NCERT Notes Class 7 Social science (Geography) Chapter 4: New Beginnings Cities and States के अंतर्गत भारतीय इतिहास में गंगा घाटी के उपजाऊ मैदानों में ‘द्वितीय नगरीकरण’ का सूत्रपात हुआ। और किस प्रकार छोटे-छोटे ‘जनपद’ आपस में संगठित होकर शक्तिशाली ‘महाजनपद’ बने और कैसे मगध व वज्जि जैसे विशाल राज्यों का उदय हुआ। प्रारंभिक नगरों के स्वरूप, उनकी सुरक्षात्मक किलाबंदी, राजाओं द्वारा स्थाई सेनाओं के रख-रखाव, कर-संग्रह की नियमित व्यवस्था और आहत सिक्कों के प्रयोग से व्यापार में आई तेजी के कारणों को समजाया गया है। साथ ही, यह राजतंत्रात्मक राज्यों और वज्जि जैसे गणराज्यों की प्रशासनिक प्रणालियों के बीच के अंतर को भी विस्तार से समझाता है।
प्रथम शहरीकरण का पतन और द्वितीय शहरीकरण की शुरुआत
- प्रथम शहरीकरण का अंत: ईसा पूर्व दूसरी सहस्राब्दी के आरंभ (2000 ईसा पूर्व के बाद) में सिंधु/हड़प्पा/सिंधु-सरस्वती सभ्यता का पतन हो गया।
- शहरी जीवन का लोप: हड़प्पा की विशेषताएँ (शहरी संरचनाएँ, व्यापारिक बाजार, विशिष्ट पेशे, लिपि और उन्नत जल निकास प्रणाली) समाप्त हो गईं और लोग ग्रामीण जीवन शैली की ओर लौट आए।
- एक सहस्राब्दी का अंतराल: भारत में लगभग एक हजार साल (1000 वर्षों) तक बड़े पैमाने पर शहरी जीवन पूरी तरह अनुपस्थित रहा।
- द्वितीय शहरीकरण: प्रथम सहस्राब्दी ईसा पूर्व में गंगा के मैदानों और सिंधु बेसिन में शहरीकरण का एक नया, जीवंत दौर शुरू हुआ।
- ऐतिहासिक स्रोत: इस काल की जानकारी के दो मुख्य आधार हैं — (1) पुरातात्विक उत्खनन और (2) प्राचीन साहित्य (उत्तर-वैदिक, बौद्ध तथा जैन साहित्य)।
जनपद और महाजनपद
- जनपद का शाब्दिक अर्थ: यह एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है — “जहाँ लोग (जना) अपने कदम (पदा) रख चुके हैं” यानी जहाँ लोग बस गए हैं।
- उदय की प्रक्रिया: उत्तर भारत में कबीलों और समूहों ने एक निश्चित क्षेत्र से जुड़कर अपनी पहचान बनाई, जिसका नेतृत्व एक ‘राजा’ करता था।
- महाजनपदों का उदय: 8वीं और 7वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक छोटे जनपद आपस में मिलकर बड़े राजनीतिक क्षेत्र बन गए, जिन्हें ‘महाजनपद’ कहा गया।
- सोलह महाजनपद: प्राचीन ग्रंथों में मुख्य रूप से 16 महाजनपदों का उल्लेख मिलता है — जो उत्तर-पश्चिम में गांधार से लेकर पूर्व में अंग और मध्य भारत (गोदावरी नदी के पास) अश्मक तक फैले थे।
- गंगा के मैदानों में संकेन्द्रण के कारण:
- उपजाऊ गंगा के मैदानों में कृषि का तेजी से विकास।
- पहाड़ों और पहाड़ियों में लौह अयस्क (Iron Ore) की उपलब्धता।
- नए और विस्तृत व्यापारिक नेटवर्क का विस्तार।
