15 July 2026 PIB Summary for UPSC in Hindi Pdf के अंतर्गत पूर्वोत्तर भारत में सीमा सुरक्षा और विकास को धार देने वाला नेसाक (NESAC) का स्पेस-बेस्ड मिशन, देश के पहले ‘त्रिभुवन’ सहकारी विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक दीक्षांत समारोह, पंचायतों को वित्तीय रूप से सक्षम बनाने वाला ‘आत्मनिर्भर पंचायत कार्यक्रम’, भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को यूरेनियम की सुरक्षा देने वाला ‘भारत-ऑस्ट्रेलिया नागरिक परमाणु सहयोग’ और औद्योगिक दुर्घटनाओं से मानव जीवन की रक्षा करने वाला CeNS बेंगलुरु का अल्ट्रा-सेंसिटिव अमोनिया सेंसर शामिल हैं।
कैपासीटीज कार्यक्रम: शहरी जलवायु लचीलापन और नेट-जीरो कार्य योजना
- प्रारंभिक परीक्षा: कैपासीटीज कार्यक्रम, राष्ट्रीय शहरी मामलों के संस्थान (NIUA), नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन 2070 लक्ष्य, पंचामृत प्रतिज्ञा।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 3): पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण; जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए शहरी अनुकूलन (Urban Adaptation); बुनियादी ढांचा (शहरी परिवहन और ऊर्जा); सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप।
Why in News? (चर्चा में क्यों?)
14 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में भारतीय शहरों को कम कार्बन उत्सर्जन और जलवायु-अनुकूल बनाने वाले ‘कैपासीटीज’ कार्यक्रम के शानदार 10 वर्ष पूरे होने पर एक विशेष राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। ‘स्केलिंग अर्बन क्लाइमेट रेजिलिएंस: द कैपासीटीज लेगेसी एंड वे फॉरवर्ड’ नामक इस कार्यक्रम का आयोजन ‘इक्ली साउथ एशिया’ और राष्ट्रीय शहरी मामलों के संस्थान (NIUA) द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। इस अवसर पर भारतीय शहरों को नेट-जीरो की राह पर ले जाने के लिए तीन महत्वपूर्ण ‘नॉलेज प्रोडक्ट्स’ (दस्तावेज) भी लॉन्च किए गए।
‘कैपासीटीज’ परियोजना क्या है?
इस परियोजना का मूल उद्देश्य भारतीय शहरों को ऐसे उपकरणों और क्षमता से लैस करना है ताकि वे अपने विकास नियोजन में जलवायु चिंताओं को शामिल कर सकें:
- शुरुआत और वित्तपोषण: यह परियोजना वर्ष 2016 में शुरू की गई थी, जिसे भारत और भूटान में स्विस दूतावास (Embassy of Switzerland) द्वारा वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है।
- सहयोगी भागीदार: इसे ‘इक्ली साउथ एशिया, ‘साउथ पोल’ और ‘इकोन्सेप्ट’ द्वारा क्रियान्वित किया जा रहा है, जिसमें NIUA ज्ञान भागीदार (Knowledge Partner) की भूमिका में है।
- राष्ट्रीय लक्ष्यों से जुड़ाव: यह कार्यक्रम स्थानीय स्तर पर ठोस कदम उठाकर भारत के वर्ष 2070 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य और प्रधानमंत्री के ‘पंचामृत’ लक्ष्यों (जैसे मिशन LiFE, स्मार्ट सिटी मिशन, अमृत 2.0) का समर्थन करता है।
पिछले एक दशक में कार्यक्रम के महत्वपूर्ण प्रभाव
इस कार्यक्रम ने देश के 8 प्रमुख शहरों (कोयंबटूर, तिरुचिरापल्ली, तिरुनेलवेली, अहमदाबाद, राजकोट, वडोदरा, उदयपुर और सिलीगुड़ी) में व्यावहारिक जमीनी बदलाव दिखाए हैं:
1. नेट-जीरो क्लाइमेट रेजिलिएंट सिटी एक्शन प्लान (CRCAPs)
- उपर्युक्त आठों शहरों के लिए विशेष जलवायु कार्ययोजनाएं तैयार की गई हैं जो उत्सर्जन कम करने और आपदाओं से निपटने का खाका प्रदान करती हैं।
2. संस्थागत बदलाव
- शहरों के स्थानीय निकायों (ULBs) में दीर्घकालिक योजना, बजट आवंटन और निगरानी के लिए स्थायी नेट-जीरो और क्लाइमेट एक्शन सेल स्थापित किए गए हैं।
3. सफल जमीनी परियोजनाएं
| शहर (State) | लागू किया गया सफल मॉडल |
| अहमदाबाद (गुजरात) | सौर-ऊर्जा संचालित ई-बस चार्जिंग स्टेशन की स्थापना। |
| कोयंबटूर (तमिलनाडु) | 154 kWp क्षमता वाले देश के अभिनव तैरते हुए सौर संयंत्र (Floating Solar Plant) का विकास। |
| राजकोट (गुजरात) | 100 रियायती ई-ऑटो के साथ ‘ग्रीन मोबिलिटी जोन’ की शुरुआत। |
| तिरुचिरापल्ली (तमिलनाडु) | शहरी जल निकायों और झीलों का पारिस्थितिक पुनरुद्धार। |
| तिरुनेलवेली (तमिलनाडु) | संभावित बाढ़ से सुरक्षा के लिए अत्याधुनिक ‘अर्ली फ्लड वार्निंग सिस्टम’। |
| वडोदरा (गुजरात) | तेजी से घने वन विकसित करने के लिए ‘मियावाकी शहरी वानिकी’ मॉडल। |
नए लॉन्च किए गए तीन ‘नॉलेज प्रोडक्ट्स’
शहरी नीति निर्माताओं और इंजीनियरों की मदद के लिए निम्नलिखित मार्गदर्शिकाएं जारी की गई हैं:
- नेट-जीरो क्लाइमेट रेजिलिएंट सिटीज मेथोडोलॉजी टूलकिट: शहरों को अपनी कार्ययोजना बनाने का वैज्ञानिक तरीका सिखाने के लिए।
- भारत में शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) के लिए ऊर्जा संक्रमण: एक व्यावहारिक गाइडबुक: ऊर्जा स्रोतों को हरित बनाने का व्यावहारिक खाका।
