हिमालय और प्रायद्वीपीय पठार के मध्य स्थित The Great Northern Plain (उत्तर का विशाल मैदान) भारत का सबसे समृद्ध और सघन आबादी वाला भौतिक प्रदेश है। लगभग 7 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला यह मैदान सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी महान नदियों द्वारा लाए गए जलोढ़ निक्षेपों (Alluvial Deposits) से निर्मित है। भू-आकृतिक और प्रादेशिक विविधताओं से संपन्न यह विशाल मैदानी भाग न केवल भारत का प्रमुख कृषि केंद्र है, बल्कि देश की सभ्यता, संस्कृति और आर्थिक विकास की जीवनरेखा भी है।
सामान्य परिचय एवं भौगोलिक विस्तार
- स्थिति: यह मैदान उत्तरी पर्वतीय प्रदेश एवं दक्षिण के पठारी भाग के मध्य स्थित है।
- लम्बाई व चौड़ाई: यह लगभग 2400 कि.मी. लम्बाई तथा 100 से 320 कि.मी. औसत चौड़ाई में विस्तृत है।
- क्षेत्रफल: यह मैदान लगभग 7 लाख वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैला है।
उत्पत्ति एवं निर्माण प्रक्रिया
- भू-गर्भिक आयु: इस विशाल मैदान की उत्पत्ति भौगोलिक रूप से एक नवीन घटना (लगभग 50 लाख वर्ष पूर्व) मानी जाती है।
- गर्त का निर्माण: हिमालय के निर्माण के क्रम में हिमालय एवं प्रायद्वीपीय पठार के मध्य एक विशाल गर्त का निर्माण हुआ।
- अवसादीकरण: कालान्तर में इसे हिमालय एवं प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र की नदियों द्वारा लाये गये अवसादों के निक्षेपण से भर दिया गया। यह अवसादीकरण की प्रक्रिया आज भी निरन्तर जारी है और धीरे-धीरे इसकी मोटाई में वृद्धि हो रही है।
प्रादेशिक विभाजन
प्रादेशिक विभिन्नताओं के आधार पर इस मैदान को निम्नलिखित भागों में बांटा जा सकता है:
(i) सिंधु का मैदान
- विस्तार: यह मैदान सिन्धु नदी घाटी क्षेत्र में निर्मित और विस्तृत है।
- क्षेत्रीय बनावट: सिन्धु नदी के पश्चिम का मैदान मुख्यतः ‘बाँगर’ से और पूर्व का मैदान ‘डेल्टाई’ है।
- थोरोम: इस भाग में नवीन जलोढ़ निक्षेपों की सतह पर पुराने नदी मार्गों के अवशेष पाये जाते हैं (जो लम्बे और संकरे गर्तों के रूप में हैं), इन्हें ‘थोरोम’ कहा जाता है।
- थाड़: सूखे नदी मार्गों के निकट असंख्य क्षारीय झीलें पाई जाती हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘थाड़’ कहते हैं, जैसे—’पूर्वी नारा’।
(ii) पंजाब का मैदान
- विस्तार: इस मैदान का विस्तार पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में पाया जाता है। दक्षिण की ओर यह राजस्थान के मैदान से मिल जाता है।
- सीमाएं: इसकी पश्चिमी सीमा पाकिस्तान की सीमा द्वारा तथा पूर्वी सीमा यमुना नदी द्वारा निर्धारित होती है।
- क्षेत्रफल व विस्तार: इस मैदान का कुल क्षेत्रफल 1.75 लाख वर्ग कि.मी. है। उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व तक इसका विस्तार 640 कि.मी. तक है।
