गंगा नदी तंत्र (Ganga River System) भारत का सबसे बड़ा और सांस्कृतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण अपवाह तंत्र है, जो देश के लगभग एक-चौथाई क्षेत्र को कवर करता है। उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में भागीरथी और अलकनंदा के मिलन से उत्पन्न होने वाली गंगा नदी, अपने सफर में यमुना, घाघरा, गंडक और कोसी जैसी विशाल सहायक नदियों को समेटती है। यह नदी तंत्र न केवल उत्तर भारत के विशाल मैदानों को ‘भारत का अन्न भंडार’ बनाता है, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका, कृषि, जलविद्युत और धार्मिक आस्था का मुख्य आधार भी है।
गंगा नदी तंत्र (Ganga River System)
गंगा नदी तंत्र के अन्तर्गत हिमालय से निकलने वाली नदियाँ जैसे यमुना, रामगंगा, गोमती, घाघरा, गंडक, कोसी इत्यादि तथा प्रायद्वीपीय उच्च भूमि से निकलने वाली चंबल, केन, बेतवा, सिंध (यमुना में मिलती है) तथा सोन (दक्षिण से निकलने वाली गंगा की एकमात्र ‘उत्तरमुखी’ सहायक नदी) आदि नदियाँ आती हैं।
मुख्य विशेषताएँ एवं विस्तार
- क्षेत्रफल: गंगा नदी तंत्र के अन्तर्गत, देश का लगभग एक चौथाई क्षेत्र आता है।
- महत्त्व: इससे उपजाऊ मैदान का निर्माण होता है, जिसे भारत का ‘अन्नभण्डार’ कहते हैं और यह सर्वाधिक जनसंकुल (सघन आबादी वाला) क्षेत्र भी है।
- सांस्कृतिक महत्त्व: गंगा नदी, सांस्कृतिक दृष्टि से भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदी है।
- विस्तार व लम्बाई: गंगा की कुल लम्बाई 2525 कि.मी. तथा अपवाह क्षेत्र 8,61,404 वर्ग कि.मी. है।
- उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश: 1450 कि.मी.
- बिहार: 445 कि.मी.
- पश्चिम बंगाल: 520 कि.मी.
गंगा नदी का उद्गम और पंचप्रयाग की संरचना
गंगा नदी वास्तव में ‘भागीरथी’ और ‘अलकनंदा’ नदियों का ही सम्मिलित रूप है। इसकी उद्गम कड़ियाँ इस प्रकार हैं:
- अलकनन्दा नदी: यह गढ़वाल (तिब्बत की सीमा के निकट 7800 मी. की ऊँचाई) से निकलती है। यह ‘धौली नदी’ (जो नीति दर्रे के निकट जास्कर श्रेणी से निकलती है) और ‘विष्णु गंगा’ (जो नीति दर्रे के निकट कामेत से निकलती है) आदि के मिलने से बनी है।
- विष्णु प्रयाग: यहाँ धौली नदी और विष्णु गंगा आपस में मिलती हैं। इसके बाद अलकनंदा मध्य हिमालय के प्रमुख और गहरे खड्ड में से होकर बहती है, जिसके एक ओर नंदादेवी और दूसरी ओर बद्रीनाथ की ऊँची चोटियाँ हैं।
- कर्ण प्रयाग: अलकनंदा की एक अन्य सहायक नदी ‘पिंडार’ (जो पिंडारी हिमनद से निकलती है) यहाँ आकर अलकनंदा से मिल जाती है।
- नन्द प्रयाग: यहाँ अलकनंदा और मंदाकिनी नदियाँ मिलती हैं।
- रूद्र प्रयाग: मन्दाकिनी नदी, जो बद्रीनाथ के दक्षिण की ओर से आती है, यहाँ अलकनंदा से मिलती है।
