16 July 2026 PIB Summary for UPSC in Hindi Pdf के अंतर्गत इसमें घरेलू तकनीकी संप्रभुता को मजबूत करने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृत ₹1,27,500 करोड़ का सेमीकॉन 2.0 मिशन, देश के वैज्ञानिक कार्यबल को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए शुरू किया गया ₹1,500 करोड़ का बायोमेडिकल रिसर्च करियर प्रोग्राम (BRCP) चरण-III, और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के वैज्ञानिकों द्वारा असम में खोजा गया 2.4 करोड़ वर्ष पुराना केवड़ा का जीवाश्म, भारत को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण का केंद्र बनाने वाली नई रणनीति मोबाइल फोन निर्माण योजना (MPMS) की प्रशासनिक रूपरेखा और इसके वैश्विक लक्ष्यों को समझेंगे, जो देश में उच्च मूल्य के इलेक्ट्रॉनिक्स घटकों के स्वदेशी उत्पादन को एक नई ऊंचाई प्रदान करेगी।
मोबाइल फोन निर्माण योजना (MPMS): भारत को ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स हब बनाने की नई रणनीति
- प्रारंभिक परीक्षा: मोबाइल फोन निर्माण योजना (MPMS), पीएलआई (PLI) योजना, घरेलू मूल्य संवर्धन (Domestic Value Addition)।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 3): भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोजगार से संबंधित विषय; उदारीकरण का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव; औद्योगिक नीति में परिवर्तन तथा औद्योगिक विकास पर इनका प्रभाव।
चर्चा में क्यों?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹62,500 करोड़ के कुल बजटीय परिव्यय के साथ मोबाइल फोन निर्माण योजना (Mobile Phone Manufacturing Scheme – MPMS) को मंजूरी दे दी है। यह नई योजना 31 मार्च 2026 को समाप्त हुई ‘बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के लिए उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन’ (PLI-LSEM) योजना का स्थान लेगी, जिसका उद्देश्य घरेलू विनिर्माण को और अधिक मजबूत करना है।
MPMS योजना की प्रमुख विशेषताएं
यह योजना भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स पारिस्थितिकी तंत्र को पूरी तरह बदलने के लिए डिज़ाइन की गई है:
- योजना की अवधि: यह योजना वित्त वर्ष 2026-27 से वित्त वर्ष 2030-31 तक 5 वर्षों की अवधि के लिए लागू रहेगी।
- विभेदित प्रोत्साहन दरें: भारत में मोबाइल फोन के निर्माण और पात्र बिक्री पर 2.25% से 5% की दर से वित्तीय प्रोत्साहन सहायता दी जाएगी।
- घरेलू सोर्सिंग पर अतिरिक्त लाभ: मुख्य घटकों और सब-असेंबलियों (पुर्जों) की घरेलू खरीद (Sourcing) को बढ़ावा देने के लिए 1.5% तक का अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया जाएगा।
- भारतीय ब्रांडों का विकास और R&D: भारत को तकनीकी रूप से संप्रभु बनाने और स्वदेशी पेटेंट बढ़ाने के लिए, उत्पादों के डिजाइन और अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर पात्र बिक्री का 3% अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया जाएगा।
योजना से अपेक्षित परिणाम
5 वर्षों के कार्यकाल के दौरान इस योजना से भारतीय अर्थव्यवस्था को निम्नलिखित बड़े लाभ मिलने की उम्मीद है:
- विशाल उत्पादन लक्ष्य: योजना की अवधि में देश में कुल संचयी मोबाइल फोन उत्पादन लगभग ₹39,00,000 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है, जिससे निर्यात में भी भारी बढ़ोतरी होगी।
- रोजगार सृजन: इस योजना के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र में लगभग 60,000 प्रत्यक्ष रोजगार पैदा होने का अनुमान है।
