NCERT Notes Class 7 Social science (Geography) Chapter 7: The Gupta Era: An Age of Tireless Creativity के अंतर्गत गुप्त काल के दौरान पनपी सांस्कृतिक और बौद्धिक क्रांति को विस्तार से समजाता है।तथा कालिदास जैसे महान साहित्यकारों की संस्कृत कृतियों, आर्यभट्ट और वराहमिहिर जैसे विद्वानों के गणित व खगोलशास्त्र में क्रांतिकारी योगदान, तथा अजंता की गुफा चित्रकारी व देवगढ़ के दशावतार मंदिर जैसी स्थापत्य कला की उत्कृष्ट कृतियों का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। और धातु विज्ञान (जैसे मेहरौली का लौह स्तंभ), चिकित्सा विज्ञान (चरक और सुश्रुत की परंपरा) और नालंदा जैसे महान अंतरराष्ट्रीय शिक्षण संस्थानों के विकास के पीछे छिपे वैज्ञानिक दृष्टिकोण और राजकीय संरक्षण के महत्व को भी स्पष्ट करता है।
गुप्त काल: अथक सृजनशीलता का युग
- कालखण्ड: तीसरी से छठी शताब्दी ईस्वी (3rd to 6th century CE)।
- साम्राज्य स्थिति: इस काल का सबसे शक्तिशाली और समृद्ध साम्राज्य।
- राजधानी: पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना)।
समकालीन राज्य और साम्राज्य (3rd to 6th Century CE)
- वाकाटक राज्य:
- क्षेत्र: उपमहाद्वीप का मध्य भाग।
- राजधानी: नंदीवर्धन (आधुनिक नागपुर के पास)।
- कामरूप राज्य:
- क्षेत्र: आधुनिक असम के विभिन्न हिस्से।
- महत्व: उत्तर-पूर्व भारत की एक प्रमुख और महत्वपूर्ण शक्ति।

- पल्लव राज्य:
- उत्थान: सातवाहन वंश के पतन के बाद उदय।
- राजधानी: कांचीपुरम।
- शासन काल: 9वीं शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध तक।
मेहरौली का लौह स्तंभ (Delhi)
- स्थान: मेहरौली (दिल्ली)।
- काल व शासक: चंद्रगुप्त द्वितीय (चंद्रगुप्त ‘विक्रमादित्य’) के शासनकाल में निर्मित।
- आयु व वजन: 1,600 वर्ष से अधिक प्राचीन और लगभग 6 टन वजनी।
- मूल स्थान: प्रारंभ में उदयगिरि गुफाओं (मध्य प्रदेश) के सामने स्थापित, बाद में दिल्ली लाया गया।
- धार्मिक समर्पण: भगवान विष्णु को समर्पित (विष्णुध्वज)।
- अभिलेख: स्तंभ पर राजा की विजयों और उपलब्धियों का वर्णन अंकित है।
प्राचीन भारतीय धातु विज्ञान
- जंग-रोधी विशेषता: 1,600 से अधिक वर्षों से खुले आसमान के नीचे रहने के बावजूद इस पर जंग नहीं लगा है।
- धातु विज्ञान का उत्कृष्ट साक्ष्य: यह प्राचीन भारत के उन्नत धातु विज्ञान (Metallurgical skills) की श्रेष्ठता को सिद्ध करता है।
- वैज्ञानिक कारण: विशेष प्रकार के लोहे और हवा की ऑक्सीजन के बीच रासायनिक प्रतिक्रिया से सतह पर एक सूक्ष्म सुरक्षात्मक परत बनती है, जो इसे क्षरण (Corrosion) से बचाती है।
एक नई शक्ति का उदय (A New Power Emerges)
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 3री शताब्दी ईस्वी में उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत में कुषाण साम्राज्य कमजोर पड़ा। इसके पतन से उत्पन्न शून्य में गुप्त साम्राज्य का उदय हुआ।
- उत्पत्ति: गुप्तों का उदय आधुनिक उत्तर प्रदेश के निकटवर्ती क्षेत्रों में क्षेत्रीय शासकों के रूप में माना जाता है।