- ऊँचाई व ढाल: इसके उत्तरी भाग की ऊँचाई 300 मी. है, जो दक्षिण-पूर्व में 200 मीटर रह गयी है। इस मैदान का सामान्य ढाल उत्तर से दक्षिण व दक्षिण-पश्चिम को है।
- निर्माण: इस मैदान के निर्माण में सिन्धु अपवाह तंत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है, जिसमें रावी, व्यास, सतलज, घग्घर और विलुप्त सरस्वती नदियों की भूमिका प्रमुख है। इस मैदान का विस्तारित भाग वर्तमान पाकिस्तान में भी दिखाई देता है, जिसके निर्माण में सिन्धु, झेलम और चेनाब नदियों की प्रमुख भूमिका है।
- निक्षेप की गहराई: इसके कई भागों में मृदा का निक्षेप काफी गहराई तक है। अंबाला (हरियाणा) के निकट यह 6000 मीटर गहराई तक है, जो इस विशाल मैदान का सर्वाधिक गहरा निक्षेप है।
सामूहिक पंच-दोआब क्षेत्र
इस मैदान की विशेषता यह रही है कि अलग-अलग दो नदियों के मध्य दोआब क्षेत्र का विकास हुआ है और ये सभी दोआब भिन्न-भिन्न नामों से जाने जाते हैं। इन्हें सामूहिक रूप से पंच-दोआब कहा जाता है।
‘दोआब’ का अर्थ: दो नदियों के बीच का भाग [दो + आब (पानी)]।
| क्र. सं. | नदियों के मध्य | दोआब क्षेत्र का नाम |
| 1. | व्यास एवं सतलज | बिस्ट दोआब |
| 2. | झेलम एवं सिन्धु | सिन्ध सागर दोआब |
| 3. | झेलम एवं चेनाब | चाज दोआब |
| 4. | चेनाब एवं रावी | रचना दोआब |
| 5. | रावी एवं व्यास | बारी दोआब |
क्षेत्रीय पारिभाषिक शब्दावली
- बेट: पंजाब मैदान मुख्यतः बाँगर से निर्मित है, लेकिन नदियों के किनारे एक संकरी पट्टी में खादर भूमि पाई जाती है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘बेट’ कहा जाता है। इस मैदान में नदी मार्गों ने जलोढ़ों की संहति को काटकर चौरस बाढ़ के खादर मैदानों की रचना की है।
- धाया: इसके दोनों किनारों पर कगार या कम ऊँचाई की खड़ी पहाड़ीनुमा स्थलाकृतियाँ विकसित हो गयी हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘धाया’ कहते हैं।
(iii) राजस्थान का मैदान
- विस्तार: राजस्थान मैदान का विस्तार पूर्व में अरावली के पश्चिम से लेकर पश्चिम में भारत-पाकिस्तान की सीमा तक विस्तारित है। उत्तर में पंजाब का मैदान और दक्षिण में कच्छ के रण से यह परिभाषित होता है।
- क्षेत्रफल व मरुस्थल: 1.75 लाख वर्ग कि.मी. में फैला इसका दक्षिण-पश्चिमी भाग पूर्ण मरुस्थलीय है, जहाँ जगह-जगह बालू के टीले पाये जाते हैं।
- प्रमुख झीलें: वायु के अपरदनात्मक कार्यों के फलस्वरूप यहाँ यत्र-तत्र झीलें भी पायी जाती हैं, जिनमें साँभर और डीडवाना प्रमुख हैं।
- साँभर झील: यह भारत की सबसे बड़ी अंतःस्थलीय (Inland) नमकीन झील है। इसका क्षेत्रफल 190 वर्ग कि.मी. है।
- प्रमुख नदी: लूनी इस मैदान की प्रमुख नदी है, जो कच्छ के रण में विलीन हो जाती है।
