दक्षिण एशिया के केंद्र में स्थित भारत – भूवैज्ञानिक संरचना (India: Geological Structure) भारतवर्ष प्राचीन काल की भूवैज्ञानिक उथल-पुथल से लेकर आधुनिक स्थलाकृतियों के निर्माण तक के क्रमिक और जटिल विवर्तनिक (Tectonic) विकास का एक अनूठा उदाहरण है। प्रागैतिहासिक काल के पैंजिया के विखंडन और गोंदवानालैंड के उत्तरमुखी प्रवाह के साथ, इस महान भूभाग ने प्राचीनतम स्थिर प्रायद्वीपीय पठार, नवीन वलित हिमालय पर्वत श्रेणियों और विशाल सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदानी भागों के रूप में अपनी भौगोलिक अखंडता को प्राप्त किया।
भारतीय भू-गर्भिक संरचना (India: Geological Structure)
पृथ्वी के भू-गर्भिक इतिहास को 5 प्रमुख कल्पों (ERA) में विभाजित किया गया है। ये कल्प पुनः क्रमिक रूप से युगों (EPOCH) में व्यवस्थित किये गये हैं।
प्रत्येक युग पुनः कई उपविभागों में, जिन्हें शक (Period) कहा जाता है, में बंटा है। प्रत्येक शक की कालअवधि निर्धारित की गयी है तथा जीवों और वनस्पतियों के विकास पर भी प्रकाश डाला गया है।
भूगर्भिक काल एवं घटनाएँ
| महाकल्प | कल्प (Period) | युग (Epoch) | आयु/आधुनिक वर्ष पहले (Age/Years before Present) | जीवन/मुख्य घटनाएँ (Life/Major events) |
| नवीनतम | ||||
| नवजीवन (Cenozoic) आज से 6.5 करोड़ वर्ष पहले | चतुर्थ (Quaternary) | अभिनव अत्यंत नूतन | 0 से 10,000 10,000 से 20 लाख वर्ष | आधुनिक मानव आदिमानव (Homo Sapiens) आरंभिक मनुष्य के पूर्वज |
| तृतीयक (Tertiary) | अतिनूतन अल्पनूतन अधिनूतन आदिनूतन पुरानूतन | 20 लाख से 50 लाख 50 लाख से 2.4 करोड़ 2.4 करोड़ से 3.7 करोड़ 3.7 करोड़ से 5.8 करोड़ 5.8 करोड़ से 6.5 करोड़ | वनमानुष, फूल वाले पौधे और वृक्ष मनुष्य से मिलता-जुलता वनमानुष जंतु स्तनपायी खरगोश (Rabbit) छोटे-स्तनपायी-चूहे आदि। | |
| मध्यजीवी (Mesozoic) 6.5 करोड़ से 24.5 करोड़ वर्ष पहले | क्रिटेशियस जुरेसिक ट्रियासिक | 6.5 करोड़ से 14.4 करोड़ 14.4 करोड़ से 20.8 करोड़ 20.8 करोड़ से 24.5 करोड़ वर्ष | डायनासोर का विलुप्त होना। डायनासोर का युग मेंढ़क व समुद्री कछुआ | |
| पुराजीव (24.5 करोड़ वर्ष से 57.0 करोड़ वर्ष पहले) | पर्मियन कार्बोनिफेरस डेवोनियन प्रवालविद/सिलुरियन ऑडोविशियन कैम्ब्रियन | 24.5 करोड़ से 28.6 करोड़ वर्ष 28.6 करोड़ से 36.0 करोड़ 36.0 करोड़ से 40.8 करोड़ वर्ष 40.8 करोड़ से 43.8 करोड़ 43.8 से 50.5 करोड़ वर्ष 50.5 करोड़ से 57.0 करोड़ वर्ष | रेंगने वाले जीवों की अधिकता, जलस्थलचर पहले रेंगने वाले जंतु, रीढ़ की हड्डी वाले पहले जीव। स्थल व जल पर रहने वाले जीव स्थल पर जीवन के प्रथम चिह्न-पौधे पहली मछली स्थल पर कोई जीवन नहीं, जल में बिना रीढ़ की हड्डी वाले जीव | |
| प्राचीनतम | ||||