- सांस्कृतिक विकास: कला, स्थापत्य, साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति। विशेषकर चंद्रगुप्त द्वितीय के काल में यह विकास चरमोत्कर्ष पर पहुँचा।
- दिल्ली लौह स्तंभ: इस पर अंकित ‘चंद्र’ नाम का संबंध चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) से है।
- धार्मिक झुकाव: चंद्रगुप्त द्वितीय विष्णु के उपासक थे। उनके अभिलेखों पर विष्णु का वाहन गरुड़ अंकित मिलता है।
चंद्रगुप्त प्रथम एवं गुप्त साम्राज्य की नींव
- नामकरण परंपरा: चंद्रगुप्त प्रथम, चंद्रगुप्त द्वितीय के दादा थे। (पारिवारिक नामकरण परंपरा का प्राचीन प्रमाण)।
- साम्राज्य विस्तार: चंद्रगुप्त प्रथम ने प्रारंभिक गुप्त साम्राज्य के सुदृढ़ीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- सिक्के और विवाह संबंध: चंद्रगुप्त प्रथम ने रानी कुमारदेवी के साथ चित्र वाले प्रसिद्ध स्वर्ण सिक्के जारी किए।
- सिक्कों की विशेषताएं:
- अग्र भाग: राजा चंद्रगुप्त प्रथम और रानी कुमारदेवी।
- पृष्ठ भाग: सिंहासनासीन देवी लक्ष्मी का अंकन।
योद्धा शासक (समुद्रगुप्त)
- प्रयाग प्रशस्ति:
- स्थान: प्रयागराज।
- रचयिता: समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण।
- विषय: चंद्रगुप्त द्वितीय के पिता समुद्रगुप्त की विजयों और उपलब्धियों का वर्णन।
- महत्वाकांक्षा: हरिषेण के अनुसार समुद्रगुप्त का लक्ष्य ‘धरणिवंध’ अर्थात ‘संपूर्ण पृथ्वी को बांधना/एकछत्र शासन स्थापित करना’ था।
- साम्राज्य नीतियाँ:
- युद्धों में अनेक राजाओं को पराजित कर उनके राज्यों को मिलाया।
- कई पराजित राजाओं को पुनः गद्दी सौंप दी गई, जो बदले में गुप्त साम्राज्य को वार्षिक कर (Tribute) देते थे।

- कला और संगीत प्रेमी:
- समुद्रगुप्त ने कला, शिक्षा और व्यापार को संरक्षण प्रदान किया।
- सिक्कों पर अंकन: एक प्रसिद्ध सिक्के पर समुद्रगुप्त को वीणा बजाते हुए दर्शाया गया है (पृष्ठ भाग पर देवी लक्ष्मी)।
अश्वमेध यज्ञ और साहित्यिक साक्ष्य
- अश्वमेध यज्ञ: साम्राज्य विस्तार की पुष्टि और अपनी संप्रभुता स्थापित करने हेतु राजा यह यज्ञ करते थे।
- विशेष सिक्के: अश्वमेध यज्ञ की स्मृति में सिक्के जारी किए गए।
- अग्र भाग: बलि का घोड़ा (Sacrificial horse)।
- पृष्ठ भाग: चँवर (Fly whisk) लिए रानी।
- विष्णु पुराण का उल्लेख: गुप्तों के प्रारंभिक मुख्य क्षेत्रों को चिह्नित करता है—
- अनुगंगा: मध्य गंगा बेसिन।
- प्रयाग: वर्तमान प्रयागराज।
- साकेत: अयोध्या।
- मगध: आधुनिक बिहार।
- साम्राज्य का चर्मोत्कर्ष: गुप्त साम्राज्य उत्तर, पश्चिम, मध्य और पूर्वी भारत के विशाल भू-भाग तक फैला हुआ था।
मुख्य गुप्त शासक एवं उनके साक्ष्य
| शासक | प्रमुख उपलब्धि / उपाधि | मुख्य ऐतिहासिक स्रोत |
| चंद्रगुप्त प्रथम | गुप्त साम्राज्य की नींव, वैवाहिक नीतियां | कुमारदेवी प्रकार के स्वर्ण सिक्के (लक्ष्मी अंकन) |
| समुद्रगुप्त | ‘धरणिवंध’ (पृथ्वी विजेता), कला प्रेमी | प्रयाग प्रशस्ति (हरिषेण), वीणा वादक सिक्के, अश्वमेध सिक्के |
| चंद्रगुप्त द्वितीय | ‘विक्रमादित्य’, कला व विज्ञान का स्वर्णकाल | दिल्ली का मेहरौली लौह स्तंभ, गरुड़ अभिलेख |
गुप्तकालीन भारतीय समाज: एक यात्री का विवरण
