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Author name: Nirmanias

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सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को पर्यावरण क्षतिपूर्ति लगाने का अधिकार दिया

सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को पर्यावरण क्षतिपूर्ति लगाने का अधिकार दिया चर्चा में क्यों?   हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति बनाम लोदी प्रॉपर्टी कंपनी लिमिटेड मामले में एक अहम फैसला सुनाया। इस निर्णय में कोर्ट ने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PCB) अब पर्यावरण क्षतिपूर्ति और पुनर्स्थापनात्मक हर्जाना (restitutionary & compensatory damages) लगा सकते हैं।  दिल्ली उच्च न्यायालय ने पहले बोर्डों द्वारा ऐसे हर्जाने लगाने को उनकी शक्तियों से बाहर माना था, किंतु सर्वोच्च न्यायालय की पीठ (न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा व न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा) ने हाईकोर्ट का निर्णय उलट दिया। यह फैसला ऐसे समय आया है जब भारत भीषण प्रदूषण संकट का सामना कर रहा है – उदाहरण के लिए, 2018 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने 323 नदियों में 351 प्रदूषित नदी खंडों की पहचान की थी, और 2019 में वायु प्रदूषण से देश में 17 लाख से अधिक अकाल मृत्यु हुई थी। इन परिस्थितियों में पर्यावरण नियामकों को मजबूत अधिकार देकर प्रदूषण से निपटने के प्रयासों को बल मिल सकता है। पुनर्स्थापनात्मक व प्रतिपूरक क्षतिपूर्ति सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि प्रदूषणकारी इकाइयों द्वारा पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई के लिए PCB पुनर्स्थापनात्मक (restoration) एवं प्रतिपूरक (compensatory) क्षतिपूर्ति वसूल सकते हैं। इसमें नियामक प्रदूषकों पर एक निश्चित धनराशि का जुर्माना लगा सकते हैं या भविष्य में संभावित नुकसान की भरपाई हेतु उनसे बैंक गारंटी जमा कराने को कह सकते हैं।  अदालत ने स्पष्ट किया है कि इन उपायों का उद्देश्य दंड देना नहीं, बल्कि प्रदूषित पर्यावरण का सुधार और पुनर्स्थापन करना है। अर्थात् इन क्षतिपूरक राशियों का उपयोग प्रभावित पर्यावरण (जैसे दूषित नदी या वायु गुणवत्ता) को उसकी मूल, स्वच्छ अवस्था में लौटाने के लिए किया जाएगा।  यह दृष्टिकोण ‘पोल्यूटर पेज़ प्रिंसिपल’ (Polluter Pays) पर आधारित है, जिसमें प्रदूषक को अपने कार्य से हुए नुकसान का आर्थिक भार उठाना पड़ता है। विधिक प्रावधान व शक्तियाँ न्यायालय ने अपने निर्णय में जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 1974 की धारा 33A तथा वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 1981 की धारा 31A का उल्लेख किया। ये प्रावधान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को लिखित आदेश द्वारा उद्योगों/इकाइयों को प्रदूषण रोकने हेतु दिशानिर्देश जारी करने की शक्ति देते हैं।  इन धाराओं के तहत बोर्ड प्रदूषणकारी इकाइयों को बंद करने, उनके संचालन पर रोक लगाने, या बिजली-पानी जैसी सुविधाएँ काटने जैसे कदम उठा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने व्याख्या की कि इन्हीं शक्तियों के अंतर्गत बोर्ड प्रदूषण के संभावित जोखिम को रोकने के लिए अग्रिम रूप से जुर्माना या बैंक गारंटी जैसी शर्तें भी लगा सकते हैं।  यह 1988 में उपरोक्त अधिनियमों में जोड़े गए संशोधनों का प्रतिफल है, जिसने बोर्डों को प्रदूषण रोकथाम के लिए व्यापक आदेश जारी करने का अधिकार प्रदान किया था। ‘पोल्यूटर पेज़’ सिद्धांत  इस फैसले ने भारतीय पर्यावरण न्यायशास्त्र में स्थापित पोल्यूटर पेज़ सिद्धांत को और मजबूती प्रदान की है। न्यायालय ने दो टूक कहा कि पर्यावरण को वास्तविक क्षति हुई हो ये अनिवार्य नहीं है; यदि किसी गतिविधि से पर्यावरण को संभावित गंभीर नुकसान होने की संभावना है, तब भी प्रदूषक से क्षतिपूर्ति ली जा सकती है। अर्थात, पर्यावरणीय क्षति की संभावना मात्र से ही यह सिद्धांत लागू हो जाता है।  