NCERT Notes Class 7 Social science (Geography) Chapter 1: Geographical Diversity of India के अंतर्गत भारत के मुख्य भौतिक विभागों—उत्तर के विशाल पर्वतीय क्षेत्र (हिमालय), सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का उपजाऊ मैदान, प्राचीन और खनिज समृद्ध प्रायद्वीपीय पठार, तटीय मैदान तथा अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीप समूहों—की भू-वैज्ञानिक विशेषताओं, उत्तर में लहराते उत्तुंग हिमालय के पर्वतीय शिखरों से लेकर दक्षिण के विशाल हिंद महासागर को स्पर्श करते तटीय मैदानों तक, और समृद्ध भौगोलिक विविधता का एक सुव्यवस्थित विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
हिमालय पर्वत शृंखला (The Himalayas)
- भौतिक विस्तार: हिमालय पर्वत श्रृंखला की कुल लंबाई लगभग 2500 किमी है, जो एक विशाल दीवार की तरह स्थित है।
- शाब्दिक अर्थ: ‘हिमालय’ शब्द दो संस्कृत शब्दों — ‘हिम’ (बर्फ) और ‘आलय’ (निवास) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है “बर्फ का घर”।
- विस्तार: यह पर्वतमाला एशिया के 6 देशों में फैली है: भारत, नेपाल, भूटान, चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान।
- ऊंचाई (Eight Thousanders): इसकी कई चोटियों की ऊंचाई 8000 मीटर से अधिक है, जिन्हें सामूहिक रूप से ‘एट थाउजेंडर्स’ कहा जाता है।
एशिया का वॉटर टावर और सांस्कृतिक महत्व
- एशिया का वॉटर टावर (Water Tower of Asia): गर्मियों में हिमालय की बर्फ पिघलकर गंगा, सिंधु (Indus) और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियों को जल प्रदान करती है। यह सैकड़ों मिलियन लोगों की पेयजल, कृषि और औद्योगिक जरूरतों को पूरा करती है।

- गंगोत्री ग्लेशियर और गोमुख: गंगा की प्रमुख सहायक नदी भागीरथी का उद्गम उत्तराखंड के गोमुख (‘गाय का मुंह’) से होता है, जो गंगोत्री ग्लेशियर का छोर है। यह स्थान धार्मिक और ट्रैकिंग दोनों दृष्टियों से प्रसिद्ध है।
हिमालय का निर्माण
- गोंडवानालैंड से प्रस्थान: करोड़ों वर्ष पूर्व भारत ‘गोंडवाना’ भूभाग का हिस्सा था और अफ्रीका का पड़ोसी था।
- यूरेशिया से टक्कर: लगभग 50 मिलियन (5 करोड़) वर्ष पूर्व, भारतीय प्लेट उत्तर की ओर बढ़ते हुए यूरेशियाई प्लेट से टकराई। दो प्लेटों के दबाव से बीच की भूमि सिकुड़कर ऊपर उठी (जैसे कालीन को धकेलने पर सलवटें पड़ती हैं) और वलित पर्वत (Fold Mountain) के रूप में हिमालय बना।

- निरंतर वृद्धि: भारतीय प्लेट आज भी लगभग 5 सेमी/वर्ष की दर से उत्तर की ओर खिसक रही है। इससे हिमालय हर साल लगभग 5 मिमी ऊंचा हो रहा है (1,000 वर्षों में 5 मीटर)।
हिमालय की तीन मुख्य श्रेणियाँ (Three Main Ranges)
हिमालय को उत्तर से दक्षिण की ओर तीन प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:
| श्रेणी का नाम | भौगोलिक स्थिति व विशेषताएं | प्रमुख चोटियां / स्थान |
| हिमाद्रि (Greater Himalayas) | सबसे उत्तरी, उच्चतम और सबसे बीहड़ श्रेणी। वर्षभर बर्फ से ढकी रहती है। | माउंट एवरेस्ट, कंचनजंगा। |
| हिमाचल (Lower Himalayas) | हिमाद्रि के दक्षिण में स्थित। मध्यम जलवायु, समृद्ध जैव विविधता और मानव बसाव के अनुकूल। | शिमला, कुल्लू-मनाली, नैनीताल, मसूरी, दार्जिलिंग। |
