NCERT Notes Class 6 science Chapter 11: Nature’s Treasures के अंतर्गत हमारी पृथ्वी पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों की विशाल संपदा और मानव जीवन में उनकी अपरिहार्यता का एक तार्किक और संवेदनशील विश्लेषण प्रस्तुत करता है। हमारे भौतिक परिवेश में बिखरी हवा, पानी, मिट्टी, वन और खनिज केवल उपभोग की वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि ये प्रकृति के वे अमूल्य खजाने हैं जो पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व और संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का आधार हैं। यह वायु और जल जैसी जीवनदायिनी संपदाओं की चक्रण प्रक्रियाओं, मृदा निर्माण के बुनियादी सिद्धांतों तथा नवीकरणीय (Renewable) और अनवीकरणीय (Non-renewable) संसाधनों के बीच के अंतर को बहुत ही व्यावहारिक स्पष्ट करता है।
वायु (Air)
- श्वसन की अनिवार्यता: मानव शरीर को अपनी दैनिक जैविक क्रियाओं को संचालित करने के लिए निरंतर ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। मनुष्य भोजन और पानी के बिना कुछ दिनों तक जीवित रह सकता है, लेकिन ऑक्सीजन के बिना कुछ मिनट भी जीवित रहना असंभव है।
- उपस्थिति के संकेतक: हवा अदृश्य होती है, लेकिन इसके प्रभाव को पेड़ों की पत्तियों की सरसराहट, लटके हुए कपड़ों के हिलने और पंखा चालू होने पर खुली किताब के पन्नों के फड़फड़ाने से महसूस किया जा सकता है।
- पवन (Wind): गतिशील हवा को पवन कहते हैं। जब यह अत्यंत धीमी गति से चलती है तो इसे समीर (Breeze) कहा जाता है, और जब यह तीव्र वेग से चलती है तो इसे तूफान (Storm) का रूप माना जाता है।

वायु का संघटन (Composition of air)
| गैस का नाम (Name of Gas) | वायुमंडल में प्रतिशत मात्रा (%) | मुख्य तथ्य |
| नाइट्रोजन | 78% | वायु में सर्वाधिक मात्रा में पाई जाने वाली अक्रिय गैस। |
| ऑक्सीजन | 21% | सजीवों के जीवित रहने और श्वसन के लिए अनिवार्य गैस। |
| आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड व अन्य | 1% | आर्गन एक अक्रिय गैस है, जबकि CO_2 ग्रीनहाउस गैस है। |
पवन ऊर्जा
- कार्यप्रणाली: जिस प्रकार फितरकी या फिरकी हवा के झोंके से गोल घूमती है, ठीक उसी यांत्रिक सिद्धांत पर पवनचक्की (Windmill) के पंख भी काम करते हैं।
- पवनचक्की के मुख्य उपयोग:
- आटा मिलों (Flour mills) को संचालित करने में।
- कुओं से भूमिगत जल को ऊपर खींचने में।

- टरबाइन चलाकर स्वच्छ विद्युत ऊर्जा (Electricity) उत्पन्न करने में।
- पवन फार्म (Windmill Farm): वह विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र जहाँ व्यावसायिक स्तर पर बिजली बनाने के लिए बड़ी संख्या में पवनचक्कियाँ स्थापित की जाती हैं।
भारत के प्रमुख पवन ऊर्जा फार्म:
- मुप्पंडल विंड फार्म: तमिलनाडु (यह भारत के सबसे बड़े पवन ऊर्जा केंद्रों में से एक है)।
- जैसलमेर विंड पार्क: राजस्थान (थार मरुस्थल क्षेत्र की उच्च पवन गति का उपयोग)।
- ब्राह्मणवेल विंड फार्म: महाराष्ट्र।
जल (Water)
- दैनिक एवं आर्थिक उपयोग: जल मानव जीवन का आधार है। इसका उपयोग पीने, खाना पकाने, स्नान करने, कपड़े और बर्तन धोने, कृषि (फसल उगाने) तथा औद्योगिक प्रक्रियाओं में बड़े पैमाने पर किया जाता है।