कोर्ट ने पूर्व के वेल्लोर सिटिज़न्स वेलफेयर फोरम बनाम भारत संघ (1996) तथा इंडियन काउंसिल फॉर एनवायरो-लीगल एक्शन बनाम भारत संघ (1996) जैसे ऐतिहासिक मामलों का हवाला दिया, जिनमें यह माना गया था कि पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई करवाना न केवल एक वैधानिक बल्कि संवैधानिक दायित्व है, न कि दंडात्मक कार्रवाई।  इस प्रकार, वर्तमान निर्णय में भी कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि प्रदूषणकर्ता ने निर्धारित मानकों का उल्लंघन करके या बिना उल्लंघन के भी पर्यावरण को नुकसान पहुँचाया है या पहुँचाने की कगार पर है, तो उससे प्रतिपूरक हानि की भरपाई कराना न्यायोचित है। गौण विधान (उपविधि) की आवश्यकता  सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि PCB द्वारा इन क्षतिपूरक शक्तियों के उपयोग को प्रभावी बनाने हेतु संबंधित नियमों का विधिसंगत ढाँचा बनाना आवश्यक है। न्यायालय के अनुसार “बोर्ड द्वारा पारदर्शी एवं मनमानी-रहित तरीके से क्षतिपूर्ति तय करने के लिए आवश्यक है कि अधीनस्थ कानून के रूप में स्पष्ट नियमावली व प्रक्रियाएँ अधिसूचित की जाएँ”।  इन नियमों में यह विवरण होना चाहिए कि पर्यावरणीय क्षति का मूल्यांकन कैसे होगा और उसके अनुरूप क्षतिपूर्ति राशि कैसे निर्धारित होगी। साथ ही, इन नियमों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को समाहित करना अनिवार्य होगा, ताकि जुर्माना लगाने की प्रक्रिया निष्पक्ष व पारदर्शी रहे। वर्तमान में CPCB द्वारा दिसंबर 2022 में जारी “पर्यावरणीय क्षति मुआवजा लगाने हेतु सामान्य रूपरेखा” नामक दिशानिर्देशों का उल्लेख कोर्ट ने किया।  न्यायालय ने निर्देश दिया कि इन दिशानिर्देशों की समग्र समीक्षा कर उन्हें औपचारिक नियमों/उपविधियों के रूप में अधिसूचित किया जाए। जब तक ऐसे नियम नहीं बनते, तब तक बोर्ड क्षतिपूर्ति संबंधी शक्तियों का क्रियान्वयन शुरू नहीं करेंगे। इससे यह सुनिश्चित होगा कि क्षतिपूर्ति लगाने की शक्ति के उपयोग में किसी भी पक्ष के साथ अन्याय या मनमानी न हो।  सर्वोच्च न्यायालय की अतिरिक्त टिप्पणियाँ कोर्ट ने PCB की भूमिका पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों का कानून द्वारा बहुत व्यापक दायित्व निर्धारित है – उन्हें जल और वायु प्रदूषण को रोकने, नियंत्रित करने तथा समाप्त करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। जल अधिनियम की धारा 17 और वायु अधिनियम की समकक्ष धारा में बोर्डों के कर्तव्यों की विस्तृत सूची है, जिससे स्पष्ट होता है कि जन स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा हेतु इन बोर्डों पर भारी ज़िम्मेदारी है।  न्यायालय ने कहा कि इतने व्यापक जनहित दायित्व को निभाने के लिए बोर्डों के पास उचित विवेकाधीन शक्तियाँ होना अपरिहार्य है, ताकि वे प्रत्येक मामले के अनुरूप उचित कार्रवाई चुन सकें। पीठ ने मार्गदर्शक सिद्धांत देते हुए दोहराया कि बोर्ड यह तय कर सकता है कि किसी प्रदूषणकारी इकाई के मामले में केवल आर्थिक दंड पर्याप्त है या पर्यावरण की तुरंत भरपाई कराना आवश्यक है – अथवा दोनों कदम उठाए जाएँ।  इसके अलावा, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बोर्ड द्वारा पुनर्स्थापनात्मक क्षतिपूर्ति की कार्रवाई उन दंडात्मक प्रावधानों से भिन्न है जो संबंधित कानूनों के अध्याय VI-VII में दिये गए आपराधिक अपराधों (जैसे जेल या जुर्माना) के लिए हैं। बोर्ड द्वारा लगाई गई क्षतिपूर्ति का मकसद पर्यावरणीय सुधार है, जबकि अदालत या अधिकृत अधिकारी द्वारा लगाया जाने वाला जुर्माना एक दंड है।  न्यायालय ने 2022 में पर्यावरण संरक्षण कानूनों में हुए संशोधनों (जिनसे कई अपराध डिक्रिमिनलाइज़ होकर आर्थिक