| शिवालिक (Outer Himalayas) | सबसे बाहरी और सबसे निचली श्रेणी। घने जंगलों और घुमावदार पहाड़ियों से निर्मित। | हिमालय और गंगा के मैदानों के बीच का संक्रमण क्षेत्र (Transition Zone)। |
आपदा प्रबंधन, कला और जैव विविधता
- काठ-कुणी और धज्जी-द्वारी शैली (Traditional Architecture):
- क्षेत्र: पश्चिमी हिमालय (विशेषकर हिमाचल प्रदेश)।
- तकनीक: स्थानीय पत्थर और लकड़ी का पारंपरिक संयोजन।
- लाभ: यह निर्माण शैली घरों को गर्म रखती है और हल्के भूकंपों (Earthquakes) के प्रभाव को झेलने में सक्षम है।
- ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क:
- स्थान: हिमाचल प्रदेश।
- स्थिति: यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल।
- विशेषता: यहाँ सरकार और स्थानीय ग्रामीण समुदाय मिलकर जैव विविधता का संरक्षण करते हैं।
- अन्य जीव/वनस्पति: स्नो लेपर्ड, हिमालयन मोनल (पक्षी), और रोडोडेंड्रोन फूल (जिसका उपयोग शर्बत बनाने में होता है)।
भारत का शीत मरुस्थल (The cold desert of India)
- शीत मरुस्थल की अवधारणा: ‘मरुस्थल’ शब्द अक्सर अत्यधिक गर्मी का अहसास कराता है, परंतु कम वर्षा वाले अत्यधिक ठंडे क्षेत्र भी मरुस्थल होते हैं।
- तापमान और जलवायु: लद्दाख भारत का शीत मरुस्थल है। यहाँ सर्दियों में तापमान –30°C से नीचे चला जाता है और वार्षिक वर्षा नगण्य होती है।
- भौगोलिक दृश्य (Landscape): लद्दाख का परिदृश्य अत्यधिक बीहड़, पथरीला, गहरी घाटियों और झीलों (जैसे पेंगोंग त्सो) वाला है।

मूनलैंड और लद्दाख की भूगर्भीय उत्पत्ति (Geological Origin)
| भूगर्भीय विशेषता / शब्द | वैज्ञानिक कारण व प्रक्रिया | मुख्य तथ्य |
| मूनलैंड | लद्दाख के भूभाग की बनावट चंद्रमा की सतह जैसी दिखती है, इसलिए इसे ‘मूनलैंड’ कहते हैं। | यह क्षरण (Erosion) और हवा-पानी के प्रभावों का परिणाम है। |
| टेथिस सागर का अवशेष | जब भारतीय प्लेट यूरेशिया से टकराई, तो बीच का समुद्र (टेथिस) वलित होकर उठ गया। | यहाँ की चट्टानें मुख्य रूप से बालू (Sand) और मिट्टी (Clay) से बनी हैं। |
| पेंगोंग त्सो | आस-पास के पर्वतीय क्षेत्रों से घुले खनिजों के कारण इसका पानी खारा (Salty) है। | स्थानीय भाषा में ‘त्सो’ का अर्थ झील होता है। |
जैव विविधता और सांस्कृतिक जीवन (Wildlife & Culture)
- याक का आर्थिक महत्व: याक हिमालयी जीवन की रीढ़ है। इसे दूध, मांस, ऊन, ईंधन (गोबर) और परिवहन के लिए पाला जाता है।
- दुर्लभ वन्यजीव: कठोर जलवायु के बावजूद यहाँ हिम तेंदुआ (Snow Leopard), इबेक्स (पहाड़ी बकरा), और तिब्बती एंटीलोप (चीरू) पाए जाते हैं।
- सांस्कृतिक धरोहर: लद्दाख अपने प्राचीन बौद्ध मठों (Monasteries) और रंगीन सांस्कृतिक उत्सवों के लिए जाना जाता है।
- लोसार: लद्दाखी नववर्ष उत्सव।
- हेमिस महोत्सव (Hemis Festival): प्रसिद्ध सांस्कृतिक व धार्मिक त्यौहार।
गंगा के मैदान (The Gangetic Plains)
- भौगोलिक स्थिति: हिमालय के दक्षिण में स्थित विशाल, समतल और अत्यधिक उपजाऊ मैदानी क्षेत्र।