- उत्तरी भाग (कृषि): इस मैदान के उत्तरी भागों में (गंगानगर तथा हनुमानगढ़ जिले) पुरानी जलोढ़ पायी जाती है। साथ ही इस क्षेत्र में लोएस प्रकार की मृदा का जमाव भी मिलता है, जिससे इन जिलों में कृषि का अच्छा विकास हुआ है। गंगानगर को राजस्थान का अन्नभण्डार कहा जाता है।
- भू-गर्भिक साक्ष्य: कहीं-कहीं शिष्ट, ग्रेनाइट व नीस चट्टानें भी पाई जाती हैं, जो यह संकेत करती हैं कि इस मैदान का कुछ भाग प्रायद्वीप का अंग है।
(iv) गंगा का मैदान
- सीमाएं: इस मैदान का विस्तार उत्तर में 300 मीटर की कण्टूर-रेखा, दक्षिण में प्रायद्वीप का पठार, पश्चिम दिशा में यमुना जबकि पूर्व दिशा में भारत-बांग्लादेश सीमा तक देखा जा सकता है।
- विस्तार व क्षेत्रफल: इस मैदान की लम्बाई लगभग 1400 कि.मी. तथा चौड़ाई 300 कि.मी. के आस-पास है। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 3 लाख 57 हजार वर्ग कि.मी. है।
- ढाल: इसका सामान्य ढाल उत्तर से दक्षिण व दक्षिण-पूर्व की ओर पाया जाता है, जो लगभग 15 से.मी. प्रति कि.मी. है।
- ऊँचाई: मैदान की अधिकतम ऊँचाई (276 मी.) सहारनपुर (उ.प्र.) के पास पायी जाती है, जो सागर द्वीपों की तरफ उत्तरोत्तर घटती जाती है (कोलकाता में 6 मीटर एवं सागर द्वीप में 3 मीटर है)।
- अपवाह तंत्र: यह मैदान गंगा, यमुना, गण्डक, कोसी, सोन आदि नदियों द्वारा अपवाहित किया जाता है। यह मैदान उत्तर प्रदेश, बिहार व पश्चिम बंगाल में विस्तृत है।
क्षेत्रीय विभाजन और भौगोलिक शब्दावली
उत्तर प्रदेश में इस मैदान को दो भागों में बांटा गया है:
- पश्चिमी भाग: ‘रूहेलखण्ड’ का मैदान
- पूर्वी भाग: ‘अवध का मैदान’
- जल्ला और टाल: गंगा के मैदान में यत्र-तत्र गर्त (नीची भूमि) पायी जाती है, जिसे पटना के आस-पास ‘जल्ला’ तथा मोकामा के निकट ‘टाल’ कहते हैं।
- बील (Beel): पश्चिम बंगाल में ऐसी निम्न भूमि जो जल से भरी होती है, ‘बील’ के नाम से जानी जाती है।
- गोखुर झील: मध्यवर्ती गंगा के मैदान में ‘गोखुर झील’ बहुतायत में पायी जाती हैं, क्योंकि इस भाग में नदियाँ विसर्प बनाती हैं।
गंगा के मैदान का उप-वर्गीकरण
- (a) ऊपरी गंगा का मैदान: रूहेलखण्ड से अवध क्षेत्र तक।
- विशेषता: ऊपरी गंगा द्वारा मैदान का दक्षिणी क्षेत्र कुछ प्रायद्वीपीय नदियों के अवनालिका अपरदन से उत्खात भूखण्ड (Badland) में तब्दील हो गया है, जो भौगोलिक रूप से बुन्देलखण्ड क्षेत्र में आता है।
- (b) मध्यवर्ती गंगा का मैदान: पूर्वी उत्तर प्रदेश से बिहार तक।
- विशेषता: इस मैदान में समतल आकृति के कारण उच्चावचीय भिन्नताएँ कम देखी जाती हैं। इस भाग में खादर भूमि की अधिकता पायी जाती है, जिसका कारण यहाँ की नदियों में वर्षा ऋतु में भयंकर बाढ़ का आना है। नदियों में मार्ग परिवर्तन के कारण ही यहाँ गोखुर झील की अधिकता पायी जाती है।