- सबसे शक्तिशाली राज्य: मगध, कोसल, वत्सो और अवंती।

- महाजनपदों का गंगा घाटी के इर्द-गिर्द केंद्रित होना यह दर्शाता है कि कृषि की प्रचुरता, लोहे के औजारों की उपलब्धता और जलमार्गों ने बड़े राज्यों और शहरी केंद्रों के विकास की नींव रखी।
खाई (सुरक्षात्मक संरचना)
- परिभाषा: किसी किले या किलेबंद शहर के चारों ओर बनाई जाने वाली एक गहरी, चौड़ी खाई, जिसे रक्षात्मक दृष्टि से पानी से भरा जाता था।
- किलेबंदी की अन्य विशेषताएँ:
- शहर की सुरक्षा दीवारों (Ramparts) के प्रवेश द्वारों को जानबूझकर संकरा रखा जाता था।
- इससे पहरेदारों को शहर में प्रवेश करने वाले या बाहर जाने वाले लोगों और वस्तुओं पर कड़ा नियंत्रण रखने में मदद मिलती थी।
- ऐतिहासिक निरंतरता: यह आश्चर्यजनक है कि इनमें से अधिकांश प्राचीन राजधानियाँ आज भी ढाई हजार साल (2,500 वर्ष) बाद जीवंत शहरों के रूप में आबाद हैं।
प्रारंभिक लोकतांत्रिक परंपराएँ
- सभा और समिति: प्रत्येक जनपद में एक सभा या समिति होती थी। यहाँ कबीले के महत्वपूर्ण मामलों पर विचार-विमर्श किया जाता था।
- वैदिक जड़े: ‘सभा’ और ‘समिति’ शब्दों का सर्वप्रथम उल्लेख भारत के प्राचीनतम ग्रंथों, वेदों में मिलता है।
- सदस्यता: इन परिषदों के अधिकांश सदस्य आमतौर पर कबीले के वरिष्ठ/अनुभवी बुजुर्ग (Elders) होते थे।
- राजा पर नियंत्रण:
- राजा स्वतंत्र या स्वेच्छाचारी (Arbitrary) होकर शासन नहीं कर सकता था।
- एक योग्य राजा से उम्मीद की जाती थी कि वह मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा इन सभाओं की सलाह भी ले।
- कुछ प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, एक अयोग्य राजा को सभा द्वारा पद से हटाया भी जा सकता था।
राजतंत्र बनाम गणतंत्र
महाजनपदों ने जनपदों के राजनीतिक सिद्धांतों को और आगे बढ़ाया, जो मुख्य रूप से दो शासन प्रणालियों में बंटे थे:
| लक्षण/विशेषता | राजतंत्रात्मक महाजनपद | गण / संघ |
| सर्वोच्च सत्ता | राजा ही अंतिम निर्णयकर्ता था। | सभा/समिति के पास वास्तविक सत्ता थी। |
| पद का प्रकार | वंशानुगत (Hereditary – राजा का पुत्र ही राजा)। | चुनाव आधारित (Selected by assembly members)। |
| निर्णय प्रक्रिया | राजा मंत्रियों व बुजुर्गों की सलाह से निर्णय लेता था। | सामूहिक चर्चा और आवश्यकता पड़ने पर मतदान (Voting)। |
| प्रमुख कार्य | कर संग्रह, कानून व्यवस्था, सेना व किलेबंदी। | सामूहिक रक्षा, शासन और शासक का चुनाव। |
| उदाहरण | मगध (बिहार), कोसल (यूपी), अवंती (एमपी)। | वज्जि और मल्ल। |
विश्व के प्राचीनतम गणतंत्र
- वज्जि और मल्ल महाजनपद: इन राज्यों में शासन की अलग प्रणाली थी। इन्हें ‘गण’ या ‘संघ’ कहा जाता था।