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उत्तराखंड में क्लाउडबस्ट

चर्चा में क्यों?   5 अगस्त 2025 की दो क्लाउडबस्ट घटनाओं (मुख्यतः खीरगंगा नदी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में) ने उत्तरकाशी ज़िले के धराली गाँव व आसपास के हर्षिल क्षेत्र में अचानक अत्यंत तीव्र बारिश फैलाई। इसके परिणामस्वरूप मिट्टी और पानी की तबाही—फ्लैश फ्लड एवं मलबे का बहाव—ने गाँव को लगभग बहा दिया। चार लोग मृत पाए गए, लगभग 100 लोग लापता बताए गए, और भारी संरचनात्मक क्षति हुई।  क्लाउडबर्स्ट (Cloudburst) क्या है? क्लाउडबर्स्ट एक अत्यंत तीव्र और स्थानीयकृत वर्षा की घटना है, जिसमें बहुत कम समय में किसी छोटे से क्षेत्र पर अत्यधिक मात्रा में बारिश होती है। यह अक्सर पहाड़ी या पर्वतीय क्षेत्रों में होती है और अचानक बाढ़ (Flash Flood), भूस्खलन (Landslide) और मलबे के प्रवाह (Debris Flow) जैसी आपदाओं को जन्म देती है। 1. आधिकारिक परिभाषा (IMD के अनुसार)  भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार: क्लाउडबर्स्ट वह घटना है जब लगभग 20–30 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 1 घंटे के भीतर कम से कम 100 मिलीमीटर वर्षा होती है। अत्यधिक तीव्र घटनाओं में यह दर 100–250 mm/घंटा तक भी पहुँच सकती है।  क्लाउडबर्स्ट (Cloudburst) के कारण    1. ओरोग्राफिक लिफ्ट और स्थलाकृति (Orographic Effect & Topography) जब नमी से भरी हवाएँ (मानसून या पश्चिमी विक्षोभ से) पर्वतीय ढलानों से टकराती हैं, तो वे मजबूरन ऊपर उठती हैं। ऊपर उठते ही हवा ठंडी होती है और उसमें मौजूद जलवाष्प क्यूम्युलोनिंबस (Cumulonimbus) बादलों में संघनित हो जाती है। जब बादल अत्यधिक जल‑वाष्प से भर जाते हैं, तो अचानक उनका संतुलन बिगड़ता है और तेज़ बारिश के रूप में पानी गिरता है।  2. वायुमंडलीय अस्थिरता (Atmospheric Instability) यदि पहाड़ों पर गर्म और ठंडी हवाओं का टकराव होता है, तो ऊर्ध्वाधर अस्थिरता (Vertical Convection) बढ़ जाती है। इस अस्थिरता के कारण बादल तेजी से विकसित होते हैं और सुपरसेल या क्यूम्युलोनिंबस बनकर अचानक वर्षा उत्पन्न करते हैं। यही प्रक्रिया लेह (2010) और केदारनाथ (2013) जैसी घटनाओं में देखी गई। 3. उच्च नमी और मानसूनी परिस्थितियाँ  मानसून के दौरान समुद्र से आने वाली हवाएँ भारी मात्रा में नमी लेकर आती हैं। यदि यह नमी पर्वतीय क्षेत्र में फंस जाए और अचानक संघनन हो जाए, तो क्लाउडबर्स्ट की संभावना अधिक होती है। 5–6 अगस्त 2025 को उत्तरकाशी (धराली) क्लाउडबर्स्ट में 1 घंटे में 210 mm से अधिक बारिश रिकॉर्ड हुई।  4. जलवायु परिवर्तन और चरम वर्षा घटनाएँ  ग्लोबल वार्मिंग के कारण हवा अधिक नमी सोखने में सक्षम हो गई है। जलवायु परिवर्तन के चलते अत्यधिक और अल्पकालिक वर्षा घटनाएँ बढ़ रही हैं। IMD और IPCC रिपोर्टों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्रों में क्लाउडबर्स्ट घटनाओं की आवृत्ति पिछले 3 दशकों में बढ़ी है। 5. माइक्रो‑क्लाइमेट और स्थानीय परिस्थितियाँ  घाटियों में स्थानीय निम्नदाब क्षेत्र (Local Low Pressure Pockets) बन जाते हैं। संकरी घाटियाँ और नदी तल जल प्रवाह को तेज़ कर देती हैं। यदि बादल इन्हीं क्षेत्रों में फंस जाते हैं, तो अचानक क्लाउडबर्स्ट की स्थिति बनती है। 