- पृथ्वी पर जल का वितरण: पृथ्वी की सतह का लगभग दो-तिहाई (2/3) भाग जल से ढका हुआ है।
- लवणीय जल की सीमा: पृथ्वी का अधिकांश जल महासागरों और समुद्रों में पाया जाता है, जो खारा (Saline) होने के कारण घरेलू, कृषि और औद्योगिक उपयोग के लिए अनुपयुक्त है।
मीठे पानी (Freshwater) की उपलब्धता और पहुँच
| मीठे पानी का स्रोत (Source) | उपलब्धता का स्वरूप | मानवीय पहुँच की स्थिति (Accessibility) |
| हिमनद और बर्फ की चादरें | ग्लेशियर और बर्फबारी के रूप में | अत्यधिक कठिन (Agri-Domestic उपयोग से दूर) |
| भूजल (Underground Water) | भूगर्भीय परतों के नीचे | कठिन और सीमित (पंपिंग की आवश्यकता) |
| सतही जल निकाय | नदियां, झीलें, तालाब और कुएँ | आसानी से सुलभ (कुल जल का एक बहुत छोटा हिस्सा) |
जल की बर्बादी और संरक्षण के उपाय (Wastage and Solutions)
- बर्बादी के मुख्य क्षेत्र: हाथ धोने, कपड़े/बर्तन धोने, शावर से नहाने, खाना पकाने, बागवानी करने और ब्रश करते समय नल खुला छोड़ने से पानी की भारी बर्बादी होती है।
- घरेलू संरक्षण रणनीतियां: उपयोग में न होने पर नलों को तुरंत बंद करना, पाइपलाइन के लीकेज को ठीक करना, पानी का पुनर्चक्रण (Recycling) करना और जल संचयन को बढ़ावा देना।
जल प्रदूषण और संकट (Water Pollution and Scarcity)
- प्रदूषण के कारण: नदियों, झरनों और झीलों में प्लास्टिक बैग, रैपर और कचरा फेंकने से जल प्रदूषित होता है। इसके अतिरिक्त, घरों का गंदा पानी और उद्योगों का रासायनिक अपशिष्ट सीधे जल स्रोतों में बहाने से पानी पीने योग्य नहीं रह जाता है।
- जल संकट की स्थिति: सीमित मीठे पानी के स्रोतों के कारण भारत के कई हिस्सों में पानी की तीव्र किल्लत है, जहाँ लोगों को पीने का पानी लाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। अतः जल का विवेकपूर्ण उपयोग अनिवार्य है।
पारंपरिक जल संचयन: भारत की प्राचीन विरासत
- वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting): भवनों, सोसाइटियों और स्कूलों की छतों से बारिश के पानी को इकट्ठा करके बड़े टैंकों में भविष्य के उपयोग के लिए संग्रहीत करना। भारत में यह एक प्राचीन प्रथा है।
- बावड़ी और वाव (Stepwells): जल संकट से निपटने के लिए भारत में निर्मित अनूठी ऐतिहासिक संरचनाएं।
- राजस्थान: इन्हें बावड़ी कहा जाता है।
- गुजरात: इन्हें वाव के नाम से जाना जाता है।
बावड़ियों की वैज्ञानिक कार्यप्रणाली:
- ये संरचनाएं न केवल सीधे गिरने वाले वर्षा जल को संचित करती हैं, बल्कि आसपास की झीलों, तालाबों और नदियों से रिसकर (Seepage) आने वाले पानी को भी जमा करती हैं।
- इनकी खाइयों (Trenches) की दीवारों पर पत्थरों के ब्लॉकों की लाइनिंग होती है, जो भूजल के रिसाव को सुगम बनाती है और पानी को प्राकृतिक रूप से छानती है।
सूर्य से ऊर्जा (Energy from the Sun)
- पृथ्वी का मुख्य ऊर्जा स्रोत: सूर्य पृथ्वी पर ऊर्जा का प्राथमिक और सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। पृथ्वी पर जीवन की कल्पना सूर्य के बिना असंभव है।