- वैश्विक मूल्य श्रृंखला (GVC) में मजबूती: यह भारत को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण हब के रूप में स्थापित कर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को अधिक लचीला बनाएगा।
भारत में मोबाइल विनिर्माण का परिदृश्य
‘मेक इन इंडिया’ विजन के तहत पिछले एक दशक में भारत ने इस क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है:
- उत्पादन और निर्यात में वृद्धि: वित्त वर्ष 2014-15 के बाद से देश में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में 7 गुना और इसके निर्यात में 11 गुना की भारी वृद्धि दर्ज की गई है।
- वैश्विक स्थान: भारत वर्तमान में मात्रा (Volume) के हिसाब से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता बन चुका है।
- घरेलू आत्मनिर्भरता: वर्तमान में भारत में उपयोग किए जाने वाले 99.2% मोबाइल फोन का निर्माण देश के भीतर ही किया जा रहा है।
- निर्यात में ऐतिहासिक बदलाव: वर्ष 2025 में स्मार्टफोन भारत से निर्यात होने वाली सबसे बड़ी एकल उत्पाद श्रेणी बनकर उभरे हैं, जिसने डीजल ईंधन और कटे हुए हीरों जैसे पारंपरिक अग्रणी निर्यात मदों को भी पीछे छोड़ दिया है।
प्रारंभिक परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
| योजना / शब्दावली | महत्वपूर्ण तथ्य |
| PLI-LSEM योजना | बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के लिए उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन योजना, जिसने वैश्विक कंपनियों को भारत की ओर आकर्षित किया। इसका कार्यकाल 31 मार्च 2026 को समाप्त हो गया है। |
| घरेलू मूल्य संवर्धन | इसका अर्थ है कि किसी उत्पाद को बनाने में विदेशों से आयातित पुर्जों के बजाय देश के भीतर बने कच्चे माल और पुर्जों का अधिक से अधिक उपयोग करना। |
| तकनीकी संप्रभुता | किसी देश की विदेशी प्रौद्योगिकियों या सॉफ्टवेयर पर निर्भरता को कम करके अपनी स्वदेशी तकनीक, पेटेंट और आरएंडडी (R&D) क्षमताओं को विकसित करना। |
सिंचन 2026: प्रयोगशाला अनुसंधान को व्यावहारिक चिकित्सा में बदलने की नई पहल
- प्रारंभिक परीक्षा: सिंचन 2026, BRIC-THSTI, जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान और नवाचार परिषद, BIRAC-RDI फंड, जैव-अर्थव्यवस्था (Bioeconomy)।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 3): विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास एवं रोजमर्रा के जीवन में इसका अनुप्रयोग; उदारीकरण का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव; औद्योगिक नीति में परिवर्तन; जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) क्षेत्र का विकास।
चर्चा में क्यों?
जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान और नवाचार परिषद (BRIC) के एक प्रमुख संस्थान ‘ट्रांसलेशनल स्वास्थ्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान’ (THSTI) ने फरीदाबाद स्थित एनसीआर बायोटेक साइंस क्लस्टर परिसर में अपने तीसरे वार्षिक उद्योग-व्यवसाय सम्मेलन ‘ सिंचन 2026‘ (Synergistic Collaboration in Healthcare Innovation) का सफल आयोजन किया। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य वैश्विक स्वास्थ्य जगत के नेताओं, जैव प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों, उद्यम पूंजीपतियों और नीति निर्माताओं को एक मंच पर लाना है ताकि प्रयोगशाला के वैज्ञानिक अनुसंधानों (Lab-bench science) को वाणिज्यिक स्तर पर मरीजों के इलाज के व्यावहारिक समाधानों में बदला जा सके।
सिंचन 2026 की मुख्य विशेषताएं और प्रगति
यह मंच भारत के स्वास्थ्य सेवा और जैव प्रौद्योगिकी नवाचारों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है:
- रणनीतिक प्रगति: वर्ष 2024 में आयोजित इसके पहले संस्करण में जहां 13 आशय पत्र (Letters of Intent) हस्ताक्षरित किए गए थे, वहीं 2025 के दूसरे संस्करण में 19 बाध्यकारी रणनीतिक समझौते हुए और वर्तमान में यह उद्योग-अकादमिक संवाद को और मजबूत कर रहा है।

- बायोइकोनॉमी (जैव-अर्थव्यवस्था) में उछाल: भारतीय उद्यम पूंजी संघ (IVCA) के अनुसार, वर्तमान में भारत की जैव-अर्थव्यवस्था (Bioeconomy) 18% की वार्षिक दर की उल्लेखनीय गति से आगे बढ़ रही है।
- नियामक सुधार: केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) के अनुसार, जैविक दवाओं (Biologics) के लिए एक नई नियामक प्रणाली तैयार की जा रही है, जिसमें राष्ट्रीय नीति और संचालन प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने के लिए गैर-सरकारी उद्योग विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाएगा।
THSTI की अनुसंधान क्षमताएं और ढांचागत तंत्र
संस्थान ने प्रयोगशाला के शोध और बाजार के बीच के अंतर (घाटी) को पाटने के लिए कई अत्याधुनिक प्रणालियां विकसित की हैं:
- मेडिकल रिसर्च सेंटर (MRC): यह पूरी तरह कार्यात्मक केंद्र है, जिसके तहत शुरुआती चरण के नैदानिक परीक्षण (Early-phase clinical trial) की इकाई, एक उन्नत कार-टी सेल (CAR-T Cell) अनुसंधान इकाई, तथा भारत की पहली ‘नियंत्रित मानव संक्रमण अध्ययन’ (CHIS – Controlled Human Infection Studies) सुविधा संचालित की जा रही है।
- एपेक्स पहल: Accelerated Productisation and Epidemic Preparedness (APEX) पहल के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर के पायलट उत्पादन प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जा रहा है, ताकि प्रमाणित अनुसंधान निष्कर्षों और उत्पादन-योग्य जैविक दवाओं के बीच के अंतर को आक्रामक रूप से समाप्त किया जा सके।
- BIRAC-RDI फंड: स्टार्टअप्स, उद्योगों और राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं के लिए उनके पूरे जीवनचक्र में आने वाले वित्तीय संकट को दूर करने के लिए विशेष अनुसंधान विकास और नवाचार (BIRAC-RDI) कोष को सक्रिय किया गया है।
मुख्य पैनल सत्र और उनके निष्कर्ष
सम्मेलन के दौरान स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार के लिए तीन प्रमुख नीतिगत स्तंभों पर गहन चर्चा की गई:
| पैनल / सत्र | मुख्य निष्कर्ष और रणनीतिक बिंदु |
| ग्लोबल हेल्थ: विज्ञान, विनिर्माण और साझेदारी | वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने में अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग, प्रतिस्पर्धी विनिर्माण क्षमता, सुदृढ़ सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) और लचीले अनुसंधान तंत्र का विकास करना। |
| प्रारंभिक नैदानिक अनुवाद में तेजी लाना | शैक्षणिक अनुसंधानों को इंसानों पर होने वाले पहले चरण के परीक्षणों में तेजी से बदलने के लिए एकीकृत नैदानिक अनुसंधान प्लेटफार्मों का उपयोग करना। |
| व्यावसायिक अनुवाद मंचों की दक्षता बढ़ाना | नए नवोन्मेषकों, निवेशकों और नीतिगत एक्सीलेटरों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना ताकि जैव प्रौद्योगिकी स्टार्टअप्स को वाणिज्यिक स्तर पर बड़े उद्योगों में बदला जा सके। |
आत्मनिर्भर भारत के लिए राष्ट्रीय यूरिया निवेश नीति-2026 (NIPU-2026): उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का नया अध्याय
- प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय यूरिया निवेश नीति-2026 (NIPU-2026), उर्वरक क्षेत्र, NIP-2012, इक्विटी पर रिटर्न (RoE) बैंड।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 3): भारत में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कृषि सहायता तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित विषय; मुख्य फसलें- देश के विभिन्न भागों में फसलों का पैटर्न; बुनियादी ढांचा और सरकारी नीतियां।