- ऐतिहासिक व सभ्यतागत महत्व: यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही भारतीय इतिहास, संस्कृति और सभ्यता के विकास का मुख्य केंद्र रहा है।
- जनसंख्या का दबाव: भारत की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा इन्हीं मैदानों में निवास करता है।
नदी प्रणाली, मिट्टी और आर्थिक जीवन
| मुख्य कारक | वैज्ञानिक व भौगोलिक विवरण | यूपीएससी परीक्षा हेतु आर्थिक महत्व |
| प्रमुख नदी प्रणालियाँ | सिंधु (Indus), गंगा, और ब्रह्मपुत्र तंत्र व उनकी सहायक नदियाँ। | कृषि, पेयजल और पनबिजली (Hydroelectricity) उत्पादन का मुख्य स्रोत। |
| जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil) | नदियाँ पहाड़ों से खनिज और उपजाऊ गाद (Silt) लाकर जमा करती हैं। | भूमि को अत्यधिक उपजाऊ बनाती हैं, जिससे सघन कृषि संभव होती है। |
| बहु-फसली प्रणाली (Multi-cropping) | वर्ष में एक से अधिक फसलें उगाना (उदा. उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के धान के खेत)। | खाद्य सुरक्षा (Food Security) और ग्रामीण आजीविका की रीढ़। |
परिवहन जाल और अवसंरचना
- समतल भू-भाग का लाभ: मैदानी इलाका समतल होने के कारण यहाँ सड़क और रेल नेटवर्क का सघन जाल विकसित हुआ है।
- लॉजिस्टिक्स और व्यापार: सुगम परिवहन से लोगों और माल (Freight) की लंबी दूरी तक आवाजाही आसान बनती है।
- आंतरिक जलमार्ग (Inland Waterways): गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियाँ सदियों से यात्रा, परिवहन और अंतर-राज्यीय व्यापार का मुख्य माध्यम रही हैं।
विशेष तथ्य
- नदियों का नामकरण: भारत की अधिकांश नदियों के नाम देवियों पर हैं (उदा. गंगा, यमुना, कावेरी)।
- ब्रह्मपुत्र नदी का अपवाद: ‘ब्रह्मपुत्र’ का अर्थ है ‘ब्रह्मा का पुत्र’।
- गर्मी में जलस्तर बढ़ना: यह नदी गर्मियों में सूखने के बजाय और विशाल हो जाती है। इसका कारण मानसून की भारी वर्षा और हिमालयी ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना है।
- रात में अत्यधिक रोशनी (Lighting Concentration): उपग्रह तस्वीरों में इन मैदानों में सघन रोशनी दिखाई देती है, जिसका मुख्य कारण अत्यधिक जनसंख्या घनत्व (Population Density) और सघन शहरीकरण है।
विशाल भारतीय मरुस्थल या थार मरुस्थल
- भौगोलिक विस्तार: थार मरुस्थल एक विशाल शुष्क (Arid) क्षेत्र है। इसका अधिकांश भाग भारत में स्थित है, जो राजस्थान, गुजरात, पंजाब और हरियाणा राज्यों तक फैला है।
- जलवायु और प्राकृतिक अवरोध: यहाँ दिन का तापमान अत्यधिक उच्च और रातें बहुत ठंडी होती हैं। जल की कमी और कठोर जलवायु के कारण यह मानव और जीवों के आवागमन के लिए प्राकृतिक अवरोध (Natural Barrier) का काम करता है।
- सांस्कृतिक अनुकूलन: स्थानीय लोगों का खान-पान, पहनावा और जीवन शैली इस कठोर वातावरण के अनुकूल ढली हुई है।
- पुष्कर मेला: यह प्रसिद्ध मेला थार मरुस्थल के किनारे पर आयोजित होता है (ऊंटों के व्यापार और संस्कृति का प्रमुख केंद्र)।
बालुका स्तूप (Sand Dunes) और जैसलमेर
| भौगोलिक / सांस्कृतिक घटक | निर्माण प्रक्रिया एवं विशेषताएँ | यूपीएससी परीक्षा हेतु मुख्य तथ्य |