| प्री-कैम्ब्रियन (57 करोड़ से 4 अरब 80 करोड़ वर्ष पहले) | 57 करोड़ से 2.50 अरब वर्ष 2.5 अरब से 3.8 अरब वर्ष 3.8 अरब से 4.8 अरब वर्ष पहले 5 अरब वर्ष पहले 5 अरब से 13.7 अरब वर्ष पहले 12 अरब वर्ष पहले 13.8 अरब वर्ष पहले |
भारतीय चट्टानों का वर्गीकरण
भारत में सभी भू-वैज्ञानिक कालों में निर्मित चट्टानें पाई जाती हैं, इसलिए भारत की भू-गर्भीय संरचना विविधता पूर्ण है, इसी विविधता के फलस्वरूप प्राकृतिक संसाधनों (खनिज पदार्थ, वनस्पतियाँ इत्यादि) में भी विविधता पायी जाती है।
भू-वैज्ञानिक इतिहास के आधार पर भारतीय भू-भाग की चट्टानों को उनके निर्माण क्रम (प्राचीन से नवीन) के अनुसार क्रमशः वर्गीकृत किया गया है:
- आर्कियन
- धारवाड़
- कुडप्पा
- विंध्यन
- गोंडवाना
- दक्कन ट्रैप
- टर्शियरी
- क्वार्टनरी
1. आर्कियन क्रम की चट्टानें
- निर्माण व स्वरूप: इन चट्टानों का निर्माण गर्म पृथ्वी के ठंडा होने के फलस्वरूप हुआ। ये प्राचीनतम व मूलभूत चट्टानें हैं। अत्यधिक रूपांतरण के कारण इनका मौलिक स्वरूप नष्ट हो चुका है।
- चट्टानों के प्रकार: नीस, ग्रेनाइट, नेफेलाइन, सायनाइट व शिष्ट प्रकार की चट्टानें हैं।
- विशेषता: ये चट्टानें जीवाश्म रहित हैं। इनमें धात्विक व अधात्विक प्रकार के खनिज प्राप्त होते हैं।
- रूपांतरण: आग्नेय चट्टानों के रूपांतरण से नीस का निर्माण होता है। बुंदेलखंड नीस व बेल्लारी नीस सबसे प्राचीन हैं। बंगाल नीस व नीलगिरि नीस भी इन्हीं चट्टानों के उदाहरण हैं।
- विस्तार: यह क्रम प्रायद्वीपीय पठार के 2/3 भाग में विस्तृत है। हिमालय की मध्यवर्ती श्रेणियों में भी ग्रेनाइट, नीस, शिष्ट व फालाइट का जमाव पाया जाता है।
- क्षेत्र: इस समूह की चट्टानें कर्नाटक, तमिलनाडु, राजस्थान (दक्षिण-पूर्वी भाग), मेघालय, आन्ध्रप्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखण्ड (छोटानागपुर पठार) में पाई जाती हैं।
2. धारवाड़ क्रम की चट्टानें
- निर्माण: आर्कियन क्रम की प्राथमिक चट्टानों के अपरदन व निक्षेपण से निर्मित प्राचीनतम् परतदार चट्टानें हैं।
- विशेषता: ये चट्टानें अत्यधिक रूपांतरित हो चुकी हैं एवं इसमें जीवाश्म नहीं मिलते।
- नामकरण: धारवाड़ नाम कर्नाटक के इसी नाम के जनपद पर आधारित है, जहाँ इन शिलाओं की सबसे पहले खोज की गई थी।
- आर्थिक महत्व: भारत के सर्वाधिक धात्विक खनिज इसी क्रम की चट्टानों में पाये जाते हैं। जैसे- लौह अयस्क, तांबा, स्वर्ण, मैंगनीज, क्रोमियम आदि।
- क्षेत्र: कर्नाटक के धारवाड़ और बेल्लारी जिला, अरावली श्रेणियों, बालाघाट, रीवा (म.प्र.), छोटा नागपुर पठार तथा शिलांग के पठार, गुजरात के चम्पानेर श्रेणी में ये चट्टानें पाई जाती हैं।
3. कुडप्पा क्रम की चट्टानें
- निर्माण: धारवाड़ क्रम की चट्टानों के अपरदन व निक्षेपण के फलस्वरूप इनका निर्माण हुआ, फलतः ये भी परतदार चट्टानें हैं।