चर्चा में क्यों?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल (CCEA) ने उर्वरक विभाग के एक बड़े सुधार प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए ‘आत्मनिर्भर भारत के लिए राष्ट्रीय यूरिया निवेश नीति-2026’ (National Investment Policy for Urea-2026 for Atmanirbhar Bharat – NIPU-2026) को हरी झंडी दे दी है। यह नई नीति देश में गैस आधारित नई यूरिया विनिर्माण इकाइयों की स्थापना के लिए निजी और सार्वजनिक निवेश को आकर्षित करेगी, जिससे भारत यूरिया उत्पादन के क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो सके।
नीति की आवश्यकता: पृष्ठभूमि और वर्तमान परिदृश्य
- मांग और उत्पादन में अंतर: वर्तमान में भारत में 33 चालू यूरिया विनिर्माण इकाइयां हैं, जिनकी कुल पुनर्मूल्यांकित/स्थापित क्षमता 269.42 लाख मीट्रिक टन (LMT) है। हालांकि, घरेलू मांग इससे कहीं अधिक है, और इस अंतर को पूरा करने के लिए भारत को हर साल भारी मात्रा में यूरिया का आयात (Import) करना पड़ता है।
- पुरानी नीति की समाप्ति: इससे पहले वर्ष 2012 में ‘नई निवेश नीति’ (NIP-2012) लाई गई थी, जिसके तहत देश में 6 नई यूरिया इकाइयां (4 सार्वजनिक उपक्रमों के संयुक्त उद्यम और 2 निजी कंपनियों द्वारा) स्थापित की गईं। इस नीति के तहत नए निवेश की समय-सीमा अक्टूबर 2019 में समाप्त हो गई थी।
- नए प्रस्ताव: उर्वरक विभाग को देश में नई यूरिया इकाइयां स्थापित करने के लिए कई नए प्रस्ताव मिल रहे थे, जिसके लिए एक स्पष्ट और आकर्षक नीतिगत ढांचे की जरूरत थी।
NIPU-2026 की प्रमुख विशेषताएं और NIP-2012 से तुलना
नई नीति (NIPU-2026) को पुरानी नीति (NIP-2012) की तुलना में अधिक पारदर्शी, व्यावहारिक और निवेशकों के अनुकूल बनाया गया है:
- लागत का स्पष्ट विभाजन (Transparency): निवेशकों को आकर्षित करने और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए निश्चित लागत (Fixed Cost) और परिवर्तनीय लागत (Variable Cost) को पूरी तरह से अलग-अलग कर दिया गया है।
- निश्चित रिटर्न की गारंटी (RoE Band): निवेशकों के जोखिम को कम करने के लिए इक्विटी पर रिटर्न (Return on Equity – RoE) का एक व्यावहारिक बैंड पेश किया गया है। इसमें न्यूनतम सीमा 12% और अधिकतम सीमा 16% तय की गई है।
- विदेशी मुद्रा जोखिम से सुरक्षा (Forex Risk Mitigation): विदेशी मुद्रा दरों में होने वाले उतार-चढ़ाव के जोखिम को कम करने के लिए एक विशेष प्रावधान किया गया है। इसके तहत संयंत्र शुरू होने के चार साल बाद प्रचलित विनिमय दरों के आधार पर निश्चित लागत को भारतीय रुपये (INR) में बदल दिया जाएगा।
- बड़ी वित्तीय बचत: इन नीतिगत सुधारों के कारण NIP-2012 की तुलना में NIPU-2026 के तहत स्थापित होने वाले प्रत्येक नए संयंत्र को ₹250 करोड़ से अधिक की बचत होने का अनुमान है।
बायोमेडिकल रिसर्च करियर प्रोग्राम (BRCP) का चरण-III: भारत की जैव-अर्थव्यवस्था को 300 बिलियन डॉलर बनाने की राह
- प्रारंभिक परीक्षा: बायोमेडिकल रिसर्च करियर प्रोग्राम (BRCP) चरण-III, जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT), वेलकम ट्रस्ट, भारत की जैव-अर्थव्यवस्था (Bioeconomy)।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 3): विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास एवं रोजमर्रा के जीवन में इसका अनुप्रयोग; उदारीकरण का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव; औद्योगिक नीति में परिवर्तन; जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) क्षेत्र का विकास और स्वास्थ्य अवसंरचना।
चर्चा में क्यों?
