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31 July 2026 The Hindu Notes In Hindi Pdf

’31 July 2026 The Hindu Notes In Hindi PDF’ के इस अंक में PM CARES Fund की पारदर्शिता, पर्यावरण संरक्षण से जुड़े बायोफार्मास्यूटिकल वेस्टवॉटर ट्रीटमेंट सिस्टम, मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) अधिनियम 2023 के प्रावधानों, आर्कटिक काउंसिल की भू-राजनीति, भारत की ‘SHANTI’ पहल के तहत बंगाल की खाड़ी के रणनीतिक महत्व, तथा जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती बादल फटने (Cloudburst) की घटनाओं का विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। PM CARES Fund परिचय एवं पृष्ठभूमि   संरचना एवं नेतृत्व (Structure & Governance) वित्तीय डेटा और आँकड़े (Financial Data & Statistics – FY 2022-23) आरंभिक और अंतिम ऑडिट रिपोर्ट (जो PM CARES वेबसाइट पर उपलब्ध अंतिम डेटा है) के अनुसार: कर लाभ एवं छूट (Tax Benefits & Exemptions) उपयोग (Utilization) प्रमुख चिंताएं, मुद्दे और चुनौतियाँ (Key Concerns & Transparency Issues) शोधकर्ताओं ने बायोफार्मास्युटिकल वेस्टवॉटर के ट्रीटमेंट के लिए कम ऊर्जा वाला सिस्टम विकसित किया संदर्भ   अपशिष्ट जल की चुनौतियाँ (Challenges in Biopharmaceutical Wastewater) बायोफार्मास्युटिकल किण्वन अपशिष्ट जल (Biopharmaceutical fermentation wastewater) को उपचारित करना सबसे कठिन औद्योगिक अपशिष्टों में माना जाता है: एकीकृत 3-चरणीय उपचार प्रणाली (Integrated Three-Stage Treatment System) चुनौतियों से निपटने के लिए विकसित की गई प्रणाली: CEC नियुक्ति अधिनियम और सुप्रीम कोर्ट सुनवाई G.S. Paper-2: राजव्यवस्था परिचय एवं संदर्भ   कानूनी और वैधानिक पृष्ठभूमि (Legal & Constitutional Background) दोनों पक्षों के मुख्य तर्क (Key Arguments) संसदीय समिति द्वारा पोलर और आर्कटिक मामलों के लिए एक समर्पित अधिकारी नियुक्त करने की मांग परिचय एवं संदर्भ (Introduction & Context) समिति की प्रमुख सिफारिशें एवं सुझाव (Key Recommendations & Suggestions) 1. समर्पित पोलर/आर्कटिक मामलों का राजदूत और डेस्क (Dedicated Ambassador & Desk) 2. आर्कटिक काउंसिल में सदस्यता का दर्जा बढ़ाना (Upgradation of Status) भारत के लिए आर्कटिक और ध्रुवीय नीति का महत्व (Importance for India)                                                        आर्कटिक काउंसिल (Arctic Council) संरचना एवं सदस्य देश मुख्य कार्य एवं उद्देश्य भारत के लिए ‘SHANTI’ पहल के आधार के तौर पर बंगाल की खाड़ी परिचय (Introduction) बंगाल की खाड़ी का सामरिक महत्व (Centrality of the Bay of Bengal) भारत की समुद्री सुरक्षा का क्रमिक विकास : तीन चरण- पहल (Initiative) वर्ष उद्देश्य एवं प्रकृति SAGAR (Security and Growth for All in the Region) 2015 यह विकास में समानता का दृष्टिकोण प्रदान करने वाला इरादे का बयान (Statement of Intent) था। MAHASAGAR 2025 इसने व्यापक इंडो-पैसिफिक और ग्लोबल साउथ में सुरक्षा की परस्पर निर्भरता को पहचानते हुए सुरक्षा दायरे का विस्तार किया । SHANTI 2026 यह सहयोग के लिए नियमों और मानकों को तय करता है, जो सुरक्षा को प्रतिस्पर्धा से मांग-संचालित सहयोग में बदलता है। बंगाल की खाड़ी में सहयोग की आवश्यकता और चुनौतियाँ सिद्धांत से व्यवहार तक (Principles to Practice) निष्कर्ष (Conclusion) बादल फटना (Cloudburst) बादल फटना क्या है? (What is a Cloudburst?) बादल फटना कैसे बनता है? (Formation Mechanism) भारत में इसकी स्थिति और बारंबारता (Frequency in India) क्या ‘क्लाउडबर्स्ट’ लेबल जवाबदेही को धुंधला करता है? (Accountability Issue) पूर्वानुमान में कठिनाइयाँ (Forecasting Challenges) निष्कर्ष (Conclusion)

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India: Origin of Indian Territory for UPSC in Hindi

