NCERT Notes Class 6 science Chapter 10: Living Creatures: Exploring their Characteristics के अंतर्गत पौधे और जंतु किस प्रकार भोजन से ऊर्जा प्राप्त करते हैं, समय के साथ उनमें निरंतर वृद्धि कैसे होती है, और वे जीवित रहने के लिए श्वसन की प्रक्रिया को कैसे अपनाते हैं। बाहरी वातावरण में होने वाले बदलावों के प्रति सजीवों द्वारा दिखाई जाने वाली अनुक्रिया, शरीर के हानिकारक पदार्थों को बाहर निकालने के लिए उत्सर्जन की व्यवस्था और अपनी प्रजाति के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए प्रजनन के वैज्ञानिक महत्व को भी स्पष्ट किया गया है।
सजीवों को निर्जीवों से क्या अलग करता है?
- वर्गीकरण का मूल आधार: किसी वस्तु को सजीव या निर्जीव श्रेणियों में बांटने के लिए गति, वृद्धि और पोषण जैसे जैविक लक्षणों को मानक बनाया जाता है।
- भ्रम और उसका निवारण (गति बनाम सजीवता): सड़क पर चलती कार में गति तो होती है, लेकिन वह निर्जीव है क्योंकि वह सजीवों के अन्य आवश्यक लक्षण जैसे वृद्धि या श्वसन प्रदर्शित नहीं करती है। ठीक इसके विपरीत, पौधे एक स्थान से दूसरे स्थान पर गमन नहीं करते, फिर भी वे विभिन्न आंतरिक व बाह्य गतियों के कारण पूर्णतः सजीव हैं।
सजीव प्राणी: उनके लक्षणों की खोज
सजीवों और निर्जीवों के बीच अंतर स्पष्ट करने वाले प्रमुख वैज्ञानिक लक्षण निम्नलिखित हैं:
1. पौधों में गति (Movement in Plants)
- पुष्पों का खिलना: कलियों का फूलों में बदलना पौधों की धीमी और समन्वित गति का उदाहरण है।
- कीटभक्षी पौधे (Insectivorous Plants): ये पौधे पोषण (विशेषकर नाइट्रोजन) के लिए पूरी तरह कीटों पर निर्भर होते हैं।
- ड्रॉसेरा: इसकी पत्तियाँ तश्तरी (Saucer) के आकार की होती हैं, जिन पर असमान लंबाई के चिपचिपे बाल (Sticky hairs) पाए जाते हैं। जैसे ही कोई कीट इस पर बैठता है, ये बाल अंदर की ओर मुड़कर कीट को फंसा लेते हैं।

- आरोही पौधे (Climbers): ये अपने आस-पास मौजूद किसी भी वस्तु या सहारे के चारों ओर मुड़कर ऊपर की ओर बढ़ते हैं।
2. वृद्धि और पोषण (Growth and Nutrition)
- शारीरिक वृद्धि: सजीवों के शरीर का आकार समय के साथ बढ़ता है, जिसे अपरिवर्तनीय शुष्क द्रव्यमान में वृद्धि कहा जाता है।
- पोषण: शारीरिक वृद्धि और चयापचय (Metabolism) के लिए सभी सजीवों को भोजन और पोषक तत्वों की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
3. श्वसन प्रक्रिया (Respiration)
- गैसीय विनिमय: श्वसन के दौरान सजीव ऑक्सीजन युक्त हवा अंदर लेते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर छोड़ते हैं। शारीरिक सक्रियता (दौड़ने या नाचने) के बाद श्वसन दर तीव्र हो जाती है।
- पादप श्वसन (Plant Respiration): पौधे भी श्वसन करते हैं। उनकी पत्तियों की सतह पर स्टोमेटा (रंध्र) नामक अत्यधिक सूक्ष्म छिद्र होते हैं, जो सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखे जा सकते हैं और हवा को अंदर-बाहर करने में मदद करते हैं।
4. उत्सर्जन (Excretion)
- अपशिष्ट निष्कासन: शरीर में बनने वाले हानिकारक अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने की प्रक्रिया उत्सर्जन कहलाती है। पशुओं में यह पसीने (जल और लवण) तथा मूत्र के रूप में होता है।