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने बायोमेडिकल रिसर्च करियर प्रोग्राम (BRCP) के चरण-III का औपचारिक शुभारंभ किया। इस कार्यक्रम को भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) और लंदन स्थित परोपकारी संस्था वेलकम ट्रस्ट (UK) द्वारा संयुक्त रूप से वित्तपोषित किया जा रहा है। इस तीसरे चरण के लिए ₹1,500 करोड़ का कुल बजटीय परिव्यय स्वीकृत किया गया है, जो देश में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बायोमेडिकल अनुसंधान कार्यबल तैयार करने में मदद करेगा।
BRCP चरण-III की मुख्य विशेषताएं
यह कार्यक्रम भारत को जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र में एक वैश्विक लीडर के रूप में स्थापित करने के लिए रणनीतिक रूप से तैयार किया गया है:
- वित्तीय ढांचा (Funding Split): कुल ₹1,500 करोड़ के बजटीय आवंटन में से ₹1,000 करोड़ जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) द्वारा और ₹500 करोड़ वेलकम ट्रस्ट (UK) द्वारा प्रदान किए जाएंगे।
- कार्यान्वयन एजेंसी: इस प्रमुख कार्यक्रम को DBT-वेलकम ट्रस्ट इंडिया एलायंस के माध्यम से संचालित किया जाता है।
- लक्षित कार्यबल: इसके तहत बुनियादी वैज्ञानिकों, क्लिनिशियन-शोधकर्ताओं, सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों, विज्ञान संचारकों और अनुसंधान प्रबंधकों को फेलोशिप और अनुसंधान अनुदान दिया जाएगा।
- तीसरे चरण का मुख्य फोकस: इस चरण में जटिल बायोमेडिकल चुनौतियों से निपटने के लिए अन्तर-विषयक और टीम-आधारित अनुसंधान पर विशेष जोर दिया गया है, ताकि प्रयोगशाला के शोध को व्यावहारिक चिकित्सा समाधानों में बदला जा सके।
भारत का बढ़ता जैव प्रौद्योगिकी परिदृश्य
केंद्रीय मंत्री ने कार्यक्रम के दौरान भारत की जैव-अर्थव्यवस्था में पिछले एक दशक में आए क्रांतिकारी बदलावों के आधिकारिक आंकड़े साझा किए:
- 20 गुना से अधिक की वृद्धि: भारत की जैव-अर्थव्यवस्था वर्ष 2014 के 10 बिलियन अमरीकी डॉलर से बढ़कर 2025 में 195 बिलियन अमरीकी डॉलर से अधिक हो गई है।
- लक्ष्य 2030: भारत सरकार ने वर्ष 2030 तक देश की जैव-अर्थव्यवस्था को 300 बिलियन अमरीकी डॉलर तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है।
- स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र: वर्तमान में भारत में लगभग 12,000 जैव प्रौद्योगिकी स्टार्टअप सक्रिय हैं, और भारत निवारक स्वास्थ्य सेवा व वैक्सीन निर्माण में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल हो चुका है।
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: वर्ष 2008 में अपनी शुरुआत के बाद से, BRCP ने अब तक 200 से अधिक संस्थानों में 500 से अधिक शोधकर्ताओं को सीधे सहायता दी है और हजारों युवा वैज्ञानिकों को प्रशिक्षित किया है।
प्रारंभिक परीक्षा हेतु त्वरित तथ्य
| घटक / आयाम | मुख्य बिंदु |
| कार्यक्रम का नाम | बायोमेडिकल रिसर्च करियर प्रोग्राम (BRCP) – चरण-III। |
| नोडल विभाग / मंत्रालय | जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT), विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार। |
| अंतर्राष्ट्रीय भागीदार | वेलकम ट्रस्ट, लंदन (ब्रिटेन) स्थित एक वैश्विक परोपकारी संस्था। |