- भागीरथी (मुख्य गंगा): इसका उद्गम उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी जनपद के 6600 मीटर की ऊँचाई पर स्थित ‘गोमुख’ के निकट ‘गंगोत्री हिमानी’ से होता है (केदारनाथ चोटी के उत्तर से)।
- इस हिमानी के निकट ‘सातोपंथ’, शिवलिंग आदि कई ऊँची चोटियाँ हैं।
- मुख्य हिमालय के कुछ उत्तर से ‘जाह्नवी’ नदी निकलकर ‘गंगोत्री’ के निकट भागीरथी में मिलती है।
- आगे यह मुख्य हिमालय श्रेणियों में बन्दरपूँछ और श्रीकान्त चोटियों के बीच 8470 मीटर गहरी घाटी में बहती है।
- देवप्रयाग: यहाँ भागीरथी और अलकनन्दा आपस में मिलकर ‘गंगा’ कहलाती हैं।
- मैदान में प्रवेश: हरिद्वार के निकट गंगा, मैदानी भाग में प्रवेश करती हैं।
गंगा का प्रवाह मार्ग एवं डेल्टा
- हरिद्वार से प्रयागराज (उ.प्र.): इस मार्ग में नदी के प्रवाह की दिशा दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व होती है।
- प्रयागराज से फरक्का: यहाँ तक इसके प्रवाह की दिशा पूर्व होती है।
- फरक्का से आगे (बांग्लादेश में): फरक्का से आगे इसकी मुख्य धारा पूर्व-दक्षिण पूर्व में प्रवाहित होती हुई बांग्लादेश में प्रवेश करती है, जहां इसे ‘पद्मा’ कहते हैं।
- जमुना से संगम: ग्वालन्दों के समीप ब्रह्मपुत्र (जिसे बांग्लादेश में ‘जमुना’ कहा जाता है) पद्मा में मिल जाती है।
- मेघना में विलय: इसकी एक शाखा दक्षिण-पूर्व की ओर मुड़कर ‘मेघना’ में मिल जाती है और बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
- गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा: यहाँ इसकी कई शाखाएँ (जल-धाराएँ) प्रवाहित होती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरने से पहले बड़े ‘डेल्टा’ का निर्माण करती हैं, जिसे ‘गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा’ के नाम से जाना जाता है। इसकी अन्य शाखाएँ जैसे हुगली, माटला, रायमंगल, मलचा, हरिंगघाटा और भागीरथी हैं।
तट के आधार पर सहायक नदियाँ
| बायें तट पर मिलने वाली नदियाँ (Left Bank Tributaries) | दायें तट पर मिलने वाली नदियाँ (Right Bank Tributaries) |
| रामगंगा, महानंदा, गोमती, घाघरा, गंडक, बागमती और कोसी | यमुना, सोन, पुनपुन, दामोदर और रूप नारायण |
हिमालय से निकलने वाली मुख्य सहायक नदियाँ
क. यमुना नदी
- उद्गम: यह गंगा की प्रमुख सहायक नदी है। यह बंदरपूँछ (6316 मी.) के पश्चिमी ढाल पर स्थित ‘यमुनोत्री हिमनद’ से निकलती है।
- प्रवाह व विलय: यह गंगा के समानान्तर बहती हुई ‘प्रयाग’ (प्रयागराज-उ.प्र.) में गंगा में मिल जाती है।
- सहायक नदियाँ:
- पर्वतीय क्षेत्र में: टॉस, गिरी और असन नदियाँ मिलती हैं।
- मैदानी क्षेत्र में (दक्षिण से): चम्बल, सिंध, बेतवा एवं केन।
- मैदानी क्षेत्र में (उत्तर से): हिंडन, रिंद, सेंगर, नान, बरूणा और ससुरखरेदी।
- विस्तार: यमुना की लम्बाई 1375 कि.मी. तथा अपवाह क्षेत्र 3,66,223 वर्ग कि.मी. है।
ख. रामगंगा
- उद्गम: यह मुख्य हिमालय के दक्षिण भाग से नैनीताल के निकट से निकलती है।
