“सिविल सेवा और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में ‘द हिंदू’ (The Hindu) अखबार की भूमिका सर्वोपरि मानी जाती है। हालांकि, अंग्रेजी भाषा में होने के कारण कई हिंदी माध्यम के छात्रों को इसे समझने और इसके नोट्स बनाने में कठिनाई होती है। The Hindu Notes In Hindi इसी समस्या का एक प्रभावी समाधान है।
डन्यूब नदी का सूखा (Danube River Drought)
पृष्ठभूमि
- समस्या: पूरे यूरोप में लंबे समय से चल रहे सूखे और भीषण गर्मी के कारण नदी का जल स्तर मौसमी रूप से रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है, जिससे सूखी नदी तल पर नावें फंस गई हैं।
डन्यूब नदी (Danube River)
डन्यूब नदी (Danube) यूरोप की दूसरी सबसे लंबी नदी है (वोल्गा नदी के बाद)। यह मध्य और पूर्वी यूरोप की एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक नदी है।

उद्गम और मुहाना (Source and Mouth)
- उद्गम: यह दक्षिण-पश्चिमी जर्मनी के ब्लैक फॉरेस्ट पर्वतीय क्षेत्र के पास शुरू होती है।
- मुहाना: यह पूर्व की ओर बहते हुए कई देशों को पार करती है और रोमानिया-यूक्रेन के पास काला सागर (Black Sea) में मिल जाती है। इसकी कुल लंबाई लगभग 2,850 से 2,860 किमी है।
प्रवाहित होने वाले देश (10 देश)
डन्यूब नदी दुनिया की ऐसी नदी है जो सबसे अधिक देशों (10 देशों) से होकर गुजरती है या उनकी अंतरराष्ट्रीय सीमा बनाती है:
जर्मनी, ऑस्ट्रिया, स्लोवाकिया, हंगरी, क्रोएशिया, सर्बिया, बुल्गारिया, रोमानिया, मोल्दोवा और यूक्रेन
प्रमुख राजधानियाँ
यह नदी यूरोप की चार प्रमुख राष्ट्रीय राजधानियों से होकर गुजरती है:
- वियना (ऑस्ट्रिया)
- ब्रातिस्लावा (स्लोवाकिया)
- बुडापेस्ट (हंगरी)
- बेलग्रेड (सर्बिया)
मुख्य विशेषताएँ एवं महत्व
- व्यापारिक मार्ग: यह यूरोप का एक प्रमुख अंतर्देशीय जलमार्ग (Inland Waterway) है, जिसका उपयोग माल ढुलाई और व्यापार के लिए किया जाता है।
- ऐतिहासिक महत्व: प्राचीन काल में यह रोमन साम्राज्य की उत्तरी सीमा (सरहद) का काम करती थी।
- जैव विविधता: इसका डेल्टा क्षेत्र (डन्यूब डेल्टा) यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, जो पक्षियों और जलीय जीवों की कई प्रजातियों का घर है। इसके बेसिन को इसके पर्यावरण के कारण “यूरोप का अमेज़ॅन” भी कहा जाता है।
पिकएक्स माउंटेन और बंकर बस्टर गैंबल
भौगोलिक और रणनीतिक पृष्ठभूमि
- स्थान: ईरान में पिकएक्स माउंटेन (नतांज परमाणु स्थल के पास)।
- मुद्दा: रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने यूरेनियम शुद्ध करने वाली मशीनें (सेंट्रीफ्यूज) इस गहरे और दुर्गम पहाड़ के नीचे भूमिगत सुविधा में स्थानांतरित कर दी हैं।
- चुनौती: अमेरिकी प्रशासन (डोनाल्ड ट्रम्प) के समक्ष इस भूमिगत ठिकाने को नष्ट करने की एक जटिल रणनीतिक चुनौती है।
तकनीकी एवं सामरिक चुनौतियाँ
- बंकर बस्टर बमों की सीमा: पारंपरिक बम सतह के पास विस्फोट करते हैं, लेकिन जब लक्ष्य पहाड़ के नीचे गहराई में हो, तो आसपास की चट्टानें और मिट्टी विस्फोट की अधिकांश ऊर्जा को सोख लेती हैं, जिससे लक्ष्य सुरक्षित रहता है।
- भूवैज्ञानिक बाधाएँ: Pickaxe Mountain का कठिन भू-भाग और कठोर भूवैज्ञानिक संरचना बंकर बस्टर बमों की प्रभावशीलता को सीमित करती है।
- संसाधन संकट: महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) की कमी भी इस प्रकार के अभियानों के सामने एक तकनीकी बाधा है।