| कुल बजटीय आवंटन | ₹1,500 करोड़ (साझा वित्तीय पोषण: ₹1,000 करोड़ DBT द्वारा + ₹500 करोड़ वेलकम ट्रस्ट द्वारा)। |
सेमीकॉन 2.0: भारत के सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र का महा-विस्तार
- प्रारंभिक परीक्षा: सेमीकॉन 2.0, भारतीय सेमीकंडक्टर मिशन (ISM 1.0), ATMP/OSAT, EDA टूल्स, फैब।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 3): विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास एवं रोजमर्रा के जीवन में इसके अनुप्रयोग; औद्योगिक नीति में परिवर्तन और औद्योगिक विकास पर इनके प्रभाव; सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र।
चर्चा में क्यों?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹1,27,500 करोड़ के कुल बजटीय परिव्यय के साथ ‘सेमीकॉन 2.0’ नीति को मंजूरी दे दी है। यह नीति सेमीकॉन 1.0 की सफलताओं को आगे बढ़ाते हुए भारत में चिप डिजाइन, कलपुर्जों के निर्माण और अत्याधुनिक असेंबली पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को दीर्घकालिक नीतिगत सहायता प्रदान करेगी ताकि भारत को दुनिया के सेमीकंडक्टर मानचित्र पर एक प्रमुख वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित किया जा सके।
सेमीकॉन 2.0 के छह मुख्य स्तंभ
इस नीति को देश के भीतर एक संपूर्ण और आत्मनिर्भर सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने के लिए 6 प्रमुख स्तंभों पर तैयार किया गया है:
- 1. चिप डिजाइन: भारत को सेमीकंडक्टर चिप डिजाइन IP (बौद्धिक संपदा) का वैश्विक केंद्र बनाना। इसके तहत पहले से काम कर रहे 105 स्टार्टअप के साथ-साथ रणनीतिक और वाणिज्यिक उत्पादों के लिए आईपी और चिप डिजाइन प्रणालियों के विकास को और गहरा किया जाएगा।
- 2. मशीनें और सामग्रियां: चिप बनाने के लिए आवश्यक विशेष मशीनों, रसायनों, गैसों और अन्य कच्चे मालों के अनुसंधान (R&D) और निर्माण में लगी कंपनियों को वित्तीय प्रोत्साहन दिया जाएगा, जो देश में सटीक विनिर्माण की नींव रखेगा।
- 3. अधिक फैब्स की स्थापना: भारत में पहला कमर्शियल सिलिकॉन फैब वर्ष 2028 में शुरू होने जा रहा है। इसके अतिरिक्त नए सिलिकॉन फैब्स, कंपाउंड सेमीकंडक्टर फैब्स, डिस्क्रीट कंपोनेंट फैब्स और डिस्प्ले फैब्स स्थापित करने के लिए वैश्विक निर्माताओं को आकर्षित किया जाएगा।
- 4. ATMP/OSAT उद्योग को मजबूती: चिप असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग (ATMP) तथा आउटसोर्स सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट (OSAT) इकाइयों के लिए भारत को एक वैश्विक वैकल्पिक गंतव्य के रूप में स्थापित करना और सबसे उन्नत पैकेजिंग तकनीकों को देश में लाना।
- 5. अनुसंधान और विकास (R&D): भारत ने अपनी सेमीकंडक्टर यात्रा 28nm-110nm जैसे बेसिक नोड्स से शुरू की है। अब घरेलू और वैश्विक अनुसंधान केंद्रों के सहयोग से इससे भी अधिक उन्नत और सूक्ष्म नोड्स व तकनीकों के विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।
- 6. प्रतिभा विकास: वर्तमान में 315 विश्वविद्यालय अत्याधुनिक ईडीए टूल्स पर छात्रों को प्रशिक्षण दे रहे हैं जिसके तहत 68,000 छात्र प्रशिक्षित हो चुके हैं। अब कॉलेज स्तर के साथ-साथ उद्योग के सहयोग से ‘क्लीन रूम’ और फैब निर्माण से जुड़ा व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा।
