NCERT Notes Class 6 science Chapter 9: Methods of Separation in Everyday Life के अंतर्गत ठोस पदार्थों को अलग करने वाली विधियों जैसे हस्तचयन (Handpicking), थ्रेशिंग, निष्पावन (Winnowing) और चालन (Sieving) से लेकर द्रव और अघुलनशील ठोस के मिश्रणों को पृथक करने वाली प्रक्रियाओं जैसे अवसादन (Sedimentation), निस्तारण (Decantation) और निस्यंदन (Filtration) के व्यावहारिक पहलुओं को समझाया गया है। इसके साथ ही, घुलनशील पदार्थों को अलग करने के लिए वाष्पन (Evaporation) और संघनन (Condensation) जैसी भौतिक प्रक्रियाओं के महत्व को भी समझाया गया है।
दैनिक जीवन में पृथक्करण की विधियाँ
दैनिक जीवन में किसी मिश्रण से उसके विभिन्न घटकों को अलग करने के लिए भौतिक गुणों (आकार, रंग, वजन) के अंतर के आधार पर निम्नलिखित प्राथमिक विधियों का उपयोग किया जाता है:
1. हस्तचयन (Handpicking)
- सिद्धांत: यह विधि घटकों के आकार (Size), रंग (Colour) और आकृति (Shape) में अंतर पर आधारित है।
- उपयुक्तता: इसका उपयोग तब किया जाता है जब अवांछित पदार्थ (जैसे गेहूं या चावल से पत्थर और भूसा) बहुत कम मात्रा में मौजूद हों और उन्हें हाथ से आसानी से उठाकर अलग किया जा सके।
2. थ्रेशिंग
- सिद्धांत: सूखे पौधों या डंठलों (Stalks) से दानों (Grains) को अलग करने की प्रक्रिया को थ्रेशिंग कहते हैं।
- पारंपरिक विधि: किसान फसल के डंठलों के बंडलों को धूप में सुखाकर उन्हें लकड़ी के बड़े लट्ठों (Wooden logs) पर पीटते हैं, जिससे दाने टूटकर अलग हो जाते हैं।

- आधुनिक थ्रेशर: यांत्रिक विकास के कारण अब मशीनों (Threshers) का उपयोग किया जाता है, जो डंठलों से अनाज को अलग करने के साथ-साथ थ्रेशिंग और ओसाई दोनों कार्य एक साथ संपन्न करती हैं।
3. निष्पावन या ओसाई
- सिद्धांत: हवा या फूंक मारकर मिश्रण के भारी (Heavier) और हल्के (Lighter) घटकों को अलग करने की विधि।
- पारंपरिक उपकरण: भारत में इसके लिए बांस से बनी ट्रे जिसे ‘सूप’ (Bamboo tray) कहते हैं, का प्रयोग किया जाता है।

- कार्यप्रणाली: किसान हवा चलने की दिशा में सूप से अनाज को नीचे गिराते हैं; जिससे भारी अनाज के दाने सीधे नीचे गिरकर ढेर बना लेते हैं और हल्का भूसा (Husk) हवा के बहाव में उड़कर दूर इकट्ठा हो जाता है।
4. चालन या छानना
- सिद्धांत: यह विधि ठोस-ठोस मिश्रण (Solid-solid mixture) के घटकों के कणों के आकार में अंतर पर काम करती है।
- कार्यप्रणाली: बारीक कण (जैसे मैदा या आटा) छलनी (Sieve) के छिद्रों से नीचे निकल जाते हैं, जबकि बड़े अवांछित कण (जैसे चोकर/Bran या छोटे पत्थर) छलनी के ऊपर ही रह जाते हैं।