- कम कार्बन कल्प की ओर शहरों के संक्रमण को सुगम बनाना (व्हाइट पेपर): हरित परियोजनाओं के लिए वित्तीय पूंजी के प्रवाह को आसान बनाना।
प्रारंभिक परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
| संस्था / कार्यक्रम | महत्वपूर्ण बिंदु |
| NIUA | राष्ट्रीय शहरी मामलों के संस्थान; यह केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत शहरी क्षेत्र के अनुसंधान और क्षमता निर्माण के लिए एक शीर्ष स्वायत्त निकाय है। |
| ICLEI South Asia | पर्यावरण और सतत विकास के लिए काम करने वाला स्थानीय सरकारों का एक वैश्विक नेटवर्क (International Council for Local Environmental Initiatives)। |
| मियावाकी तकनीक | जापानी वनस्पति वैज्ञानिक अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित पद्धति, जिसमें बहुत कम जगह में देशी प्रजातियों के पौधे लगाकर कम समय में घने वन बनाए जाते हैं। |
CAC49 में भारत की ऐतिहासिक सफलता: वैश्विक खाद्य मानकों में बढ़ी धाक
- प्रारंभिक परीक्षा: कोडेक्स एलीमेंटेरियस कमीशन (CAC), FSSAI, काजू की गुठली (Cashew Kernels) हेतु मानक, सूखी धनिया और कढ़ी पत्ता मानक।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 2 & 3): भारत के हितों पर विकसित और विकासशील देशों की नीतियों का प्रभाव; महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान और उनका ढांचा; खाद्य सुरक्षा और कृषि निर्यात; तकनीकी बाधाएं (Technical Barriers to Trade – TBT)।
Why in News? (चर्चा में क्यों?)
6 से 10 जुलाई 2026 तक जेनेवा (स्विट्जरलैंड) में आयोजित कोडेक्स एलीमेंटेरियस कमीशन के 49वें सत्र (CAC49) में भारत ने वैश्विक खाद्य सुरक्षा मानकों के निर्धारण में एक बड़ी कूटनीतिक और तकनीकी सफलता हासिल की है। भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) श्री रजित पुन्हानी ने किया। इस सत्र में भारत की अध्यक्षता में तैयार किए गए सात महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मानकों को मंजूरी दी गई और भारतीय काजू के लिए वैश्विक मानक विकसित करने के भारत के प्रस्ताव को भी सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया।
भारत की अगुआई में अपनाए गए 7 कोडेक्स मानक
इस सम्मेलन में भारत की अध्यक्षता और सह-अध्यक्षता में विकसित निम्नलिखित अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाया गया, जो वैश्विक व्यापार में भारतीय कृषि उत्पादों को नई पहचान दिलाएंगे:
1. भारत की अध्यक्षता में अपनाए गए मानक:
- सूखे धनिए के बीज (Dried Coriander Seeds): यह वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक व्यापार किए जाने वाले मसालों में से एक के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार को सुगम बनाएगा।
- ताजे कढ़ी पत्ते (Fresh Curry Leaves): पहली बार इस क्षेत्रीय जड़ी-बूटी के लिए एक अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क स्थापित किया गया है।
2. भारत की सह-अध्यक्षता में अपनाए गए मानक:
- इलायची और वैनिला (Large Cardamom & Vanilla): इन मूल्यवान वैश्विक वस्तुओं के लिए गुणवत्ता आवश्यकताओं का मानकीकरण किया गया।
- खाद्य उत्पादन में जल का सुरक्षित पुनः उपयोग (Safe Use and Reuse of Water): खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों में टिकाऊ जल प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए नए दिशानिर्देश।
- चिकन मीट में रोगजनक नियंत्रण: पोल्ट्री क्षेत्र में ‘कैम्पिलोबैक्टर’ और ‘साल्मोनेला’ बैक्टीरिया के नियंत्रण हेतु कड़े नियम, जिससे खाद्य जनित बीमारियां कम होंगी।
- प्रीपैकेज्ड खाद्य पदार्थों की लेबलिंग: संयुक्त प्रस्तुतीकरण और मल्टीपैक प्रारूपों के लिए स्पष्ट लेबलिंग नियम लागू किए गए।
‘काजू की गुठली’ के लिए नया मानक
सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक भारत के उस प्रस्ताव को मंजूरी मिलना था, जिसके तहत अब काजू की गुठली के लिए एक समर्पित कोडेक्स मानक विकसित किया जाएगा:
- संचालन समिति: यह कार्य ‘प्रसंस्कृत फल और सब्जियां कोडेक्स समिति’ (CCPFV) के तहत किया जाएगा।
- भारत को लाभ: भारत दुनिया के सबसे बड़े काजू उत्पादकों और निर्यातकों में से एक है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के सामंजस्य (Harmonization) से भारतीय निर्यातकों के लिए व्यापार की तकनीकी बाधाएं (TBT) कम होंगी और वैश्विक बाजारों तक पहुंच आसान होगी।
- नई खाद्य प्रणालियों में नेतृत्व: भारत को ‘न्यू फूड सोर्सेज एंड प्रोडक्शन सिस्टम्स’ (NFPS) के लिए गठित इलेक्ट्रॉनिक वर्किंग ग्रुप का सह-अध्यक्ष भी चुना गया है, जो भविष्य के वैश्विक खाद्य नियमों पर काम करेगा।
कोडेक्स एलीमेंटेरियस कमीशन (CAC) क्या है?