- सौर ताप का पारंपरिक उपयोग: सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊष्मा (Heat) का उपयोग फसलों और खाद्य पदार्थों के संरक्षण के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, मिर्च या कच्चे आम को धूप में सुखाकर उन्हें तब के लिए सुरक्षित रख लिया जाता है जब ताजी फसल उपलब्ध नहीं होती।
खाद्य श्रृंखला और सौर ऊर्जा की निर्भरता
पारिस्थितिकी (Ecology) के दृष्टिकोण से पृथ्वी पर ऊर्जा का प्रवाह पूरी तरह सौर ऊर्जा पर टिका हुआ है:
- उत्पादक (Plants): पौधे सूर्य के प्रकाश (Sunlight) का उपयोग करके प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं तैयार करते हैं।
- उपभोक्ता (Animals/Humans): शाकाहारी जानवर इन पौधों को खाते हैं और ऊर्जा प्राप्त करके वृद्धि करते हैं। मनुष्य और अन्य मांसाहारी जीव भोजन के लिए पौधों और जानवरों दोनों पर निर्भर हैं।
- निष्कर्ष: चूंकि भोजन का आधार पौधे हैं और पौधों का आधार सूर्य है, इसलिए पृथ्वी का पूरा जैविक चक्र (Life Cycle) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सूर्य से ही संचालित होता है।

आधुनिक सौर प्रौद्योगिकी और अनुप्रयोग
सूर्य की ऊर्जा को दो रूपों में सीधे प्रयोग में लाया जा सकता है:
- सौर पैनल: ये छतों पर, स्ट्रीट लाइटों में या ट्रैफिक सिग्नलों पर लगाए जाते हैं। ये सूर्य की प्रकाश ऊर्जा को कैप्चर (संग्रहीत) करके सीधे विद्युत ऊर्जा (Electricity) में परिवर्तित करते हैं।
- प्रत्यक्ष तापीय उपयोग (Direct Thermal Use):
- सोलर कुकर: सौर ताप का सीधे उपयोग करके खाना पकाने में।
- सोलर वॉटर हीटर: घरेलू या औद्योगिक उपयोग के लिए पानी गर्म करने में।
वन (Forests)
- वनों की परिभाषा: वन एक विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र होते हैं जहाँ विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियों (herbs), झाड़ियों (shrubs) और वृक्षों (trees) की सघन वृद्धि पाई जाती है।
- पारंपरिक संरक्षण दर्शन: भारतीय ग्रामीण संस्कृति में पेड़ों से सीधे फल न तोड़कर जमीन पर गिरे फलों (जैसे नेल्लीकाई/आंवला) को बीनने की परंपरा है ताकि पेड़ों के फल वन्यजीवों और पक्षियों के लिए सुरक्षित बचे रहें।
- पारिस्थितिक तंत्र का आधार: वन विभिन्न प्रकार के जंगली जानवरों, पक्षियों और कीटों का प्राकृतिक आवास (Natural home) हैं, जो उन्हें भोजन और आश्रय प्रदान करते हैं। जीवों की यह विविधता प्राकृतिक खाद्य श्रृंखला को सुचारू रखती है।
- चिंता का विषय: मानवीय गतिविधियों (जैसे बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई) के कारण वनों का आवरण (Forest cover) लगातार घट रहा है, जबकि नए वनों के उगने या उनके पुनरुद्धार (Restoration) में कई वर्षों का लंबा समय लगता है।
भारत में वन संरक्षण के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रयास
भारत में प्राचीन काल से ही वनों का आदर, संरक्षण और संवर्धन करने की एक मजबूत समृद्ध परंपरा रही है:
| संरक्षण का प्रकार / आंदोलन | काल और स्थान | मुख्य विशेषता |
| पवित्र उपवन | प्राचीन काल से संपूर्ण भारत में | सांस्कृतिक व धार्मिक आस्था के आधार पर संरक्षित वनों के वे छोटे हिस्से जहाँ इंसानी हस्तक्षेप और कटाई पूरी तरह वर्जित होती है। |