- प्रवाह व विलय: यह उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में कालागढ़ किले के निकट मैदान में प्रवेश करती है। यहाँ से आगे इसमें दाहिने किनारे से ‘कोह नदी’ मिलती है और कन्नौज में यह गंगा नदी में मिल जाती है।
- विस्तार: इसकी लम्बाई 600 कि.मी. तथा अपवाह क्षेत्र 32,800 वर्ग कि.मी. है।
ग. काली नदी (काली गंगा / गारवाया चौका / शारदा)
- उद्गम: काली नदी कुमायूँ के उत्तरी पूर्वी भाग में ‘मिलाम हिमनद’ से निकलती है। प्रारम्भ में इस नदी को ‘गौरी गंगा’ के नाम से जाना जाता है।
- प्रवाह व नाम परिवर्तन:
- इसकी मुख्य सहायक नदियाँ धर्मा, लिसार, सरजू और पूर्वी रामगंगा हैं। यही नदी सरजू या शारदा के नाम से पहाड़ियों में बहती हुई ब्रह्मदेव के निकट मैदान में प्रवेश करती है।
- यहाँ यह दो शाखाओं में विभाजित हो जाती है, जो पुनः ‘मुण्डिया घाट’ के निकट आपस में मिल जाती हैं।
- इससे आगे यह पीलीभीत (उ.प्र.) और नेपाल के बीच सीमा बनाते हुए बहती है, जहां इसे ‘काली गंगा’ के नाम से जाना जाता है।
- विलय: उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में यह घाघरा नदी से मिल जाती है। यहाँ इसे ‘चौका नदी’ के नाम से जाना जाता है (नरहाय घाट में)।
घ. घाघरा (करनाली या कोणिपाली)
- उद्गम: यह तिब्बत के पठार में स्थित ‘मापचो-चुग’ हिमनद से निकलती है।
- प्रवाह व खड्ड: शिवालिक को पार करते समय यह नदी तिला, सेसी और बेरी नदियों का जल संग्रह करती है और ‘शीश-पनी’ नामक 180 मी. चौड़ा तथा 610 मीटर गहरा खड्ड बनाती है।
- मैदानी रूप: मैदानी भाग में पहुँचकर इसकी दो शाखाएँ हो जाती हैं—पश्चिम की ओर ‘करनाली’ तथा पूर्व की ओर ‘गिरवा’, किन्तु आगे पुनः एक हो जाती हैं और मैदानों में इसे घाघरा नदी के नाम से जाना जाता है।
- सहायक नदियाँ व विलय: इसकी सहायक नदियों में शारदा, राप्ती एवं छोटी गंडक हैं। यह छपरा (बिहार) में गंगा में मिल जाती है।
ङ. गण्डक
- उद्गम व संरचना: ‘काली गण्डक’ (मुक्तिनाथ के निकट फोटू दर्रे के पास से) एवं ‘त्रिशूल गंगा’ (गोसाईगाँव 8013 मीटर की ऊँचाई से) नामक नदियों के मिलने से गंडक नदी बनती है।
- नामकरण का कारण: इस नदी को नेपाल में ‘सालीग्रामी’ और मैदानी भाग में ‘नारायणी’ कहते हैं, क्योंकि इसमें गोलमटोल ‘सालिग्राम’ (पत्थर जो ठाकुर जी के रूप में पूजे जाते हैं) बहुतायत में मिलते हैं।
- प्रवाह व विलय: यह महाभारत श्रेणी को पार करती हुई बिहार के पश्चिमी चम्पारण जनपद से मैदान में प्रवेश करती है तथा हाजीपुर के समीप गंगा नदी में मिल जाती है। इसकी कुल लम्बाई 425 कि.मी. है।
च. कोसी या कौशिकी (बिहार का शोक)
- उद्गम व संरचना: यह गंगा की सबसे बड़ी मैदानी नदियों में से एक है, जो सात नदियों से मिलकर बनती है, जिसमें ‘अरूण’ (तिब्बत में ‘फुगबू’) प्रमुख है, जो ‘गोसाईथान’ के उत्तर से निकलती है।