- पादप उत्सर्जन: पौधे भी उत्सर्जन करते हैं। घास और गुलाब जैसी वनस्पतियाँ पत्तियों की युक्तियों पर पानी की छोटी बूंदों के रूप में अतिरिक्त जल और खनिजों को बाहर निकालती हैं (इस प्रक्रिया को बिंदुस्राव/Guttation कहते हैं)।
5. उद्दीपनों के प्रति अनुक्रिया (Response to Stimuli)
- उद्दीपन (Stimulus): पर्यावरण में होने वाला कोई भी ऐसा परिवर्तन या घटना जो सजीवों को प्रतिक्रिया करने के लिए प्रेरित करे, उद्दीपन कहलाती है (जैसे अचानक कांटे पर पैर पड़ना या गर्म कप छूना)।
- पादप अनुक्रिया:
- छुई-मुई (Mimosa/Lajjalu): स्पर्श का उद्दीपन मिलते ही इसकी पत्तियाँ तुरंत अंदर की ओर मुड़कर बंद हो जाती हैं।

- सोने वाली पत्तियाँ (Sleeping Leaves): आंवला (Indian Gooseberry) जैसे कुछ पौधों की आमने-सामने वाली पत्तियां सूर्यास्त के बाद प्रकाश की अनुपस्थिति (उद्दीपन्न) के कारण आपस में जुड़कर बंद हो जाती हैं।
6. प्रजनन और मृत्यु (Reproduction and Death)
- प्रजनन: अपने ही जैसी नई संतान उत्पन्न करने की जैविक प्रक्रिया को प्रजनन कहते हैं, जो पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता (Continuity of life) बनाए रखने के लिए अनिवार्य है।
- मृत्यु: जब कोई सजीव अनुकूल संसाधन (भोजन, हवा, पानी) होने के बाद भी ऊपर दिए गए जैविक लक्षणों को प्रदर्शित करने में पूरी तरह असमर्थ हो जाता है, तो उसे मृत घोषित कर दिया जाता है।
सजीवों के मूलभूत जैविक लक्षणों का सारांश
| जैविक प्रक्रिया | जंतुओं में स्वरूप | पौधों में स्वरूप | वैज्ञानिक महत्व |
| गति (Movement) | स्थान परिवर्तन (लोकोमोशन) | पत्तियों का मुड़ना, फूलों का खिलना | पौधों में रासायनिक उद्दीपनों द्वारा नियंत्रित गति होती है। |
| श्वसन (Respiration) | फेफड़ों/त्वचा द्वारा गैस विनिमय | पत्तियों पर मौजूद रंध्रों (Stomata) द्वारा | ऊर्जा उत्पादन के लिए कोशिकीय स्तर पर अनिवार्य। |
| उत्सर्जन (Excretion) | मूत्र और पसीने के माध्यम से | पत्तियों पर बूंदों के रूप में (Guttation) | शरीर के आंतरिक संतुलन (Homeostasis) के लिए आवश्यक। |
| अनुक्रिया (Response) | तंत्रिका तंत्र द्वारा तीव्र प्रतिक्रिया | स्पर्श या प्रकाश (जैसे छुई-मुई और आंवला) के प्रति | पर्यावरण के अनुकूल जीवित रहने की उत्तरजीविता रण |
बीज के अंकुरण के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ
- अंकुरण (Germination): जब एक निष्क्रिय बीज अनुकूल परिस्थितियों में एक सक्रिय अंकुर (Sprout) में बदल जाता है, तो उसे अंकुरण कहते हैं।
- सजीवता का प्रमाण: अंकुरण की प्रक्रिया यह सिद्ध करती है कि एक सूखा बीज वास्तव में सजीव (Living) है, जो अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर सक्रिय हो जाता है।
विभिन्न परिस्थितियों का बीजों पर प्रभाव
| गमला (Pot) | उपलब्ध परिस्थितियाँ | वायु की उपलब्धता | अंकुरण का परिणाम | वैज्ञानिक कारण |
| Pot A | सीधी धूप + पानी बिल्कुल नहीं | उपलब्ध | अंकुरण नहीं | पानी के बिना आंतरिक जैविक क्रियाएं शुरू नहीं हो पाती हैं। |