- यात्री का परिचय: चीनी बौद्ध भिक्षु और यात्री फ़ाहियान।
- भारत आगमन काल: 5वीं शताब्दी ईस्वी की शुरुआत (399–414 CE) में चंद्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ के शासनकाल के दौरान।
- यात्रा का मुख्य उद्देश्य:
- पवित्र बौद्ध स्थलों के दर्शन करना।
- भारतीय विद्वानों से ज्ञान प्राप्त करना।
- बौद्ध धर्मग्रंथों की पांडुलिपियों को एकत्र कर चीन ले जाना।
- ऐतिहासिक स्रोत: उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘ए रिकॉर्ड ऑफ बुद्धिस्टिक किंगडेम्स’ आज भी गुप्तकालीन भारत का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करती है।
फ़ाहियान के अनुसार गुप्तकालीन समाज एवं शासन
- प्रशासन व जीवन:
- प्रजा खुशहाल और जनसंख्या समृद्ध थी।
- लोगों पर कड़े सरकारी नियम, घर-घर पंजीकरण या अधिकारियों का अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं था।
- राजकीय भूमि पर खेती करने वाले किसान अपनी उपज का एक भाग कर (Tax) के रूप में देते थे।
- राजा के अंगरक्षकों और कर्मचारियों को नियमित वेतन मिलता था।
- आर्थिक समृद्धि एवं नगर:
- मध्य देश (गंगा के मैदान) के नगर बहुत बड़े और समृद्ध थे।
- नगरों की गलियाँ व्यवस्थित और साफ-सुथरी रखी जाती थीं।
- समृद्ध वैश्य (व्यापारी) और विदेशी व्यापारी सुंदर मकानों में रहते थे।
- कल्याणकारी व्यवस्थाएं (Welfare System):
- वैश्य प्रमुखों ने दान-पुण्य और औषधालयों (Charity houses & Dispensaries) की स्थापना की।
- गरीबों, अनाथों और रोगियों के लिए मुफ्त भोजन, चिकित्सा और दवाओं की उचित व्यवस्था थी।
चंडालों की स्थिति और सामाजिक विषमता
- सामाजिक बहिष्कार: अपने यात्रा वृत्तांत के अन्य भागों में फ़ाहियान ने चंडालों के साथ होने वाले कठोर और अमानवीय व्यवहार का उल्लेख किया है।
- आउटकास्ट: चंडालों को वर्ण व्यवस्था से बाहर माना जाता था और उन्हें नगर की सीमाओं से बाहर रहने पर मजबूर किया जाता था।
- ऐतिहासिक अंतर्दृष्टि (Historian’s Perspective):
- फ़ाहियान का विवरण केवल एक पक्ष दिखाता है; संपूर्ण समाज को समझने के लिए बहु-आयामी स्रोतों की आवश्यकता होती है।
- गुप्त काल केवल समृद्धि का काल नहीं था, बल्कि इसमें सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता की जड़ें भी गहरी थीं।
फ़ाहियान का यात्रा वृत्तांत:
| विषय | फ़ाहियान द्वारा दर्ज मुख्य तथ्य |
| भ्रमण काल | 399–414 CE (चंद्रगुप्त द्वितीय का काल) |
| प्रशासनिक कर | केवल राजकीय भूमि की उपज पर हिस्सा |
| सामाजिक कल्याण | वैश्यों द्वारा मुफ्त अस्पताल, अनाथालय व भोजन वितरण |
| सामाजिक अंधकार | चंडालों का नगर से बाहर निष्कासन व कठोर सामाजिक स्थिति |
गुप्त साम्राज्य की झलकियाँ (Glimpses of the Gupta Empire)
शासन एवं प्रशासन (Governance and administration)
- राजशास्त्र का सिद्धांत: कौटिल्य के सप्तांग सिद्धांत के तहत ‘मित्र’ (alliances) बनाने की सलाह का पालन।
- साम्राज्य विस्तार की रणनीतियाँ: सैन्य विजय, कूटनीति और विवाह संबंधों का त्रिस्तरीय प्रयोग।