Foreign Currency Non-Resident [Bank] or FCNR (B) Deposits जमा योजना
परिचय एवं पृष्ठभूमि (Introduction & Context)
- परिभाषा: FCNR (B) जमा योजना (वर्ष 1993 में शुरू) एक ऐसी विदेशी मुद्रा जमा योजना है जिसके तहत अनिवासी भारतीयों (NRIs), भारतीय मूल के व्यक्तियों (PIOs) और ओवरसीज कॉर्पोरेट बॉडीज (OCBs) को विदेशी मुद्रा में भारत में बैंक खाते रखने की अनुमति मिलती है।
- वर्तमान संदर्भ (जुलाई 2026): भू-राजनीतिक खंडितता (geopolitical fragmentation), अस्थिर पूंजी प्रवाह और डॉलर की मजबूती के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये को सहारा देने और विदेशी मुद्रा (forex) भंडार को मजबूत करने के लिए FCNR (B) रियायती स्वैप विंडो (Concessional Swap Window) को पुनर्जीवित किया है।
- लक्ष्य: इस नई योजना के माध्यम से $50-70 बिलियन आकर्षित करने का लक्ष्य है। अब तक $20.72 बिलियन की कुल विदेशी मुद्रा जुटाई जा चुकी है, जिसमें से 84% ($17.4 बिलियन) अकेले FCNR (B) के जरिए आए हैं।
योजना की मुख्य विशेषताएँ और RBI का हस्तक्षेप (Design Features)
- मुद्रा के प्रकार: ये जमाएं अमेरिकी डॉलर, पाउंड स्टर्लिंग, यूरो, जापानी येन, ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और कनाडाई डॉलर जैसी नामित विदेशी मुद्राओं में रखी जाती हैं। मूलधन और ब्याज दोनों विदेशी मुद्रा में होते हैं, जिससे जमाकर्ता रुपये के मूल्यह्रास (depreciation) के जोखिम से सुरक्षित रहते हैं।
- RBI की स्वैप सुविधा: 3 से 5 साल की परिपक्वता (maturity) वाली FCNR (B) जमाओं के लिए बैंकों को रियायती विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधा दी जा रही है, जिससे हेजिंग (hedging) की लागत काफी कम हो जाती है।
- ब्याज दर लाभ: हेजिंग लागत कम होने से बैंक अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड (4-4.4%) की तुलना में डॉलर जमा पर अधिक रिटर्न (बड़े बैंकों में लगभग 6% और छोटे/निजी बैंकों में 7.1% तक) दे पा रहे हैं, जिससे NRI निवेशकों का आकर्षण बढ़ा है।
Bank credit-deposit ratio at a 62-year high
CD रेशियो (क्रेडिट-डिपॉजिट अनुपात): वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही (Q1 FY27) में भारतीय बैंकों का CD रेशियो 62 साल के उच्चतम स्तर 82.6% पर पहुंच गया।
लोन और डिपॉजिट की वृद्धि (Q1):
- लोन: 18.6% (YoY) बढ़कर ₹219.3 लाख करोड़।
- डिपॉजिट: 13.3% बढ़कर ₹265.4 लाख करोड़।
वृद्धि में अंतर (Variance): लोन और डिपॉजिट की वृद्धि के बीच का अंतर 5 प्रतिशत अंक (percentage points) था (जून तिमाही, FY24 के बाद से सबसे ज्यादा)।
CD रेशियो में तेजी के कारण (विश्लेषकों के अनुसार):
- पिछले 5 वर्षों में बैंकों के पास अतिरिक्त निवेश (excess investments) था, जिसे उन्होंने लोन में फिर से लगाया (redeployed)। इससे ऑप्टिकली लोन बुक तेज और इन्वेस्टमेंट बुक धीमी बढ़ी।
- बैंकों की पूंजी (capital) अपने लाइफ-टाइम हाई पर है, जिसे आगे उधार दिया जा रहा है।
क्रेडिट-डिपॉजिट (सीडी) अनुपात वह वित्तीय माप है जो यह बताता है कि बैंक अपनी कुल जमा राशि (डिपॉजिट) का कितना हिस्सा कर्ज (क्रेडिट) देने में उपयोग कर रहे हैं। इसका सूत्र कुल ऋण को कुल जमा से भाग देकर 100 से गुणा करना है।
उच्च अनुपात (>85%): यह अधिक ऋण मांग और लाभ को दिखाता है, लेकिन बैंक की तरलता (लिक्विडिटी) पर जोखिम बढ़ा सकता है।