- स्थापना: इसकी स्थापना वर्ष 1963 में की गई थी।
- जनक संस्थाएं: यह खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा संयुक्त रूप से स्थापित एक अंतर-सरकारी निकाय है।
- कार्य: इसका मुख्य कार्य उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की रक्षा करना और खाद्य व्यापार में निष्पक्ष प्रथाओं को सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय खाद्य मानक, दिशानिर्देश और कोड ऑफ प्रैक्टिस तैयार करना है।
- मुख्यालय: जेनेवा, स्विट्जरलैंड।
प्रारंभिक परीक्षा हेतु मुख्य तथ्य
| संस्था / पहल | मुख्य तथ्य |
| FSSAI | खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत स्थापित एक वैधानिक स्वायत्त निकाय; यह केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है। |
| Spices Board | वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत कार्य करने वाला वैधानिक निकाय, जो भारतीय मसालों के विकास और निर्यात संवर्धन के लिए जिम्मेदार है। |
| CCPFV | Codex Committee on Processed Fruits and Vegetables; यह प्रसंस्कृत फलों और सब्जियों के वैश्विक मानकों का निर्धारण करने वाली विशिष्ट कोडेक्स समिति है। |
नेसाक: पूर्वोत्तर में सीमा प्रबंधन और विकास को रफ्तार दे रही अंतरिक्ष तकनीक
- प्रारंभिक परीक्षा: उत्तर पूर्वी अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (NESAC), इसरो, भू-स्थानिक मानचित्रण (Geospatial Mapping), आपदा प्रबंधन।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 3): विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास और रोजमर्रा के जीवन में अनुप्रयोग; अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी; सीमा सुरक्षा और बुनियादी ढांचा; आपदा प्रबंधन (बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली)।
Why in News? (चर्चा में क्यों?)
14 जुलाई 2026 को केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष मंत्रालय, डॉ. जितेंद्र सिंह ने मेघालय के उमियम (Umiam) में उत्तर पूर्वी अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (NESAC) का दौरा किया। इस अवसर पर उन्होंने पूर्वोत्तर क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक विकास और देश की रणनीतिक प्राथमिकताओं (जैसे सीमा प्रबंधन) को मजबूत करने में ‘नेसाक’ की बढ़ती भूमिका की सराहना की। वर्तमान में नेसाक पूर्वोत्तर के 8 राज्यों में लगभग 130 अंतरिक्ष अनुप्रयोग परियोजनाओं (Space Application Projects) पर काम कर रहा है।
नेसाक की प्रमुख परियोजनाएं और उनके अनुप्रयोग
1. सीमा प्रबंधन और सुरक्षा (Border Management)
- भारत-म्यांमार सीमा का मानचित्रण: देश की रणनीतिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए भारत-म्यांमार अंतर्राष्ट्रीय सीमा का अत्याधुनिक भू-स्थानिक मानचित्रण (Geospatial Mapping) किया जा रहा है।
- अंतर-राज्यीय सीमा विवाद सुलझाना: पूर्वोत्तर राज्यों के बीच दशकों पुराने सीमा विवादों को वैज्ञानिक रूप से हल करने के लिए उपग्रह आधारित मानचित्रण का उपयोग किया जा रहा है।
2. आपदा प्रबंधन (Disaster Management)
- बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली (FLEWS): असम और आसपास के राज्यों में बाढ़ के खतरों को कम करने के लिए मौसम और उपग्रह डेटा आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को और अधिक सटीक बनाया जा रहा है।
- जल संचयन: चेरापूंजी के रामकृष्ण मिशन में अपनाए गए जल संचयन (Water Harvesting) मॉडल की तर्ज पर पूर्वोत्तर में जल सुरक्षा मजबूत की जा रही है।
3. कृषि और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन
- बांस का मानचित्रण (Bamboo Mapping): पूर्वोत्तर बेंत और बांस विकास परिषद (NECBDC) के साथ मिलकर बांस संसाधनों का वैज्ञानिक मानचित्रण किया जा रहा है, ताकि स्थानीय लोगों के लिए आजीविका के नए अवसर पैदा किए जा सकें।
4. पर्यटन और संस्कृति को बढ़ावा
- ‘ManzilNE’ जियोटूरिज्म डैशबोर्ड: पूर्वोत्तर की प्राकृतिक, पारिस्थितिक और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देने के लिए निजी पर्यटन क्षेत्र की भागीदारी के साथ इस अनूठे डैशबोर्ड को सशक्त किया जा रहा है।
उत्तर पूर्वी अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (NESAC) क्या है?