- (c) निम्न गंगा का मैदान: मुख्यतः पश्चिम बंगाल (फरक्का-हल्दिया) में विस्तृत।
- विशेषता: उत्तर से दक्षिण की ओर निम्न गंगा का मैदान चौड़ा होता जाता है। इसके दक्षिणी भाग में गंगा डेल्टा का विस्तार पाया जाता है। समुद्री ज्वार के प्रभाव के कारण मैदान के दक्षिणी भाग में दलदली दशाएँ पायी जाती हैं। निचले भाग प्रायः जलमग्न रहते हैं जिन्हें ‘बील’ (बिल) कहा जाता है, जबकि नदियों के किनारे ऊँचे भागों को ‘चर’ (Char) कहा जाता है तथा इन्हीं ऊँचे भागों में गाँव बसे हैं।
(v) असम का मैदान (ब्रह्मपुत्र मैदान या असम घाटी)
- स्थिति: यह मैदान हिमालय पर्वत और मेघालय के पठार के मध्य स्थित एक लम्बा व संकरा मैदान है।
- आकार: यह मैदान लगभग 650 कि.मी. लम्बा और 80 कि.मी. तक चौड़ा है।
- ढाल: इसका सामान्य ढाल पूर्व से पश्चिम दिशा में है। पूर्व में इसकी ऊँचाई समुद्र तल से 1300 मीटर तो पश्चिम में मात्र 30 मीटर रह जाती है।
- विभाजन: ब्रह्मपुत्र नदी इस मैदान को दो भागों (उत्तरी तथा दक्षिणी) में बाँटती है।
- निर्माण: प्राकृतिक रूप से इसका विकास ब्रह्मपुत्र अपवाह तंत्र तथा पूर्वांचल पहाड़ियों के अपवाह तंत्र द्वारा हुआ है।
- गुंफित नदी और द्वीप: ढाल प्रवणता कम होने के कारण ब्रह्मपुत्र एक गुंफित नदी (Braided River) हो गयी है, जिससे इसमें कई नदीय द्वीप बन गये हैं। इनमें ‘माजुली’ (क्षेत्रफल 929 वर्ग कि.मी.) विश्व का सबसे बड़ा नदीय द्वीप है।
विशाल मैदान का भौगोलिक विभाजन
धरातल की ऊँचाई, गहराई तथा मिट्टी की संरचना के आधार पर इस मैदानी भाग को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया गया है:
- भाबर का मैदान
- तराई का मैदान
- बांगर (भांगर) का मैदान
- खादर का मैदान
1. भाबर का मैदान
निर्माण एवं विस्तार
- स्थिति: जहाँ हिमालय पर्वत (शिवालिक) और मैदानी प्रदेश एक दूसरे से मिलते हैं (गिरिपाद क्षेत्र), वहाँ हिमालय से निकलने वाली असंख्य जलधाराओं ने अपने साथ पर्वतीय क्षेत्रों से टूटकर गिरे हुए पत्थरों के छोटे-बड़े टुकड़े काफी मोटाई में जमा कर दिये हैं।
- परिभाषा: इन कंकड़-पत्थरों से ढका हुआ भाग ही ‘भाबर’ कहलाता है।
- आकार व विस्तार: यह शिवालिक के समानान्तर 8 से 16 कि.मी. की चौड़ाई में फैला हुआ है, जबकि लम्बाई लगभग 2400 कि.मी. है। सिन्धु से तिस्ता नदी तक इसका विस्तार निरंतरता में देखा जा सकता है।
- क्षेत्रीय चौड़ाई: भाबर मैदान की चौड़ाई पूर्व में कम पायी जाती है, जबकि पश्चिम और उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ती जाती है।
विशेषताएँ
- जल की लुप्तता: इस भाग में केवल बड़ी नदियों का जल ही दिखता है, अन्य धारायें इसमें लुप्त हो जाती हैं (क्योंकि यहाँ रन्ध्रता काफी अधिक होती है)।