भारत – भारतीय क्षेत्र का उद्गम प्राचीन काल की सांस्कृतिक चेतना से लेकर आधुनिक संप्रभु राष्ट्र बनने तक के ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक विकास का एक अनूठा उदाहरण है। औपनिवेशिक काल के खंडित राजनीतिक मानचित्र से मुक्त होकर, स्वतंत्रता के समय मौजूद 560 से अधिक रियासतों के भारत संघ में ऐतिहासिक विलय और मजबूत लौह संकल्प के साथ, इस महान देश ने अपनी भौगोलिक अखंडता को पुनः प्राप्त किया। भारतीय संविधान के भाग-1 और ऐतिहासिक राज्यों के पुनर्गठन अधिनियमों के माध्यम से क्रमिक रूप से विकसित होता यह क्षेत्र, उत्तर में जम्मू-कश्मीर व लद्दाख से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी और सुदूर द्वीपों तक एक सुदृढ़ प्रशासनिक ताने-बाने में बंधा है। भारतीय भू-भाग की उत्पत्ति (Origin of Indian Territory) महाद्वीपीय विस्थापन और विभाजन (Continental Drift) क्रैटॉन और प्राचीन वलित-संरचनाएँ पश्चिमी घाट और दक्कन ट्रैप का निर्माण यूरेशियाई प्लेट से टक्कर और हिमालय की उत्पत्ति हिमालय की विभिन्न श्रेणियों की उत्पत्ति का कालक्रम निम्नवत है: विशाल मैदानों का निर्माण NCERT Class 6, Chapter-2 यहाँ पढ़ें;-

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India: Geological Structure for UPSC in Hindi

दक्षिण एशिया के केंद्र में स्थित भारत – भूवैज्ञानिक संरचना (India: Geological Structure) भारतवर्ष प्राचीन काल की भूवैज्ञानिक उथल-पुथल से लेकर आधुनिक स्थलाकृतियों के निर्माण तक के क्रमिक और जटिल विवर्तनिक (Tectonic) विकास का एक अनूठा उदाहरण है। प्रागैतिहासिक काल के पैंजिया के विखंडन और गोंदवानालैंड के उत्तरमुखी प्रवाह के साथ, इस महान भूभाग ने प्राचीनतम स्थिर प्रायद्वीपीय पठार, नवीन वलित हिमालय पर्वत श्रेणियों और विशाल सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदानी भागों के रूप में अपनी भौगोलिक अखंडता को प्राप्त किया। भारतीय भू-गर्भिक संरचना (India: Geological Structure) पृथ्वी के भू-गर्भिक इतिहास को 5 प्रमुख कल्पों (ERA) में विभाजित किया गया है। ये कल्प पुनः क्रमिक रूप से युगों (EPOCH) में व्यवस्थित किये गये हैं। प्रत्येक युग पुनः कई उपविभागों में, जिन्हें शक (Period) कहा जाता है, में बंटा है। प्रत्येक शक की कालअवधि निर्धारित की गयी है तथा जीवों और वनस्पतियों के विकास पर भी प्रकाश डाला गया है। भूगर्भिक काल एवं घटनाएँ महाकल्प कल्प (Period) युग (Epoch) आयु/आधुनिक वर्ष पहले (Age/Years before Present) जीवन/मुख्य घटनाएँ (Life/Major events) नवीनतम नवजीवन (Cenozoic) आज से 6.5 करोड़ वर्ष पहले चतुर्थ (Quaternary) अभिनवअत्यंत नूतन 0 से 10,00010,000 से 20 लाख वर्ष आधुनिक मानवआदिमानव (Homo Sapiens)आरंभिक मनुष्य के पूर्वज तृतीयक (Tertiary) अतिनूतनअल्पनूतनअधिनूतनआदिनूतनपुरानूतन 20 लाख से 50 लाख50 लाख से 2.4 करोड़2.4 करोड़ से 3.7 करोड़3.7 करोड़ से 5.8 करोड़5.8 करोड़ से 6.5 करोड़ वनमानुष, फूल वाले पौधे और वृक्षमनुष्य से मिलता-जुलता वनमानुष जंतुस्तनपायीखरगोश (Rabbit)छोटे-स्तनपायी-चूहे आदि। मध्यजीवी (Mesozoic) 6.5 करोड़ से 24.5 करोड़ वर्ष पहले क्रिटेशियसजुरेसिकट्रियासिक 6.5 करोड़ से 14.4 करोड़14.4 करोड़ से 20.8 करोड़20.8 करोड़ से 24.5 करोड़ वर्ष डायनासोर का विलुप्त होना।डायनासोर का युगमेंढ़क व समुद्री कछुआ पुराजीव (24.5 करोड़ वर्ष से 57.0 करोड़ वर्ष पहले) पर्मियन कार्बोनिफेरस डेवोनियनप्रवालविद/सिलुरियन ऑडोविशियन कैम्ब्रियन 24.5 करोड़ से 28.6 करोड़ वर्ष 28.6 करोड़ से 36.0 करोड़ 36.0 करोड़ से 40.8 करोड़ वर्ष40.8 करोड़ से 43.8 करोड़ 43.8 से 50.5 करोड़ वर्ष 50.5 करोड़ से 57.0 करोड़ वर्ष रेंगने वाले जीवों की अधिकता, जलस्थलचरपहले रेंगने वाले जंतु, रीढ़ की हड्डी वाले पहले जीव।स्थल व जल पर रहने वाले जीवस्थल पर जीवन के प्रथम चिह्न-पौधेपहली मछलीस्थल पर कोई जीवन नहीं, जल में बिना रीढ़ की हड्डी वाले जीव प्राचीनतम प्री-कैम्ब्रियन (57 करोड़ से 4 अरब 80 करोड़ वर्ष पहले) 57 करोड़ से 2.50 अरब वर्ष2.5 अरब से 3.8 अरब वर्ष 3.8 अरब से 4.8 अरब वर्ष पहले 5 अरब वर्ष पहले5 अरब से 13.7 अरब वर्ष पहले12 अरब वर्ष पहले13.8 अरब वर्ष पहले भारतीय चट्टानों का वर्गीकरण भारत में सभी भू-वैज्ञानिक कालों में निर्मित चट्टानें पाई जाती हैं, इसलिए भारत की भू-गर्भीय संरचना विविधता पूर्ण है, इसी विविधता के फलस्वरूप प्राकृतिक संसाधनों (खनिज पदार्थ, वनस्पतियाँ इत्यादि) में भी विविधता पायी जाती है। भू-वैज्ञानिक इतिहास के आधार पर भारतीय भू-भाग की चट्टानों को उनके निर्माण क्रम (प्राचीन से नवीन) के अनुसार क्रमशः वर्गीकृत किया गया है: 1. आर्कियन क्रम की चट्टानें 2. धारवाड़ क्रम की चट्टानें 3. कुडप्पा क्रम की चट्टानें 4. विंध्यन क्रम की चट्टानें 5. गोंडवाना क्रम की चट्टानें 6. दक्कन ट्रैप 7. टर्शियरी क्रम की चट्टानें 8. क्वार्टनरी (नवजीव) क्रम की चट्टानें भारत में हिमयुग भारत में घटित ज्वालामुखी क्रियाएँ एवं क्षेत्र भारत में सर्वप्रथम ज्वालामुखी क्रिया धारवाड़ युग में हुई। उसके बाद कुडप्पा, विंध्यन, पैल्योजोइक, कार्बोनीफेरस, मेसोजोइक के अन्त तथा टर्शियरी के प्रारम्भ में हुई। भारत के छः क्षेत्रों में ज्वालामुखी क्रिया हुई— NCERT Class 6, Ch-4 यहाँ पढ़ें:-

