Give The Best…..Take The Best

25 July 2026 The Hindu Notes In Hindi Pdf

25 July 2026 The Hindu Notes In Hindi Pdf के इस महत्वपूर्ण विश्लेषणात्मक अंक में देश और दुनिया से जुड़े कई दूरदर्शी विषयों को शामिल किया गया है। इसमें भारत की समुद्री विदेश नीति, महिला कार्यबल की भागीदारी से ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य, सुंदरबन के नाजुक मैंग्रोव तंत्र और हिमालयी औषधीय पौधे ‘कुटकी’ के संरक्षण पर जोर दिया गया है। साथ ही, ऊर्जा क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली जिंक-एयर बैटरी के लिए नई नैनोफ्लुइड इलेक्ट्रोलाइट तकनीक पर भी विशेष प्रकाश डाला गया है।

नई तकनीक और विकासकर्ता

  • नवाचार: वैज्ञानिकों ने एक नया नैनोफ्लुइड इलेक्ट्रोलाइट विकसित किया है, जो विद्युत रूप से रिचार्ज होने वाली जिंक-एयर बैटरी के कैथोड की कार्यक्षमता बढ़ाने में सक्षम है।
  • पेटेंट: इस तकनीक को भारतीय पेटेंट (संख्या – IN570691) प्राप्त हो चुका है और यह व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए तैयार है।

मुख्य विशेषताएं और लाभ

  • स्थिरता: यह नया इलेक्ट्रोलाइट तीन महीने से अधिक समय तक स्थिर रहता है।
  • उपयोग: इसे सीधे जिंक-एयर बैटरी के निर्माण में उपयोग किया जा सकता है। यह बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण (ग्रिड-स्केल स्टोरेज) और भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने में सहायक है।
  • पर्यावरण-अनुकूल: यह लिथियम-आयन बैटरी के सुरक्षित, किफायती और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प (एक्वियस बैटरी) के रूप में उभर रहा है।

समाधान की गई तकनीकी चुनौतियाँ

पारंपरिक जिंक-एयर बैटरियों की दो प्रमुख समस्याओं का समाधान किया गया है:

  1. जिंक एनोड पर हाइड्रोजन गैस बनना: सामान्य इलेक्ट्रोलाइट में बहुत कम मात्रा में सामान्य सिलिका और जिंक ऑक्साइड के नैनोकण मिलाकर अनावश्यक हाइड्रोजन गैस बनने की प्रक्रिया को नियंत्रित किया गया और जिंक के क्षरण को रोका गया।
  2. वायु कैथोड पर ऑक्सीजन की धीमी अभिक्रिया: पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध तत्वों से बने द्विकार्यात्मक उत्प्रेरक तैयार किए गए, जिससे महंगे प्लैटिनम या रूथेनियम की आवश्यकता कम हुई।

संकटग्रस्त जड़ी-बूटी और उद्देश्य

  • परिचय: कुटकी (Picrorhiza kurroa) हिमालय के ऊंचे इलाकों (2,700-4,500 मीटर की ऊंचाई) में पाई जाने वाली एक मूल्यवान औषधीय जड़ी-बूटी है।
  • संकट: दशकों से अंधाधुंध और विनाशकारी जंगली कटाई (uprooting) के कारण यह पौधा विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गया है।
  • आईयूसीएन (IUCN) स्थिति: इसे IUCN रेड लिस्ट में ‘संकटग्रस्त’ (Endangered) श्रेणी में रखा गया है।
  • CITES सूची: अंतरराष्ट्रीय व्यापार के खतरे को देखते हुए इसे CITES के परिशिष्ट II (Appendix II) में शामिल किया गया है, जिसके तहत इसका व्यापार केवल विनियमित और नियंत्रित शर्तों के तहत ही किया जा सकता है।

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में मॉडल

  • पहल: हिमालयन रिसर्च ग्रुप (HRG) द्वारा हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के किसानों के लिए एक स्थायी खेती का मॉडल अपनाया गया है।
  • विस्तार: 2022 में जैव प्रौद्योगिकी विभाग के हिमालयन बायोसंसाधन मिशन के तहत एक शोध परियोजना के रूप में शुरू हुआ यह प्रयास अब लगभग 180 किसानों के साथ इस संकटग्रस्त प्रजाति का सबसे बड़ा निजी भूमि खेती क्लस्टर बन गया है।

वैज्ञानिक खेती और ‘स्टोलन’ (Stolon) विधि

  • मिथक बनाम सच्चाई: समाज में यह मिथक था कि पौधे की ‘जड़’ ही दवा है और बाजार में बिकती है। तकनीकी रूप से, औषधीय भाग जड़ नहीं बल्कि पौधे की एक साइड शाखा होती है जो मिट्टी पर रेंगती है और जिसमें गांठें (nodes) होती हैं—इसे ‘स्टोलन’ (Stolon) कहा जाता है। रेशेदार जड़ों में कोई औषधीय तत्व नहीं होता।
  • स्थायी कटाई तकनीक: एचआरजी (HRG) के वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है जिसमें किसान केवल पौधे के साइड वाले ‘स्टोलन’ की कटाई करते हैं, और मुख्य पौधे (mother plant) को सुरक्षित छोड़ देते हैं ताकि वह सालों-साल उत्पादन जारी रख सके। इसे बारहमासी (perennial) पौधा बनाया जा सकता है।

संदर्भ (Context)

  • मुद्दा: अतिक्रमण और अवैध गतिविधियों (विशेषकर उथली मछली की तालाबों/भेड़ियों का निर्माण) के कारण सैकड़ों एकड़ मैंग्रोव वनों का नष्ट होना।
  • घोषणा: पश्चिम बंगाल के पर्यावरण और वन मंत्री द्वारा अतिक्रमण वाले क्षेत्रों को पुनः बहाल (Restore) करने का आश्वासन।

प्रमुख तथ्य  

  • भारत में मैंग्रोव का हिस्सा: भारत के कुल मैंग्रोव आवरण का 42.45% हिस्सा अकेले पश्चिम बंगाल (विशेषकर सुंदरबन) में है।
  • कुल क्षेत्रफल: सुंदरबन में लगभग 2,119.16 वर्ग किमी मैंग्रोव क्षेत्र है।
  • खारे पानी के मगरमच्छ (Saltwater Crocodiles): सुंदरबन टाइगर रिजर्व के अनुसार, क्षेत्र में खारे पानी के मगरमच्छों की संख्या 234 से 264 के बीच है।

सुंदरबन मैंग्रोव वनों के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ (Challenges)

  • अवैध अतिक्रमण: मैंग्रोव वनों को काटकर उन्हें व्यावसायिक मत्स्य पालन (Fisheries/Bheries) में बदला जा रहा है।
  • भ्रामक आवरण: जल निकायों और क्रीक्स (Creeks) से यात्रा करने पर बाहरी आवरण घना मैंग्रोव प्रतीत होता है, लेकिन अंदरूनी हिस्से में वनों को साफ कर अतिक्रमण किया जा चुका है।
  • पारिस्थितिकीय संवेदनशीलता: सुंदरबन एक अत्यंत नाजुक (Fragile) पारिस्थितिकी तंत्र है, जिस पर जलवायु परिवर्तन और मानवीय हस्तक्षेप का लगातार खतरा बना हुआ है।

उपाय

  • सुझाव 1 (संरक्षण प्राधिकरण): एक मैंग्रोव प्रबंधन और संरक्षण प्राधिकरण (Mangrove Management and Conservation Authority) का गठन ।
  • सुझाव 2 (पर्यटन को बढ़ावा): इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए खारे पानी के मगरमच्छों के संरक्षण और संवर्धन पर जोर।
  • सुझाव 3 (प्रौद्योगिकी और सह-प्रबंधन): मैंग्रोव शासन को मजबूत करने के लिए तकनीकी नवाचार (Technology Driven Innovation) और सह-प्रबंधन (Co-management) का उपयोग।

संदर्भ (Context)

  • लक्ष्य: भारत का वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ (Viksit Bharat) बनने का लक्ष्य।
  • प्रमुख बाधा: दोगुनी युवा बेरोजगारी, असंतुलित आर्थिक वृद्धि, और महिलाओं की निम्न कार्य सहभागिता दर (WPR)।
  • निहितार्थ: महिलाओं को उत्पादक रोजगार में शामिल किए बिना भारत का विकसित राष्ट्र बनने का सपना अधूरा है।

अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमियां (Structural Weaknesses)

  • नीतिगत झटके (Policy-induced shocks): वर्ष 2016 से लेकर (नोटबंदी, त्रुटिपूर्ण जीएसटी, एनबीएफसी संकट और कोविड-19 प्रबंधन) अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक स्थिति प्रभावित हुई है।
  • रोजगार पर प्रभाव: कृषि क्षेत्र में रोजगार में वृद्धि और विनिर्माण (Manufacturing) तथा सकल मूल्य वर्धित (GVA) में विनिर्माण की हिस्सेदारी में गिरावट आई है। गैर-कृषि रोजगार की वृद्धि दर धीमी हुई है।
  • असमानता और मांग में कमी: अर्थव्यवस्था के असमान होने से समग्र मांग (Aggregate Demand) और निवेश-जीडीपी अनुपात में गिरावट आई है।

