5 September 2026 PIB Summary for UPSC in Hindi Pdf के अंतर्गत भारत की अंतरिक्ष क्षमताओं को मजबूत करने वाले ISRO द्वारा GSLV-F17 से EOS-05 उपग्रह का सफल प्रक्षेपण, स्थानीय उत्पादों को वैश्विक बाजार से जोड़ने के लिए ‘डिस्ट्रिक्ट्स एज एक्सपोर्ट हब्स’ (DEH) पहल, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों में सुशासन और कानूनी अनुपालन सुगम बनाने वाले ‘कॉर्पोरेट मित्र’ पाठ्यक्रम, राजमार्गों के पर्यावरण-अनुकूल विकास हेतु NHAI का ‘ग्रीन हाईवे एक्सीलेंस अवार्ड्स 2026’, वेस्ट हीट रिकवरी में क्रांतिकारी खोज स्कैंडियम नाइट्राइड (ScN) में रिकॉर्ड थर्मोइलेक्ट्रिक प्रभाव, स्मार्ट ड्रग डिलीवरी व मेमोरी तकनीक में जाम्ड सिस्टम और माइक्रोगेल कण, जनजातीय समुदायों के सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण के लिए ‘पीएम-जनमन’ और ‘DA-JGUA’ पहलों की प्रगति समीक्षा, तथा बायोमेडिकल डिवाइसेस हेतु पेप्टाइड आधारित पीजोइलेक्ट्रिक बायोमटेरियल्स का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
ISRO की बड़ी उपलब्धि: GSLV-F17 द्वारा EOS-05 उपग्रह का सफल प्रक्षेपण
- प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय महत्व की समसामयिक घटनाएं, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (अंतरिक्ष तकनीक)।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 3): विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियां, प्रौद्योगिकी का स्वदेशीकरण और नई प्रौद्योगिकियों का विकास, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में ISRO की भूमिका और निजी क्षेत्र/भारतीय उद्योग की भागीदारी।
चर्चा में क्यों?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ISRO के GSLV-F17/EOS-05 मिशन के सफल प्रक्षेपण की सराहना करते हुए इसे देश के लिए एक गर्व का क्षण बताया। यह प्रक्षेपण सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC-SHAR), श्रीहरिकोटा के द्वितीय लॉन्च पैड से सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
मुख्य बिंदु: EOS-05 मिशन और अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार
1. जिओसिंक्रोनस कक्षा से पहला इमेजिंग सैटेलाइट
- EOS-05 की खासियत: यह भारत का पहला अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट (EOS) है जिसे सीधे जिओसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (Sub-GTO / Geo Orbit) में स्थापित किया गया है।
- निरंतर निगरानी: निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) उपग्रहों के विपरीत, यह जिओसिंक्रोनस कक्षा (~36,000 किमी ऊंचाई) से भारतीय भूभाग और तटीय क्षेत्रों की 24/7 वास्तविक समय (Real-time) में निरंतर इमेजिंग करने में सक्षम है।
- मुख्य उपयोगिता: प्राकृतिक आपदा प्रबंधन (चक्रवात, बाढ़), कृषि और सीमाओं की सामरिक निगरानी में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा।
2. ISRO और भारतीय उद्योग की बढ़ती भागीदारी
- अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र: इस मिशन की सफलता में निजी उद्योग और भारतीय निजी विनिर्माण साझेदारों की महत्वपूर्ण भागीदारी रही है।
- आत्मनिर्भर भारत: ISRO और निजी क्षेत्र के इस बढ़ते समन्वय से भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ताकत और पैमाना (Scale) मिल रहा है।
उपग्रह एवं प्रक्षेपण यान:
| घटक | विवरण |
| प्रक्षेपण यान (Launch Vehicle) | GSLV-F17 (GSLV Mk-II की 19वीं उड़ान) |
| पेलोड / उपग्रह | EOS-05 (भार: लगभग 2,367 किग्रा) |
| कक्षा (Orbit) | सब-जिओसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (Sub-GTO) |
| प्राथमिक उद्देश्य | आपदा प्रबंधन, कृषि विश्लेषण और भू-भाग की निरंतर उच्च-गुणवत्ता इमेजिंग |
‘डिस्ट्रिक्ट्स एज एक्सपोर्ट हब्स’ (DEH) पहल: भारत के हर जिले को निर्यात का केंद्र बनाने की रणनीति
- प्रारंभिक परीक्षा: प्रमुख की-वर्ड्स और तथ्य (अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, विदेश व्यापार नीति, ODOP, DGFT, निर्यात हब)।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 2 & 3): केंद्र-राज्य संबंध और संस्थागत तंत्र, भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाना, विकास से संबंधित मुद्दे, समावेशी विकास, उदारीकरण का प्रभाव और औद्योगिक नीति।
चर्चा में क्यों?