| Pot B | सीधी धूप + अत्यधिक पानी (जलजमाव) | अनुपलब्ध (मिट्टी के छिद्र पानी से बंद) | अंकुरण नहीं | वायु (ऑक्सीजन) न मिलने से बीज श्वसन नहीं कर पाता और सड़ जाता है। |
| Pot C | पूर्ण अंधकार + नमी (सीमित पानी) | उपलब्ध | अंकुरण सफल | अधिकांश बीजों को अंकुरित होने के लिए प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती। |
| Pot D | सीधी धूप + नमी (सीमित पानी) | उपलब्ध | अंकुरण सफल | अंकुरण के लिए आवश्यक तीनों प्राथमिक घटक (वायु, नमी, सही तापमान) मौजूद हैं। |
अंकुरण के तीन मुख्य घटक और उनका कार्य
1. जल (Water)
- बीज चोल (Seed Coat): यह बीज की बाहरी सुरक्षात्मक परत होती है।
- कार्य: पानी बीज चोल को सोखकर नरम (Soft) बनाता है। इसके बिना आंतरिक भ्रूण (Embryo) विकसित होकर बाहर नहीं आ पाता।
2. वायु और मिट्टी (Air and Soil)
- श्वसन: अंकुरण के समय बीज को ऊर्जा बनाने के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है।
- कार्य: बीज मिट्टी के कणों के बीच मौजूद खाली स्थानों (Air spaces) से हवा लेते हैं। मिट्टी का यह ढीलापन जड़ों को आसानी से फैलने में भी मदद करता है।
3. प्रकाश और अंधकार की स्थिति (Light and Dark Conditions)
- सामान्य नियम: सेम (Bean) सहित अधिकांश पौधों के बीजों को अंकुरित होने के लिए प्रकाश की कोई आवश्यकता नहीं होती है।
- अपवाद:
- प्रकाश-प्रिय बीज (Light-requiring): कोलियस और पेटुनिया के बीजों को अंकुरित होने के लिए प्रकाश अनिवार्य है। इन्हें मिट्टी से पूरी तरह ढकने पर इनका अंकुरण रुक जाता है।
- अंधकार-प्रिय बीज (Dark-requiring): कैलेंडुला और ज़िन्निया के बीजों को अंकुरण के लिए पूर्ण अंधकार चाहिए। इसलिए इन्हें मिट्टी की पर्याप्त परत से ढकना जरूरी होता है।
- अंकुरण के बाद: एक बार जब बीज से नन्हा पौधा (Seedling) बाहर आ जाता है, तब उसके आगे के विकास और प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) के लिए धूप अनिवार्य हो जाती है।
पौधों में वृद्धि और गति
- मूल सिद्धांत: पौधों में गति जंतुओं की तरह स्थान बदलने (लोकोमोशन) के रूप में नहीं, बल्कि उनके अंगों (जैसे जड़ और तना) की विशिष्ट दिशात्मक वृद्धि (Directional Growth) के रूप में दिखाई देती है।
- अनुवर्तन (Tropism): बाह्य उद्दीपनों (जैसे प्रकाश, गुरुत्वाकर्षण) के प्रति पौधों की प्रतिक्रिया में होने वाली इस दिशात्मक वृद्धि को अनुवर्तन कहते हैं।

विभिन्न परिस्थितियों में जड़ और तने की वृद्धि
| बीकर ) | पौधे की स्थिति और प्रकाश की दिशा | तने (Shoot) की वृद्धि की दिशा | जड़ (Root) की वृद्धि की दिशा | वैज्ञानिक निष्कर्ष |
| Beaker A | सीधा पौधा (Upright): सभी दिशाओं से समान धूप। | ऊपर की ओर (Upward) | नीचे की ओर | सामान्य परिस्थितियों में तना प्रकाश की ओर और जड़ें जमीन की ओर बढ़ती हैं। |
| Beaker B | उल्टा पौधा (Inverted): सभी दिशाओं से समान धूप। | मुड़कर ऊपर की ओर | मुड़कर नीचे की ओर | पौधा उल्टा होने पर भी जड़ें गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में नीचे और तना ऊपर घूम जाता है। |