- वनस्पति एवं आबादी: इस क्षेत्र में लम्बी जड़ों वाले बड़े-बड़े वृक्ष तो दृष्टिगोचर होते हैं, परन्तु छोटे पौधे, खेतों तथा जनसंख्या का अभाव पाया जाता है।
2. तराई का मैदान
स्थिति एवं विस्तार
- परिभाषा: भाबर प्रदेश से नीचे की ओर बढ़ने पर जहाँ लुप्त हुई नदियों का जल पुनः प्रकट (दिखाई देता है) होता है, वहाँ से तराई मैदान प्रारम्भ होता है।
- आकार: इसका विकास भाबर मैदान के समानान्तर एक पेटीनुमा आकृति में हुआ है। इसकी चौड़ाई 15-30 कि.मी. तथा लम्बाई 2400 कि.मी. है।
- अंतर्राष्ट्रीय विस्तार: इसका विस्तार भारत, नेपाल एवं भूटान तीनों में दिखाई देता है।
क्षेत्रीय भिन्नता एवं मानवीय गतिविधियाँ
- भौगोलिक अंतर: पश्चिमवर्ती भाग में वर्षा कम होने के कारण सिन्धु के मैदान और हिमालय के ढालों के बीच भाबर तो बहुत चौड़ा है, पर तराई का अभाव (कम) है; जबकि मध्य व पूर्वी भाग में भाबर की अपेक्षा तराई का मैदान काफी विस्तृत (चौड़ा) है।
- वनस्पति व जीव: इस मैदान में दलदल (नम भूमि) पायी जाती है। इन दलदलों में ऊँची-ऊँची घास (जैसे—कास, हाथी घास आदि), वृक्ष और असंख्य जंगली पशु पाये जाते हैं।
- जनसंख्या व कृषि: मलेरिया बीमारी के कारण यहाँ जनसंख्या का अभाव है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश और पंजाब में इस क्षेत्र के जंगलों को साफ कर कृषि कार्य किया जा रहा है।
3. बांगर (भांगर) का मैदान
विशेषताएँ एवं मृदा संरचना
- परिभाषा: यह नदी की बाढ़ सीमा से परे पुरानी जलोढ़क से निर्मित उच्च भूमि (जलोढ़ चबूतरा) है, जहाँ सामान्य रूप से नदियों के बाढ़ का जल नहीं पहुँच पाता है।
- कंकड़ की प्रधानता: इस मैदान के जमाव में चूने के कंकड़ बहुतायत में पाये जाते हैं।
- रेह या कल्लर: इसमें कहीं-कहीं लवणीय व क्षारीय मिट्टी मिलती है, जिसे ‘रेह’ या ‘कल्लर’ कहा जाता है। इसका विस्तार उत्तर प्रदेश में अधिक है।
- भूड (Bhoor): पंजाब की भाँति पश्चिमी उ.प्र. में भी कहीं-कहीं बालू के ढेर मिलते हैं, जिन्हें ‘भूड’ (Bhoor) कहा जाता है; ये प्राचीन काल में जल के जमाव से बने थे।
- जीवाश्म: इसमें गैंडा, दरियाई घोड़ा, हाथी एवं ईक्वस आदि जीवों के जीवावशेष पाये जाते हैं।
4. खादर का मैदान
विशेषताएँ एवं उपजाऊपन
- परिभाषा: नवीन काँप (जलोढ़ मृदा) द्वारा निर्मित नदियों के बाढ़ मैदान को ‘खादर या बेट’ (पंजाब) कहते हैं।
- उर्वरता: प्रतिवर्ष बाढ़ के दौरान रेत की नई परत जमा होने से इसकी उर्वरता बनी रहती है।
- जमाव के प्रकार: इसमें मुख्यतः बालू, रेत, पंक एवं चिकनी मिट्टी के जमाव पाये जाते हैं।
- काल एवं जीव अवशेष: इसका निर्माण ऊपरी अभिनूतन काल से नूतन काल के दौरान हुआ। इसमें ऐसे जीवों के अवशेष पाये जाते हैं जो आज भी मौजूद हैं।