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय (PIB दिल्ली) ने ‘Districts as Export Hubs (DEH)’ पहल की प्रगति और इसके कार्यान्वयन की रूपरेखा पर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की। इस महत्वाकांक्षी योजना का मुख्य उद्देश्य देश के प्रत्येक जिले की अनूठी उत्पादन और सेवा क्षमताओं को पहचानकर उन्हें सीधे अंतर्राष्ट्रीय बाजारों से जोड़ना है। यह पहल भारत के पारंपरिक निर्यात मॉडल को, जो केवल कुछ बड़े शहरों और बंदरगाहों तक सीमित था, बदलकर विकेंद्रीकृत और समावेशी विकास को बढ़ावा दे रही है। इसके तहत छोटे व्यापारियों, एमएसएमई (MSMEs), स्टार्टअप्स और महिला उद्यमियों को सीधे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जोड़ा जा रहा है।
मुख्य बिंदु: जिला-स्तरीय निर्यात मॉडल और इसका क्रियान्वयन
1. ODOP से DEH तक का सफर
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ (ODOP) की शुरुआत 2018 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मुरादाबाद के पीतल उद्योग को बढ़ावा देने के लिए की गई थी, जिसे बाद में राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया गया।
- व्यापक रूपरेखा: विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) द्वारा संचालित DEH केवल एक उत्पाद के प्रचार तक सीमित न रहकर संपूर्ण निर्यात पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को मजबूत बनाता है।
- विस्तार: जनवरी 2026 तक यह पहल देश के 770 से अधिक जिलों को कवर कर चुकी है।
- कन्वर्जेंस मॉडल: DEH कोई नई बजटीय/फंडिंग योजना नहीं है, बल्कि यह केंद्र और राज्य की मौजूदा योजनाओं (जैसे एमएसएमई, कृषि और बुनियादी ढांचा योजनाएं) का एकीकृत उपयोग करती है।
2. तीन-स्तरीय संस्थागत संरचना
- केन्द्रीय स्तर: वाणिज्य विभाग नीतिगत दिशा प्रदान करता है और DGFT मुख्य कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में निगरानी करता है।
- राज्य स्तर: राज्य निर्यात संवर्धन समितियां (SEPCs) विभिन्न विभागों के बीच समन्वय और मार्गदर्शन सुनिश्चित करती हैं।
- जिला स्तर: जिला निर्यात संवर्धन समितियां (DEPCs) जिला निर्यात कार्य योजनाएं (District Export Action Plans – DEAPs) तैयार करती हैं। मार्च 2026 तक 590 जिलों के ड्राफ्ट तैयार हो चुके हैं और 249 योजनाएं औपचारिक रूप से अपनाई जा चुकी हैं।
3. डिजिटलीकरण, अवसंरचना और क्षमता निर्माण
- ई-कॉमर्स साझेदारी: एम्साइज़, शिपरॉकेट, और डीएचएल (DHL) जैसे प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से एमएसएमई (MSMEs) को कम लागत पर कूरियर शिपिंग सहायता मिलती है।

- डाक घर निर्यात केंद्र: छोटे और ग्रामीण निर्यातकों को कम लागत पर पैकेजिंग, कस्टम्स क्लीयरेंस और दस्तावेजीकरण की सुविधा प्रदान की जाती है।
- GRID कार्यक्रम: एक्जिम बैंक के ‘Grassroots Initiatives for Development (GRID)’ के तहत 6 प्रमुख जिलों (अनंतपुर, रायपुर, सोलन, तिरुप्पुर, कानपुर और कोल्हापुर) का विशेष विकास किया जा रहा है।
प्रमुख जिला उत्पाद मैपिंग (DEH Product Mapping)
| जिला | राज्य | संभावित निर्यात उत्पाद |
| साबरकांठा | गुजरात | सिरामिक एवं टाइल्स, आलू |
| अरावली | गुजरात | खनिज, कृषि प्रसंस्करण, कांच एवं टाइल्स |
| जलगाँव | महाराष्ट्र | जलगाँव केला, जलगाँव भरीत बैंगन |
| आगर मालवा | मध्य प्रदेश | संतरा |
| बस्तर | छत्तीसगढ़ | बस्तर आयरन क्राफ्ट, चावल, ज्वार, मक्का |
| जामताड़ा | झारखंड | बांस शिल्प, काजू |
कॉर्पोरेट मित्र पाठ्यक्रम: MSME अनुपालन और क्षमता निर्माण के लिए नई पहल
- प्रारंभिक परीक्षा: प्रमुख की-वर्ड्स और तथ्य (कॉर्पोरेट मित्र, MSME अनुपालन, केंद्रीय बजट 2026-27, पैरा-प्रोफेसनल्स)।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 2 & 3): सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप, भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाना, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस , MSME क्षेत्र का विकास और औपचारिककरण, रोजगार सृजन और समावेशी समृद्धि।
चर्चा में क्यों?
कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय (Ministry of Corporate Affairs – MCA) के मार्गदर्शन में ICAI, ICSI और ICoAI द्वारा ‘कॉर्पोरेट मित्र पाठ्यक्रम’ के पहले बैच की औपचारिक शुरुआत की गई। इस योजना के तहत कॉर्पोरेट मित्र लर्निंग मैनेजमेंट सिस्टम (LMS) भी लॉन्च किया गया है, जिसके पहले बैच में कुल 2,879 शिक्षार्थियों (Learners) ने अपना पंजीकरण कराया है। इसका प्राथमिक उद्देश्य सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए व्यावसायिक और नियामक अनुपालन को आसान और सुलभ बनाना है।
मुख्य बिंदु: कॉर्पोरेट मित्र पहल की रूपरेखा और उद्देश्य
1. पृष्ठभूमि और बजटीय घोषणा
- बजट 2026-27 में घोषणा: भारत सरकार ने केंद्रीय बजट 2026-27 में कॉर्पोरेट मित्र पहल की घोषणा की थी।
- पैरा-प्रोफेसनल्स का निर्माण: इसका मुख्य लक्ष्य प्रशिक्षित और प्रमाणित पैरा-प्रोफेसनल्स का एक ऐसा कैडर तैयार करना है जो MSMEs को सस्ती और सुलभ पेशेवर सहायता प्रदान कर सके।
- व्यावसायिक सुगमता: यह कदम ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को बढ़ावा देने, एमएसएमई क्षेत्र के औपचारिककरण, रोजगार सृजन और समावेशी आर्थिक विकास के लिए उठाया गया है।
2. बहु-संस्थानीय सहयोग और तकनीकी साझेदारी
- पेशेवर निकाय: इस पाठ्यक्रम को तीन प्रमुख संस्थानों- इंस्टिट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (ICAI), इंस्टिट्यूट ऑफ कंपनी सेक्रेटरीज ऑफ इंडिया (ICSI) और इंस्टिट्यूट ऑफ कॉस्ट अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (ICoAI) के संयुक्त सहयोग से डिजाइन किया गया है।
- तकनीकी व अकादमिक साझेदार: डिजिटल प्लेटफॉर्म और शैक्षणिक सहायता के लिए आईआईटी मद्रास, आईआईटी मद्रास प्रवर्तक और स्वयं प्लस की सहायता ली जा रही है।
3. पाठ्यक्रम की संरचना और प्रशिक्षण मॉडल
- कुल अवधि: यह पाठ्यक्रम कुल 12 महीने (1 वर्ष) की अवधि का है, जिसे दो चरणों में विभाजित किया गया है।
- प्रथम चरण (6 माह): रिकॉर्डेड वीडियो लेक्चर के माध्यम से लगभग 150 घंटे का संरचित अकादमिक अध्ययन कराया जाएगा।
- द्वितीय चरण (6 माह): ICAI, ICSI और ICoAI के सदस्यों की पेशेवर फर्मों में 6 महीने का प्रैक्टिकल ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग दिया जाएगा।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| घटक / बिंदु | महत्वपूर्ण तथ्य |
| पहल का नाम | कॉर्पोरेट मित्र पाठ्यक्रम |
| प्रथम बैच पंजीकरण | 2,879 शिक्षार्थी (Learners) |
| प्रशासनिक मंत्रालय | कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय (Ministry of Corporate Affairs) |
| बजटीय संदर्भ | केंद्रीय बजट 2026-27 |
| प्रशिक्षण अवधि | 12 महीने (6 महीने अकादमिक + 6 महीने ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग) |
| मुख्य लक्ष्य | MSMEs के लिए अनुपालन (Compliance) को आसान बनाना और पैरा-प्रोफेसनल्स तैयार करना |
NHAI का ‘ग्रीन हाईवे एक्सीलेंस अवार्ड्स 2026’: राष्ट्रीय राजमार्गों पर पर्यावरण अनुकूल प्रथाओं को बढ़ावा
- प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय महत्त्व की समसामयिक घटनाएँ, पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी, बुनियादी ढाँचा (सड़क एवं राजमार्ग), ग्रीन हाईवे नीति।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 2 & 3): बुनियादी ढाँचा (सड़क एवं राजमार्ग), पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण और क्षरण, सतत विकास, हरित नीतियां और सरकारी पहलें।
चर्चा में क्यों?
