सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को पर्यावरण क्षतिपूर्ति लगाने का अधिकार दिया
सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को पर्यावरण क्षतिपूर्ति लगाने का अधिकार दिया चर्चा में क्यों? हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति बनाम लोदी प्रॉपर्टी कंपनी लिमिटेड मामले में एक अहम फैसला सुनाया। इस निर्णय में कोर्ट ने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PCB) अब पर्यावरण क्षतिपूर्ति और पुनर्स्थापनात्मक हर्जाना (restitutionary & compensatory damages) लगा सकते हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने पहले बोर्डों द्वारा ऐसे हर्जाने लगाने को उनकी शक्तियों से बाहर माना था, किंतु सर्वोच्च न्यायालय की पीठ (न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा व न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा) ने हाईकोर्ट का निर्णय उलट दिया। यह फैसला ऐसे समय आया है जब भारत भीषण प्रदूषण संकट का सामना कर रहा है – उदाहरण के लिए, 2018 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने 323 नदियों में 351 प्रदूषित नदी खंडों की पहचान की थी, और 2019 में वायु प्रदूषण से देश में 17 लाख से अधिक अकाल मृत्यु हुई थी। इन परिस्थितियों में पर्यावरण नियामकों को मजबूत अधिकार देकर प्रदूषण से निपटने के प्रयासों को बल मिल सकता है। पुनर्स्थापनात्मक व प्रतिपूरक क्षतिपूर्ति सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि प्रदूषणकारी इकाइयों द्वारा पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई के लिए PCB पुनर्स्थापनात्मक (restoration) एवं प्रतिपूरक (compensatory) क्षतिपूर्ति वसूल सकते हैं। इसमें नियामक प्रदूषकों पर एक निश्चित धनराशि का जुर्माना लगा सकते हैं या भविष्य में संभावित नुकसान की भरपाई हेतु उनसे बैंक गारंटी जमा कराने को कह सकते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि इन उपायों का उद्देश्य दंड देना नहीं, बल्कि प्रदूषित पर्यावरण का सुधार और पुनर्स्थापन करना है। अर्थात् इन क्षतिपूरक राशियों का उपयोग प्रभावित पर्यावरण (जैसे दूषित नदी या वायु गुणवत्ता) को उसकी मूल, स्वच्छ अवस्था में लौटाने के लिए किया जाएगा। यह दृष्टिकोण ‘पोल्यूटर पेज़ प्रिंसिपल’ (Polluter Pays) पर आधारित है, जिसमें प्रदूषक को अपने कार्य से हुए नुकसान का आर्थिक भार उठाना पड़ता है। विधिक प्रावधान व शक्तियाँ न्यायालय ने अपने निर्णय में जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 1974 की धारा 33A तथा वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 1981 की धारा 31A का उल्लेख किया। ये प्रावधान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को लिखित आदेश द्वारा उद्योगों/इकाइयों को प्रदूषण रोकने हेतु दिशानिर्देश जारी करने की शक्ति देते हैं। इन धाराओं के तहत बोर्ड प्रदूषणकारी इकाइयों को बंद करने, उनके संचालन पर रोक लगाने, या बिजली-पानी जैसी सुविधाएँ काटने जैसे कदम उठा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने व्याख्या की कि इन्हीं शक्तियों के अंतर्गत बोर्ड प्रदूषण के संभावित जोखिम को रोकने के लिए अग्रिम रूप से जुर्माना या बैंक गारंटी जैसी शर्तें भी लगा सकते हैं। यह 1988 में उपरोक्त अधिनियमों में जोड़े गए संशोधनों का प्रतिफल है, जिसने बोर्डों को प्रदूषण रोकथाम के लिए व्यापक आदेश जारी करने का अधिकार प्रदान किया था। ‘पोल्यूटर पेज़’ सिद्धांत इस फैसले ने भारतीय पर्यावरण न्यायशास्त्र में स्थापित पोल्यूटर पेज़ सिद्धांत को और मजबूती प्रदान की है। न्यायालय ने दो टूक कहा कि पर्यावरण को वास्तविक क्षति हुई हो ये अनिवार्य नहीं है; यदि किसी गतिविधि से पर्यावरण को संभावित गंभीर नुकसान होने की संभावना है, तब भी प्रदूषक