6. अन्य सहायक कारण  वनस्पति में कमी (Deforestation): ढलानों पर पेड़ों की कमी से जल धारण क्षमता घट जाती है और वर्षा सीधे तेज़ बहाव में बदल जाती है। मानव‑जनित निर्माण (Infrastructure Pressure):  सड़क, होटल, और अतिक्रमण प्राकृतिक जल मार्गों को रोक देते हैं, जिससे बारिश का पानी केंद्रित होकर बाढ़ का रूप ले लेता है। ग्लेशियर झीलों की नज़दीकी: यदि क्लाउडबर्स्ट ग्लेशियर झीलों के पास होता है, तो यह GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) को ट्रिगर कर सकता है। क्लाउडबर्स्ट के संवेदनशील क्षेत्र (Vulnerable Regions) क्लाउडबर्स्ट मुख्यतः पर्वतीय और ढलानदार क्षेत्रों में होते हैं, जहाँ नमी से भरी हवाएँ तेजी से ऊपर उठती हैं। भारत में निम्नलिखित क्षेत्र सबसे अधिक संवेदनशील माने जाते हैं: हिमालयी क्षेत्र (उत्तर भारत) उत्तराखंड: उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़ हिमाचल प्रदेश: कुल्लू, चंबा, किन्नौर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख: गुलमर्ग, पहलगाम, लेह (2010 लेह क्लाउडबर्स्ट) इन क्षेत्रों में संकरी घाटियाँ और तीव्र ढलान जल प्रवाह को तेज़ कर देते हैं। पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मेघालय (विशेषकर चेरापूंजी और मौसिनराम) अत्यधिक मानसूनी नमी और संकरी घाटियाँ यहाँ जोखिम बढ़ाती हैं। पश्चिमी घाट और केरल वायनाड, इडुक्की, कोडगु क्षेत्र में भी जून–सितंबर के दौरान छोटे पैमाने पर क्लाउडबर्स्ट जैसी घटनाएँ दर्ज होती हैं। प्रभाव (Impact) A. बुनियादी ढांचे को नुकसान (Infrastructure Damage) सड़क और पुल: NH‑34 (उत्तरकाशी–गंगोत्री मार्ग) जैसी मुख्य सड़कें बार‑बार क्षतिग्रस्त होती हैं। धराली क्लाउडबर्स्ट (अगस्त 2025) में कई पुल और सड़कें पूरी तरह बह गईं। भवन और होटल: घाटियों और नदी किनारे बने होटल और घर बहाव की चपेट में आ जाते हैं। 2025 धराली आपदा में 40+ घर और 25–50 होटल ध्वस्त। पावर और टेलीकॉम: बिजली और संचार लाइनें टूट जाती हैं, जिससे राहत कार्य कठिन हो जाता है। B. गंगोत्री तीर्थ यात्रा पर प्रभाव (Disrupted Pilgrimage Route) यात्री मार्ग बाधित: NH‑34 और आसपास की लिंक सड़कों के बहने से गंगोत्री और यमुनोत्री की यात्रा रुक जाती है। तीर्थयात्री फँस जाते हैं: बारिश और भूस्खलन के कारण हजारों यात्री कई दिनों तक फँस जाते हैं। स्थानीय अर्थव्यवस्था प्रभावित: होटल, होमस्टे और टूरिज़्म पर निर्भर स्थानीय लोगों को भारी नुकसान। 3. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की चेतावनी प्रणाली (Warning Systems) डॉपलर वेदर रडार (DWR): देहरादून, श्रीनगर और शिलांग जैसे केंद्रों से 100–200 km दायरे में रियल‑टाइम वर्षा डेटा। ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन (AWS): छोटे पैमाने की वर्षा घटनाओं की मॉनिटरिंग। रेड, ऑरेंज और येलो अलर्ट: 2025 उत्तरकाशी घटना के समय IMD ने 10 अगस्त तक रेड अलर्ट जारी किया। सैटेलाइट इमेजिंग और हाई‑रेज़ॉल्यूशन मॉडलिंग: INSAT‑3D/3DR और अब GIS आधारित चेतावनी प्रणाली क्लाउडबर्स्ट पहचान में मदद कर रही है। 4. निवारण और शमन उपाय (Mitigation Efforts)  पूर्व चेतावनी और रियल‑टाइम मॉनिटरिंग उच्च रेज़ॉल्यूशन Doppler रडार और Rain‑Gauge नेटवर्क का विस्तार। मोबाइल SMS और सायरन‑आधारित चेतावनी। संवेदनशील क्षेत्रों का मानचित्रण (Zonation) भूस्खलन और फ्लैश फ्लड प्रवण क्षेत्रों का GIS‑आधारित मैप तैयार करना। संवेदनशील गाँव और तीर्थ मार्गों पर नियमित निगरानी। बुनियादी ढांचे का सुरक्षित निर्माण नदी किनारे अवैध निर्माण पर रोक। पुल और सड़कें जल प्रवाह और मलबा बहाव को ध्यान में रखकर डिज़ाइन करना। समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन स्थानीय लोगों को राहत‑बचाव और आपदा तैयारी में प्रशिक्षित करना। SDRF और NDRF के साथ मिलकर गाँव‑स्तरीय चेतावनी तंत्र। जलवायु अनुकूलन उपाय वनीकरण और कैचमेंट एरिया प्रबंधन। हिमालयी पारिस्थितिकी में अवसंरचना का सीमित और नियंत्रित विकास।

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5 August 2025 Current Affairs