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने ‘ग्रीन हाईवे एक्सीलेंस अवार्ड्स 2026’ के विजेताओं की घोषणा की। इस पुरस्कार का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय राजमार्गों पर वृक्षारोपण और सौंदर्यकरण की सर्वोत्तम प्रथाओं को बढ़ावा देना है। यह पहल राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क के विकास के साथ-साथ पर्यावरणीय स्थिरता को जोड़ने की NHAI की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। इसके माध्यम से पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ राजमार्गों के निर्माण के लिए क्षेत्रीय कार्यालयों, ठेकेदारों, एनजीओ और निजी एजेंसियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
मुख्य बिंदु: पुरस्कार की श्रेणियां और मूल्यांकन ढांचा
1. पुरस्कार की प्रमुख श्रेणियां और विजेता
NHAI द्वारा यह पुरस्कार तीन अलग-अलग श्रेणियों में प्रदान किए गए हैं:
- श्रेणी I: एवेन्यू प्लांटेशन (सड़क के किनारों पर वृक्षारोपण)
- प्रथम पुरस्कार: आंध्र प्रदेश में NH-16 पर चिलाकलुरिपेट बाईपास का 6-लेनिंग प्रोजेक्ट (RO-विजयवाड़ा)।
- द्वितीय पुरस्कार: गुजरात में वडोदरा-मुंबई एक्सप्रेसवे का पडरा से वडोदरा सेक्शन (RO-गांधीनगर)।
- तृतीय पुरस्कार: NH-925 का गगरिया-बखासर सेक्शन और NH-925A का सत्ता-गांधव सेक्शन (RO-जयपुर)।
- सांत्वना पुरस्कार: तिरुचि-कराईकुडी सेक्शन (NH-210, 336, 36, 536 और तिरुचि बाईपास) (RO-मदुरै)।
- श्रेणी II: मीडियन प्लांटेशन (सड़क के बीच की पट्टियों पर वृक्षारोपण)
- प्रथम पुरस्कार: NH-163 पर हैदराबाद-यादगिरि सेक्शन की 4-लेनिंग (RO-हैदराबाद)।
- द्वितीय पुरस्कार: गुजरात में वडोदरा-मुंबई एक्सप्रेसवे का संपा से पडरा सेक्शन (RO-गांधीनगर)।
- तृतीय पुरस्कार: वाराणसी रिंग रोड, पैकेज-I, NH-31 का हरहुआ से संदहा सेक्शन (RO-यूपी ईस्ट, वाराणसी)।
- श्रेणी III: लैंड पार्सल में वृक्षारोपण (टोल प्लाजा, इंटरचेंज और खाली जमीन)
- प्रथम पुरस्कार: NH-44 पर जमथा ओवर क्लॉवर लीफ स्थित ‘ऑक्सीजन बर्ड पार्क’ (RO-नागपुर)।
- द्वितीय पुरस्कार: दुहाई इंटरचेंज, NE-II पर ToT बंडल-7 के तहत लैंड पार्सल (RO-दिल्ली)।
- तृतीय पुरस्कार: लखनऊ-अयोध्या रोड और लखनऊ आउटर रिंग रोड इंटरसेक्शन पर ‘मियावाकी वृक्षारोपण’ (RO-यूपी वेस्ट, लखनऊ)।
2. नामांकन और मूल्यांकन प्रक्रिया
- ऑनलाइन पोर्टल और भागीदारी: NHAI के ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से कुल 86 नामांकन प्राप्त हुए थे। इसमें एवेन्यू के लिए 27, मीडियन के लिए 36 और लैंड पार्सल के लिए 23 आवेदन शामिल थे।
- जियो-टैगिंग एवं तकनीक: नामांकनों के साथ जियो-टैग की गई तस्वीरें, ड्रोन वीडियो, साइट-विशिष्ट प्लान और पौधों के जीवित रहने की दर (Survival Rate) का डेटा जमा किया गया था।
- मूल्यांकन का मुख्य मानदंड: अंतिम मूल्यांकन में पौधों की जीवित रहने की दर (Survival Rate) को सबसे अधिक प्राथमिकता दी गई। इसके अलावा गड्ढों का आकार, देशी प्रजातियों का चयन, सुरक्षा उपाय और मियावाकी जैसी तकनीकों के उपयोग को आधार बनाया गया।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| घटक / बिंदु | महत्वपूर्ण तथ्य |