महिला श्रम शक्ति: आर्थिक वृद्धि का मुख्य इंजन

  • जीडीपी पर प्रभाव: नए अध्ययन के अनुसार, भारत की महिला कार्य सहभागिता दर (WPR) में 10 प्रतिशत अंकों की वृद्धि से जीडीपी विकास दर में लगभग दो प्रतिशत अंकों की वृद्धि हो सकती है।
  • बहुआयामी लाभ:
    • श्रम आपूर्ति में विस्तार और उत्पादकता क्षमता में वृद्धि।
    • घरेलू आय, उपभोग और बचत में सुधार।
    • बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा में सुधार (मानव पूंजी का विकास)।
    • नोबेल पुरस्कार विजेता क्लाउडिया गोल्डिन (Claudia Goldin) के अनुसार, लैंगिक रूप से विविध कार्यस्थल अधिक कुशल, रचनात्मक और प्रतिस्पर्धी होते हैं।

महिला कार्य सहभागिता (WPR) की वर्तमान स्थिति और चुनौतियाँ

  • निम्न सहभागिता: भारत में महिलाओं की कार्य सहभागिता दर (WPR) 30% से कम है, जो दुनिया में सबसे कम (सउदी अरब और यमन के बराबर) है।
  • यू-आकार का वक्र (U-shaped Curve): 1980 और 1990 के दशक में कृषि में उच्च भागीदारी के कारण महिलाओं की WPR अधिक थी। आर्थिक विकास और मशीनीकरण के कारण यह वक्र नीचे गिरा (क्लाउडिया गोल्डिन के सिद्धांत के अनुरूप)।
  • संकट-प्रेरित नारीकरण (Distress-driven Feminisation of Agriculture):
    • कोविड-19 और शहरी क्षेत्रों से रिवर्स पलायन के कारण पुरुष ग्रामीण लौटे, जिससे महिलाओं को निर्वाह कृषि में अवैतनिक पारिवारिक श्रम (Unpaid Family Labor – UFL) के रूप में काम करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
    • गैर-कृषि अवसरों के सिमटने और सामाजिक-सांस्कृतिक मानदंडों के कारण महिलाओं को अनौपचारिक और असुरक्षित कृषि कार्यों में लौटना पड़ा।
  • विनिर्माण क्षेत्र में गिरावट: वस्त्र, खाद्य प्रसंस्करण, और छोटे पैमाने के विनिर्माण जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में 2013 से 2019 के बीच रोजगार में गिरावट आई। 2004 की तुलना में 2019 में कम महिलाएं विनिर्माण क्षेत्र में थीं (मेक इन इंडिया के दावों के बावजूद)।

उत्तर-दक्षिण विभाजन (The North-South Divide)

  • तमिलनाडु का सफल मॉडल:
    • भारत की 40% से अधिक महिला फैक्ट्री श्रमिक तमिलनाडु में कार्यरत हैं (जबकि देश की आबादी का यह केवल 5-6% हिस्सा है)।
    • इसका कारण वस्त्र, परिधान (तिरुपुर/कोयंबटूर), जूते, इलेक्ट्रॉनिक्स (श्रीपेरंबदूर) और ऑटोमोबाइल उद्योगों की मजबूत उपस्थिति के साथ-साथ उच्च महिला साक्षरता, गतिशीलता और अच्छे हॉस्टल/परिवहन की सुविधा है।
  • हिंदी-बेल्ट राज्यों की स्थिति (उत्तर भारत की चुनौती):
    • बिहार जैसे राज्यों में महिला WPR मात्र 15% है।
    • उत्तर प्रदेश और बिहार में माध्यमिक स्तर पर सकल नामांकन अनुपात (GER) में लैंगिक समानता तो आई है, लेकिन शिक्षित युवा महिलाओं में उच्च बेरोजगारी दर और ‘न तो काम में, न शिक्षा में’ (NEET) रहने वाली महिलाओं की संख्या 2018 में 10 करोड़ को पार कर गई है।
    • समाधान: हिंदी भाषी राज्यों को दक्षिणी राज्यों की तरह स्वास्थ्य (बीमा आधारित नहीं) और सार्वजनिक शिक्षा (विशेषकर बालिकाओं के लिए) में भारी निवेश करना होगा।

संदर्भ (Context)

  • समस्या: समुद्र में जटिल अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) और जवाबदेही के अभाव के कारण भारतीय नाविकों का संघर्ष, भू-राजनीतिक संघर्षों (जैसे- पश्चिम एशिया, लाल सागर) के बीच फंसना और जहाजों पर हमले।
  • भूमिका: भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा नाविक श्रम शक्ति (Seafarer Workforce) आपूर्तिकर्ता देश है (फिलीपींस के बाद और चीन से थोड़ा आगे), जिसकी वैश्विक आपूर्ति में 12% से अधिक हिस्सेदारी है।

प्रमुख आंकड़े एवं रिपोर्ट (Key Facts & Data)