- औद्योगिक अनुप्रयोग: इस विधि का उपयोग निर्माण स्थलों (Construction sites) पर बड़ी चलनियों द्वारा रेत से कंकड़-पत्थरों को अलग करने के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है।
भौतिक पृथक्करण विधियों का सारांश
| विधि (Method) | मुख्य पृथक्करण कारक | व्यावहारिक उदाहरण |
| हस्तचयन | रंग, रूप और आकार में बड़ा अंतर | पुलाव में से साबुत काली मिर्च को अलग करना। |
| थ्रेशिंग | यांत्रिक आघात (Beating) | गेहूं के सूखे डंठलों से दानों को अलग करना। |
| निष्पावन | घनत्व/वजन में अंतर (भारी बनाम हल्का) | गेहूं के दानों से हल्के भूसे को अलग करना। |
| चालन | कणों के भौतिक आकार (Particle Size) का अंतर | गेहूं के आटे से चोकर (Bran) को अलग करना। |
दैनिक जीवन में पृथक्करण की विधियाँ (भाग-2)
1. वाष्पीकरण द्वारा पुनरावृत्ति
- सिद्धांत: नमक के घोल को चाइना डिश में रखकर गर्म करने पर पानी पूरी तरह उबलकर भाप बन जाता है और तली में शुद्ध नमक ठोस अवशेष के रूप में वापस प्राप्त हो जाता है।
- सीमा: इस प्रक्रिया में केवल विलेय (नमक) वापस मिलता है, विलायक (पानी) भाप बनकर हवा में उड़ जाता है।
2. अवसादन और निस्तारण
- अवसादन (Sedimentation): किसी तरल में मौजूद भारी और अघुलनशील (Insoluble) घटकों के तली में नीचे बैठ जाने की प्राकृतिक प्रक्रिया को अवसादन कहते हैं (जैसे: चाय की पत्तियों का बर्तन के नीचे बैठना या चावल धोते समय मिट्टी का बैठना)।
- निस्तारण (Decantation): तली में बैठे हुए ठोस को बिना हिलाए, बर्तन को थोड़ा तिरछा करके ऊपर के साफ तरल (द्रव) को दूसरे बर्तन में धीरे से उड़ेलने की प्रक्रिया को निस्तारण कहते हैं।
- अनुप्रयोग व सीमा: चावल और दालों को धोते समय अशुद्धियों को हटाने में इसका प्रयोग होता है। यह पृथक्करण की पूर्णतः शुद्ध विधि नहीं है, क्योंकि निस्तारण के बाद भी तरल में कुछ सूक्ष्म अवांछित कण (जैसे चाय की कुछ पत्तियां) आ ही जाते हैं।
- अमिश्रणीय द्रव (Immiscible Liquids): तेल और पानी का मिश्रण (जो आपस में नहीं मिलते और अलग परत बनाते हैं) को अलग करने के लिए भी निस्तारण (Decantation) विधि का उपयोग किया जाता है।
3. निस्यंदन या छानना (Filtration)
- सिद्धांत: किसी तरल-ठोस मिश्रण को एक ऐसे छिद्रयुक्त माध्यम (Filter) से गुजारना जिसके छिद्रों का आकार ठोस कणों से छोटा हो, जिससे ठोस ऊपर रुक जाए और तरल बाहर निकल जाए।
- शब्दावली: छानने के बाद फिल्टर पर बचे ठोस पदार्थ को अवशेष और नीचे छनकर आए साफ द्रव को निस्यंद कहते हैं (जैसे: चाय की छलनी में रुकी पत्तियां ‘अवशेष’ हैं और कप में आई चाय ‘निस्यंद’ है)।
- फिल्टर के प्रकार व चयन: फिल्टर का चयन अवांछित कणों के आकार पर निर्भर करता है।
- कपड़ा: बुने हुए धागों के बीच के बारीक छिद्र फिल्टर का काम करते हैं (प्राचीन काल से प्रयुक्त)।
- फिल्टर पेपर: इसमें अत्यधिक सूक्ष्म और अदृश्य छिद्र होते हैं, जो गंदे/मिट्टी वाले पानी (Muddy water) से भी कीचड़ के बारीक कणों को अलग कर देते हैं।