- स्थापना: यह वर्ष 2000 में स्थापित एक संयुक्त पहल है।
- साझा प्रयास: यह अंतरिक्ष विभाग (DoS)/इसरो और उत्तर पूर्वी परिषद (NEC) का एक संयुक्त उपक्रम है।
- मुख्यालय/स्थान: उमियम, शिलांग (मेघालय)।
- उद्देश्य: पूर्वोत्तर क्षेत्र (अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा) को उन्नत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी (जैसे रिमोट सेंसिंग, उपग्रह संचार और आपदा प्रबंधन सहायता) के माध्यम से विकास की मुख्यधारा से जोड़ना।
पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए उपग्रह आधारित विकास के प्रमुख क्षेत्र
| क्षेत्र (Sector) | उपयोग की जाने वाली तकनीक |
| दूरसंचार | दुर्गम पहाड़ी इलाकों में उपग्रह संचार SatCom के जरिए शिक्षा EduSat और टेली-मेडिसिन नेटवर्क का विस्तार। |
| शहरी विकास | भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) का उपयोग करके स्मार्ट शहरों का नियोजन और वन आवरण की निगरानी। |
| ड्रोन तकनीक | कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में ड्रोन (UAV) का उपयोग करके सटीक कृषि और आपातकालीन चिकित्सा आपूर्ति। |
प्रारंभिक परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
| संस्था / शब्दावली | महत्वपूर्ण तथ्य |
| उत्तर पूर्वी परिषद (NEC) | गृह मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत कार्य करने वाला एक वैधानिक निकाय, जिसे उत्तर पूर्वी परिषद अधिनियम, 1971 के तहत पूर्वोत्तर राज्यों के विकास के लिए गठित किया गया था। |
| भू-स्थानिक डेटा | ऐसा डेटा जिसमें किसी वस्तु, घटना या क्षेत्र की पृथ्वी की सतह पर सटीक भौगोलिक स्थिति (Latitude/Longitude) शामिल होती है। |
‘त्रिभुवन’ सहकारी विश्वविद्यालय का पहला दीक्षांत समारोह: सहकारिता क्षेत्र में ऐतिहासिक शैक्षणिक क्रांति
- प्रारंभिक परीक्षा: ‘त्रिभुवन’ सहकारी विश्वविद्यालय, ‘सहकार से समृद्धि’ विजन, श्वेत क्रांति 2.0, पैक्स, अमूल।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 2 & 3): विकास प्रक्रिया और विकास उद्योग- गैर-सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों, विभिन्न समूहों और संघों, दानकर्ताओं, संस्थागत और अन्य हितधारकों की भूमिका; कृषि और उससे संबंधित क्षेत्र; समावेशी विकास और इससे उत्पन्न विषय।
Why in News? (चर्चा में क्यों?)
14 जुलाई 2026 को सहकारिता और नागरिक उड्डयन केंद्रीय राज्य मंत्री श्री मुरलीधर मोहोल ने गुजरात के आणंद में ‘त्रिभुवन’ सहकारी विश्वविद्यालय के पहले दीक्षांत समारोह की अध्यक्षता की। यह देश का पहला ऐसा राष्ट्रीय विश्वविद्यालय है जो पूरी तरह से सहकारी क्षेत्र (Cooperative Sector) के शैक्षणिक और व्यावसायिक सशक्तिकरण के लिए समर्पित है। समारोह के दौरान विश्वविद्यालय के पहले बैच के 302 छात्रों को स्नातक और 2 छात्रों को पीएचडी की उपाधि प्रदान की गई।
‘त्रिभुवन’ सहकारी विश्वविद्यालय: पृष्ठभूमि और विरासत
- स्थापना और आधार: यह विश्वविद्यालय आणंद (गुजरात) में स्थित ‘ग्रामीण प्रबंधन संस्थान’ (IRMA – Institute of Rural Management Anand) की लगभग 45 वर्षों की समृद्ध शैक्षणिक विरासत पर आधारित है।
- राष्ट्रीय महत्व का संस्थान: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वर्ष 2025 में IRMA को राष्ट्रीय महत्व के संस्थान (Institution of National Importance) का दर्जा दिया गया और इसे ‘त्रिभुवन’ सहकारी विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित किया गया।
- नामकरण का आधार: इसका नाम प्रसिद्ध सहकारी नेता त्रिभुवनदास पटेल के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रेरणा से 1946 में खेड़ा जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ की स्थापना की थी, जो बाद में ‘अमुल’ के नाम से विश्व प्रसिद्ध हुआ।
सहकारिता क्षेत्र में बड़े नीतिगत बदलाव और नए आयाम
दीक्षांत समारोह के दौरान केंद्रीय मंत्री ने देश में सहकारिता आंदोलन को आधुनिक, पारदर्शी और पेशेवर बनाने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए प्रमुख कदमों पर प्रकाश डाला:
1. श्वेत क्रांति 2.0 (White Revolution 2.0)