- लोकतांत्रिक स्वरूप: इन सभाओं में महत्वपूर्ण निर्णय सर्वसम्मति, चर्चा या वोट के माध्यम से लिए जाते थे।
- वैश्विक महत्व: दुनिया भर के इतिहासकार इन्हें विश्व के सबसे शुरुआती गणतंत्रों (Early Republics) में से एक मानते हैं।
कुछ अन्य नवीन प्रयोग
- सामाजिक व सांस्कृतिक क्रांति: महाजनपद काल भारतीय सभ्यता में गहरे वैचारिक और सामाजिक परिवर्तनों का काल था।
- नए विचारों का प्रसार:
- उत्तर-वैदिक, बौद्ध और जैन दर्शन का उदय हुआ।
- भिक्षुओं, भिक्षुणियों, विद्वानों और तीर्थयात्रियों के माध्यम से साहित्य व शिक्षाओं का अखिल भारतीय प्रसार हुआ।
- भारतीय कला का पुनरुद्धार हुआ, जो आगे चलकर साम्राज्यवादी काल में पूर्ण रूप से विकसित हुई।
लोहे की धातुकर्म तकनीक
- प्रथम बनाम द्वितीय शहरीकरण:
- हड़प्पा (प्रथम शहरीकरण): ताँबा (Copper) और काँसा (Bronze) आधारित तकनीक।
- महाजनपद (द्वितीय शहरीकरण): लोहा धातुकर्म (Iron Metallurgy) आधारित क्रांति।
- समय व विकासक्रम:
- भारत के कई क्षेत्रों में ईसा पूर्व दूसरी सहस्राब्दी के प्रारंभ से ही लोहा निष्कर्षण व घड़ाई की तकनीक विकसित होने लगी थी।
- ईसा पूर्व दूसरी सहस्राब्दी के अंत तक लोहे के औजार दैनिक जीवन में व्यापक रूप से इस्तेमाल होने लगे।
- कृषि व युद्ध पर प्रभाव:
- बड़े पैमाने पर वनों की कटाई और गहन कृषि संभव हुई।
- काँसे की तुलना में हल्के और तीखे हथियार (तलवारें, भाले, तीर, ढाल) बने।
- सैन्य अभियानों और गठबंधनों ने नए राज्यों और बड़े साम्राज्यों के गठन का मार्ग प्रशस्त किया।
भारत में आहत सिक्के
- व्यापारिक आवश्यकता: बढ़ते क्षेत्रीय व विदेशी व्यापार ने मुद्रा प्रणाली की मांग की।
- पंच-मार्क सिक्के:
- भारत के प्राचीनतम सिक्के मुख्यतः चाँदी (Silver) के बने थे।
- धातु पर प्रतीक या चिन्ह ‘पंच’ (थप्पा मार कर) अंकित किए जाते थे।

- कालांतर में ताँबे, सोने और अन्य धातुओं के सिक्के भी बनाए जाने लगे।
- सिक्कों का प्रचलन: सामान्यतः प्रत्येक महाजनपद अपने सिक्के जारी करता था, परंतु व्यापार में पड़ोसी राज्यों के सिक्के भी स्वीकार किए जाते थे।
वर्ण-जाति व्यवस्था
- सभ्यता और सामाजिक जटिलता: जैसे-जैसे मानव सभ्यताएँ विकसित हुईं, शासन, धर्म, शिक्षा, व्यापार, कृषि और शिल्प जैसे कार्यों के आधार पर समाज विभिन्न समूहों में विभाजित होता गया।
- समानता बनाम असमानता: आदर्श समाज में ये समूह एक-दूसरे के पूरक होते हैं। व्यावहारिक रूप से इससे असमानता जन्म लेती है, जहाँ कुछ समूह अधिक धन, शक्ति और प्रभाव हासिल कर लेते हैं।
जाति और वर्ण की द्वैत संरचना
भारतीय समाज दो-स्तरीय संरचना पर आधारित था:
- जाति:
- आधार: विशिष्ट पेशेवर व्यवसाय (Occupation) और आजीविका से जुड़ा समूह।
- कौशल का हस्तांतरण: कृषि, धातुकर्म या शिल्प जैसे कौशल एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होते थे।
- उप-जातियाँ: जातियाँ आगे चलकर उप-जातियों में विभाजित हुईं, जिनके विवाह, खान-पान और रीति-रिवाजों के अपने अलग नियम बने।
- वर्ण:
- उद्गम: वैदिक ग्रंथों से उत्पन्न अवधारणा।
- चार वर्ण और उनके कार्य:
- ब्राह्मण: ज्ञान का संरक्षण/प्रसार और धार्मिक अनुष्ठान।
- क्षत्रिय: समाज व क्षेत्र की रक्षा और युद्ध संचालन।
- वैश्य: व्यापार, वाणिज्य और कृषि के माध्यम से धन का सृजन।
- शूद्र: शिल्पकार, कारीगर, श्रमिक और सेवादार।
‘Caste’ शब्द की उत्पत्ति
- मूल शब्द: अंग्रेजी शब्द ‘Caste’ पुर्तगाली शब्द ‘Casta’ से आया है।
- ऐतिहासिक संदर्भ: 16वीं शताब्दी में भारत आए पुर्तगाली यात्रियों ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था को समझने के लिए इस शब्द का प्रयोग किया था।
- विद्वानों का मत: कुछ विद्वान इसे ‘वर्ण’, अधिकांश ‘जाति’, जबकि अन्य इसे पूरी ‘वर्ण-जाति व्यवस्था’ के लिए संदर्भित करते हैं।
गतिशीलता, कठोरता और औपनिवेशिक प्रभाव
- प्रारंभिक गतिशीलता (Early Flexibility):
- ग्रंथों और अभिलेखों से स्पष्ट है कि शुरुआती दौर में व्यक्ति और समुदाय आवश्यकतानुसार अपना व्यवसाय बदल सकते थे।
- सूखा या प्राकृतिक आपदा आने पर किसान शहरों में जाकर नए काम अपनाते थे। कुछ ब्राह्मणों द्वारा व्यापार या सैन्य गतिविधियाँ अपनाने के प्रमाण भी मिलते हैं।
- सामाजिक स्थिरता: इस प्रणाली ने गतिविधियों और अर्थव्यवस्था को संगठित कर भारतीय समाज को एक शुरुआती ढाँचा व स्थिरता प्रदान की।
- कठोरता का विकास: समय के साथ यह व्यवस्था जटिल और कठोर होती गई, जिससे निचली जातियों के प्रति असमानता व भेदभाव बढ़ा।
- ब्रिटिश काल का प्रभाव: विद्वानों में सर्वसम्मति है कि यह प्रणाली शुरुआती दौर में काफी लचीली थी। ब्रिटिश शासन के दौरान प्रशासनिक वर्गीकरण के कारण यह अधिक कठोर और स्पष्ट रूप से विभाजित हो गई।
वर्ण बनाम जाति
| पहलू | वर्ण | जाति |
| उत्पत्ति | वैदिक शास्त्रीय अवधारणा | सामाजिक-आर्थिक और व्यावसायिक विकास |
| संख्या | केवल 4 स्थिर श्रेणियां | हजारों स्थानीय जातियां व उप-जातियां |
| मुख्य आधार | कार्य/गुण पर आधारित विभाजन | व्यावसायिक कौशल, स्थानीय रीति-रिवाज व विवाह |
| लचीलापन | प्राचीन काल में परिवर्तनशील | समय के साथ अत्यंत कठोर और वंशानुगत |
भारत के अन्य भागों में विकास
- सड़क एवं संचार मार्ग: 1st millennium BCE में व्यापार, तीर्थयात्रा और सैन्य अभियानों के लिए प्रमुख संपर्क मार्ग विकसित हुए।