- प्रशासनिक विकेंद्रीकरण: संपूर्ण नियंत्रण केंद्र में रखने के बजाय साम्राज्य को प्रांतों में बाँटा गया।
- भूमि अनुदान (Land Grants): स्थानीय शासकों, पुरोहितों और सामंतों को भूमि दान दी गई। इसके रिकॉर्ड ताम्रपत्रों (Copper plates) पर दर्ज किए जाते थे।
नए राजा … नई उपाधियाँ
- उच्च उपाधियाँ: गुप्त शासकों ने ‘महाराजाधिराज’, ‘सम्राट’ और ‘चक्रवर्ती’ जैसी विशाल उपाधियाँ धारण कीं।
- तुलना: यह मौर्योत्तर या पूर्ववर्ती शासकों की साधारण उपाधियों (‘राजन’, ‘महाराजा’) से उनकी सर्वोच्च संप्रभुता को अलग दर्शाती थी।
- प्रभावती गुप्त और वैवाहिक संबंध:
- चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह दक्षिणी पड़ोसी राज्य वाकाटक के राजकुमार से हुआ।
- पति की असामयिक मृत्यु के बाद उन्होंने संरक्षक शासिका (Regency) के रूप में सफलतापूर्वक शासन संभाला।
- उन्होंने गुप्त-वाकाटक संबंधों को सुदृढ़ रखा और अभिलेखों में स्वयं को ‘दो राजाओं की माता’ कहा।
- धार्मिक व स्थापत्य योगदान:
- अपने पिता की तरह विष्णु भक्त होने के कारण प्रभावती गुप्त ने रामगिरि (रामटेक पहाड़ी, महाराष्ट्र) में भगवान विष्णु को समर्पित मंदिरों का निर्माण कराया।
- उदाहरण: केवल नृसिंह मंदिर।
समृद्ध व्यापार
- राजस्व के स्रोत: मुख्य आधार भू-राजस्व (Land Tax) था। अन्य स्रोतों में जुर्माना, खानों पर कर, सिंचाई, व्यापार और शिल्प कर शामिल थे।
- राजस्व का उपयोग: सेना के रखरखाव, मंदिर निर्माण, बुनियादी ढाँचे और विद्वानों/कलाकारों के संरक्षण में।
- व्यापारिक नेटवर्क: भूमध्यसागरीय दुनिया (Mediterranean World), दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन के साथ व्यापार।
- प्रमुख निर्यात वस्तुएं: वस्त्र (Textiles), मसाले, हाथीदांत और बहुमूल्य रत्न।
- सोकोत्रा द्वीप का महत्व:
- अरब सागर में रणनीतिक रूप से स्थित द्वीप।
- यहाँ से ब्राह्मी लिपि के शिलालेख, मिट्टी के बर्तन और बौद्ध स्तूप के चित्र मिले हैं।
- यह द्वीप भारतीय व्यापारियों की दीर्घकालिक उपस्थिति और हिंद महासागर में सांस्कृतिक आदान-प्रदान का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
गुप्त प्रशासन व व्यापार:
| क्षेत्र | मुख्य विवरण / साक्ष्य |
| प्रशासनिक दस्तावेज़ | ताम्रपत्र पर दर्ज भूमि अनुदान |
| कूटनीतिक संबंध | प्रभावती गुप्त का वाकाटक राजवंश में विवाह |
| शाही उपाधियाँ | महाराजाधिराज, सम्राट, चक्रवर्ती |
| अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक केंद्र | सोकोत्रा द्वीप (अरब सागर) – ब्राह्मी अभिलेख व बौद्ध साक्ष्य |
नवीन विचारों और उपलब्धियों का युग (New Ideas and Wonders: The Classical Age)
- धार्मिक दृष्टिकोण: गुप्त शासक वैष्णव धर्म के अनुयायी थे। उन्होंने बौद्ध संस्थानों जैसे नालंदा विश्वविद्यालय और बौद्ध विहारों को भी उदार संरक्षण दिया।
- शास्त्रीय युग: दीर्घकालीन शांति और राजनीतिक स्थिरता के कारण इसे भारत का ‘शास्त्रीय युग’ कहा जाता है।
- ज्ञान का संकलन: पूर्ववर्ती ज्ञान का संकलन हुआ। साहित्य, गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा और धातु विज्ञान (जैसे मेहरौली का लौह स्तंभ) में ऐतिहासिक प्रगति हुई।