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Drainage System of India Notes in Hindi Pdf

भारत का अपवाह तंत्र (Drainage System of India) देश की भौगोलिक संरचना, कृषि और अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है। भारतीय नदी प्रणाली को मुख्य रूप से दो भागों में वर्गीकृत किया गया है—पहला, हिमालयी अपवाह तंत्र, जिसमें वर्षभर बहने वाली गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी विशाल नदियाँ शामिल हैं; और दूसरा, प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र, जिसमें गोदावरी, कृष्णा, नर्मदा और तापी जैसी मौसमी नदियाँ आती हैं। यह समृद्ध जल तंत्र न केवल सिंचाई और जल-विद्युत का मुख्य स्रोत है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का भी आधार है। भारत का अपवाह तंत्र (Drainage System) मुख्य अवधारणाएँ एवं परिभाषाएँ नदियों का महत्त्व भारत जैसे उष्ण और मौसमी वर्षा वाले देश के लिए इन नदियों का विशेष महत्त्व है: अपवाह तंत्र को प्रभावित करने वाले कारक किसी भी क्षेत्र का अपवाह तंत्र व प्रतिरूप (Pattern) निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करता है: नदी द्रोणियों का वर्गीकरण भारत में 4000 से अधिक छोटी एवं बड़ी नदियाँ मिलती हैं। इनके क्षेत्र के आधार पर अंतर निम्न प्रकार है: आकार की दृष्टि से भारतीय नदियों की श्रेणियाँ श्रेणी अपवाह क्षेत्र (प्रति नदी बेसिन) नदी बेसिनों की संख्या देश के कुल जल में हिस्सेदारी बड़ी नदियाँ 20,000 वर्ग कि.मी. से अधिक 14 संयुक्त रूप से बड़ी और मध्यम नदियाँ मिलकर कुल जल मात्रा का 90% भाग संजोए रखती हैं। मध्यम नदियाँ 2,000 से 20,000 वर्ग कि.मी. 44 छोटी नदियाँ 2,000 वर्ग कि.मी. से कम अत्यधिक शेष हिस्सा उत्पत्ति के आधार पर भारतीय अपवाह तंत्र उत्पत्ति के आधार पर भारत के अपवाह तंत्र को दो मुख्य भागों में विभाजित किया जा सकता है: क. हिमालयी अपवाह तंत्र हिमालय क्षेत्र की नदियाँ बारहमासी होती हैं और इनका मुख्य स्रोत ग्लेशियर और मानसून दोनों हैं। मुख्य अपवाह प्रतिरूप (Patterns): हिमालयी नदियों की मुख्य विशेषताएँ: ख. प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर करती हैं और तुलनात्मक रूप से अधिक पुरानी हैं। मुख्य अपवाह प्रतिरूप (Patterns): प्रायद्वीपीय नदियों की मुख्य विशेषताएँ: भारत की विस्तृत जल-विभाजक प्रणाली संपूर्ण भारत की अपवाह प्रणाली को मुख्य रूप से अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और आंतरिक अपवाह क्षेत्रों में बाँटा गया है। आंतरिक अपवाह क्षेत्र: जब नदियाँ किसी सागर में न मिलकर आंतरिक भागों (मरूस्थल या झील) में ही विलुप्त हो जाती हैं। यह क्षेत्र मुख्य रूप से उत्तरी कश्मीर, दक्षिणी-पूर्वी असम और पश्चिमी राजस्थान तक सीमित है, जिसका कुल क्षेत्रफल लगभग 1.6 लाख वर्ग कि.मी. है। उदाहरण: लूनी, घग्गर, रूपनगढ़, मेढ़ा आदि। मुख्य जल-विभाजक रेखा (The Great Indian Watershed) भारत के कुल अपवाह का लगभग 3/4 भाग (75%) बंगाल की खाड़ी में गिरता है और शेष अरब सागर तथा आंतरिक तंत्र का हिस्सा है। इन दोनों बड़े अपवाह तंत्रों के बीच की विभाजक रेखा निम्नलिखित मार्ग का अनुसरण करती है: हिमालयी अपवाह तंत्र हिमालयी अपवाह तंत्र का अध्ययन, सुविधा की दृष्टि से तीन मुख्य नदी तंत्रों के माध्यम से किया जा सकता है। 1. सिन्धु नदी तंत्र – इसे विस्तार से पढने के लिए यहाँ Click करें 11. गंगा नदी तंत्र – इसे विस्तार से पढने के लिए यहाँ Click करें III. ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र – इसे विस्तार से पढने के लिए यहाँ Click करें प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र (Peninsular Drainage System) मुख्य विशेषताएँ एवं सामान्य परिचय प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र: विस्तार से पढने के लिए यहाँ click करें महत्वपूर्ण भौगोलिक परिभाषाएँ डेल्टा (Delta): नदी जब सागर या झील में गिरती है तो वेग में अत्यधिक कमी के कारण उसके मुहाने पर मलबा का निक्षेप होने लगता है, जिससे वहाँ विशेष प्रकार के स्थलरूप का निर्माण होता है, जिसे ‘डेल्टा’ कहते हैं। ज्यादातर बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ ‘डेल्टा’ का निर्माण करती हैं। एश्चुअरी / ज्वार नदमुख (Estuary): नदी के जल में तीव्र प्रवाह के कारण जब उसके मुहाने पर साथ लाये गए मलबे का निक्षेप नहीं होता है, तथा नदी जल के साथ मलबा भी समुद्र में गिर जाता है, तो नदी का मुहाना उथला होने के बजाय गहरा हो जाता है। ऐसे गहरे मुहाने को ही ज्वारनदमुख कहा जाता है। ज्यादातर अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ एश्चुअरी का निर्माण करती हैं।

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Peninsular Drainage System Notes in Hindi Pdf