| पुरस्कार का नाम | ग्रीन हाईवे एक्सीलेंस अवार्ड्स 2026 |
| आयोजक संस्था | भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) |
| स्थापना वर्ष | वर्ष 2025 (हरित राजमार्ग नीति, 2015 के तहत) |
| मूल्यांकन का मुख्य आधार | पौधों की जीवित रहने की दर (Survival-rate Data) |
| विशेष तकनीक/पार्क | नागपुर में ऑक्सीजन बर्ड पार्क एवं लखनऊ में मियावाकी तकनीक |
| पुरस्कार श्रेणियां | एवेन्यू प्लांटेशन, मीडियन प्लांटेशन और लैंड पार्सल |
स्कैंडियम नाइट्राइड (ScN) में रिकॉर्ड थर्मोइलेक्ट्रिक प्रभाव: ताप से बिजली बनाने की सदी पुरानी सीमा टूटी
- प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्व की वैज्ञानिक एवं तकनीकी घटनाएं, सामान्य विज्ञान (भौतिकी एवं सामग्री विज्ञान)।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 3): विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियां, प्रौद्योगिकी का स्वदेशीकरण, नई प्रौद्योगिकियों का विकास और क्वांटम प्रौद्योगिकियों में अनुप्रयोग।
चर्चा में क्यों?
जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (JNCASR), सिडनी विश्वविद्यालय और भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) बैंगलोर के वैज्ञानिकों की एक संयुक्त टीम ने एक ऐतिहासिक सफलता हासिल की। उन्होंने एक विशेष क्रिस्टलीय सेमीकंडक्टर विकसित किया है जो तापमान के अंतर को सामान्य से लगभग 1,000 गुना अधिक विद्युत वोल्टेज में बदल देता है। यह खोज ठोस पदार्थों में तापीय ऊर्जा से बिजली बनाने (Seebeck Effect) की सदी पुरानी भौतिक सीमा को तोड़ती है।
मुख्य बिंदु: खोज का विवरण, सीबेक प्रभाव और व्यावहारिक अनुप्रयोग
1. सीबेक प्रभाव और ऐतिहासिक सीमा का टूटना
- मूल सिद्धांत: जब दो असमान सामग्रियों के जोड़ में एक सिरे को गर्म और दूसरे को ठंडा रखा जाता है, तो चार्ज कैरियर्स गर्म से ठंडे सिरे की ओर प्रवाहित होते हैं, जिससे वोल्टेज उत्पन्न होता है। इसे सीबेक प्रभाव कहते हैं।
- पारंपरिक सीमा: अब तक क्रिस्टलीय ठोस पदार्थों में सीबेक गुणांक (Seebeck Coefficient) कुछ ही मिलीवोल्ट प्रति केल्विन तक सीमित था (अधिकांश धातुओं में केवल कुछ माइक्रोवोल्ट)। उच्च मान केवल लिक्विड इलेक्ट्रोलाइट्स या आयनिक जेल्स में ही देखे जाते थे।
- नया कीर्तिमान: JNCASR की टीम ने लगभग 200 नैनोमीटर पतली फिल्म में कमरे के तापमान के पास –124.6 मिलीवोल्ट प्रति केल्विन से अधिक का सीबेक प्रभाव दर्ज किया। यह द्रव इलेक्ट्रोलाइट्स से भी अधिक है।
2. सामग्री और निर्माण तकनीक (HDHC ScN)
- सामग्री: वैज्ञानिकों ने स्कैंडियम नाइट्राइड (ScN) नामक एक रिफ्रैक्टरी ट्रांजिशन-मेटल नाइट्राइड की पतली फिल्में मैग्नीशियम ऑक्साइड (MgO) सबस्ट्रेट पर विकसित कीं।
- मैग्नीशियम डोपिंग: प्राकृतिक मुक्त इलेक्ट्रॉनों को संतुलित करने के लिए जानबूझकर मैग्नीशियम से डोपिंग की गई, जिससे ‘हाईली डोप्ड, हाईली कम्पेंसेटेड’ (HDHC) सेमीकंडक्टर बना।