- प्रवाह मार्ग: यह नदी पश्चिम में माउंट एवरेस्ट और पूर्व में कंचनजंगा के बीच दक्षिण दिशा में प्रवाहित होती है। यहाँ इसकी घाटी बहुत गहरी व सँकरी है। आगे पश्चिम की ओर से ‘सुनकोसी’ और पूर्व से ‘तामुर कोसी’ नदियाँ इसमें आकर मिलती हैं।
- मैदान में प्रवेश: यहीं से यह कोसी के नाम से शिवालिक को पार कर मैदानी भाग में प्रवेश करती है और स्वयं का अपना ‘स्थल डेल्टा’ (जलोढ़ पंख) का निर्माण करती है।
- विशेषता व विलय: ‘कोसी’ को अत्यधिक ‘बाढ़’ व ‘मार्ग-परिवर्तन’ के कारण ‘बिहार का शोक’ कहा जाता है। यह मनिहारी से 32 कि.मी. पश्चिम में गंगा में मिल जाती है।
- विस्तार: यह 730 कि.मी. लम्बी है तथा इसका कुल अपवाह क्षेत्र 86,900 वर्ग कि.मी. है, जिसमें से 21,500 वर्ग कि.मी. भारत में स्थित है।
पठार से निकलने वाली गंगा की सहायक नदियाँ
यद्यपि, गंगा में जल मुख्यतः उन सहायक नदियों से आता है जिनका उद्गम स्थान हिमालय में है, किन्तु कुछ जल पठारी नदियों से भी प्राप्त होता है। ये चम्बल, बेतवा, काली सिंध, केन और सोन हैं।
क. चम्बल (पौराणिक नाम – चर्मावती/चर्मण्वती)
- उद्गम: यह नदी मध्य प्रदेश के मालवा पठार पर स्थित महु के निकट (616 मी.) ‘जनापाव पहाड़ी’ से निकलती है।
- प्रवाह व विलय: यह पहले उत्तर-पूर्व की ओर बहकर राजस्थान के झालावाड़, कोटा, बूँदी और धौलपुर जिलों में बहती है; फिर यह पूर्वी भाग में बहती हुई इटावा से पूर्व 38 कि.मी. दूर यमुना में मिलती है।
- चूलिया जलप्रपात: कोटा संभाग में भैंसरोड़गढ़ के निकट 18 मीटर की ऊँचाई से इसका जल ‘चूलिया’ झरने में गिरता है।
- बाँध व सहायक नदियाँ: कोल्हा (कोटला/कोय) के निकट इस पर ‘गांधी सागर बांध’ बनाया गया है। इसकी सहायक नदियाँ काली सिन्ध, सिवान, पार्वती और बनास हैं।
- विशेषताएँ: चम्बल ने अपरदन से ‘उत्खात’ भूमि क्षेत्र या बीहड़ (Ravines) बना रखे हैं। इसकी सम्पूर्ण लम्बाई 965 कि.मी. है। यह राजस्थान की एकमात्र सदावाहिनी नदी है।
ख. बेतवा या वेत्रवती
- उद्गम व प्रवाह: यह भोपाल के दक्षिण-पश्चिम से निकलकर उत्तर-पूर्वी दिशा में बहती हुई भोपाल, विदिशा, झाँसी, जालौन और हमीरपुर से प्रवाहित होती है। इसके ऊपरी भाग में कई झरने पाए जाते हैं।
- विलय: यह यमुना नदी में मिल जाती है।
- ऐतिहासिक नगर: साँची और विदिशा जैसे ऐतिहासिक नगर इसके किनारे अवस्थित हैं।
ग. सोन या स्वर्ण नदी
- उद्गम: इसका उद्गम ‘अमरकण्टक पठार’ (नर्मदा के उद्गम क्षेत्र के समीप) से होता है।
- सहायक नदियाँ: बनास, गोपद, रिहन्द, कन्हड़ और उत्तरी कोयल इसकी सहायक नदियाँ हैं।
- प्रवाह व विलय: यह विन्ध्य श्रेणी में कई जलप्रपात बनाते हुए बहती है। यह नदी मानेर से पश्चिम (बिहार) में गंगा में मिल जाती है।
- विशेषता: इसका गंगा से संगम निरंतर पश्चिम की ओर खिसकता जा रहा है।
- विस्तार: इसकी लम्बाई 780 कि.मी. और अपवाह क्षेत्र 71,900 वर्ग कि.मी. है।