- विद्वानों का आश्रय: चंद्रगुप्त द्वितीय का दरबार विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों, कवियों और कलाकारों से सुशोभित था।
आर्यभट्ट
- स्थान व काल: कुसुमपुर (आधुनिक पटना के पास) में लगभग 500 CE के समय कार्यरत।
- प्रमुख ग्रंथ: ‘आर्यभटीय’—गणित और खगोलशास्त्र का संक्षिप्त व महत्वपूर्ण ग्रंथ।

- प्रमुख खगोलीय खोजें:
- पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, जिससे दिन और रात होते हैं।
- सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की गति की गणना के सूत्र दिए।
- एक वर्ष की अवधि 365 दिन, 6 घंटे, 12 मिनट और 30 सेकंड बताई (आधुनिक मान से केवल कुछ मिनट का अंतर)।
- सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण का सटीक वैज्ञानिक कारण बताया।
- गणितीय योगदान: समीकरणों (equations) को हल करने और गणना की तकनीकों का सूत्रीकरण किया।
वराहमिहिर
- स्थान व क्षेत्र: उज्जैनी (उज्जैन) के प्रसिद्ध गणितज्ञ, खगोलशास्त्री और ज्योतिषी।
- प्रमुख ग्रंथ: ‘बृहत्संहिता’—विश्वकोशीय (encyclopedic) ग्रंथ।
- विषय-वस्तु: खगोलशास्त्र, ज्योतिष, मौसम का पूर्वानुमान, वास्तुकला, नगर नियोजन और कृषि।
- पद्धति: पारंपरिक ज्ञान के साथ तार्किक चिंतन और प्रत्यक्ष अवलोकन का अनूठा समन्वय।
कालिदास
- साहित्यिक स्थान: संस्कृत साहित्य के महानतम कवि और नाटककार।
- प्रमुख कृति: ‘मेघदूतम्’ (The Cloud Messenger)।
- विषय-वस्तु: निष्कासित यक्ष द्वारा बादलों के माध्यम से अपनी प्रेयसी को संदेश भेजने की कथा।
- विशेषता: इसमें प्रेम की भावनाओं के साथ-साथ उत्तर भारत के परिदृश्यों (landscapes) और मौसम का सजीव व विस्तृत वर्णन है।
आयुर्वेद का संकलन
- संहिताबद्धीकरण (Codification): गुप्त काल में प्राचीन आयुर्वेदिक ज्ञान को व्यवस्थित रूप से संकलित किया गया।
- प्रमुख ग्रंथ: चरक संहिता और सुश्रुत संहिता को अंतिम रूप दिया गया।
- मुख्य विषय: रोगों का वर्गीकरण, निदान, उपचार, आहार का महत्व, औषधियों का निर्माण और उन्नत शल्य चिकित्सा (surgical techniques)।
- मूल दर्शन: समग्र स्वास्थ्य (holistic healing) तथा मन, शरीर और प्रकृति के बीच संतुलन।
गुप्तकालीन महान विभूतियाँ:
| विद्वान | क्षेत्र | प्रमुख ग्रंथ / उपलब्धि |
| आर्यभट्ट | गणित व खगोलशास्त्र | आर्यभटीय, पृथ्वी का घूर्णन, ग्रहण का वैज्ञानिक कारण |
| वराहमिहिर | खगोलशास्त्र व ज्ञान-विज्ञान | बृहत्संहिता (मौसम, कृषि, वास्तुकला) |
| कालिदास | संस्कृत साहित्य | मेघदूतम् (काव्य सौंदर्य व भौगोलिक विवरण) |
| चरक/सुश्रुत | आयुर्वेद व शल्य चिकित्सा | चरक संहिता एवं सुश्रुत संहिता का अंतिम संकलन |
सौंदर्य की खोज (The Quest for Beauty)
- कला का वातावरण: गुप्त शासकों ने ऐसा माहौल बनाया जहाँ शिल्प कला समृद्ध हुई और उच्च सौंदर्य मानक (Aesthetic standards) स्थापित हुए।
- सारनाथ (उत्तर प्रदेश): बुद्ध की उत्कृष्ट मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध कला केंद्र बना।
- अजंता गुफाएँ (महाराष्ट्र): गुप्त और वाकाटक शासकों के संयुक्त संरक्षण में गुफाओं को तराशा गया।