प्रमुख व्यापारिक मार्ग
- उत्तरापथ:
- विस्तार: उत्तर-पश्चिम भारत को गंगा के मैदानों से होते हुए पूर्वी भारत तक जोड़ता था।
- दक्षिणापथ:
- आरंभ बिंदु: कौशाम्बी (प्रयागराज के पास – वत्स महाजनपद की तत्कालीन राजधानी)।
- विस्तार: विंध्य पर्वत शृंखला को पार करते हुए सुदूर दक्षिण तक जाता था।
- तटीय बंदरगाह: पार्श्व सड़कों (Lateral Roads) ने आंतरिक भागों को पूर्वी व पश्चिमी तट के व्यापारिक बंदरगाहों से जोड़ा।
शिशुपालगढ़
- अवस्थिति: ओडिशा (वर्तमान भुवनेश्वर का उपनगर)। प्रथम उत्खनन 1948 में।
- ऐतिहासिक महत्व: प्राचीन कलिंग क्षेत्र की राजधानी।
- नगर योजना व वास्तुकला:
- सख्त वर्गाकार योजना।
- चौड़ी सड़कें और विशाल किलेबंदी।
- सुरक्षा के लिए जल से भरी खाई (Moat) और नियंत्रण हेतु संकरे प्रवेश द्वार (Narrow Gateways)।
सुदूर दक्षिण के राज्य व पुरातात्विक केंद्र
- शहरीकरण की शुरुआत: दक्षिण भारत में लगभग 400 BCE से नगर उभरने लगे (नवीनतम उत्खनन व्यापारिक गतिविधियों को और पुराना बताते हैं)।
- तीन प्रमुख राजवंश: चोल, चेर और पांड्य का उदय।
- साहित्यिक साक्ष्य: प्राचीनतम तमिल साहित्य (संगम साहित्य) में इन राजाओं व राज्यों का उल्लेख है।
- कोडुमनाल:
- स्थान: ईरोड (तमिलनाडु) के पास।

- महत्व: शंख (Shell) और बहुमूल्य पत्थरों (Gemstones) के निर्माण व प्रसंस्करण का प्रमुख औद्योगिक केंद्र।
संसाधन, समुद्री व्यापार व वैश्विक जुड़ाव
- दक्षिण के मुख्य संसाधन: सोना (Gold), मसाले (Spices), और कीमती व अर्द्ध-कीमती पत्थर (Precious Stones)।
- व्यापारिक विस्तार: शेष भारत के साथ-साथ विदेशी साम्राज्यों के साथ लाभदायक समुद्री व्यापार।
- अखिल भारतीय एकीकरण (300–200 BCE):
- उत्तर-पूर्व सहित पूरा उपमहाद्वीप एक अंतर-संबद्ध (Interconnected) नेटवर्क में बदल गया।
- वस्तुओं और संस्कृति का प्रवाह मध्य एशिया (Central Asia) और दक्षिण-पूर्व एशिया (Southeast Asia) तक हुआ।
- महाजनपदों का अंत: 300-200 BCE तक महाजनपद काल समाप्त हुआ और एकीकृत साम्राज्यों के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ।

मुख्य पुरातात्विक स्थल व व्यापारिक मार्ग
| स्थल / मार्ग | भौगोलिक स्थिति | मुख्य पहचान व विशेषताएं | प्रासंगिकता |
| उत्तरापथ | उत्तर-पश्चिम से पूर्वी भारत | गंगा घाटी को जोड़ने वाला मुख्य व्यापारिक मार्ग | प्राचीन व्यापार मार्ग |
| दक्षिणापथ | कौशाम्बी से दक्षिण भारत | विंध्याचल पार कर दक्षिण जाने वाला मुख्य मार्ग | प्राचीन व्यापार मार्ग |
| शिशुपालगढ़ | भुवनेश्वर, ओडिशा | कलिंग की राजधानी, वर्गाकार लेआउट व किलेबंदी | प्राचीन नगर नियोजन |