प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र (Peninsular Drainage System) भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे प्राचीन और सुव्यवस्थित नदी तंत्र है, जो हिमालयी नदी प्रणाली से भी पुराना माना जाता है। इस तंत्र में मुख्य जल-विभाजक की भूमिका ‘पश्चिमी घाट’ निभाता है। यहाँ की नदियाँ मुख्य रूप से दो दिशाओं में बहती हैं—महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी बड़ी नदियाँ पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में डेल्टा बनाती हैं, जबकि नर्मदा और तापी जैसी नदियाँ अपवादस्वरूप पश्चिम की ओर भ्रंश घाटी में बहती हुई अरब सागर में एश्चुअरी (ज्वारनदमुख) का निर्माण करती हैं। प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र (Peninsular Drainage System) मुख्य विशेषताएँ एवं सामान्य परिचय निकासी के आधार पर नदियों का वर्गीकरण प्रायद्वीपीय नदियों को हम सुविधा के लिए इनकी निकासी के आधार पर निम्नलिखित भागों में बाँटकर अध्ययन कर सकते हैं: बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली प्रमुख नदियाँ क. गोदावरी (दक्षिण की गंगा / वृद्ध गंगा) ख. महानदी ग. कृष्णा घ. पेन्नार ङ. कावेरी (दक्षिणी गंगा) अरब सागर, खम्भात की खाड़ी व कच्छ के रण में गिरने वाली नदियाँ क. नर्मदा ख. तापी (ताप्ती) ग. माही घ. साबरमती ङ. लूनी प्रायद्वीपीय भारत की अन्य छोटी नदियाँ प्रायद्वीपीय भारत में कई अन्य छोटी नदियाँ हैं। इनमें से कई नदियाँ तीव्र ढाल एवं जलप्रपात के कारण जल-विद्युत उत्पादन की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं (खासकर पश्चिमी तट पर बहने वाली नदियाँ)। पूर्वी तट की छोटी नदियाँ सिंचाई व नौवहन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। अरब सागर / खम्भात की खाड़ी / कच्छ के रण में गिरने वाली लघु नदियाँ: बंगाल की खाड़ी / मन्नार की खाड़ी में गिरने वाली लघु नदियाँ:

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Brahmaputra River System Notes in Hindi Pdf

ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र (Brahmaputra River System) एशिया की सबसे बड़ी और गतिशील नदी प्रणालियों में से एक है, जो तिब्बत, भारत और बांग्लादेश के विशाल भू-भाग को कवर करता है। कैलाश पर्वत के निकट से ‘सांग्पो’ के रूप में निकलने वाली यह नदी भारत के अरुणाचल प्रदेश और असम से होकर बहती है, जहाँ इसे ‘ब्रह्मपुत्र’ नाम मिलता है। यह नदी तंत्र न केवल अपनी विशाल जल क्षमता और ‘माजुली’ जैसे विश्व के सबसे बड़े नदी द्वीप के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि पूर्वोत्तर भारत की कृषि, जैव विविधता और राष्ट्रीय जलमार्ग के लिए रीढ़ की हड्डी माना जाता है। ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र (Brahmaputra River System) ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र का विस्तार 5,80,000 वर्ग कि.मी. क्षेत्र पर है, जिसमें 2,58,008 वर्ग कि.मी. क्षेत्र भारत में स्थित है। ब्रह्मपुत्र (Brahmaputra) ब्रह्मपुत्र विश्व की बड़ी नदियों में से एक है। प्रवाह मार्ग एवं नाम परिवर्तन तट के आधार पर सहायक नदियाँ असम घाटी की 725 कि.मी. की यात्रा में इसमें निम्नलिखित सहायक नदियाँ आकर मिलती हैं: मुख्य विशेषताएँ एवं तटीय नगर

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Ganga River System Notes In Hindi Pdf

गंगा नदी तंत्र (Ganga River System) भारत का सबसे बड़ा और सांस्कृतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण अपवाह तंत्र है, जो देश के लगभग एक-चौथाई क्षेत्र को कवर करता है। उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में भागीरथी और अलकनंदा के मिलन से उत्पन्न होने वाली गंगा नदी, अपने सफर में यमुना, घाघरा, गंडक और कोसी जैसी विशाल सहायक नदियों को समेटती है। यह नदी तंत्र न केवल उत्तर भारत के विशाल मैदानों को ‘भारत का अन्न भंडार’ बनाता है, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका, कृषि, जलविद्युत और धार्मिक आस्था का मुख्य आधार भी है। गंगा नदी तंत्र (Ganga River System) गंगा नदी तंत्र के अन्तर्गत हिमालय से निकलने वाली नदियाँ जैसे यमुना, रामगंगा, गोमती, घाघरा, गंडक, कोसी इत्यादि तथा प्रायद्वीपीय उच्च भूमि से निकलने वाली चंबल, केन, बेतवा, सिंध (यमुना में मिलती है) तथा सोन (दक्षिण से निकलने वाली गंगा की एकमात्र ‘उत्तरमुखी’ सहायक नदी) आदि नदियाँ आती हैं। मुख्य विशेषताएँ एवं विस्तार गंगा नदी का उद्गम और पंचप्रयाग की संरचना गंगा नदी वास्तव में ‘भागीरथी’ और ‘अलकनंदा’ नदियों का ही सम्मिलित रूप है। इसकी उद्गम कड़ियाँ इस प्रकार हैं: गंगा का प्रवाह मार्ग एवं डेल्टा तट के आधार पर सहायक नदियाँ बायें तट पर मिलने वाली नदियाँ (Left Bank Tributaries) दायें तट पर मिलने वाली नदियाँ (Right Bank Tributaries) रामगंगा, महानंदा, गोमती, घाघरा, गंडक, बागमती और कोसी यमुना, सोन, पुनपुन, दामोदर और रूप नारायण हिमालय से निकलने वाली मुख्य सहायक नदियाँ क. यमुना नदी ख. रामगंगा ग. काली नदी (काली गंगा / गारवाया चौका / शारदा) घ. घाघरा (करनाली या कोणिपाली) ङ. गण्डक च. कोसी या कौशिकी (बिहार का शोक) पठार से निकलने वाली गंगा की सहायक नदियाँ यद्यपि, गंगा में जल मुख्यतः उन सहायक नदियों से आता है जिनका उद्‌गम स्थान हिमालय में है, किन्तु कुछ जल पठारी नदियों से भी प्राप्त होता है। ये चम्बल, बेतवा, काली सिंध, केन और सोन हैं। क. चम्बल (पौराणिक नाम – चर्मावती/चर्मण्वती) ख. बेतवा या वेत्रवती ग. सोन या स्वर्ण नदी