| चिपको आंदोलन | वर्ष 1970 के दशक की शुरुआत, उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) | पर्यावरण संरक्षण के लिए आम जनता, विशेषकर स्थानीय महिलाओं का ऐतिहासिक सामूहिक प्रयास, जिसमें वे पेड़ों को कटने से बचाने के लिए उनसे चिपक (hug) जाती थीं। |
| वन महोत्सव | प्रतिवर्ष जुलाई महीने के प्रथम सप्ताह में | देश भर में मनाया जाने वाला एक सप्ताह लंबा वन उत्सव, जिसका मुख्य उद्देश्य वृक्षारोपण को बढ़ावा देना और हरित आवरण (Green cover) में वृद्धि करना है। |
वनों में मृदा संरक्षण और प्राकृतिक पुनर्चक्रण
जंगल की जमीन पर गिरने वाली सूखी पत्तियों और गीली मिट्टी का एक गहरा वैज्ञानिक चक्र होता है:
- मृदा अपरदन से सुरक्षा: पौधों और पेड़ों की जड़ें मिट्टी के कणों को आपस में मजबूती से बांधकर रखती हैं, जिससे भारी बारिश के दौरान उपजाऊ मिट्टी बहने (Washed away) से बच जाती है।
- प्राकृतिक पोषक तत्व संवर्धन: पेड़ों से गिरने वाली सूखी पत्तियां समय के साथ सड़कर (Decay) ह्यूमस में बदल जाती हैं, जिससे मिट्टी आवश्यक पोषक तत्वों से समृद्ध होती है।
- सतत चक्र: इसी समृद्ध और उपजाऊ मिट्टी का उपयोग करके नए पौधे और पेड़ दोबारा उगते हैं, जिसे प्रकृति में पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण (Recycling in nature) कहा जाता है।
मृदा, चट्टानें और खनिज (Soil, Rocks and Minerals)
- मृदा की संरचना (Soil Composition): मिट्टी में केवल रेत नहीं होती, बल्कि इसमें कीट, केंचुआ, अदृश्य सूक्ष्मजीव और मृत पौधों व जानवरों के सड़े-गले अवशेष शामिल होते हैं। विभिन्न स्थानों की मिट्टी का रंग और बनावट उसमें मौजूद पदार्थों के आधार पर भिन्न होती है।
- केंचुआ (Earthworm): इसे ‘प्रकृति का हलवाहा’ या प्राकृतिक एजेंट कहा जाता है। यह मिट्टी को उलट-पुलट कर उसे ढीला बनाता है, जिससे मिट्टी के कणों के बीच हवा का संचार बढ़ता है और जड़ों का विकास सुगम होता है।
- मृदा निर्माण (Soil Formation): मिट्टी का निर्माण सूर्य के ताप, जल की क्रिया और सजीवों के प्रभाव से चट्टानों के टूटने व अपक्षय से होता है। यह एक अत्यंत धीमी प्रक्रिया है, जिसमें मिट्टी की एक पतली परत बनने में भी हजारों वर्ष का समय लगता है।
चट्टानों (Rocks) के प्रकार और उनके व्यावहारिक अनुप्रयोग
| चट्टान का नाम | मुख्य विशेषता / अनुप्रयोग | परीक्षा हेतु महत्व |
| लैटेराइट | इसका उपयोग ईंटों (Bricks) की तरह भवन निर्माण में किया जाता है। | उच्च तापमान और भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में निर्मित होने वाली अत्यधिक निक्षालित (Leached) मिट्टी/चट्टान। |
| स्लेट | छतों के निर्माण (Roofing) में परतदार संरचना के रूप में उपयोगी। | यह एक रूपांतरित (Metamorphic) चट्टान है। |
| ग्रेनाइट, बलुआ पत्थर व संगमरमर | मकानों, मंदिरों, इमारतों, बांधों, सड़कों और टेबल टॉप के निर्माण में। | बलुआ पत्थर (Sandstone) अवसादी है, जबकि संगमरमर (Marble) का खनन रूपांतरित चट्टान के रूप में होता है। |
| प्राचीन पाषाण उपकरण | हस्त-कुठार और बाणाग्र बनाने में। | मानव इतिहास में हजारों साल पहले (पुरापाषाण/मध्यपाषाण काल) पत्थरों से औजार बनाए जाते थे। |