- स्थापत्य: मेहराबदार छतें (Arched roofs) जो लकड़ी की बीम की नकल करती हैं, और स्तूप के साथ seated बुद्ध की आकृतियाँ।
- चित्रकला: बोधिसत्व पद्मपाणि का प्रसिद्ध चित्र यहीं से मिलता है।
- उदयगिरि गुफाएँ (मध्य प्रदेश): चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाएँ और हिंदू देवी-देवताओं की नक्काशी।
- अहिच्छत्र टेराकोटा मूर्तियाँ (उत्तर प्रदेश): पवित्र नदियों गंगा और यमुना का अंकन।
- गंगा: मकर (Crocodile) पर सवार।
- यमुना: कछुए (Tortoise) पर सवार।
- देवगढ़ (उत्तर प्रदेश): दशावतार मंदिर, जहाँ शेषनाग पर शयनरत भगवान विष्णु का प्रसिद्ध मूर्तिकल्प स्थित है।
गुप्त साम्राज्य का पतन (The Decline of the Guptas)
- समय काल: 6वीं शताब्दी ईस्वी में पतन शुरू हुआ।
- हूण आक्रमण: मध्य एशिया की बर्बर हूण जनजाति के बारंबार आक्रमणों ने साम्राज्य की शक्ति तोड़ दी।
- आंतरिक कारण: कमजोर उत्तरवर्ती गुप्त शासक और शक्तिशाली क्षेत्रीय सामंतों का उदय, जिससे आंतरिक संघर्ष बढ़ा।
इसी बीच दक्षिण और उत्तर-पूर्व में
1. दक्षिण भारत: पल्लव राजवंश
- उत्थान: सातवाहनों के पतन के बाद उदय हुआ (प्रारंभ में सातवाहनों के सामंत थे)।
- भौगोलिक विस्तार: तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश का क्षेत्र।
- राजधानी: कांचीपुरम —इसे ‘हजारों मंदिरों का शहर’ कहा गया।
- धार्मिक झुकाव व कला: अधिकतर राजा शैव धर्मानुयायी थे; उन्होंने भव्य चट्टान काटकर बनाए गए गुफा मंदिरों का निर्माण कराया।
- शिक्षा केंद्र: कांचीपुरम में ‘घटिका’ (शिक्षा केंद्र) विकसित हुए, जिनकी शुरुआत सातवाहनों के समय हुई थी।
2. उत्तर-पूर्व भारत: कामरूप राज्य
- शासकीय वंश: वर्मन राजवंश।
- भौगोलिक विस्तार: ब्रह्मपुत्र घाटी (वर्तमान असम), उत्तरी बंगाल और बांग्लादेश के हिस्से।
- पौराणिक संदर्भ:
- रामायण और महाभारत में इस क्षेत्र को प्राग्ज्योतिष कहा गया है।
- महाभारत युद्ध में प्राग्ज्योतिष के राजा भगदत्त ने कौरवों की ओर से युद्ध लड़ा था।
- संस्कृति: मंदिर और मठ शिक्षा के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हुए।

समुद्रगुप्त की दक्षिण व उत्तर-पूर्व नीति
- पल्लव और कामरूप का उल्लेख: प्रयाग प्रशस्ति में दोनों राज्यों का स्पष्ट उल्लेख है।
- प्रत्यक्ष नियंत्रण का अभाव: समुद्रगुप्त ने पल्लव और कामरूप शासकों को युद्ध में हराया जरूर, लेकिन उनके राज्यों पर सीधा कब्जा नहीं किया।
- ग्रहण-मोक्षानुग्रह नीति: पराजित राजाओं को इस शर्त पर पुनः गद्दी दी गई कि वे गुप्त संप्रभुता स्वीकार करेंगे और नियमित कर (Tribute) देंगे।
प्रमुख गुप्तकालीन कला केंद्र एवं साक्ष्य
| स्थान | राज्य | प्रमुख कला / ऐतिहासिक साक्ष्य |
| सारनाथ | उत्तर प्रदेश | बुद्ध की धातु व पत्थर की मूर्तियाँ |
| अजंता | महाराष्ट्र | बोधिसत्व पद्मपाणि का चित्र, गुप्त-वाकाटक कला |
| अहिच्छत्र | उत्तर प्रदेश | गंगा (मकर) और यमुना (कछुआ) की टेराकोटा मूर्तियाँ |
| देवगढ़ | उत्तर प्रदेश | दशावतार मंदिर (शेषनाग पर विष्णु) |
| कांचीपुरम | तमिलनाडु | पल्लवों की राजधानी, घटिका (शिक्षा केंद्र) |