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Indus River System Notes in Hindi Pdf

सिन्धु नदी तंत्र (Indus River System) विश्व के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण नदी बेसिन्स में से एक है, जो मुख्य रूप से पश्चिमी हिमालय क्षेत्र के जल को अरब सागर तक ले जाता है। इस तंत्र की मुख्य नदी सिन्धु है, जो तिब्बत में मानसरोवर झील के निकट से निकलती है। झेलम, चिनाब, रावी, व्यास और सतलज जैसी इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ (पंचनद) उत्तर-पश्चिम भारत की भूमि को उपजाऊ बनाती हैं। यह नदी तंत्र न केवल भूगोल बल्कि कृषि, व्यापार और भारत-पाकिस्तान जल समझौते की दृष्टि से भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। सिन्धु नदी तंत्र (Indus River System) इस क्रम की नदियाँ पश्चिमी हिमालय प्रदेश का जल अरब सागर में गिराती हैं। यह संसार की कुछ सबसे बड़ी नदी द्रोणियों में से एक है। इस तंत्र में सिन्धु सबसे बड़ी नदी है तथा झेलम, चिनाब, रावी, व्यास, सतलज व अन्य इसकी सहायक नदियाँ हैं। सिन्धु नदी (Indus River) सिन्धु जल समझौता (Indus Water Treaty) मुख्य सहायक नदियाँ (पंचनद) क. झेलम नदी ख. चिनाब नदी ग. रावी नदी घ. व्यास नदी ङ. सतलज नदी

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The Universe Notes in Hindi pdf