- नामकरण: आन्ध्र प्रदेश के कुडप्पा जनपद के नाम पर इनका नामकरण हुआ। जहाँ ये शिलायें (चट्टानें) 35,100 वर्ग किमी० की अर्धचन्द्राकार द्रोणी में पायी जाती हैं।
- खनिज संपदा: कुडप्पा चट्टानों में शेल, स्लेट, क्वार्टजाइट, चूना पत्थर, संगमरमर, एस्बेस्टस आदि पाये जाते हैं।
- क्षेत्र: कृष्णा घाटी, नल्लामलाई पहाड़ी क्षेत्र, पापधनी व चेयार घाटी आदि में ये चट्टानें पाई जाती हैं। इसके अलावा छत्तीसगढ़ क्षेत्र, राजस्थान-दिल्ली क्षेत्र एवं मध्य हिमालय में भी ये चट्टानें पाई जाती हैं।
4. विंध्यन क्रम की चट्टानें
- नामकरण व विस्तार: इस क्रम का नामकरण विंध्य पहाड़ियों के नाम पर किया गया है। जहाँ ये चट्टानें अनावरित रूप में देखी जाती हैं। यह क्रम पश्चिम में चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से लेकर पूर्व में सासाराम (बिहार) तक 103,500 वर्ग किमी. क्षेत्र पर फैला है।
- निर्माण: छिछले सागर एवं नदी घाटियों के तलछट के अवसादीकरण व निक्षेपण से निर्मित इन चट्टानों में चूना पत्थर, बलुआ पत्थर, शेल आदि पाये जाते हैं। विंध्य क्रम कुडप्पा चट्टानों के अवसादीकरण एवं निक्षेपीकरण के परिणामस्वरूप हुई है। कुछ क्षेत्रों में विंध्य चट्टानें दक्कन लावा से दब गयी हैं।
- ऐतिहासिक महत्व: इसी संरचना में लाल बलुआ पत्थर पाया जाता है जो भवन निर्माण कार्यों में ऐतिहासिक काल से प्रयुक्त होता रहा है। दिल्ली का लाल किला, कुतुबमीनार, फतेहपुर सीकरी का किला, आगरा का किला जैसी इमारतें इसी पत्थर से निर्मित हुईं।
- हीरे की खानें: मध्य प्रदेश के पन्ना जिला एवं कर्नाटक के गोलकुंडा की हीरे की खानें इसी क्रम की चट्टानों में पाई जाती हैं।
- क्षेत्र: बिहार के सासाराम व रोहतास क्षेत्र, छत्तीसगढ़ का दक्षिणी भाग, आन्ध्र प्रदेश का दक्षिण पूर्वी भाग (तटीय भाग को छोड़कर), कर्नाटक का उत्तरी क्षेत्र, गुजरात एवं राजस्थान में अरावली के निकट के क्षेत्र में ये चट्टानें पाई जाती हैं।
5. गोंडवाना क्रम की चट्टानें
- नामकरण व काल: इसका नामकरण मध्य प्रदेश के गोंड क्षेत्र के नाम पर हुआ। उत्तरी कार्बोनीफेरस युग से लेकर जुरैसिक युग तक इन चट्टानों का निर्माण अधिक हुआ है।
- ऊर्जा संसाधन (कोयला): इसी क्रम की चट्टानों में भारत का लगभग 98% कोयला निक्षेप पाया जाता है।
- विशेषता: ये परतदार चट्टानें हैं एवं इनमें मछलियों तथा रेंगने वाले जीवों के अवशेष प्राप्त होते हैं।
- निर्माण प्रक्रिया: कार्बोनीफेरस युग में प्रायद्वीपीय भारत में कई दरारों का निर्माण हुआ। इन दरारों के बीच भूमि के धंसने से घाटीनुमा गर्तों का निर्माण हुआ। इसमें तत्कालीन वनस्पतियों के दबने से कालांतर में कोयले का निर्माण हुआ।
- नदी घाटियाँ: यह कोयला आज मुख्य रूप से दामोदर, सोन, महानदी, गोदावरी, वर्धा आदि नदी-घाटियों में पाया जाता है। इसीलिए प्रायद्वीप पठार का पूर्वी क्षेत्र कोयला भण्डार की दृष्टि से सर्वाधिक सम्पन्न क्षेत्र है।