- अन्य माध्यम: कपास (Cotton), चारकोल, और रेत (Sand) का उपयोग भी औद्योगिक जल फिल्टर में किया जाता है।
- इतिहास (चाय के बैग): शुरुआती चाय के बैग सिल्क (रेशम) के कपड़े से बनते थे क्योंकि यह गर्म पानी में भी मजबूत रहता था। बाद में मलमल और आधुनिक समय में फिल्टर पेपर का उपयोग होने लगा।
- व्यावहारिक सादृश्य: मछुआरों द्वारा नदी में डाला जाने वाला मछली पकड़ने का जाल (Mesh) भी निस्यंदन का एक रूप है, जहाँ पानी जाल से बाहर निकल जाता है और बड़ी मछलियाँ अंदर रुक जाती हैं।
4. मंथन या बिलोना
- सिद्धांत: यह अपकेंद्रण के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें घनत्व के अंतर का उपयोग किया जाता है।
- कार्यप्रणाली: दही या दूध को मथनी की सहायता से तीव्र गति से घुमाया जाता है।
- पृथक्करण: मथने पर कम घनत्व वाला हल्का मक्खन (Butter) सतह पर ऊपर तैरने लगता है, जबकि भारी छाछ (Buttermilk) नीचे ही शेष रह जाती है।
5. चुंबकीय पृथक्करण (Magnetic Separation)
- सिद्धांत: चुंबकीय (Magnetic) और अचुंबकीय (Non-magnetic) पदार्थों के मिश्रण को अलग करने के लिए चुंबक के आकर्षण गुण का उपयोग करना।
- चुंबकीय पदार्थ: वे पदार्थ जो चुंबक की ओर आकर्षित होते हैं, जैसे लोहा (Iron)।
- व्यावहारिक उदाहरण: लकड़ी के बुरादे में दुर्घटनावश गिरी लोहे की कीलों को चुंबक घुमाकर तुरंत अलग किया जा सकता है।
- औद्योगिक अनुप्रयोग (कचरा प्रबंधन): रीसाइक्लिंग उद्योगों में कचरे के बड़े ढेरों में से लोहे के कबाड़ (Scrap iron) को अलग करने के लिए क्रेन में शक्तिशाली इलेक्ट्रोमैग्नेट्स (विद्युत चुंबक) लगाए जाते हैं, ताकि लोहे को पुनः चक्रित (Recycle) किया जा सके।
उन्नत पृथक्करण विधियों का सारांश
| तकनीक | पृथक्करण का भौतिक आधार | मुख्य अनुप्रयोग |
| अवसादन व निस्तारण | गुरुत्वाकर्षण और अघुलनशील भारीपन | तेल और पानी को अलग करना; चावल धोना। |
| निस्यंदन (Filtration) | कणों का आकार बनाम फिल्टर के छिद्र | गंदे पानी से मिट्टी अलग करना; चाय छानना। |
| मंथन (Churning) | घनत्व का अंतर (हल्का बनाम भारी) | दही से मक्खन को अलग करना। |
| चुंबकीय पृथक्करण | चुंबकीय गुणों की उपस्थिति | कचरे के ढेर से लोहे के स्क्रैप को अलग करना। |
पर्यावरण संकट: प्लास्टिक प्रदूषण (Plastic Pollution)
- समस्या: नदियों और जल निकायों में अंधाधुंध फेंके जाने वाले प्लास्टिक बैग, टूटी बोतलें और खाद्य पदार्थों के रैपर जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर रहे हैं।
- जलीय जीवों पर प्रभाव: जलीय जीव (जैसे मछलियाँ) गलती से प्लास्टिक की वस्तुओं या स्ट्रॉ (Straws) को निगल लेते हैं, जो उनके श्वसन तंत्र और गले में फंस जाते हैं, जिससे उनकी तड़पकर मृत्यु हो जाती है।
- समाधान रणनीति: प्लास्टिक प्रदूषण को उसके स्रोत पर ही रोकना (Stop plastic pollution at source) अनिवार्य है। इसके लिए एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध और कचरे का वैज्ञानिक पृथक्करण (Magnetic separation आदि द्वारा) आवश्यक है।
समुद्र के पानी से नमक (Salt from Seawater)
- स्रोत: समुद्र का पानी विभिन्न लवणों (Salts) और पानी का एक जटिल प्राकृतिक मिश्रण है।
- पृथक्करण की विधि (Evaporation):
- समुद्र के पानी को उथले गड्ढों (Shallow pits) में भरकर छोड़ दिया जाता है।
- सूर्य के प्रकाश और हवा के प्रभाव से पानी पूरी तरह वाष्पीकृत (Evaporate) हो जाता है।
- पानी उड़ने के बाद गड्ढों के तल में ठोस लवणों का मिश्रण बच जाता है, जिसे बाद में शुद्धिकरण (Purification) प्रक्रिया द्वारा साधारण नमक (Common salt – NaCl) के रूप में प्राप्त किया जाता है।
- भौगोलिक तथ्य (Sambhar Lake): राजस्थान में स्थित सांभर झील भारत में अंतर्देशीय नमक उत्पादन (Inland salt production) का एक बहुत बड़ा और प्रमुख प्राकृतिक स्रोत है।

- दैनिक जीवन का प्रेक्षण: गर्मियों में गहरे रंग के सूती कपड़ों पर आने वाले सफेद धब्बे हमारे शरीर से निकलने वाले पसीने के पानी के उड़ जाने के बाद बचे हुए शारीरिक लवण (नमक) के कारण बनते हैं।
ऐतिहासिक जुड़ाव: नमक सत्याग्रह (Dandi March)
- ऐतिहासिक संदर्भ: महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार के दमनकारी नमक कानून (नमक उत्पादन पर सरकारी एकाधिकार और कर) के विरोध में 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम (अहमदाबाद, गुजरात) से अपनी प्रसिद्ध दांडी यात्रा शुरू की थी।
- महत्व: 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुंचकर गांधीजी ने प्राकृतिक नमक हाथ में उठाकर कानून तोड़ा, जिसने पूरे देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) की शुरुआत की। नमक को इसलिए चुना गया क्योंकि यह समाज के अमीर और गरीब दोनों वर्गों की बुनियादी जरूरत थी।