- लक्ष्य: इसका मुख्य उद्देश्य अगले पांच वर्षों में देश में दूध खरीद (Milk Procurement) को 50 प्रतिशत तक बढ़ाना है। महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए सहकारी समितियों के निदेशक मंडलों में उनके प्रतिनिधित्व को अनिवार्य किया गया है।
2. मानव संसाधन की भारी मांग
- 17 लाख युवाओं की आवश्यकता: आने वाले वर्षों में सहकारिता क्षेत्र के विस्तार को देखते हुए देश में 17 लाख से अधिक प्रशिक्षित युवाओं की आवश्यकता होगी। यह विश्वविद्यालय पेशेवरों और शोधकर्ताओं को तैयार कर इस कमी को पूरा करेगा।
- उभरते क्षेत्र: सहकारिता का दायरा अब पारंपरिक क्षेत्रों (जैसे डेयरी, चीनी, उर्वरक) से आगे बढ़कर जैविक खेती (Organic Farming), पर्यटन, बीमा, खाद्य प्रसंस्करण और डिजिटल सेवाओं तक फैल चुका है।
3. ‘भारत टैक्सी’- सहकारी अर्थव्यवस्था का नया मॉडल
- ड्राइवर ही मालिक: यह ‘द ड्राइवर इज द ओनर’ की अवधारणा पर आधारित ऐप-आधारित टैक्सी सेवा का एक अनूठा सहकारी मॉडल है। अगले दो वर्षों में इसे देश के लगभग 500 शहरों में विस्तारित करने की योजना है।
4. संस्थागत वित्तीय सहायता में ऐतिहासिक वृद्धि
- NCDC का योगदान: राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) द्वारा सहकारी समितियों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। जहां 1963 से 2014 तक केवल ₹55,000 करोड़ की सहायता दी गई थी, वहीं 2014 से 2025 के बीच यह राशि बढ़कर लगभग ₹4.5 लाख करोड़ पहुंच गई है।
सहकारी पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने वाली प्रमुख संस्थाएं
सरकार ने किसानों को ‘बीज से बाजार’ तक एक एकीकृत मंच प्रदान करने के लिए कई राष्ट्रीय स्तर की बहु-राज्य सहकारी समितियों का गठन किया है:
- NCEL (National Cooperative Exports Limited): सहकारी उत्पादों के वैश्विक निर्यात को बढ़ावा देने के लिए।
- NCOL (National Cooperative Organics Limited): जैविक कृषि उत्पादों के प्रमाणीकरण और विपणन के लिए।
- BBSSL (Bharatiya Beej Sahakari Samiti Limited): गुणवत्तापूर्ण बीजों के संरक्षण और वितरण के लिए।
- NUCFDC: शहरी सहकारी बैंकों (UCBs) के लिए एक छत्र संगठन (Umbrella Organisation) के रूप में कार्य करता है।
प्रारंभिक परीक्षा हेतु मुख्य तथ्य
| पहल / संस्था | मुख्य तथ्य |
| सहकारिता मंत्रालय | जुलाई 2021 में ‘सहकार से समृद्धि’ के सपने को साकार करने के लिए एक स्वतंत्र मंत्रालय के रूप में गठित किया गया। केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह इसके पहले मंत्री हैं। |
| पैक्स (PACS) | Primary Agricultural Credit Societies; अगले पांच वर्षों में देश भर में 2 लाख बहुउद्देशीय पैक्स स्थापित करने का लक्ष्य है, जिनमें से 35,000 से अधिक पहले ही सक्रिय हो चुके हैं। |
| सहकारी लोकपाल और चुनाव प्राधिकरण | सहकारी समितियों में पारदर्शिता और सुशासन सुनिश्चित करने तथा स्वतंत्र व समयबद्ध चुनाव कराने के लिए इन संस्थाओं का गठन किया गया है। |
आत्मनिर्भर पंचायत कार्यक्रम: पंचायतों की वित्तीय आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम
- प्रारंभिक परीक्षा: आत्मनिर्भर पंचायत कार्यक्रम, राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान (RGSA), खुद का राजस्व स्रोत (Own Source Revenue – OSR), नाबार्ड , हुडको।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 2): स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government) – शक्तियां, कार्य और चुनौतियां; विकेंद्रीकरण और वित्तीय स्वायत्तता; पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) का सशक्तीकरण।
Why in News? (चर्चा में क्यों?)
13 और 14 जुलाई 2026 को केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय ने ‘आत्मनिर्भर पंचायत कार्यक्रम’ के तहत सात राज्यों के लिए वर्चुअल आउटरीच कार्यशालाओं का आयोजन किया। इन राज्यों में छत्तीसगढ़, पंजाब, असम, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं। इस पहल के माध्यम से अब तक देश के 10 राज्यों में इस कार्यक्रम का विस्तार किया जा चुका है। इसका मुख्य उद्देश्य पंचायतों को अपने खुद के राजस्व स्रोतों (Own Source Revenue – OSR) को मजबूत कर वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाना है।
आत्मनिर्भर पंचायत कार्यक्रम क्या है?