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना में बड़ा बदलाव: बटालियन स्तर पर ड्रोन तैनात   चर्चा में क्यों : मई 2025 में पाहलगाम आतंकी हमले के बाद चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर से मिली सीख के आधार पर भारतीय सेना अब संगठनात्मक पुनर्गठन करने जा रही है। इसमें ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम को बटालियन स्तर पर मानक हथियार बनाना शामिल है।  इसमें नई लाइट कमांडो बटालियन, रुद्र ब्रिगेड, आधुनिक आर्टिलरी यूनिट और विशेष ड्रोन यूनिट भी बनाई जाएंगी। UPSC पाठ्यक्रम: मुख्य विषय: आईटी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टेक्नोलॉजी, जैव-टेक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित मुद्दों के क्षेत्र में जागरूकता। ड्रोन क्या हैं? ड्रोन, जिन्हें मानव रहित हवाई वाहन (UAV) के रूप में भी जाना जाता है, वे विमान हैं जो बिना किसी मानव पायलट के संचालित हो सकते हैं।  उन्हें या तो दूर से नियंत्रित किया जा सकता है या स्वायत्त रूप से उड़ाया जा सकता है जब उनकी उड़ान योजनाओं को GPS और सॉफ़्टवेयर-नियंत्रित सिस्टम का उपयोग करके प्रोग्राम किया जाता है। ड्रोन का वर्गीकरण ड्रोन नियम, 2021 के तहत ड्रोन का वर्गीकरण उनके वजन के आधार पर किया गया है। 1. नैनो ड्रोन :  वजन सीमा: 250 ग्राम या उससे कम। मुख्य विशेषताएँ: ये सबसे छोटे ड्रोन हैं, हल्के वजन के हैं और अक्सर शौकिया उड़ान और फ़ोटोग्राफ़ी जैसे मनोरंजक उद्देश्यों के लिए उपयोग किए जाते हैं। नियमन:  कम जोखिम और छोटे आकार की वजह से, इन पर न्यूनतम नियामक शर्तें लागू होती हैं। 2. माइक्रो ड्रोन: वजन सीमा: 250 ग्राम से 2 किलोग्राम तक। मुख्य विशेषताएँ: नैनो ड्रोन से थोड़े बड़े, माइक्रो ड्रोन छोटे पैमाने के वाणिज्यिक संचालन, जैसे हवाई फ़ोटोग्राफ़ी, सर्वेक्षण या निरीक्षण के लिए उपयुक्त हैं। नियमन: नैनो ड्रोन की तुलना में संचालन के लिए अतिरिक्त अनुमतियों की आवश्यकता होती है। 3. छोटा ड्रोन: वजन सीमा: 2 किलोग्राम से 25 किलोग्राम तक। मुख्य विशेषताएँ: इन ड्रोन का उपयोग उन्नत वाणिज्यिक अनुप्रयोगों, जैसे कि कृषि (कीटनाशकों का छिड़काव), मानचित्रण और वितरण सेवाओं के लिए किया जाता है। विनियमन: ऑपरेटरों को विस्तृत अनुमति और परिचालन अनुपालन की आवश्यकता होती है। 4. मध्यम ड्रोन: वजन सीमा: 25 किलोग्राम से अधिक और 150 किलोग्राम तक। मुख्य विशेषताएँ: मध्यम ड्रोन का उपयोग औद्योगिक और रक्षा अनुप्रयोगों में किया जाता है, जैसे कि महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे की निगरानी या टोही। विनियमन: इन ड्रोन का दुरुपयोग या गलत तरीके से इस्तेमाल किए जाने पर अधिक नुकसान होने की संभावना के कारण ये सख्त विनियमन के अधीन हैं। 5. बड़ा ड्रोन: वजन सीमा: 150 किलोग्राम से अधिक। मुख्य विशेषताएँ: बड़े ड्रोन मुख्य रूप से सैन्य और औद्योगिक उद्देश्यों, जैसे कि कार्गो परिवहन, निगरानी या लड़ाकू मिशनों के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। विनियमन: उनके आकार और क्षमताओं के कारण, उन्हें व्यापक अनुमति और प्रमाणन सहित उच्चतम स्तर के विनियामक अनुपालन की आवश्यकता होती है। ड्रोन प्रणाली का विकास भारत खुफिया, निगरानी और टोही (आईएसआर) संचालन को बढ़ाने के लिए अपने मानव रहित हवाई वाहन (यूएवी) क्षमताओं को सक्रिय रूप से आगे बढ़ा रहा है।  तापस ड्रोन आर्चर सशस्त्र यूएवी मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस भारत की आधुनिक युद्ध रणनीति में ड्रोन की भूमिका भारत की सैन्य रणनीति अब ड्रोन-केंद्रित युद्ध पर आधारित होती जा रही है। इस बदलाव के पीछे मुख्य कारण घरेलू अनुसंधान एवं विकास (R&D) में तेजी, ड्रोन आयात पर 2021 से लागू प्रतिबंध और ड्रोन एवं उनके कंपोनेंट्स के लिए उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना है। सितंबर 2021 में शुरू हुई इस PLI योजना के तहत 2021-22 से 2023-24 तक तीन वित्तीय वर्षों में कुल ₹120 करोड़ का प्रावधान किया गया। इस योजना ने घरेलू उत्पादन और AI-आधारित स्वायत्त ड्रोन तकनीक को बढ़ावा दिया। भविष्य