कम अनुपात (<70%): यह सुरक्षित होता है, लेकिन संकेत देता है कि बैंक अपने पैसों का पूरा उपयोग कर्ज देने के लिए नहीं कर रहे हैं।
ई-कॉमर्स सेक्टर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के नियमों में एक बड़ा बदलाव
- नियम में बदलाव: अब सरकार ने इन्वेंट्री-आधारित (inventory-based) ई-कॉमर्स कंपनियों में FDI की अनुमति दे दी है, जो केवल मार्केटप्लेस के रूप में काम नहीं करतीं बल्कि अपना स्टॉक/सामान खुद रखती हैं।
- मुख्य शर्त: यह छूट केवल तभी लागू होगी जब यह इन्वेंट्री (सामान) निर्यात (exports) के लिए उपयोग की जाएगी।
- पुरानी नीति: पिछले लगभग एक दशक से भारत में केवल बिजनेस-टू-बिजनेस (B2B) ई-कॉमर्स और विशुद्ध रूप से मार्केटप्लेस मॉडल (जहां कंपनी खुद अपना सामान नहीं रखती) में ही FDI की अनुमति थी।
- नीति का उद्देश्य: इस प्रतिबंध का मुख्य उद्देश्य भारत के छोटे व्यापारियों की रक्षा करना और मल्टी-ब्रांड रिटेल में FDI पर प्रतिबंध को बनाए रखना था।
- वाणिज्य मंत्रालय का बयान: भारतीय विक्रेताओं को वैश्विक बाजारों तक आसान और अधिक पहुंच प्रदान करके निर्यात को बढ़ावा देने के लिए इस नीति की समीक्षा की गई है, जिसके तहत घरेलू स्तर पर निर्मित उत्पादों के निर्यात के मामले में इन्वेंट्री-आधारित ई-कॉमर्स मॉडल पर प्रतिबंध लागू नहीं होंगे।
विरोध(Protest) करने का अधिकार और पुलिस शक्तियों की सीमाएँ
संवैधानिक और कानूनी ढांचा
- संवैधानिक अधिकार: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(b) नागरिकों को शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार देता है।
- उचित प्रतिबंध: अनुच्छेद 19(3) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था, भारत की संप्रभुता और अखंडता, तथा अन्य संवैधानिक आधारों पर इस अधिकार पर “उचित प्रतिबंध” लगाए जा सकते हैं।
सीजेपी (CJP) मार्च और कानून की स्थिति
- गैरकानूनी सभा (Unlawful Assembly): भारतीय न्याय संहिता (BNS) के अनुसार, 5 या उससे अधिक लोगों की सभा तब गैरकानूनी मानी जाती है जब उसका सामान्य उद्देश्य आपराधिक बल का प्रयोग करना, कानून के क्रियान्वयन का विरोध करना, कोई अपराध करना, या किसी व्यक्ति को बल/धमकी से मजबूर करना हो।
- अनुमति का अभाव: दिल्ली पुलिस के अनुसार, CJP ने संसद तक जुलूस निकालने की अनुमति नहीं ली थी।
- निषेधाज्ञा: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत नई दिल्ली जिले में विरोध प्रदर्शनों, मार्च और रैलियों पर रोक थी (केवल जंतर-मंतर के निर्धारित स्थल पर पूर्व अनुमति के साथ अनुमति थी)।
- न्यायिक जांच: पुलिस कार्रवाई (पुलिस की ज्यादती और अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों) के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की गईं, जिस पर कोर्ट ने केंद्र और दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा है। एक वकील ने सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान (suo motu) लेने का अनुरोध किया था, जिसे भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मौखिक रूप से अस्वीकार कर दिया।
पुलिस कार्रवाई के मानक और नियम
- मानवाधिकार और पुलिसिंग: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) का पुलिस अधिकारियों के लिए मानवाधिकार मैनुअल बताता है कि प्रभावी पुलिसिंग और मानवाधिकारों का सम्मान एक-दूसरे के पूरक हैं। पुलिस को नागरिकों के अधिकारों के रक्षक के रूप में कार्य करना चाहिए।