खनिज और धातुओं का निष्कर्षण (Minerals)
- चट्टानों का मूल घटक: सभी चट्टानें मूल रूप से विभिन्न खनिजों (Minerals) से मिलकर बनी होती हैं।
- धातु निष्कर्षण (Extraction): मानव उपयोग की महत्वपूर्ण धातुएं जैसे एल्युमिनियम, सोना, तांबा और लोहा इन्हीं खनिजों (अयस्कों) से निकाली जाती हैं।
- विविध अनुप्रयोग: खनिजों का उपयोग हवाई जहाज, कारों, आभूषणों (Jewellery), सौंदर्य प्रसाधनों (Cosmetics) और औद्योगिक विनिर्माण में बड़े पैमाने पर होता है।
जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels)
- मूल संकल्पना: पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस (Natural Gas) और कोयला को सामूहिक रूप से जीवाश्म ईंधन कहा जाता है।
- निर्माण प्रक्रिया: इनका निर्माण लाखों वर्ष पहले पृथ्वी की गहराइयों में दबे सूक्ष्मजीवों (Microorganisms) और पौधों के अवशेषों पर अत्यधिक उच्च दाब तथा ताप के प्रभाव के कारण हुआ है।
- परिवहन में भूमिका: खनिज और चट्टानों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने वाले अधिकांश आधुनिक परिवहन वाहन प्रत्यक्ष रूप से जीवाश्म ईंधनों पर ही निर्भर हैं।
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के विभिन्न रूप व उनके उपयोग
| ईंधन का नाम (Fuel) | स्रोत / प्राप्ति (Source) | मुख्य उपयोग व पर्यावरणीय प्रभाव |
| पेट्रोल और डीजल | पेट्रोलियम (क्रूड ऑयल) से प्राप्त | वाहनों (यातायात) में सबसे व्यापक रूप से उपयोग होने वाला प्राथमिक ईंधन। |
| केरोसिन (मिट्टी का तेल) | पेट्रोलियम से प्राप्त | मुख्य रूप से प्रकाश और घरेलू ईंधन के रूप में प्रयुक्त। |
| LPG (तरल पेट्रोलियम गैस) | पेट्रोलियम रिफाइनिंग का उत्पाद | स्वच्छ घरेलू खाना पकाने के ईंधन के रूप में कोयला, लकड़ी और उपले (Dung cakes) का स्थान ले चुका है। |
| CNG (संपीड़ित प्राकृतिक गैस) | प्राकृतिक गैस का संपीड़ित रूप | वाहनों में पेट्रोल/डीजल की तुलना में उपयोग होने वाला एक अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन (Cleaner Fuel)। |
| कोयला (Coal) | कार्बनिक अवशेषों का ठोस रूप | भारत में मुख्य रूप से विद्युत उत्पादन (Thermal Power) में सर्वाधिक प्रयुक्त। |
पर्यावरणीय चुनौतियाँ और संरक्षण के उपाय
- वायु प्रदूषण: जीवाश्म ईंधनों के दहन से भारी मात्रा में धुआँ और कार्बन डाइऑक्साइड (CO_2) जैसी ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं, जिसने वैश्विक स्तर पर बड़े पैमाने पर वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन को जन्म दिया है।
- सीमित भंडार (Finite Resources): ये ईंधन प्रकृति में सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं। यदि वर्तमान दर से इनका दोहन जारी रहा, तो ये निकट भविष्य में पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे।
- व्यक्तिगत संरक्षण रणनीतियाँ:
- नजदीकी स्थानों पर जाने के लिए पैदल चलना या साइकिल का उपयोग करना।
- निजी वाहनों के स्थान पर सार्वजनिक परिवहन (Public Transport) को प्राथमिकता देना।
- वैकल्पिक और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों (जैसे सौर और पवन ऊर्जा) की खोज करना।