असीम रहस्यों और अनंत विस्तार को अपने भीतर समेटे हुए The Universe (ब्रह्मांड) अति सूक्ष्म कणों से लेकर विशालकाय आकाशगंगाओं और खगोलीय पिंडों का एक विराट स्वरूप है। अंतरिक्ष विज्ञान (Cosmology) के अंतर्गत ब्रह्मांड का अध्ययन सदियों से मानव जिज्ञासा का केंद्र रहा है। लगभग 13.8 अरब वर्ष पूर्व हुए ‘बिग बैंग’ (महाविस्फोट) से उत्पन्न हुआ हमारा ब्रह्मांड आज भी निरंतर विस्तारित हो रहा है। इसके इसी विस्मयकारी जीवन चक्र, तारों के जन्म, और सौरमंडल की गतियों को समझना आधुनिक विज्ञान का सबसे बड़ा रोमांच है। ब्रह्मांड का परिचय ब्रह्मांड से संबंधित ऐतिहासिक एवं आधुनिक परिकल्पनाएँ (A) भू-केन्द्रीय परिकल्पना (Geocentric Concept) (B) सूर्य-केन्द्रीय परिकल्पना (Heliocentric Concept) (C) उत्तरवर्ती अध्ययन एवं हब्बल का नियम ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति (Origin of The Universe) ब्रह्मांड की उत्पत्ति से संबंधित मुख्य रूप से निम्नलिखित चार अवधारणाएँ प्रस्तुत की गई हैं: ब्रह्मांड की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धांत (सर्वमान्य मत) डाप्लर प्रभाव (Doppler Effect) आकाशगंगा एवं संबंधित खगोलीय पिंड तारे की परिभाषा एवं प्रारंभिक विकास (आद्य तारा) तारे के विकास को विस्तार से पढने के लिए यहाँ click करें सौरमंडल (Solar System) सौरमंडल में चारों ओर भ्रमण करने वाले ग्रह, उपग्रह, धूमकेतु, उल्काएँ तथा क्षुद्रग्रह आदि सभी को शामिल किया जाता है। सूर्य जो कि सौरमंडल का जन्मदाता है, सम्पूर्ण सौरमंडल को ऊर्जा एवं प्रकाश प्रदान करता है। सूर्य की ऊर्जा का स्रोत उसके केन्द्र में हाइड्रोजन परमाणुओं का नाभिकीय संलयन द्वारा हीलियम में बदलना है। सूर्य हमारे सौरमंडल के केन्द्र में स्थित है। सौरमंडल (Solar System): विस्तार से पढने के लिए यहाँ click करें सौरमंडल के ग्रह (Planets of Solar System) ग्रह की परिभाषा एवं सामान्य विशेषताएँ ग्रहों का वर्गीकरण सूर्य से दूरी एवं आकार के अनुसार ग्रहों का क्रम सभी 8 ग्रहों का विस्तृत विवरण यहाँ पढ़ें उपग्रह (Satellite) ग्रहों के उपग्रहों की विवरणात्मक सारणी क्रम सं. ग्रह उपग्रहों की संख्या उपग्रहों के नाम 1 बुध 0 — 2 शुक्र 0 — 3 पृथ्वी 1 चन्द्रमा 4 मंगल 2 फोबोस, डिमोस 5 बृहस्पति 79 गैनीमीड (Ganymede), कैलिस्टो, यूरोपा आदि। 6 शनि 82 टाइटन, रेहा (Rhea), इथापेटस, डिओन आदि। 7 अरुण 27 टाइटेनिया (Titania), ओबेरॉन, उम्ब्रियल (Umbriel), एरियल, मिरांडा आदि। 8 वरुण 13 ट्राइटन (Triton) (सबसे बड़ा), नेरोड (Neried) चन्द्रमा (Moon) एवं उसके भौतिक लक्षण चन्द्रमा के सांख्यिकीय आँकड़े भारत के चन्द्र अन्वेषण अभियान (चन्द्रयान) (A) चन्द्रयान-1 (B) चन्द्रयान-2 उल्काश्म तथा उल्का पिंड (Meteors & Shooting Stars) ब्लू मून (Blue Moon) परिघटना विगत वर्षों में सिविल सर्विसेज की परीक्षा में आए हुए प्रश्न प्रश्न 1. ‘क्षुद्रग्रहों’ के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: उपर्युक्त दिए गए कथनों में से कौन-सा कथन सत्य है? उत्तर: (a) 1 और 2 व्याख्या: उपर्युक्त दिए गए कथनों में से केवल 1 और 2 सत्य हैं, जबकि कथन 3 असत्य है। क्षुद्रग्रहों (Asteroids) की कक्षा मंगल एवं बृहस्पति की कक्षाओं के मध्य स्थित है। प्रश्न 2. निम्नलिखित में से कौन उल्का से संबंधित है? उत्तर: (c) बाह्य अंतरिक्ष से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रविष्ट हुए द्रव्य का अंश व्याख्या: उल्का बाह्य अंतरिक्ष से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रविष्ट हुए द्रव्य का अंश होता है। यह एक ठोस आकाशीय पिण्ड होता है, जो वायुमंडल में प्रवेश करते ही घर्षण से जलने के कारण चमकने लगता है। इन्हें ‘टूटा हुआ तारा’ (Shooting Star) भी कहा जाता है। जबकि वे पिण्ड जो वायुमंडल के घर्षण से पूर्णतः जल नहीं पाते और चट्टानों के रूप में पृथ्वी पर आ गिरते हैं, उन्हें उल्का पिण्ड (Meteorites) कहते हैं। प्रश्न 3. मंगल और बृहस्पति की कक्षाओं के बीच सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करने वाले शैल के टुकड़ों के समूह को क्या कहते हैं? उत्तर: (d) क्षुद्रग्रह व्याख्या: मंगल एवं बृहस्पति के मध्य क्षेत्र में सूर्य की परिक्रमा करने वाले अपेक्षाकृत छोटे पिण्ड को क्षुद्रग्रह (Asteroids) कहते हैं। इनकी उत्पत्ति ग्रहों के विस्फोट के फलस्वरूप टूटे हुए खण्डों से हुई है। प्रश्न 4. निम्नलिखित में से कौन-सा एक तारा पृथ्वी के सर्वाधिक निकट है? उत्तर: (a) सूर्य व्याख्या: सूर्य पृथ्वी का सबसे निकटतम तारा है। पृथ्वी पर सूर्य का प्रकाश पहुँचने में लगभग 8 मिनट 16.6 सेकेण्ड लगते हैं। सूर्य का आयतन पृथ्वी से 13 लाख गुना अधिक पाया जाता है। प्रश्न 5. सूर्य से दूरी के क्रम में, निम्नलिखित में से कौन-से दो ग्रह, मंगल और यूरेनस के बीच हैं? उत्तर: (b) बृहस्पति और शनि व्याख्या: सूर्य से दूरी के बढ़ते क्रम में बृहस्पति और शनि ग्रह, मंगल (Mars) और यूरेनस (अरुण) के बीच स्थित हैं। प्रश्न 6. निम्नलिखित में से कौन-से ग्रह के सर्वाधिक प्राकृतिक उपग्रह या चन्द्र हैं? (वर्ष 2009 के प्रश्न के संदर्भ में) उत्तर: (c) शनि व्याख्या: वर्तमान डेटा के अनुसार शनि ग्रह के सर्वाधिक उपग्रह हैं, जबकि बृहस्पति दूसरा सर्वाधिक उपग्रह वाला ग्रह है।

