है।
- विस्तार व बाँध: यह नदी 1312 कि.मी. लम्बी और 98,796 वर्ग कि.मी. अपवाह क्षेत्र में विस्तृत है। इस पर प्रसिद्ध सरदार सरोवर बाँध बनाया गया है।
ख. तापी (ताप्ती)
- उद्गम व प्रवाह: यह नदी मध्य प्रदेश के बैतूल जिले से मुल्ताई नामक (मूल ताप्ती) नगर के पास 724 मीटर की ऊँचाई से निकलती है। इस नदी की घाटी सतपुड़ा के दक्षिण में स्थित है।
- निकास: 724 कि.मी. की दूरी तय कर सूरत के निकट खम्भात की खाड़ी में गिरती है।
ग. माही
- उद्गम व निकास: यह मध्य प्रदेश के विंध्यन क्षेत्र से निकलती है। 553 कि.मी. की दूरी तय कर और 34,842 वर्ग कि.मी. (राजस्थान, म.प्र., गुजरात) क्षेत्र में अपवाहित होते हुए खम्भात की खाड़ी में गिरती है।
- सहायक नदियाँ: इसकी मुख्य सहायक नदियाँ ‘सोम’, अनस, ‘जाखम’ आदि हैं।
घ. साबरमती
- उद्गम व प्रवाह: राजस्थान में मेवाड़ की पहाड़ियों से निकलकर खम्भात की खाड़ी में गिरती है। इसकी कुल लम्बाई 320 कि.मी. है। अहमदाबाद इसके किनारे बसा हुआ सबसे बड़ा शहर है।
ङ. लूनी
- उद्गम व विलुप्ति: राजस्थान में अजमेर के दक्षिण-पश्चिमी भाग में स्थित ‘नाग पहाड़ी’ (अरावली श्रेणी) से निकलती है तथा अर्धशुष्क मरुस्थलीय क्षेत्र में प्रवाहित होती हुई ‘कच्छ के रण’ के दलदल में विलीन हो जाती है।
- उत्पत्ति व सहायक नदियाँ: यह पुष्कर के समीप सागरमती और सरस्वती के रूप में उत्पन्न होती है। इसकी लम्बाई 450 कि.मी. है। सरसुती, बुंदी, सुकड़ी और जवाई इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं। ‘सरसुती’ का उद्भव ‘पुष्कर झील’ से होता है।
प्रायद्वीपीय भारत की अन्य छोटी नदियाँ
प्रायद्वीपीय भारत में कई अन्य छोटी नदियाँ हैं। इनमें से कई नदियाँ तीव्र ढाल एवं जलप्रपात के कारण जल-विद्युत उत्पादन की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं (खासकर पश्चिमी तट पर बहने वाली नदियाँ)। पूर्वी तट की छोटी नदियाँ सिंचाई व नौवहन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
अरब सागर / खम्भात की खाड़ी / कच्छ के रण में गिरने वाली लघु नदियाँ:
- शतरंजी: गुजरात के अमरेली जिले के दलकहवा के निकट से निकलती है तथा भावनगर जिले में बहते हुए खम्भात की खाड़ी में गिरती है।
- भादर: गुजरात के राजकोट जिले से निकलती है और पोरबन्दर जिले में प्रवाहित होते हुए अरब सागर में गिरती है। इसकी एक शाखा उत्तर की ओर बहते हुए अहमदाबाद जिले से खम्भात की खाड़ी में गिरती है।
- वैतरणा: महाराष्ट्र के नासिक जिले की त्रयंबक की पहाड़ी से निकलती है, और बलसाड के निकट अरब सागर में गिरती है।
- काली नदी: कर्नाटक के बेलगाँव जिले से निकलती है तथा ‘कारवार की खाड़ी’ (अरब सागर) में गिरती है।
- शरावती: कर्नाटक के शिमोग (शिमोगा) जिले से निकलती है। प्रसिद्ध गरसोप्पा (जोग) प्रपात इसी नदी के मार्ग में स्थित है।
- भरतपूझा: केरल की सबसे बड़ी नदी है, इसे ‘पोन्नानी’ के नाम से भी जाना जाता है। यह अन्नामलाई की पहाड़ियों से निकलती है तथा पोन्नानी नामक स्थान के पास अरब सागर में गिरती है।
- पेरियार: केरल की दूसरी सबसे बड़ी नदी है। यह अन्नामलाई की पहाड़ियों से निकलकर ‘वेम्बानद’ झील के उत्तर में अरब सागर में गिरती है।
- पम्बा: अन्नामलाई पहाड़ी से निकलती है तथा केरल में बहती हुई ‘वेम्बानद’ झील में गिरती है।
बंगाल की खाड़ी / मन्नार की खाड़ी में गिरने वाली लघु नदियाँ:
- स्वर्ण रेखा: इसका उद्गम राँची के दक्षिण-पश्चिम से होता है तथा यह तालेसरी के पास बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
- ताम्रपर्णी: तिरूनेलवेली जनपद की प्रमुख नदी है। सहयाद्री के अगस्त्यलाई की ढालों से निकलकर यह मन्नार की खाड़ी में गिरती है।
- वैतरणी: ओडिशा की क्योंझर पहाड़ियों से निकलकर, दक्षिण-पूर्व की ओर बहते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
- ब्राह्मणी: राउरकेला (ओडिशा) के पास छोटानागपुर पठार से निकलने वाली ‘दक्षिणी कोयल’ और ‘शंख’ नदियों के संगम के बाद यह ब्राह्मणी कहलाती है। ह्वीलर द्वीप (ओडिशा) तट के पास बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
- वंशधारा: ओडिशा के दक्षिणी भाग से निकलकर, आंध्र प्रदेश में बहते हुए यह बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
- पलार: कर्नाटक के कोलार जिले से निकलती है। यह आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में बहते हुए, तमिलनाडु के अर्काट जिले में पहुँचती है और अंततः बंगाल की खाड़ी में गिरती है। पोड़नी और पेय्यार इसकी मुख्य सहायक नदियाँ हैं।
- वैगाई: मदुरई (तमिलनाडु) के ‘वरूशनाडू’ पहाड़ी से निकलती है। मदुरई, रामनाथपुरम् आदि शहरों से बहती हुई मंडपम के पास ‘बंगाल की खाड़ी’ में गिरती है।