- विशेष नोट: दामोदर नदी बेसिन में गोंडवाना संरचना का सर्वाधिक विकास हुआ है।
6. दक्कन ट्रैप
- निर्माण व काल: मेसोजोइक युग के अंतिम चरण (क्रिटेशियस युग) में प्रायद्वीपीय भारत में ज्वालामुखी क्रिया प्रारम्भ हुई। इस प्रकार दरारों के माध्यम से लावा के उद्गार और जमाव के फलस्वरूप इन चट्टानों का निर्माण हुआ।
- नामकरण: दरारी उद्भेदन से सोपानिक रचना वाले इस ज्वालामुखी पठार को ‘दक्कन ट्रैप’ कहते हैं। स्वीडिश भाषा में ट्रैप का अर्थ ‘सोपान’ या ‘कदम’ होता है।
- खनिज व मिट्टी: इस संरचना में मुख्यतः बेसाल्ट और डोलोराइट पाये जाते हैं। बेसाल्ट के अपघटन से ‘काली मिट्टी’ रेगुर का निर्माण हुआ है।
- विस्तार व मोटाई: यह संरचना महाराष्ट्र के अधिकांश भाग, गुजरात, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु एवं आन्ध्र प्रदेश में पाई जाती है। मुंबई तट के सहारे इसकी मोटाई लगभग 3000 मी० है जबकि पूर्व की ओर उत्तरोत्तर कमी देखी जाती है।
7. टर्शियरी क्रम की चट्टानें
- महत्व: भारत की भू-गर्भिक संरचना के विकास में तृतीय युग का विशेष महत्व है क्योंकि इसी युग के दौरान देश की वर्तमान समाकृति की रूपरेखा तैयार हो सकी।
- महत्वपूर्ण घटनाएँ: इस युग की दो महत्वपूर्ण घटनायें हैं:
- (i) गोंडवाना लैण्ड का अन्तिम रूप से विखण्डन एवं इसके बड़े भाग का समुद्र में निमज्जन।
- (ii) टेथिस के भूअभिनतिक अवसादों के उत्थापन से हिमालय की ऊँची श्रृंखलाओं का निर्माण।
- भू-गर्भिक क्रियाएँ: इसी दौरान प्रायद्वीपीय क्षेत्र का भ्रंशन एवं इसके विखण्डित खण्डों का अरब सागर एवं बंगाल की खाड़ी में निमज्जन हुआ। टर्शियरी चट्टानें बाह्य प्रायद्वीपीय भू-भाग में प्रमुख रूप से पायी जाती हैं।
- क्षेत्र: किरथर सुलेमान क्षेत्र, कश्मीर हिमालय क्षेत्र, उत्तरी-पूर्वी हिमालय क्षेत्र, अराकानयोमा क्षेत्र एवं प्रायद्वीपीय भारत का तटीय क्षेत्र इसी काल में विकसित हुये।
8. क्वार्टनरी (नवजीव) क्रम की चट्टानें
- निर्माण व विशेषता: यह भारत की नवीनतम् भू-गर्भिक संरचना है। अभिनूतन एवं नूतन काल की सबसे महत्वपूर्ण भू-गर्भिक संरचना (भारत का उत्तरी मैदान का विकास) प्रायद्वीप एवं हिमालय के मध्य स्थित एक द्रोणीनुमा गर्त में हुआ है।
- मैदानी संरचना: टेथिस भू-सन्नति के निरन्तर संकरा होने व छिछला होने एवं हिमालयी व दक्षिण भारतीय नदियों द्वारा लाये गये अवसादों के जमाव से निर्मित हुआ। इसके पुराने जलोढ़ ‘बांगार’ एवं नये जलोढ़ ‘खादर’ कहलाते हैं।
- ऊर्जा संसाधन: इस मैदानी भाग में प्राचीन वन प्रदेशों के दब जाने से कोयला और पेट्रोलियम के भंडार क्षेत्र मिलते हैं।
- विस्तार क्षेत्र: इसके अन्तर्गत गुजरात, पश्चिमी राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, असम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा का पूर्वी भाग, आन्ध्र प्रदेश का पूर्वी भाग और तमिलनाडु का पूर्वी भाग आते हैं।