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Planets of Solar System Notes in Hindi pdf

अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) की नवीन परिभाषा के अनुसार हमारे Planets of the Solar System (सौरमंडल के ग्रह) सूर्य की परिक्रमा करने वाले वे विशाल पिंड हैं जो एक निश्चित गुरुत्वाकर्षण, आकार और स्वतंत्र कक्षा रखते हैं। आंतरिक चट्टानी ग्रहों (बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल) से लेकर गैसों से बने विशाल बाह्य महाग्रहों (बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण) तक, प्रत्येक ग्रह अपनी अनूठी वायुमंडलीय दशाओं, वलय प्रणालियों और उपग्रहों के कारण विशिष्ट है। इन ग्रहों की भौतिक संरचना, प्राचीन काल से चली आ रही गतियों और आधुनिक अंतरिक्ष अभियानों का अध्ययन ब्रह्मांड विज्ञान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। सौरमंडल के ग्रह (Planets of Solar System) ग्रह की परिभाषा एवं सामान्य विशेषताएँ ग्रहों का वर्गीकरण सभी 8 ग्रहों का विस्तृत विवरण (A) बुध (Mercury) (B) शुक्र (Venus) (C) पृथ्वी (Earth) पृथ्वी: महत्त्वपूर्ण सांख्यिकीय तथ्य (सारणी) विशेषता / प्राचल विवरण / डेटा आकृति लगभग गोलाभ (Geoid) धरातलीय क्षेत्रफल 51.1 करोड़ वर्ग किमी. अनुमानित आयु 4.6 बिलियन वर्ष विषुवतरेखीय व्यास 12,756 किमी. अक्षध्रुवीय व्यास 12,714 किमी. विषुवतरेखीय परिधि 40,075 किमी. ध्रुवीय परिधि 40,008 किमी. सूर्य से न्यूनतम दूरी (उपसौर) 14.70 करोड़ किमी. सूर्य से अधिकतम दूरी (अपसौर) 15.21 करोड़ किमी. सूर्य से माध्य/औसत दूरी 14.98 करोड़ किमी. चन्द्रमा से दूरी 3,84,315 किमी. परिक्रमण समय (सूर्य की परिक्रमा) 365 दिन 5 घंटे 48 मिनट 46 सेकण्ड परिभ्रमण समय (अपने अक्ष पर घूर्णन) 23 घंटे 56 मिनट 4 सेकण्ड पृथ्वी का द्रव्यमान 5.9722×10²⁴ kg समुद्रतल से स्थल की सर्वोच्च ऊँचाई 8,850 मीटर (माउंट एवरेस्ट) समुद्रतल से सागर की सर्वाधिक गहराई 11,022 मीटर (मैरियाना ट्रेंच) (D) मंगल (Mars) (E) बृहस्पति (Jupiter) (F) शनि (Saturn) (G) अरुण (Uranus) (H) वरुण (Neptune) प्लूटो का वर्गीकरण (विवाद एवं निष्कासन) क्षुद्र ग्रह या अवान्तर ग्रह (Asteroids) ग्रह: परीक्षा उपयोगी महत्त्वपूर्ण तथ्य (त्वरित सारणी) प्राचल / प्रश्न उत्तर (ग्रह / पिंड) सबसे बड़ा और सर्वाधिक द्रव्यमान वाला ग्रह बृहस्पति सर्वाधिक तीव्र कक्षीय गति वाला ग्रह बुध सबसे लम्बा संयुति (Synodic) दिवस वाला ग्रह बुध सबसे छोटा संयुति दिवस वाला ग्रह बृहस्पति सर्वाधिक उपग्रहों वाला ग्रह शनि (82 उपग्रह) सबसे बड़े उपग्रह (गैनीमीड) वाला ग्रह बृहस्पति सर्वाधिक औसत घनत्व वाला ग्रह पृथ्वी न्यूनतम औसत घनत्व वाला ग्रह शनि सर्वोच्च पर्वत (निक्स ओलंपिया) युक्त ग्रह मंगल सबसे गहरे सागर युक्त ग्रह बृहस्पति प्रबलतम चुम्बकीय क्षेत्र वाला ग्रह बृहस्पति सर्वाधिक वृत्ताकार कक्षा वाला ग्रह शुक्र सबसे गर्म ग्रह शुक्र चन्द्रमा (उपग्रह) रहित ग्रह बुध और शुक्र धरातल पर तरल (जल) की सर्वाधिक मात्रा युक्त ग्रह पृथ्वी सर्वाधिक उत्केन्द्रित कक्षा वाले चन्द्रमा युक्त ग्रह वरुण

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