- बल प्रयोग के नियम:
- BNSS के तहत, कार्यकारी मजिस्ट्रेट या अधिकृत पुलिस अधिकारी किसी गैरकानूनी या सार्वजनिक शांति भंग करने वाली सभा को तितर-बितर करने का आदेश दे सकते हैं।
- भारत में पुलिस के आचार संहिता (Code of Conduct) के अनुसार, पुलिस को यथासंभव समझाने, सलाह और चेतावनी की विधि अपनानी चाहिए। यदि बल प्रयोग अपरिहार्य हो, तो केवल न्यूनतम आवश्यक बल का ही प्रयोग किया जाना चाहिए।
- पहचान संबंधी मुद्दा: BNSS के तहत गिरफ्तारी करने वाले पुलिसकर्मी के पास नाम का स्पष्ट और दृश्यमान पहचान होना अनिवार्य है, लेकिन भीड़ नियंत्रण या सभाओं को तितर-बितर करने वाले कर्मियों के लिए ऐसा कोई नियम नहीं है। वीडियो में कुछ पुलिसकर्मियों के चेहरे ढके हुए या बिना नेम टैग के देखे गए।
सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले
- अनीता ठाकुर बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य (2016): कोर्ट ने माना कि अत्यधिक बल का प्रयोग मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, घायलों को मुआवजा दिया, और कहा कि पुलिस कार्रवाई उचित और जवाबदेह होनी चाहिए।
- मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018): कोर्ट ने दोहराया कि हालांकि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रदर्शनों को विनियमित किया जा सकता है, लेकिन विरोध के अधिकार को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता।
- अमित साहनी बनाम पुलिस कमिश्नर (2020) [शाहीन बाग मामला]: कोर्ट ने पुष्टि की कि असहमति जताना एक संवैधानिक अधिकार है, लेकिन इसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक स्थानों पर अनिश्चितकालीन कब्जा नहीं किया जा सकता।
नाटो (NATO) का अंकारा शिखर सम्मेलन (2026) और भू-राजनीतिक प्रभाव
अंकारा शिखर सम्मेलन का परिचय
- आयोजन: 7-8 जुलाई, 2026.
- स्थान: अंकारा, तुर्की (Türkiye).
- प्रतिभागी: नाटो (North Atlantic Treaty Organization) के 32 सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष या शासनाध्यक्ष.
- उद्देश्य: 2025 के हेग (The Hague) शिखर सम्मेलन के बाद हुई प्रगति की समीक्षा करना और नाटो के प्रमुख उद्देश्यों को पूरा करने के लिए एक नया रोडमैप तैयार करना।
- विशेष स्थिति: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आक्रामक उपस्थिति के बावजूद, इस सम्मेलन को नाटो के सबसे सफल सम्मेलनों में से एक माना गया। ट्रम्प ने अपना अधिकांश समय अमेरिकी रणनीति की सफलता का गुणगान करने और अमेरिकी हथियारों की श्रेष्ठता बताने में बिताया।

रणनीतिक रोडमैप की चार मुख्य प्रतिबद्धताएं
- सामूहिक रक्षा (Article 5): वाशिंगटन संधि के अनुच्छेद 5 के तहत सामूहिक रक्षा और ट्रांसअटलांटिक बॉन्ड के प्रति 32 नाटो सहयोगियों की “अटल प्रतिबद्धता”।
- ‘द हेग’ रक्षा प्रतिबद्धता: सभी सदस्यों द्वारा सर्वसम्मति से यह समर्थन कि 2035 तक वे अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का कम से कम 5% हिस्सा रक्षा पर खर्च करेंगे (यह पहले के 2% खर्च के लक्ष्य से भारी वृद्धि है)।
- यूक्रेन का समर्थन: यूक्रेन की स्वतंत्रता, संप्रभुता और प्रादेशिक अखंडता की रक्षा के लिए नाटो का “अटूट समर्थन”।