| बालुका स्तूप (Sand Dunes) | पवन (Wind) द्वारा रेत को स्थानांतरित कर पहाड़ी नुमा आकृतियों में ढालना। | ये स्तूप अस्थिर होते हैं और इनकी ऊंचाई 150 मीटर तक हो सकती है। |
| जैसलमेर | थार मरुस्थल के मध्य में स्थित शहर, जिसे ‘गोल्डन सिटी’ कहा जाता है। | जैसलमेर का किला यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। |
जल संरक्षण और जीवन शैली (Water Conservation & Adaptation)
- पारंपरिक बर्तन सफाई तकनीक: पानी की अत्यधिक कमी के कारण बर्तनों को रेत से रगड़कर साफ किया जाता है और नाममात्र पानी से खंगाला जाता है। खंगाले गए पानी को पुनः पौधों में डालकर पुनर्चक्रित (Reuse) किया जाता है।
- टांका या कुंड: राजस्थान की पारंपरिक और प्रभावकारी जल संरक्षण संरचनाएँ। इनमें वर्षा जल (Rainwater) को विशेष रूप से पीने के उद्देश्य से एकत्र और संग्रहित किया जाता है।
अरावली की पहाड़ियाँ (The Aravalli Hills)
- प्राचीनता: अरावली विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। यह लगभग 2.5 अरब वर्ष पुरानी है।
- विस्तार: यह श्रृंखला भारत के चार राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों — दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में फैली है।
- ऊंचाई व शिखर: अधिकांश पहाड़ियों की ऊंचाई 300 से 900 मीटर के बीच है। इसका सर्वोच्च शिखर माउंट आबू (1700 मीटर से अधिक) है।
- जलवायु में भूमिका: यह एक प्राकृतिक अवरोध (Natural Barrier) के रूप में कार्य करती है। यह थार मरुस्थल को पूर्व की ओर फैलने से रोकती है।

अरावली का खनिज और ऐतिहासिक महत्व
| विषय | ऐतिहासिक व वैज्ञानिक साक्ष्य | मुख्य तथ्य |
| खनिज संसाधन | संगमरमर (Marble), ग्रेनाइट, जस्ता (Zinc) और तांबा (Copper)। | प्राचीन काल से निर्माण और खनन का केंद्र रही है। |
| जावर की खानें (Zawar Mines) | 800 से अधिक वर्ष पुराने ऐतिहासिक साक्ष्य। | भारतीय विश्व में सबसे पहले जस्ता (Zinc) निष्कर्षण प्रक्रिया में पारंगत हुए। |
| सामरिक दुर्ग (Historic Forts) | चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़ और रणथंभौर के ऐतिहासिक किले। | पहाड़ियों का ढाल शत्रुओं के विरुद्ध प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करता था। |
प्रायद्वीपीय पठार (The Peninsular Plateau)
- पठार व प्रायद्वीप की परिभाषा:
- पठार (Plateau): आसपास की भूमि से ऊंचा उठा हुआ, मुख्य रूप से समतल सतह और तीव्र ढलानों वाला भूभाग।
- प्रायद्वीप (Peninsula): वह भूभाग जो तीन ओर से जल से घिरा हो (अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर)।
- भौतिक संरचना: यह भारत की एक अत्यंत प्राचीन और मध्य-दक्षिण में स्थित त्रिकोणीय संरचना है। इसके बीच में दक्कन का पठार स्थित है।
पश्चिमी घाट बनाम पूर्वी घाट
| विशेषता | पश्चिमी घाट (Western Ghats) | पूर्वी घाट (Eastern Ghats) |
| संरचना व ऊंचाई | अधिक ऊंचे और पश्चिमी तट के समानांतर दीवार की तरह निरंतर विस्तृत। | अपेक्षाकृत कम ऊंचे और नदियों द्वारा कटे-छंटे (Broken) खंडों में स्थित। |
| स्थानीय नाम व दर्जा | उत्तरी भाग को ‘सह्याद्रि’ कहते हैं। यह UNESCO विश्व धरोहर स्थल है। | पूर्वी तट के साथ बिखरी हुई पहाड़ियों के रूप में फैला है। |