प्राकृतिक संसाधन: नवीकरणीय और गैर-नवीकरणीय (Natural Resources: Renewable and Non-renewable)
- संसाधनों का वर्गीकरण: प्रकृति से प्राप्त होने वाले मूल्यवान तत्व प्राकृतिक संसाधन कहलाते हैं (जैसे वायु, जल, वन, खनिज)। इसके विपरीत, मानव द्वारा निर्मित वस्तुएं (जैसे विद्युत बल्ब, फर्नीचर, साइकिल) मानव-निर्मित संसाधन कहलाती हैं।
- पुनर्पूंजीकरण का सिद्धांत: प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग का तरीका उनके भविष्य को तय करता है। जैसे जमीन पर गिरे फलों को इकट्ठा करने से वृक्षों के बीज पशु-पक्षियों के माध्यम से नए पौधों को जन्म देते हैं, जिससे वनों का चक्र प्राकृतिक रूप से चलता रहता है।
नवीकरणीय बनाम गैर-नवीकरणीय संसाधन: एक तुलनात्मक विश्लेषण
| संसाधन का प्रकार | वैज्ञानिक परिभाषा | मुख्य उदाहरण | महत्वपूर्ण तथ्य |
| नवीकरणीय संसाधन (Renewable) | वे संसाधन जो एक उचित समय सीमा के भीतर प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा स्वतः नवीकृत, पुनर्स्थापित या पुनः भर जाते हैं। | वायु (Air), जल (Water), वन (Forest) | इनका अत्यधिक दोहन या प्रदूषण इनके चक्र को बाधित कर सकता है, इसलिए विवेकपूर्ण उपयोग अनिवार्य है। |
| गैर-नवीकरणीय संसाधन (Non-renewable) | वे संसाधन जो प्रकृति में सीमित मात्रा में हैं और एक बार समाप्त होने के बाद उचित समय में पुनः निर्मित नहीं हो सकते। | कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, खनिज (Minerals), मिट्टी (Soil), चट्टानें (Rocks) | इनके निर्माण में लाखों वर्ष लगते हैं। एक बार समाप्त होने पर ये हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे। |
संसाधन जिनका हम उपयोग करते हैं
- शहरीकरण और वायु प्रदूषण (Urban Environmental Crisis): ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरों में वृक्षों की कमी और वाहनों से निकलने वाले धुएं के कारण वायु की गुणवत्ता गंभीर रूप से प्रभावित होती है।
- स्वच्छ विकल्प (Green Alternatives): जीवाश्म ईंधन के दहन से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए आधुनिक समय में इलेक्ट्रिक वाहन जैसे धुएँ से मुक्त और पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों को अपनाया जा रहा है।
- दैनिक जीवन में संसाधनों की खपत: हमारे दैनिक जीवन की हर गतिविधि (कपड़े धोना, मिट्टी के खिलौने बनाना, जलावन लकड़ी इकट्ठा करना, पतंग बनाना, नाश्ता करना) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जल, मिट्टी, पौधों और जानवरों जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर टिकी है।
सतत विकास और गांधीवादी दर्शन
- भावी पीढ़ी के लिए संरक्षण: प्राकृतिक संसाधनों का जिम्मेदारी से और बिना बर्बादी के उपयोग करना ही सतत विकास (Sustainable Development) का मूल मंत्र है, ताकि वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी संसाधन सुरक्षित रहें।
- ऐतिहासिक उद्धरण:
“पृथ्वी हर मनुष्य की आवश्यकता (Need) को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन प्रदान करती है, लेकिन किसी भी मनुष्य के लालच (Greed) को पूरा करने के लिए नहीं।” – महात्मा गांधी