| Beaker C | सीधा पौधा: एक छोटे छेद से केवल एक दिशा से प्रकाश। | प्रकाश के स्रोत की ओर मुड़ना | नीचे की ओर (सीधी) | तना प्रकाश की ओर आकर्षित होकर झुक जाता है, जबकि जड़ों पर इस प्रकाश का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। |
मुख्य वैज्ञानिक निष्कर्ष
- तने (Shoot) का व्यवहार: पौधे का तना हमेशा ऊपर की ओर बढ़ता है और सूर्य के प्रकाश की दिशा में गति प्रदर्शित करता है। विज्ञान में इसे धनात्मक प्रकाशानुवर्तन (Positive Phototropism) कहते हैं।
- जड़ (Root) का व्यवहार: पौधे की जड़ें हमेशा नीचे की ओर (जमीन में) बढ़ती हैं, चाहे पौधे को उल्टा ही क्यों न रख दिया जाए। विज्ञान में इसे धनात्मक गुरुत्वानुवर्तन (Positive Geotropism) कहा जाता है।
भारतीय वैज्ञानिक: सर जगदीश चंद्र बोस (1858–1937)
- मुख्य खोज: इन्होंने विश्व के सामने यह सिद्ध किया कि पौधों में भी जीवन होता है। वे इंसानों और जंतुओं की तरह ही विभिन्न बाह्य उद्दीपनों (जैसे प्रकाश, ऊष्मा, विद्युत और गुरुत्वाकर्षण) को महसूस कर सकते हैं और उनके प्रति अनुक्रिया (Respond) करते हैं।
- क्रेस्कोग्राफ (Crescograph): सर जे. सी. बोस ने स्वयं इस अनूठे उपकरण का आविष्कार किया था।
- कार्य: यह उपकरण पौधों की अत्यंत धीमी वृद्धि को बहुत उच्च स्तर पर आवर्धित (Magnify) करके सटीक रूप से माप सकता था।
- महत्व: इसके माध्यम से उन्होंने विभिन्न उत्तेजकों (Stimuli) के प्रभाव में पौधों की तात्कालिक प्रतिक्रियाओं और उनकी वृद्धि दर को रिकॉर्ड किया।
पौधे का जीवन चक्र
- मूल अवधारणा: एक बीज से अंकुरण प्रारंभ होकर एक पूर्ण परिपक्व पौधे का विकास होना, फिर उस पर पुष्प व फल आना और अंततः नई पीढ़ी के बीजों का निर्माण होना पौधे का संपूर्ण जीवन चक्र (Life Cycle) कहलाता है।
- निरंतरता का सिद्धांत: इस चक्र के माध्यम से वनस्पतियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनी प्रजाति की निरंतरता को पृथ्वी पर बनाए रखती हैं।

पौधे के विकास के विभिन्न चरण और उनके रूपात्मक परिवर्तन
| विकासात्मक चरण | मुख्य रूपात्मक परिवर्तन | वैज्ञानिक परिघटना और महत्व |
| 1. बीजारोपण व अंकुरण | बीज को मिट्टी में बोकर अनुकूल परिस्थितियां (नमी, वायु, सही तापमान) दी जाती हैं। | सुशुप्तावस्था (Dormancy) समाप्त होती है और भ्रूण सक्रिय होकर अंकुर (Sprout) बनता है। |
| 2. वानस्पतिक वृद्धि | अंकुर एक युवा पौधे (Young Plant) में बदलता है और तेजी से तने तथा पत्तियों का विस्तार करता है। | पौधा प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) द्वारा अपनी वृद्धि के लिए ऊर्जा संचित करता है। |
| 3. पुष्पन (Flowering) | एक निश्चित अवधि (परिपक्वता) के बाद पौधे पर पहला फूल दिखाई देता है। | यह पौधे का प्रजनन चरण (Reproductive Phase) होता है जो आगे फल बनने की नींव रखता है। |
| 4. फलन व बीज निर्माण | फूल के कुछ हिस्से सूखकर गिर जाते हैं और शेष भाग एक फली या फल (Pod/Fruit) में विकसित होता है। | निषेचन (Fertilization) के बाद अंडाशय फल में और बीजांड बीजों में बदल जाते हैं, जिसमें नई पीढ़ी के बीज सुरक्षित रहते हैं। |