  • नाविकों की संख्या: जून 2025 तक सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत की नाविक कार्यबल संख्या लगभग 3.2 लाख है (जो 2014 से लगभग तीन गुना है)।
  • वैश्विक रैंकिंग: 2026 सीफ़रर वर्कफोर्स रिपोर्ट (Seafarer Workforce Report) के अनुसार भारत दूसरे स्थान पर है।
  • परित्याग (Abandonment): अंतर्राष्ट्रीय परिवहन कार्यकर्ता महासंघ (ITF) के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में 1,125 भारतीय नाविकों को परित्यक्त (Abandoned) किया गया, जो किसी भी देश से सबसे अधिक है।
  • पश्चिम एशिया संकट: फरवरी के बाद से पश्चिम एशिया संघर्ष से जुड़े हमलों में मारे गए 14 भारतीयों में से कम से कम 8 वाणिज्यिक जहाजों पर सवार नाविक थे।

भारतीय नाविकों के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ (Challenges)

  • जटिल राष्ट्रीयता और उत्तरदायित्व का अभाव: मुंबई में भर्ती, सिंगापुर की कंपनी, पनामा का झंडा, कुवैती तेल, ओमान के तट पर हमला—ऐसी जटिल व्यवस्था में नाविक के परिवार को यह नहीं पता होता कि कौन सी सरकार, जहाज मालिक या बीमाकर्ता जिम्मेदार है।
  • प्रादेशिक प्रणाली (Territorial Consular System) की सीमाएं: नाविक लगातार देश बदलते हैं, लेकिन पारंपरिक कांसुलर व्यवस्था क्षेत्रीय (Territorial) आधार पर काम करती है, जिससे आपातकाल में तुरंत मदद नहीं मिल पाती।
  • खतरनाक क्षेत्र (Conflict Zones): पश्चिम एशिया, काला सागर (Black Sea), लाल सागर, अदन की खाड़ी और पश्चिमी अफ्रीका के पास समुद्री डाकू, मिसाइल, ड्रोन और खदानों का लगातार खतरा बना हुआ है।
  • जहाज मालिकों और ध्वज राज्यों (Flag States) की लापरवाही: कई ध्वज राज्य (Flag States) केवल पंजीकरण करते हैं लेकिन जब वेतन रुकता है या चालक दल को छोड़ा जाता है, तो वे मैरीटाइम लेबर कन्वेंशन (MLC) का पालन नहीं करते।

सरकार द्वारा उठाए गए कदम और नई पहल (Government Initiatives)

  • सीफ़रर फर्स्ट (Seafarer First) प्रतिक्रिया: सरकार ने एक डैशबोर्ड लॉन्च किया है जो जहाजों, खतरों और क्रू की सुरक्षा पर नजर रखता है; साथ ही प्रभावित प्रत्येक परिवार के लिए एक संपर्क अधिकारी (Liaison Officer) की व्यवस्था की गई है।
  • यात्रा प्रतिबंध: 15 जुलाई को सरकार ने शिपवार्ड्स और एजेंसियों को निर्देश दिया कि अगले आदेश तक हरमुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले जहाजों पर भारतीय नाविकों को तैनात न किया जाए।
  • महानिदेशक शिपिंग (DG Shipping) के निर्देश: 14 मई को डीजी शिपिंग ने लाइसेंस प्राप्त भर्ती एजेंसियों को उन 366 जहाजों पर भारतीय नाविकों को तैनात करने से प्रतिबंधित किया, जो नाविकों के परित्याग (Abandonment) के मामलों से जुड़े रहे हैं।

आगे की राह / आवश्यक उपाय (Way Forward)

  • स्थायी समुद्री कांसुलर प्रोटोकॉल (Standing Maritime Consular Protocol): संकट का संकेत मिलते ही तुरंत जिम्मेदारी तय करने के लिए एक स्पष्ट प्रोटोकॉल होना चाहिए। प्रमुख शिपिंग केंद्रों में भारतीय मिशनों में विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की जाए जो स्थानीय बंदरगाह अधिकारियों और वकीलों से संपर्क में रहें।
  • अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग: भारत को फिलीपींस और इंडोनेशिया के साथ मिलकर अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के माध्यम से संघर्ष क्षेत्रों में तैनाती, नजरबंदी और प्रत्या repatriation पर साझा मानक (Common Standards) बनाने के लिए दबाव डालना चाहिए।
  • नाविकों का ‘जानने का अधिकार’ (Right to Know): अनुबंध पर हस्ताक्षर करने से पहले नाविक को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि जहाज का वास्तविक मालिक कौन है, वह कहां जाएगा, क्या वह प्रतिबंधित है और क्या उसका बीमा वैध है। खतरनाक क्षेत्रों में जाने वाले नाविकों को बिना जुर्माने के इनकार करने का अधिकार मिलना चाहिए।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top