यह कार्यक्रम पंचायती राज मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान (RGSA) के तहत संचालित किया जा रहा है:
- मूल उद्देश्य: स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों, अप्रयुक्त संपत्तियों और नए विचारों का उपयोग करके पंचायतों के लिए स्थायी राजस्व स्रोत विकसित करना।
- राष्ट्रीय चुनौती प्रक्रिया (National Challenge Process): इस कार्यक्रम के तहत पात्र पंचायतों से स्थानीय स्तर पर राजस्व उत्पन्न करने वाले अभिनव (Innovative) प्रोजेक्ट प्रस्ताव आमंत्रित किए जाते हैं।
पात्रता मानदंड (Eligibility Criteria):
प्रस्ताव भेजने के लिए पंचायतों को निम्नलिखित शर्तों को पूरा करना अनिवार्य है:
- ग्राम पंचायतें: न्यूनतम ₹50 लाख का वार्षिक खुद का राजस्व (OSR) होना चाहिए।
- ब्लॉक पंचायतें: न्यूनतम ₹1 करोड़ का वार्षिक खुद का राजस्व (OSR) होना चाहिए।
- कार्यकाल: दोनों श्रेणियों की पंचायतों का न्यूनतम 3 वर्ष का कार्यकाल शेष होना अनिवार्य है।
फंडिंग और तकनीकी सहायता :
चयनित प्रस्तावों को बैंक-योग्य परियोजनाओं (Bankable Projects) में बदलने के लिए तकनीकी सहायता दी जाती है। इनकी फंडिंग निम्नलिखित माध्यमों से की जाती है:
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP – Public-Private Partnership)
- कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR – Corporate Social Responsibility)

- बैंक ऋण और विभिन्न सरकारी योजनाओं का अभिसरण (Convergence)।
- संस्थागत भागीदार: नाबार्ड और हुडको इस कार्यक्रम के आधिकारिक वित्तीय और परियोजना विकास भागीदार हैं।
भारत में पंचायतों की वित्तीय स्थिति और चुनौतियाँ
भारतीय संविधान के 73वें संशोधन (1992) ने पंचायतों को संवैधानिक दर्जा तो दिया, लेकिन वित्तीय स्वायत्तता के मामले में ये आज भी काफी हद तक निर्भर हैं:
- अनुदानों पर निर्भरता: भारत में अधिकांश पंचायतें अपनी वित्तीय आवश्यकताओं के लिए केंद्रीय वित्त आयोग और राज्य वित्त आयोग के अनुदानों (Grants) पर निर्भर रहती हैं।
- कमजोर OSR (Own Source Revenue): स्थानीय स्तर पर कर (जैसे गृह कर, मनोरंजन कर, प्रकाश कर) और गैर-कर राजस्व वसूलने की क्षमता बेहद कमजोर रही है।
- प्रभाव: वित्तीय आत्मनिर्भरता के बिना पंचायतें केवल ‘एजेंसी’ बनकर रह जाती हैं, वे अपनी स्थानीय प्राथमिकताओं के अनुरूप स्वतंत्र नीतियां नहीं बना पातीं।
प्रारंभिक परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
| योजना / संस्था / शब्दावली | महत्वपूर्ण तथ्य |
| राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान (RGSA) | यह पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) के क्षमता निर्माण और सुशासन को मजबूत करने के लिए शुरू की गई एक केंद्र प्रायोजित योजना (Centrally Sponsored Scheme) है। |
| नाबार्ड | राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक; स्थापना 1982 (शिवरामन समिति की सिफारिश पर)। यह ग्रामीण बुनियादी ढांचे के विकास के लिए शीर्ष ऋण प्रदाता निकाय है। |
| हुडको | Housing and Urban Development Corporation Limited; आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत एक सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम (PSU), जो बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के वित्तपोषण का कार्य करता है। |
भारत-ऑस्ट्रेलिया नागरिक परमाणु सहयोग: भारत के स्वच्छ ऊर्जा कार्यक्रम को नई गति
- प्रारंभिक परीक्षा: भारत-ऑस्ट्रेलिया नागरिक परमाणु सहयोग समझौता, प्रशासनिक व्यवस्था (Administrative Arrangement), परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG), आईएईए सेफगार्ड्स, ‘शांति’ अधिनियम 2025।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 2 & 3): भारत के हितों पर विकसित और विकासशील देशों की नीतियों का प्रभाव; द्विपक्षीय व क्षेत्रीय समझौते; बुनियादी ढांचा (ऊर्जा सुरक्षा); वैज्ञानिक विकास और अनुप्रयोग (परमाणु ऊर्जा का तीन-चरणीय कार्यक्रम)।
Why in News? (चर्चा में क्यों?)