के युद्ध अब AI-आधारित स्वायत्त ड्रोन और नेटवर्क-सेंट्रिक ऑपरेशन पर अधिक निर्भर होंगे और भारत इसके लिए मजबूत आधार तैयार कर रहा है। बटालियन स्तर पर ड्रोन यूनिट मई 2025 में पाहलगाम आतंकी हमले के बाद संचालित ऑपरेशन सिंदूर ने स्पष्ट कर दिया कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन का उपयोग निर्णायक है। इस अभियान से सीख लेकर भारतीय सेना ने निर्णय लिया कि इंफेंट्री, आर्मर्ड और आर्टिलरी बटालियनों में UAV और काउंटर-UAV सिस्टम को मानक हथियार बनाया जाएगा। वर्तमान में ड्रोन को द्वितीयक हथियार के रूप में प्रयोग किया जाता है और इनके संचालन के लिए सैनिकों को उनके मूल कार्यों से हटाना पड़ता है। नई संरचना के तहत हर यूनिट में समर्पित ड्रोन ऑपरेटिंग टीम बनाई जाएगी, जिससे सैनिक विशेष प्रशिक्षण लेकर केवल ड्रोन संचालन पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे। इंफेंट्री बटालियनों में पलटन और कंपनी स्तर पर निगरानी ड्रोन लगाए जाएंगे और इसके लिए लगभग 70 सैनिकों को पुनः आवंटित किया जाएगा। ड्रोन खरीद और सप्लाई चेन का संस्थानीकरण भारतीय सेना का उद्देश्य ड्रोन और अगली पीढ़ी के उपकरणों को मानक सैन्य वस्तु के रूप में शामिल करना है। इस कदम से ड्रोन की नियमित खरीद सुनिश्चित होगी और एक स्थायी सप्लाई चेन विकसित होगी। इससे आपातकालीन या एड-हॉक खरीद पर निर्भरता कम होगी और लंबी अवधि के लिए सतत युद्ध क्षमता विकसित की जा सकेगी। भैरव लाइट कमांडो बटालियन का गठन भारतीय सेना 30 नई लाइट कमांडो बटालियनों का गठन कर रही है, जिन्हें भैरव बटालियन कहा जाएगा। प्रत्येक बटालियन में 250 सैनिक होंगे, जो विशेष मिशनों के लिए प्रशिक्षित होंगे। इन बटालियनों को विभिन्न कमांड्स के अंतर्गत तैनात किया जाएगा ताकि विशेष क्षेत्रों में तेज़ी से आक्रामक कार्रवाई की जा सके। रुद्र ब्रिगेड : स्वतंत्र और समन्वित युद्ध संरचना भारतीय सेना मौजूदा ब्रिगेड्स को पुनर्गठित कर रुद्र ब्रिगेड बनाएगी। इन ब्रिगेड्स में इंफेंट्री, आर्मर्ड, आर्टिलरी, UAVs और लॉजिस्टिक तत्व एकीकृत होंगे। रुद्र ब्रिगेड को इस तरह तैयार किया जाएगा कि वह विविध भौगोलिक परिस्थितियों में स्वतंत्र रूप से संचालन कर सके। यह संरचना पारंपरिक और हाइब्रिड दोनों प्रकार के युद्धों के लिए उपयुक्त होगी। आर्टिलरी का आधुनिकीकरण : ड्रोन बैटरियां और दिव्यास्त्र यूनिट भारतीय सेना की आर्टिलरी रेजिमेंट में बड़े बदलाव किए जा रहे हैं। नई योजना के तहत दो विस्तारित गन बैटरियां और तीसरी ड्रोन बैटरी बनाई जाएगी, जिसमें निगरानी और लड़ाकू ड्रोन शामिल होंगे। दिव्यास्त्र बैटरियां बनाई जाएंगी, जिनमें लंबी दूरी की तोपें, लूटेरिंग म्यूनिशन और एंटी-ड्रोन सिस्टम शामिल होंगे। इन बैटरियों का उद्देश्य गहराई वाले क्षेत्रों में लक्ष्य को भेदना और क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना होगा। आर्मर्ड, मैकेनाइज्ड इन्फेंट्री और इंजीनियरिंग यूनिट्स का पुनर्गठन आर्मर्ड और मैकेनाइज्ड इन्फेंट्री में रिकॉन्नेसेंस प्लाटून को निगरानी और स्ट्राइक ड्रोन से लैस किया जाएगा। इंजीनियर

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चोल विरासत में केवल भव्य मंदिर ही नहीं, बल्कि सुशासन भी शामिल है       

UPSC पाठ्यक्रम: प्रारंभिक परीक्षा: GS पेपर 3 – अर्थव्यवस्था और पर्यावरण  मुख्य परीक्षा: कृषि एवं जल संसाधन प्रबंधन, सतत अवसंरचना (बुनियादी ढांचा लचीलापन), संरक्षण पर्यावरण एवं विशिष्टता।   चर्चा में क्यों:- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जुलाई 2025 में गंगईकोंडा चोलपुरम यात्रा मोदी के उद्घोषणीय राजा राजराजा चोल और राजेंद्र चोल के स्मारकों की स्थापना की घोषणा लेकर आई। इस अवसर पर उन्होंने चोल वंश की प्रशासनिक, स्थापत्य और समुद्री पराकाष्ठा की विरासत को राष्ट्र निर्माण और संवर्धित प्रासंगिकता की रूपक बताया।    