| जलप्रपात व जैव विविधता | मानसून में तीव्र ढलानों पर अनेक जलप्रपात बनते हैं; अत्यधिक समृद्ध जैव विविधता। | कम ढलान; पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ यहाँ से होकर गुजरती हैं। |
नदियाँ, जनजातीय संस्कृति और जलप्रपात
- पठार का ढलान (Eastward Tilt): प्रायद्वीपीय पठार का ढलान पूर्व की ओर है।
- पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ: गोदावरी, कृष्णा, कावेरी और महानदी पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। ये कृषि, उद्योग और जलविद्युत (Hydroelectric Power) के लिए जल प्रदान करती हैं।
- पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ: नर्मदा और तापी (Tapti) नदियाँ पश्चिम की ओर बहकर अरब सागर में गिरती हैं।
- जनजातीय समुदाय (Tribal Communities): पठार के घने जंगलों में संताल, गोंड, बैगा, भील, और कोरकू जनजातियाँ निवास करती हैं।
- मुख्य राज्य: झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना और गुजरात।
- जलप्रपात (Waterfalls): असमतल और चट्टानी सतह के कारण नदियाँ कई जलप्रपात बनाती हैं, जो जलविद्युत उत्पादन और सिंचाई में सहायक हैं।
भारत की अद्वितीय तटरेखा
- तटरेखा की लंबाई: भारत की कुल तटरेखा 7500 किमी से अधिक लंबी है।
- तटीय विविधता: यहाँ सुनहरी रेत वाले समुद्र तट (Beaches), काली चट्टानें, प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs) और घने जंगल पाए जाते हैं।
भारत का पश्चिमी तट (The West Coast of India)
- भौगोलिक विस्तार: यह तट गुजरात से केरल तक फैला है (महाराष्ट्र, गोवा और कर्नाटक से होते हुए)।
- नदियाँ व मुहाना: नदियाँ पश्चिमी घाट से निकलकर तेजी से बहती हैं। ये डेल्टा बनाने के बजाय ज्वारनदमुख (Estuaries) बनाती हैं।
- नर्मदा और तापी: नर्मदा और तापी के ज्वारनदमुख पश्चिमी तट पर सबसे बड़े हैं।
- तटीय संरचना: यहाँ खाड़ियाँ (Creeks) और कोव पाए जाते हैं।
- आर्थिक महत्व: पश्चिमी तट पर कई महत्वपूर्ण बंदरगाह और शहर प्राचीन काल से व्यापार के प्रमुख केंद्र रहे हैं।
पूर्वी तट (The East Coast)
- भौगोलिक विस्तार: यह तट पूर्वी घाट और बंगाल की खाड़ी के बीच, गंगा डेल्टा से कन्याकुमारी तक फैला है।
- प्रमुख नदियाँ व डेल्टा: महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियाँ यहाँ उपजाऊ डेल्टा बनाती हैं।
- डेल्टा का निर्माण: नदियाँ जब समुद्र में गिरती हैं तो तलछट (Sediments) जमा करती हैं। इससे त्रिभुजाकार या पंखे के आकार की उपजाऊ भूमि बनती है।
- प्रमुख झीले/लैगून:
- चिलिका झील और पुलिकट झील।
- लैगून: प्राकृतिक अवरोध (जैसे रेत की पट्टी) द्वारा मुख्य समुद्र से अलग हुआ तटीय जलनिकाय।
पश्चिमी तट बनाम पूर्वी तट
| लक्षण | पश्चिमी तट (West Coast) | पूर्वी तट (East Coast) |
| भौगोलिक स्थिति | अरब सागर और पश्चिमी घाट के बीच | बंगाल की खाड़ी और पूर्वी घाट के बीच |
| तटीय चौड़ाई | संकीर्ण (Narrow) मैदान | चौड़ा और विस्तृत (Wide) मैदान |
| जल आकृतियाँ | एस्ट्युरी (Estuary/ज्वारनदमुख), खाड़ियाँ | डेल्टा और लैगून झीले |