9 जुलाई 2026 को मेलबर्न में आयोजित तीसरे भारत-ऑस्ट्रेलिया वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों देशों ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए नागरिक परमाणु सहयोग समझौते के तहत ‘प्रशासनिक व्यवस्था’ (Administrative Arrangement) को अंतिम रूप दिया। इस व्यवस्था के लागू होने से भारत के नागरिक परमाणु कार्यक्रमों के लिए ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम के दीर्घकालिक और निर्बाध आयात का रास्ता साफ हो गया है।
भारत-ऑस्ट्रेलिया परमाणु समझौते के मुख्य बिंदु
- ईंधन सुरक्षा सुनिश्चित करना: ऑस्ट्रेलिया के पास दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम भंडार (वैश्विक कुल का एक-तिहाई से अधिक) है। यह समझौता भारत के तेजी से बढ़ते परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को दीर्घकालिक ईंधन सुरक्षा प्रदान करेगा।
- IAEA सेफगार्ड्स (सुरक्षा उपाय): इस समझौते के तहत ऑस्ट्रेलिया से आयातित सभी यूरेनियम का उपयोग केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जाएगा और यह अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की सख्त निगरानी व सुरक्षा उपायों के अधीन रहेगा।
- NSG सदस्यता का समर्थन: इस शिखर सम्मेलन में ऑस्ट्रेलिया ने परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) में भारत की स्थायी सदस्यता के दावों का पुनः पुरजोर समर्थन किया।
भारत का महत्वाकांक्षी परमाणु ऊर्जा रोडमैप
यह प्रशासनिक व्यवस्था भारत के दीर्घकालिक ऊर्जा लक्ष्यों को प्राप्त करने में एक रीढ़ की हड्डी साबित होगी:
- लक्ष्य 2047: भारत ने वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट (GW) परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है।
- वर्तमान स्थिति: भारत वर्तमान में 7 स्थानों पर 24 परमाणु रिएक्टरों का संचालन कर रहा है, जिनकी कुल स्थापित क्षमता 8.78 GW है। इसके अतिरिक्त, 8000 मेगावाट (MW) की संयुक्त क्षमता वाले 10 और रिएक्टर निर्माणाधीन हैं।
- शांति अधिनियम 2025: दिसंबर 2025 में अधिनियमित Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India (SHANTI) Act के तहत पहली बार भारतीय निजी कंपनियों और संयुक्त उद्यमों को परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के निर्माण, स्वामित्व और संचालन की अनुमति दी गई है। यूरेनियम की सुनिश्चित आपूर्ति से अब निजी निवेशकों का भरोसा मजबूत होगा।
- छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs):
- बजट 2025-26 में स्वदेशी SMRs के अनुसंधान और विकास के लिए ₹20,000 करोड़ आवंटित किए गए हैं।
- SMRs आमतौर पर 300 MWe तक बिजली पैदा करते हैं और सरकार का लक्ष्य 2033 तक कम से कम पांच स्वदेशी SMRs को संचालित करना है।
भारत का तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम और थोरियम की राह (Three-Stage Program)
भारत के पास विश्व का सबसे बड़ा थोरियम भंडार है (मुख्य रूप से केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और ओडिशा की तटीय रेत/मोनाजाइट में)। हालांकि, थोरियम प्राकृतिक रूप से विखंडनीय (Fissile) नहीं होता, इसे रिएक्टर के भीतर न्यूट्रॉन अवशोषण के जरिए विखंडनीय बनाना पड़ता है। भारत का तीन-चरणीय कार्यक्रम इसी पर आधारित है:
[चरण 1: PHWRs] ──(प्राकृतिक यूरेनियम)──> [बाय-प्रोडक्ट: प्लूटोनियम]
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[चरण 2: FBRs] ──(प्लूटोनियम + थोरियम)──> [बाय-प्रोडक्ट: यूरेनियम-233]
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[चरण 3: थोरियम रिएक्टर] ──(यूरेनियम-233 + थोरियम) ──> [असीमित स्वच्छ ऊर्जा]
प्रारंभिक परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
| तथ्य / संस्था | महत्वपूर्ण तथ्य |
| NSG (परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह) | यह 48 सदस्य देशों का एक स्वैच्छिक समूह है, जो परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए परमाणु सामग्री और तकनीक के निर्यात को नियंत्रित करता है। भारत इसका सदस्य नहीं है। |
| द्विपक्षीय समझौते | भारत ने शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए अब तक 18 देशों के साथ नागरिक परमाणु सहयोग के अंतर-सरकारी समझौतों (IGA) पर हस्ताक्षर किए हैं। |
| PHWR | Pressurised Heavy Water Reactor; यह प्राकृतिक यूरेनियम को ईंधन के रूप में और भारी जल (D_2O) को मंदक (Moderator) व शीतलक (Coolant) के रूप में उपयोग करता है। |
कमरे के तापमान पर चलने वाला नया अमोनिया सेंसर: नैनो-प्रौद्योगिकी से व्यक्तिगत सुरक्षा तक
- प्रारंभिक परीक्षा: अमोनिया गैस सेंसर, VOx/VS2 हेटेरोस्ट्रक्चर, CeNS बेंगलुरु, पीजोइलेक्ट्रिक नैनोजेनरेटर।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 3): विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- रोजमर्रा के जीवन में अनुप्रयोग और देशज रूप से तकनीक का विकास; नैनो-प्रौद्योगिकी (Nanotechnology); औद्योगिक सुरक्षा व आपदा प्रबंधन।
Why in News? (चर्चा में क्यों?)