भारतीय सेमीकंडक्टर मिशन 1.0 (ISM 1.0) की अब तक की प्रगति
सेमीकॉन 2.0 की नींव ISM 1.0 की ठोस उपलब्धियों पर टिकी है, जिसके मुख्य आंकड़े निम्नलिखित हैं:
1. विनिर्माण (Manufacturing Area)
- स्वीकृत इकाइयाँ: अब तक ₹1.64 लाख करोड़ के कुल निवेश के साथ 12 विनिर्माण इकाइयों को मंजूरी दी जा चुकी है (1 सिलिकॉन फैब, 1 सिलिकॉन कार्बाइड फैब, 1 एकीकृत गैलियम नाइट्राइड माइक्रो एलईडी डिस्प्ले फैब और 9 पैकेजिंग इकाइयाँ)।
- वाणिज्यिक उत्पादन: मंजूर प्रस्तावों में से 3 कंपनियों—माइक्रोन, कायन्स और सीजी सेमी ने अपना वाणिज्यिक उत्पादन शुरू कर दिया है, जबकि एक अन्य इकाई द्वारा 2026 में उत्पादन शुरू होने की उम्मीद है।
2. डिजाइन और स्टार्टअप सपोर्ट (Design Infrastructure)
- वित्तीय सहायता: स्टार्टअप्स और MSMEs की 24 सेमीकंडक्टर डिजाइन परियोजनाओं को प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता मंजूर की गई है।
- संसाधन उपलब्धता: 105 से अधिक स्टार्टअप्स/MSMEs को उद्योग-मानक इलेक्ट्रॉनिक्स डिजाइन ऑटोमेशन (EDA) टूल्स तक मुफ्त पहुंच प्रदान की गई है। ये कंपनियाँ सैटेलाइट संचार, ड्रोन, एआई सिस्टम, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और स्मार्ट मीटर के लिए घरेलू चिप्स तैयार कर रही हैं।
प्रारंभिक परीक्षा हेतु त्वरित तथ्य
| तकनीकी घटक | मुख्य बिंदु |
| सेमीकॉन 2.0 बजट | कुल बजटीय आवंटन ₹1,27,500 करोड़ है, जो भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और चिप पारिस्थितिकी तंत्र को दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करता है। |
| फैब (Foundry) | सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन प्लांट; वह अत्याधुनिक और धूल-मुक्त (Clean Room) कारखाना जहाँ कच्चे सिलिकॉन वेफर्स पर अत्यंत जटिल प्रक्रियाओं के जरिए वास्तविक माइक्रोचिप्स का निर्माण किया जाता है। |
| ATMP / OSAT | Assembly, Testing, Marking, and Packaging / Outsourced Semiconductor Assembly and Test; फैब में बनी चिप्स को अंतिम उत्पादों (जैसे फोन, कार) में लगाने योग्य सुरक्षित पैकेजिंग में बदलने की प्रक्रिया। |
| EDA टूल्स | Electronic Design Automation; यह सॉफ्टवेयर टूल्स का एक संग्रह है जिसका उपयोग इंजीनियर अत्यंत जटिल सेमीकंडक्टर प्रणालियों और सर्किट बोर्ड्स (SoCs) के डिजाइन और सिमुलेशन के लिए करते हैं। |
| भारत का पहला फैब | देश का पहला बड़े पैमाने का सिलिकॉन फैब वर्ष 2028 में चालू (Commissioned) होने के लिए निर्धारित है। |
असम में मिला केवड़ा का 24 मिलियन वर्ष पुराना जीवाश्म: हिमालय और मानव सभ्यता से भी प्राचीन
- प्रारंभिक परीक्षा: केवड़ा जीवाश्म खोज (Pandanus), बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (BSIP), तिकाक पर्बत फॉर्मेशन (माकुम कोलफील्ड), पैंडनेसी कुल, जैव-भौगोलिक शरणस्थल (Refugium)।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 3): पर्यावरण एवं जैव विविधता; जलवायु परिवर्तन के प्रति पारिस्थितिकी तंत्र की अनुक्रिया; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियां; स्वदेशी रूप से तकनीकी और वैज्ञानिक विकास।
चर्चा में क्यों?