- मरुस्थल व तटीय क्षेत्र: थार के मरुस्थल में प्लायोसीन युग के निक्षेप मिलते हैं। ‘कच्छ का रण’ जो पहले समुद्र का भाग था इसी काल में अवसादी निक्षेप से भर गया।
- कश्मीर घाटी व करेवा: कश्मीर घाटी का निर्माण प्लिस्टोसीन काल में हुआ। यह घाटी प्रारम्भ में एक झील थी। इसमें अवसादों के क्रमिक जमाव से वर्तमान रूप का निर्माण हुआ जो ‘करेवा’ के नाम से जाना जाता है।
भारत में हिमयुग
- परिभाषा: हिमयुग (हिमानियों का युग) पृथ्वी के जीवन में आने वाले ऐसे युगों को कहते हैं जिनमें पृथ्वी की सतह और वायुमण्डल का तापमान लम्बे समय के लिए कम हो जाता है, जिससे महाद्वीपों के बड़े भू-भाग पर हिमानियाँ (ग्लेशियर) फैल जाती हैं।
- समय काल: आज से लगभग 29000 वर्ष पूर्व (अभिनूतन काल) आखिरी था। माना जाता है कि यह हिमयुग 12,000 वर्ष पूर्व समाप्त हो गया।
- प्रभाव (उत्तरी भारत): जब यह हिमयुग अपनी चरम सीमा पर था तो उत्तरी भारत का काफी बड़ा भाग हिमानियों (बर्फ) की मोटी चादर से हजारों साल तक ढका रहा। इसका सर्वाधिक प्रभाव उत्तरी अवस्थिति और ऊंचाई के कारण हिमालय क्षेत्र में देखा गया।
- विशेषता व विस्तार: इसका सतत विस्तार न होकर चार उप-कालों में बंटा था जिसके बीच-बीच में उष्ण काल विद्यमान था। हिमालय क्षेत्र में 1800 मीटर की ऊंचाई तक विस्तृत हिमनद के प्रभाव मिले हैं।
- हिमानी झीलें: इसी हिम युग के दौरान ही हिमालय के विभिन्न भागों में हिमोढ़, अवरोधों तथा हिमानी के अपरदनात्मक क्रिया से अनेकों हिमानी झीलों का निर्माण हुआ, जैसे कैलाशकुण्ड, सनासर बेसिन, गुलमर्ग बेसिन, अलपत्री, शेषनाग, कौंसरनाग इत्यादि प्रमुख हैं।
- प्रायद्वीपीय भारत: इस काल में भारत के प्रायद्वीपीय भाग में हिमानीकरण के कोई संकेत नहीं मिलते।
भारत में घटित ज्वालामुखी क्रियाएँ एवं क्षेत्र
भारत में सर्वप्रथम ज्वालामुखी क्रिया धारवाड़ युग में हुई। उसके बाद कुडप्पा, विंध्यन, पैल्योजोइक, कार्बोनीफेरस, मेसोजोइक के अन्त तथा टर्शियरी के प्रारम्भ में हुई।
- वर्तमान स्थिति: वर्तमान में भारत की मुख्य भूमि पर ज्वालामुखी क्रिया शून्य है। बंगाल की खाड़ी में स्थित बैरन द्वीप में हाल ही में ज्वालामुखी क्रिया हुई थी, यह भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी पर्वत है।
भारत के छः क्षेत्रों में ज्वालामुखी क्रिया हुई—
- धारवाड़ युग में डालमा सीरीज में
- कुडप्पा युग में कुडप्पा-बीजापुर ग्वालियर प्रदेश
- विंध्यन युग में मलानी (जोधपुर-राजस्थान) प्रदेश में
- पैल्योजोइक युग में कुमायूँ हिमालय, सतलज घाटी तथा पीरपंजाल श्रेणियों में
- मैसोजोइक युग में राजमहल पहाड़ियों तथा अबोर श्रेणियों (अरूणाचल प्रदेश) में।
- क्रिटेशस के अंत तथा टर्शियरी युग के आरंभ में दक्कन के पठार पर व्यापक रूप से ज्वालामुखी क्रिया हुई।