14 जुलाई 2026 को भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान नैनो और सॉफ्ट मैटर विज्ञान केंद्र (CeNS), बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने एक बेहद संवेदनशील अमोनिया सेंसर विकसित करने में सफलता पाई है। यह नया सेंसर बेहद कम सांद्रता वाली जहरीली अमोनिया गैस का कमरे के सामान्य तापमान पर तेजी से पता लगाने में सक्षम है। इस खोज की मदद से अब बिना बाहरी बिजली स्रोत के चलने वाले पहनने योग्य (Wearable) और स्व-संचालित (Self-powered) सुरक्षा उपकरण बनाना संभव हो सकेगा।
अमोनिया गैस: औद्योगिक महत्व और खतरे
- औद्योगिक उपयोग: अमोनिया गैस का बड़े पैमाने पर उपयोग उर्वरक (Fertilizer) उत्पादन, रेफ्रिजरेशन (शीतलन प्रणालियों), रासायनिक निर्माण और आधुनिक कृषि क्षेत्रों में किया जाता है।
- गंभीर स्वास्थ्य जोखिम: हवा में दुर्घटनावश अमोनिया का रिसाव होने से आंखों, त्वचा और श्वसन तंत्र में गंभीर जलन हो सकती है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से फेफड़ों को स्थायी नुकसान पहुंचता है और जान भी जा सकती है।
- पारंपरिक सेंसरों की सीमा: पुराने सेंसरों को सक्रिय करने के लिए बहुत अधिक ऊंचे तापमान (Heat) या बाहरी बिजली की जरूरत होती थी, जिससे उन्हें हर जगह ले जाना या शरीर पर पहनना नामुमकिन था।
नए सेंसर की तकनीकी बनावट और कार्यप्रणाली
बेंगलुरु के वैज्ञानिकों की टीम (जिसका नेतृत्व प्रो. अंगप्पन सुब्रमण्यन कर रहे थे) ने इस तकनीक में कुछ अभूतपूर्व बदलाव किए हैं:
- VOx/VS2 हेटेरोस्ट्रक्चर: यह सेंसर वेनेडियम ऑक्साइड-वेनेडियम सल्फाइड (VO_x/VS_2) के संकर नैनो-ढांचे पर आधारित है। इसकी सतह को विशेष रूप से रूपांतरित किया गया है ताकि अमोनिया के अणु इससे तेजी से चिपक सकें और बिजली के प्रवाह को बदल सकें।
- अति-संवेदनशील क्षमता: यह सेंसर हवा में मात्र 319 पार्ट्स प्रति बिलियन (ppb) जैसी मामूली अमोनिया सांद्रता को भी तुरंत पकड़ लेता है, जो कि वैश्विक औद्योगिक सुरक्षा मानकों से कहीं बेहतर है।
- लंबे समय तक टिकाऊ: यह गीले और सूखे दोनों मौसमों में काम करता है और लगातार 10 हफ्तों से अधिक समय तक बिना किसी खराबी के सटीक नतीजे देता है।
क्रांतिकारी अनुप्रयोग: पहनने योग्य और स्व-संचालित उपकरण
वैज्ञानिकों ने इस प्रयोगशाला खोज को व्यावहारिक रूप देते हुए तीन मुख्य प्रोटोटाइप (नमूने) तैयार किए हैं:
1. स्व-संचालित उपकरण
- वैज्ञानिकों ने सेंसर को एक लचीले पीजोइलेक्ट्रिक नैनोजेनरेटर के साथ जोड़ा है। यह जनरेटर इंसानी शरीर की सामान्य हलचल (जैसे चलने या हाथ हिलाने) से पैदा होने वाली यांत्रिक ऊर्जा को बिजली में बदल देता है। इस कारण सेंसर को किसी बाहरी बैटरी की आवश्यकता नहीं होती।
2. पहनने योग्य स्मार्ट वस्त्र
- इस हल्के सेंसर को लचीले प्लास्टिक (Polymer), कागज और कपड़ों पर आसानी से छापा जा सकता है। इसे मोड़ने, मरोड़ने या मोड़ने पर भी इसकी कार्यक्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता। इसकी मदद से सेना के जवानों, फैक्ट्री कर्मचारियों और लैब तकनीशियनों के लिए स्मार्ट सुरक्षा बैंड या जैकेट बनाए जा रहे हैं।
3. पोर्टेबल चेतावनी प्रणाली
- यह छोटा उपकरण हवा में अमोनिया की मात्रा बढ़ने पर अलार्म बजाता है। यह आम लोगों की समझ के लिए पर्यावरण को तीन श्रेणियों—सुरक्षित (Safe), चेतावनी (Warning) और खतरा (Danger) में बांटकर स्क्रीन पर दिखाता है।
प्रारंभिक परीक्षा हेतु त्वरित तथ्य
| संस्थान / तकनीक | मुख्य तथ्य |
| CeNS | Centre for Nano and Soft Matter Sciences, बेंगलुरु; यह भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के तहत एक स्वायत्त अनुसंधान संस्थान है जो नैनो तकनीक पर काम करता है। |
| पीजोइलेक्ट्रिक प्रभाव | कुछ विशिष्ट सामग्रियों (जैसे विशेष क्रिस्टल या सिरेमिक) पर जब यांत्रिक दबाव (Mechanical Stress) डाला जाता है, तो वे बिजली पैदा करते हैं। इसी सिद्धांत पर नैनोजेनरेटर काम करते हैं। |
| ppb (पार्ट्स प्रति बिलियन) | यह हवा या तरल पदार्थों में गैसों की बेहद सूक्ष्म सांद्रता मापने की इकाई है (1 बिलियन अणुओं में गैस के अणुओं की संख्या)। |