से क्षतिपूर्ति ली जा सकती है। अर्थात, पर्यावरणीय क्षति की संभावना मात्र से ही यह सिद्धांत लागू हो जाता है। कोर्ट ने पूर्व के वेल्लोर सिटिज़न्स वेलफेयर फोरम बनाम भारत संघ (1996) तथा इंडियन काउंसिल फॉर एनवायरो-लीगल एक्शन बनाम भारत संघ (1996) जैसे ऐतिहासिक मामलों का हवाला दिया, जिनमें यह माना गया था कि पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई करवाना न केवल एक वैधानिक बल्कि संवैधानिक दायित्व है, न कि दंडात्मक कार्रवाई। इस प्रकार, वर्तमान निर्णय में भी कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि प्रदूषणकर्ता ने निर्धारित मानकों का उल्लंघन करके या बिना उल्लंघन के भी पर्यावरण को नुकसान पहुँचाया है या पहुँचाने की कगार पर है, तो उससे प्रतिपूरक हानि की भरपाई कराना न्यायोचित है। गौण विधान (उपविधि) की आवश्यकता सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि PCB द्वारा इन क्षतिपूरक शक्तियों के उपयोग को प्रभावी बनाने हेतु संबंधित नियमों का विधिसंगत ढाँचा बनाना आवश्यक है। न्यायालय के अनुसार “बोर्ड द्वारा पारदर्शी एवं मनमानी-रहित तरीके से क्षतिपूर्ति तय करने के लिए आवश्यक है कि अधीनस्थ कानून के रूप में स्पष्ट नियमावली व प्रक्रियाएँ अधिसूचित की जाएँ”। इन नियमों में यह विवरण होना चाहिए कि पर्यावरणीय क्षति का मूल्यांकन कैसे होगा और उसके अनुरूप क्षतिपूर्ति राशि कैसे निर्धारित होगी। साथ ही, इन नियमों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को समाहित करना अनिवार्य होगा, ताकि जुर्माना लगाने की प्रक्रिया निष्पक्ष व पारदर्शी रहे। वर्तमान में CPCB द्वारा दिसंबर 2022 में जारी “पर्यावरणीय क्षति मुआवजा लगाने हेतु सामान्य रूपरेखा” नामक दिशानिर्देशों का उल्लेख कोर्ट ने किया। न्यायालय ने निर्देश दिया कि इन दिशानिर्देशों की समग्र समीक्षा कर उन्हें औपचारिक नियमों/उपविधियों के रूप में अधिसूचित किया जाए। जब तक ऐसे नियम नहीं बनते, तब तक बोर्ड क्षतिपूर्ति संबंधी शक्तियों का क्रियान्वयन शुरू नहीं करेंगे। इससे यह सुनिश्चित होगा कि क्षतिपूर्ति लगाने की शक्ति के उपयोग में किसी भी पक्ष के साथ अन्याय या मनमानी न हो। सर्वोच्च न्यायालय की अतिरिक्त टिप्पणियाँ कोर्ट ने PCB की भूमिका पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों का कानून द्वारा बहुत व्यापक दायित्व निर्धारित है – उन्हें जल और वायु प्रदूषण को रोकने, नियंत्रित करने तथा समाप्त करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। जल अधिनियम की धारा 17 और वायु अधिनियम की समकक्ष धारा में बोर्डों के कर्तव्यों की विस्तृत सूची है, जिससे स्पष्ट होता है कि जन स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा हेतु इन बोर्डों पर भारी ज़िम्मेदारी है। न्यायालय ने कहा कि इतने व्यापक जनहित दायित्व को निभाने के लिए बोर्डों के पास उचित विवेकाधीन शक्तियाँ होना अपरिहार्य है, ताकि वे प्रत्येक मामले के अनुरूप उचित कार्रवाई चुन सकें। पीठ ने मार्गदर्शक सिद्धांत देते हुए दोहराया कि बोर्ड यह तय कर सकता है कि किसी प्रदूषणकारी इकाई के मामले में केवल आर्थिक दंड पर्याप्त है या पर्यावरण की तुरंत भरपाई कराना आवश्यक है – अथवा दोनों कदम उठाए जाएँ। इसके अलावा, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बोर्ड द्वारा पुनर्स्थापनात्मक क्षतिपूर्ति की कार्रवाई उन दंडात्मक प्रावधानों से भिन्न है जो संबंधित कानूनों के अध्याय VI-VII में दिये गए आपराधिक अपराधों (जैसे जेल या जुर्माना) के लिए हैं। बोर्ड द्वारा लगाई गई क्षतिपूर्ति का मकसद पर्यावरणीय सुधार है, जबकि अदालत या अधिकृत अधिकारी द्वारा लगाया जाने वाला जुर्माना एक दंड है। न्यायालय ने 2022 में पर्यावरण संरक्षण कानूनों में हुए संशोधनों (जिनसे कई अपराध डिक्रिमिनलाइज़ होकर आर्थिक