पृष्ठभूमि / Background चोल साम्राज्य (Chola Empire) दक्षिण भारत के इतिहास में 9वीं से 13वीं शताब्दी तक एक प्रमुख और प्रभावशाली शक्ति रहा। इसका प्रशासनिक ढाँचा, जल प्रबंधन और सांस्कृतिक उपलब्धियाँ आज भी अध्ययन का विषय हैं। चोल शासन ने न केवल भव्य मंदिरों और स्थापत्य की परंपरा दी, बल्कि सुशासन, स्थानीय स्वशासन और सतत संसाधन प्रबंधन का भी उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया। 1. राजेंद्र चोल प्रथम और साम्राज्य का विस्तार (1014–1044 CE) राजेंद्र चोल प्रथम चोल साम्राज्य के सबसे प्रख्यात शासकों में से एक थे। उन्होंने दक्षिण भारत के अतिरिक्त श्रीलंका, अंडमान-निकोबार द्वीप, मलेशिया और इंडोनेशिया (श्रीविजय साम्राज्य) तक अपना प्रभाव स्थापित किया। उन्होंने गंगईकोंडा चोलपुरम को अपनी नई राजधानी बनाया, जहाँ से साम्राज्य का प्रशासन संचालित होता था। उनके शासनकाल में नौसैनिक शक्ति और समुद्री व्यापार दोनों का अत्यधिक विकास हुआ। प्रशासनिक महत्त्व: राजेंद्र चोल ने साम्राज्य को मंडल, नाडु, कुर्रम और ग्राम इकाइयों में विभाजित किया। स्थानीय निकायों को मजबूत किया गया और कर वसूली का सुव्यवस्थित तंत्र विकसित हुआ। 2. करिकाल चोल और कल्लानई (Grand Anicut) करिकाल चोल (लगभग 150 ईस्वी) चोल वंश के प्रारंभिक शासक थे। उन्होंने कल्लानई बाँध (Grand Anicut) का निर्माण करवाया, जो आज भी कावेरी नदी पर स्थित है। यह विश्व की सबसे प्राचीन चालू मानव निर्मित जल-सिंचाई संरचनाओं में गिना जाता है। इसका उद्देश्य था:  नदी के जल का नियंत्रित वितरण सिंचाई के माध्यम से कृषि उत्पादन बढ़ाना अकाल और सूखे के प्रभाव को कम करना 3. ग्रामस्तरीय संस्थाएँ और स्थानीय स्वशासन चोल शासन की विशेषता ग्राम पंचायत आधारित प्रशासन और संसाधन प्रबंधन था। पंचायत (Gram Sabha): ग्राम के सामान्य प्रशासन, कर संग्रहण और विवाद निपटान की मुख्य इकाई। टैंक समिति (Eri Variyam): गाँव के तालाब और जलाशयों के रखरखाव के लिए जिम्मेदार। सिंचाई और जल संरक्षण को प्राथमिकता दी जाती थी। बागवानी समिति (Totta Variyam): उद्यान, फलदार वृक्षों और कृषि भूमि की देखरेख। भूमि उपयोग की दक्षता बढ़ाने में सहायक। इन समितियों की व्यवस्था यह दर्शाती है कि चोल शासन विकेंद्रीकृत प्रशासन, लोक सहभागिता और संसाधन प्रबंधन पर आधारित था। 4. आधुनिक संदर्भ में प्रासंगिकता चोल प्रशासनिक परंपरा आज भी पंचायती राज, जल संरक्षण और सतत विकास के लिए प्रेरणास्रोत है। SDG‑6 (Clean Water & Sanitation) और SDG‑11 (Sustainable Cities & Communities) की दिशा में यह ऐतिहासिक मॉडल एक सफल स्थानीय शासन और संसाधन प्रबंधन का उदाहरण प्रस्तुत करता है। हालिया घटनाक्रम / Current Developments   a 1. आदि तिरुवथिरै उत्सव 2025 का समापन वर्ष 2025 में 23 जुलाई से 27 जुलाई तक तमिलनाडु में गंगईकोंडा चोलपुरम स्थित ब्रहदीश्वर मंदिर में आयोजित किया गया, जो चोल सम्राट राजेंद्र चोल प्रथम की जयंती का पर्व है। इस उत्सव के समापन समारोह की अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की, जिसमें उन्होंने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिदृश्य पर अपने विचार व्यक्त किए। 2. गंगा जल अनुष्ठान और प्रतीकात्मक महत्व पीएम मोदी ने गंगाईकोंडा चोलपुरम मंदिर में ‘कलश’ के द्वारा गंगा जल लाने का प्रतीकात्मक अनुष्ठान संपन्न किया। इसे चोल शासन की ऐतिहासिक परंपरा का पुनर्पाठ मानते हुए उनकी विजयी गंगा अभियान की याद दिलाई गई। यह कार्य अंगीकृत रूप से “गंगा-जलंयम जयस्तंभ (liquid pillar of victory)” की स्मृति को जीवंत करता है, जैसा कि ऐतिहासिक चोल शिलालेखों में उल्लेख है। 3. स्मारक सिक्का एवं सम्राटों की मूर्तियाँ प्रधानमंत्री ने राजेंद्र चोल और उनके पिता राजा राजराजा चोल की स्मृति में स्मारक सिक्का जारी किया । साथ ही उन्होंने दोनों सम्राटों की विशाल मूर्तियाँ स्थापित करने की घोषणा की, ताकि ऐतिहासिक चेतना और सांस्कृतिक गौरव को आधुनिक पीढ़ियों तक प्रस्थापित किया जा सके। 