| प्रमुख नदियाँ | नर्मदा, तापी (तिव्र गति से बहने वाली नदियाँ) | महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी |
भारतीय द्वीप समूह (Indian Islands)
भारत के पास दो प्रमुख द्वीप समूह हैं — लक्षद्वीप (अरब सागर) और अंडमान एवं निकोबार (बंगाल की खाड़ी)।
लक्षद्वीप समूह (Lakshadweep islands)
- अवस्थिति: अरब सागर में केरल के मालाबार तट के पास स्थित द्वीपसमूह (Archipelago)।
- द्वीपों की संख्या: यह 36 प्रवाल द्वीपों (Coral Islands) से मिलकर बना है।
- समुद्री संसाधन: भारत यहाँ विस्तृत समुद्री क्षेत्र (EEZ) पर नियंत्रण रखता है, जो मत्स्य पालन और संसाधन अन्वेषण के लिए महत्वपूर्ण है।
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (Andaman and Nicobar islands)
- संरचना: बंगाल की खाड़ी में स्थित 500 से अधिक ज्वालामुखी और पर्वतीय द्वीपों का समूह।
- सामरिक महत्व: यह हिंद महासागर में भारत की अग्रिम चौकी (Outpost) के रूप में कार्य करता है।
- बैरेन द्वीप (Barren Island): भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी (Active Volcano) यहाँ स्थित है।
- ऐतिहासिक महत्व (Cellular Jail): स्वतंत्रता संग्राम के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों को यहाँ की सेल्युलर जेल (काला पानी) में रखा जाता था, जो अब एक ऐतिहासिक स्मारक है।
पश्चिम बंगाल और सुंदरबन में डेल्टा
- भौगोलिक स्थिति: यह डेल्टा गंगा, ब्रह्मपुत्र और उनकी सहायक नदियों के संगम से बनता है।
- पारिस्थितिकी संगम: यहाँ नदी, समुद्र और स्थल का एक अनूठा संगम देखने को मिलता है।
- अंतर्राष्ट्रीय विस्तार: इस डेल्टा का लगभग आधा हिस्सा भारत में और शेष आधा भाग बांग्लादेश में स्थित है।
- वैश्विक दर्जा: सुंदरबन एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।
- प्रमुख प्रजाति: यह स्थान प्रसिद्ध रॉयल बंगाल टाइगर और मैंग्रोव वनों का प्राकृतिक आवास है।
उत्तर-पूर्व की पहाड़ियाँ (The hills of the Northeast)
- भौगोलिक पहचान: गारो, खासी और जयंतिया पहाड़ियाँ पूर्वोत्तर भारत की प्रमुख भू-आकृतियाँ हैं।
- पठारी संरचना: ये पहाड़ियां मुख्य रूप से मेघालय पठार का हिस्सा हैं।
- जलवायु एवं जैव विविधता: यहाँ अत्यधिक वर्षा, घने जंगल, लुभावने जलप्रपात (उदा. सेवेन सिस्टर्स वॉटरफॉल) और उपजाऊ भूमि पाई जाती है।
- विश्व में सर्वाधिक वर्षा: यह क्षेत्र दुनिया में सबसे अधिक वर्षा प्राप्त करने वाले स्थलों में शामिल है।
- सांस्कृतिक उत्सव: खासी समुदाय द्वारा प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए शाद सुक मायन्सिएम उत्सव मनाया जाता है।
विशेष तथ्य सारणी
| विषय / स्थल | मुख्य विशेषता | परीक्षा हेतु महत्व |
| मावलिननॉन्ग गांव | ईस्ट खासी हिल्स (मेघालय) में स्थित। | ‘एशिया का सबसे स्वच्छ गांव’ (Cleanest Village in Asia) का दर्जा। |
| इको-फ्रेंडली जीवन शैली | बांस के कूड़ेदान और उत्कृष्ट स्वच्छता प्रबंधन। | सामुदायिक पर्यावरण संरक्षण का वैश्विक मॉडल। |
| लिविंग रूट ब्रिज | रबर के पेड़ों की जड़ों को वर्षों तक आपस में बुनकर बनाए गए प्राकृतिक पुल। | पारंपरिक जैव-इंजीनियरिंग (Bio-engineering) का सर्वोत्तम उदाहरण। |