- यूरोपीय रक्षा औद्योगिक आधार (DIB): एक हाई-टेक्नोलॉजी, उच्च क्षमता वाले यूरोप-व्यापी रक्षा औद्योगिक आधार (DIB) का निर्माण करना।
नाटो का विस्तार और रूस की प्रतिक्रिया
- रूस का दृष्टिकोण: रूस अमेरिका और यूरोपीय लोकतंत्रों पर अनियंत्रित विस्तारवाद का आरोप लगाता है। पोलैंड, रोमानिया, बाल्टिक देशों और पूर्व सोवियत गणराज्यों को नाटो में शामिल करने को रूस अपने प्रभाव क्षेत्र में हस्तक्षेप मानता है।
- यूक्रेन संघर्ष: 2022 में रूस का यूक्रेन पर आक्रमण इस डर से प्रेरित था कि कीव नाटो में शामिल होने की ओर बढ़ रहा है (जिससे 1949 में 12 सदस्यों से शुरू हुआ नाटो अब 31 सदस्यों तक पहुंच गया था)।
- फिनलैंड और स्वीडन: रूस के आक्रमण ने ऐतिहासिक रूप से तटस्थ रहे फिनलैंड और स्वीडन को अपनी गुटनिरपेक्षता छोड़कर क्रमशः नाटो का 31वां और 32वां सदस्य बनने के लिए प्रेरित किया।
नाटो के बदलाव और रक्षा उत्पादन की चुनौतियाँ
- ऐतिहासिक बदलाव:
- शीत युद्ध की समाप्ति (1990-91) के बाद बाल्कन जैसे क्षेत्रों में ऑपरेशन।
- 2001 के 9/11 हमलों के बाद ‘आतंक पर वैश्विक युद्ध’ (Global War on Terror) में शामिल होना।
- अब रूस और चीन के एक साथ आने से उपजे नए महाशक्ति संघर्ष के दौर में नाटो खुद को फिर से ढाल रहा है।
- रक्षा उद्योग (DIB) का संकट:
- 5% रक्षा खर्च के वादे से पहले ही यूरोपीय रक्षा उद्योग उत्पादन बढ़ाने में संघर्ष कर रहा था। MBDA और Rheinmetall जैसी यूरोपीय रक्षा कंपनियों ने गोला-बारूद के उत्पादन में कमी की चेतावनी दी है।
- ऑपरेशन एपिक फ्यूरी (Operation Epic Fury): ईरान के खिलाफ अमेरिकी-इजरायल बमबारी अभियान ने यह दिखा दिया है कि जब एशियाई सहयोगियों की मांगें यूरोपीय जरूरतों के साथ प्रतिस्पर्धा करती हैं, तो हथियार और गोला-बारूद की भारी कमी हो जाती है। उदाहरण के लिए, इस अभियान के दौरान अमेरिका ने 850 से अधिक टोमाहॉक क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल किया, जिन्हें मौजूदा 85 प्रति वर्ष की उत्पादन दर से बदलने में एक दशक का समय लगेगा।
- रणनीतिक बेमेल: यूक्रेन युद्ध के दौरान एयर डिफेंस मिसाइल, इंटरसेप्टर, सटीक निर्देशित हथियार (precision-guided munitions) और तोपखाने के रॉकेटों की भारी कमी देखी गई।
- अमेरिका पर निर्भरता: 2022-2024 के बीच यूरोप के रक्षा खर्च का आधा हिस्सा अमेरिका से आया (जो 2019-2021 में 28% था)। यूरोपीय ग्राहकों के लिए अमेरिकी फॉरेन मिलिट्री सेल्स (FMS) 2008 के बाद से चौगुनी होकर 2024 में 76 अरब डॉलर तक पहुंच गई है।
भारत के लिए निहितार्थ और आत्म-निर्भरता की आवश्यकता
- विक्रेता का बाजार (Sellers’ Market): यूरोपीय मांग में इस तेज उछाल के कारण वैश्विक हथियार बाजार ‘खरीदार के बाजार’ से ‘विक्रेता के बाजार’ में बदल रहा है।
- भारत पर प्रभाव: इसका पहला संकेत अमेरिकी फर्म जनरल इलेक्ट्रिक (GE) एयरोस्पेस द्वारा भारत को F-404 लड़ाकू जेट इंजन (जो भारतीय वायु सेना के तेजस हल्के लड़ाकू विमान कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण हैं) की आपूर्ति में देरी के रूप में सामने आया है।
- निष्कर्ष: चूंकि भारत का रक्षा क्षेत्र नई पीढ़ी की तकनीकों (जैसे ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और लचीले नेटवर्क) की ओर बढ़ रहा है, इसलिए अन्य देशों पर निर्भर रहने के बजाय भारत के रक्षा उद्योग के लिए आत्म-निर्भर (Self-reliance) बनना बेहद जरूरी हो गया है।