4. जल संरक्षण दिवस की मांग भारतीय किसान संघम द्वारा प्रस्ताव रखा गया कि आदि तिरुवथिरै दिवस को एक विशेष जल संरक्षण दिवस (International Day of Water Conservation) घोषित किया जाए। इस मांग का पृष्ठभूमि चोल कालीन जल-निकायों और सिंचाई प्रबंधन की श्रेष्ठ परंपरा थी। संघम ने इस पर दिनचर्या में किसानों, किसान संगठनों और जल प्रबंधन में उत्कृष्ट योगदान देने वाले संस्थाओं को सम्मानित करने की भी प्रस्तावित इच्छा जताई। 5. स्थानीय जल संरचनाओं का पुनर्दर्शन तमिलनाडु सरकार ने ₹19.2 करोड़ की राशि चोलागंगम (Cholagangam) जलाशय के पुनर्विकास पर खर्च करने की घोषणा की। इस परियोजना में जलाशय की बांध मजबूती, 15 किमी स्पिलवे और 38 किमी इनलेट नहर की सफाई, और पर्यटन सुविधाओं का विकास शामिल है।  इस आयोजन के साथ राज्य स्तर पर ₹55 करोड़ की चोल संग्रहालय योजना और 35‑फीट की राजा राजराजा चोल मूर्ति निर्माण का प्रस्ताव भी सामने आया।  6.प्रशासनिक और सांस्कृतिक संदर्भ ये हालिया पहलें चोल राजा के प्रशासनिक स्तर और उनके जल प्रबंधन कार्यों को वर्तमान शासन प्रणाली में सांस्कृतिक पुनरस्थापना, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और स्थानीय विकास के मॉडल के रूप में पेश कर रही हैं। पीएम मोदी ने समारोह में चोल साम्राज्य को “Viksit Bharat के लिए प्राचीन रोडमैप” के रूप में वर्णित किया, जिसमें सामुद्रिक शक्ति, आर्थिक सफलता और सांस्कृतिक एकता का समन्वय दिखता है । महत्व / Significance चोल शासन का महत्व केवल सांस्कृतिक धरोहर और भव्य मंदिरों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह सुशासन, जल-सुरक्षा, कृषि समृद्धि और व्यापारिक विस्तार का भी प्रतीक था। आधुनिक भारत में इसके कई पहलू प्रेरणादायक हैं, जिनका विश्लेषण निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है। 1. संप्रभुता और समुद्री शक्ति का प्रतीक चोल साम्राज्य ने न केवल दक्षिण भारत में, बल्कि श्रीलंका, मलय प्रायद्वीप और सुमात्रा तक अपना प्रभाव स्थापित किया। यह व्यापक समुद्री नेटवर्क और नौसैनिक शक्ति भारत की सामरिक संप्रभुता और समुद्री व्यापार सुरक्षा का प्रारंभिक उदाहरण था। आधुनिक भारत में सागरमाला परियोजना और इंडो-पैसिफिक रणनीति के संदर्भ में यह विरासत महत्वपूर्ण है। 2. जल सुरक्षा और कृषि समृद्धि का मॉडल करिकाल चोल द्वारा निर्मित कल्लानई (Grand Anicut) आज भी कावेरी नदी पर सिंचाई का आधार है। चोल काल में eri variyam (टैंक समिति) और

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अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस (International Youth Day)

  परिचय: अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस प्रतिवर्ष 12 अगस्त को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य युवाओं के मुद्दों को वैश्विक स्तर पर सामने लाना, उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना और युवा सशक्तिकरण के लिए नीतियाँ बनाना है। स्थापना का इतिहास: उद्देश्य: भारत में प्रासंगिकता: चुनौतियाँ:  समाधान और आगे की राह: ✅ कौशल विकास और उद्यमिता को बढ़ावा देना✅ शिक्षा प्रणाली में नवाचार और डिजिटल साक्षरता✅ मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता✅ युवा संसद, ई-गवर्नेंस में भागीदारी✅ ग्रीन रोजगार और जलवायु नेतृत्व में युवा नेतृत्व को बढ़ाना 🔹 निष्कर्ष: युवाओं की भागीदारी के बिना सतत विकास का लक्ष्य अधूरा है। अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि एक आह्वान है कि हम अपनी नीतियों, संस्थाओं और समाज में युवाओं को निर्णायक स्थान दें।   Previous Post

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