| 5. शून्यता व प्राकृतिक मृत्यु | फल और बीज पूरी तरह परिपक्व होने के बाद पौधा धीरे-धीरे पीला और सूखा होने लगता है। | जीवन की सभी चयापचय गतिविधियाँ (Metabolic Activities) समाप्त हो जाती हैं और पौधा मृत हो जाता है |
जंतुओं का जीवन चक्र
- जंतु विकास प्रक्रिया: पौधों की तरह जंतु भी समय के साथ क्रमिक शारीरिक परिवर्तनों (Morphological changes) से गुजरते हैं।
- विविधता: विभिन्न जंतुओं के बच्चे (young ones) वयस्क अवस्था तक पहुँचते-पहुँचते अपने आकार, रूप और संरचना में व्यापक बदलाव प्रदर्शित करते हैं।
मच्छर का जीवन चक्र
- रोग संचरण (Disease Transmission): मादा मच्छर (Female mosquitoes) रक्तचूषक कीट हैं जो मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया जैसी खतरनाक बीमारियों को फैलाती हैं।

- नियंत्रण रणनीति: मच्छरों के प्रजनन को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका घरों और आसपास के क्षेत्रों (कूलर, गमले, खुले बर्तन) में पानी को इकट्ठा (Stagnant water) न होने देना है।
मच्छर के विकास के चार मुख्य चरण:
- अंडा (Stage I): मादा मच्छर ठहरे हुए पानी की सतह पर या उसके पास अंडे देती है।
- लावा (Stage II): अंडों से कीड़े जैसी संरचना निकलती है जिसे लार्वा कहते हैं। यह पानी में रहता है लेकिन श्वसन (Respiration) के लिए हवा लेने हेतु बार-बार पानी की सतह पर आता है।
- प्यूपा (Stage III): लार्वा का रूपांतरण प्यूपा में होता है। यह भी पानी में रहता है और हवा के लिए सतह पर आता है। इसका आकार लार्वा और वयस्क दोनों से भिन्न होता है।
- वयस्क मच्छर (Stage IV): प्यूपा से पूर्ण विकसित मच्छर निकलता है जो पानी की सतह पर थोड़ी देर आराम कर उड़ जाता है। वयस्क मच्छर का जीवनकाल 10 से 15 दिनों का होता है।
मेंढक का जीवन चक्र
- अंडे (Spawn): वर्षा ऋतु में उथले तालाबों के किनारों पर या जलीय पौधों से चिपका एक सफेद जेली जैसा पदार्थ दिखाई देता है, जिसे स्पॉन कहते हैं; यह वास्तव में मेंढक के अंडों का गुच्छा होता है।
- आवास परिवर्तन: मेंढक का जीवन चक्र पूरी तरह जलीय (Aquatic) आवास से शुरू होकर उभयचर (Amphibious – भूमि और पानी दोनों) आवास में बदल जाता है।
मेंढक के विकास का क्रमिक वर्गीकरण:
| चरण (Stage) | नाम | समयावधि/विशेषताएं | शारीरिक अनुकूलन और महत्व |
| Stage IA | स्पॉन | Day 1 | पानी की सतह पर जेली के रूप में सुरक्षित अंडों का समूह। |
| Stage IB | भ्रूण (Embryo) | Day 3-4 | अंडे के भीतर भ्रूण का प्रारंभिक विकास। |
| Stage IIA | टैडपोल पूंछ के साथ | Day 7-10 | प्रारंभिक डिंभक (Larva); इसमें केवल पूंछ होती है, पैर नहीं होते। पूंछ पानी में तैरने में मदद करती है। |
| Stage IIB | पैर वाला टैडपोल | 8-10 सप्ताह | टैडपोल के पिछले पैर (Hind legs) विकसित होने लगते हैं, लेकिन पूंछ बनी रहती है। |
| Stage III | फ्रॉगलेट (Froglet) | 12 सप्ताह | यह छोटा मेंढक जैसा दिखता है। यह पानी में रहने के साथ-साथ भूमि पर भी कुछ समय बिताना शुरू करता है। |
| Stage IV | वयस्क मेंढक (Adult) | 14 सप्ताह | पूंछ पूरी तरह गायब हो जाती है। इसके पैर कूदने और जमीन पर उतरने के लिए मजबूत हो जाते हैं। यह पानी और जमीन दोनों पर रह सकता है। |