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (BSIP), लखनऊ के वैज्ञानिकों ने एक अभूतपूर्व खोज की घोषणा की है। वैज्ञानिकों को पूर्वोत्तर राज्य असम के माकुम कोलफील्ड से केवड़े के पौधे के 24 मिलियन (2.4 करोड़) वर्ष पुराने जीवाश्म पत्ते मिले हैं। यह खोज प्रमाणित करती है कि सुगंधित अर्क, पारंपरिक दवाओं और धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग होने वाला यह सांस्कृतिक पौधा भारतीय उपमहाद्वीप में हिमालय के पूर्ण उत्थान और मानव सभ्यता के आगमन से भी बहुत पहले से जीवित है।
खोज से जुड़े मुख्य बिंदु और वैज्ञानिक विश्लेषण
वैज्ञानिकों (हर्षिता भाटिया और गौरव श्रीवास्तव) द्वारा किए गए इस शोध को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘जियोबायोस’ में प्रकाशित किया गया है, जिसके मुख्य निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:
- भौगोलिक अवस्थिति और भूवैज्ञानिक आयु: ये जीवाश्म पत्ते असम के माकुम कोलफील्ड में स्थित तिकाक पर्बत फॉर्मेशन से बरामद किए गए हैं, जो लगभग 24 मिलियन वर्ष पुराने (ओलिगोसीन-मायोसीन काल के संधिकाल के) हैं।

- शारीरिक विशेषताएँ: विस्तृत सूक्ष्मदर्शी विश्लेषण से पता चला है कि इन जीवाश्मों में आज के आधुनिक केवड़े की तरह ही तलवार के आकार की लंबी पत्तियां, समानांतर शिराएं और किनारों पर विशिष्ट कांटे हूबहू संरक्षित हैं।
- विकासवादी महत्व: दुनिया भर में केवड़ा परिवार (पैंडनेसी) के जीवाश्म रिकॉर्ड अत्यंत दुर्लभ हैं। यह खोज यूरोप और उत्तरी अमेरिका के सबसे पुराने जीवाश्मों (85-66 मिलियन वर्ष पुराने) और एशिया-ऑस्ट्रेलिया के आधुनिक पौधों के बीच के विकासवादी अंतराल को जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
भारत की जैव-भौगोलिक भूमिका: एक प्राचीन शरणस्थल
यह खोज पृथ्वी के अतीत और भविष्य के जलवायु परिवर्तनों को समझने के लिए एक व्यावहारिक दृष्टिकोण देती है:
- वैश्विक वितरण और संकुचन: लगभग 85 से 66 मिलियन वर्ष पहले केवड़े के पूर्वज पूरे उत्तरी गोलार्ध (यूरोप और उत्तरी अमेरिका सहित) में फैले हुए थे। लेकिन लगभग 34 मिलियन वर्ष पहले जब वैश्विक जलवायु ठंडी होने लगी, तो ये पौधे उन क्षेत्रों से विलुप्त हो गए और केवल उष्णकटिबंधीय (Tropical) क्षेत्रों तक सिमट गए।
- भारत एक शरणस्थल के रूप में: असम से मिले ये जीवाश्म साबित करते हैं कि जब पूरी दुनिया में जलवायु बदल रही थी, तब भारतीय उपमहाद्वीप ने प्राचीन उष्णकटिबंधीय पौधों के लिए एक सुरक्षित शरणस्थल के रूप में कार्य किया। केवड़ा भारतीय वनस्पति का कोई हालिया हिस्सा नहीं है, बल्कि यह भारत के प्राचीन आदिम वर्षावनों का एक जीवित उत्तरजीवी है।
प्रारंभिक परीक्षा हेतु त्वरित तथ्य
| घटक / शब्दावली | मुख्य बिंदु |
| जीवाश्म का स्थान | माकुम कोलफील्ड (असम); इसकी तिकाक पर्बत फॉर्मेशन कोयला और समृद्ध जीवाश्म वनस्पतियों के लिए जानी जाती है। |
| वैज्ञानिक नाम / कुल | आधुनिक केवड़े का वंश पैंडेनस है और यह पैंडनेसी परिवार से संबंधित है। |
| BSIP, लखनऊ | बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान; यह भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के तहत एक स्वायत्त अनुसंधान संस्थान है, जो प्राचीन पादप जीवाश्मों के अध्ययन के लिए समर्पित है। |
| रिफ्यूजियम | वह भौगोलिक क्षेत्र जो वैश्विक जलवायु परिवर्तन के काल में भी स्थानिक प्रजातियों को जीवित रहने के लिए अनुकूल परिस्थितियां प्रदान करता है। |