- संरचना: एक्स-रे डिफ्रेक्शन और इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी ने पुष्टि की कि यह फिल्म पूरी तरह से एकल-क्रिस्टलीय और एपिटैक्सियल है।
3. प्रोटोटाइप सेंसर और भविष्य के अनुप्रयोग
- फोटॉन सेंसर प्रोटोटाइप: टीम ने HDHC ScN फिल्म पर आधारित एक प्रोटोटाइप लाइट/फोटॉन सेंसर बनाया है जो तेजी से और सटीक रूप से वोल्टेज प्रतिक्रिया प्रदर्शित करता है।
- पेटेंट: इस थर्मोइलेक्ट्रिक थिन-फिल्म सामग्री और सेंसर तकनीक के लिए एक भारतीय पेटेंट आवेदन दायर किया गया है।
- प्रमुख उपयोग: अल्ट्रा-सेंसिटिव तापमान सेंसिंग, लो-नॉइज़ थर्मल इमेजिंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) सेंसर, बोलोमैट्रिक डिवाइस और क्वांटम प्रौद्योगिकियों में क्रायोजेनिक सिंगल-फोटॉन डिटेक्टर।
जाम्ड सिस्टम और माइक्रोगेल कण: तापीय आघात से मेमोरी इरेज़र और ड्रग डिलीवरी में नया मोड़
- प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय महत्व की वैज्ञानिक एवं तकनीकी घटनाएं, बायो-टेक्नोलॉजी, नैनो-टेक्नोलॉजी और एडवांस्ड मटेरियल्स।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 3): विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियां, देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास, स्वास्थ्य क्षेत्र में नई तकनीकों (ड्रग डिलीवरी प्रणाली) का अनुप्रयोग।
चर्चा में क्यों?
रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट (RRI), बैंगलोर के वैज्ञानिकों ने जाम्ड सिस्टम्स में संरचनात्मक पुनर्प्राप्ति पर एक महत्वपूर्ण अध्ययन प्रकाशित किया। उन्होंने साबित किया है कि ग्लास जैसे ठोस पदार्थों को अचानक तापीय आघात देकर उनके अंदर दर्ज मेमोरी इंप्रिंट्स को मिटाया जा सकता है। यह तकनीक जाम्ड या जटिल पदार्थों को क्षणभर के लिए तरल अवस्था में ला देती है। इस खोज से कैंसर उपचार और टार्गेटेड ड्रग डिलीवरी प्रणालियों में क्रांतिकारी सुधार की संभावना बढ़ गई है।
मुख्य बिंदु: शोध का विवरण, असमितियाँ और ड्रग डिलीवरी में अनुप्रयोग
1. जाम्ड सिस्टम और ‘मेमोरी इरेज़र’ का विज्ञान
- कांच जैसी संरचना: ग्लास या जाम्ड सिस्टम ठोस जैसे दिखते हैं। मगर इनकी आंतरिक संरचना तरल पदार्थों जैसी अव्यवस्थित होती है।
- मेमोरी इंप्रिंट्स मिटाना: ये पदार्थ अपने तापीय इतिहास की मेमोरी बनाए रखते हैं। वैज्ञानिकों ने इन्हें क्षणभर के लिए तरल अवस्था में बदलकर इस मेमोरी को पूरी तरह से मिटा दिया।
- तापीय आघात (Thermal Shock): तापमान में अचानक बदलाव करने पर कण पुनर्व्यवस्थित हो जाते हैं। इससे जाम्ड सिस्टम क्षणिक रूप से बहने लगता है।
2. पथ-निर्भरता और असमिति (Asymmetry) पर नियंत्रण
- पथ-निर्भर व्यवहार: हीटिंग (गर्म करने) और कूलिंग (ठंडा करने) के दौरान निलंबन (Suspension) द्वारा अपनाया गया रास्ता अलग-अलग होता है। इनमें कोई मिरर सिमेट्री नहीं पाई गई।

- असमिति पर नियंत्रण: वैज्ञानिकों ने पाया कि तापीय आघात का उपयोग करके हीटिंग और कूलिंग के बीच की इस असमिति को नियंत्रित और समाप्त किया जा सकता है।
3. माइक्रोगेल कण और लक्षित दवा वितरण
- माइक्रोगेल की विशेषता: माइक्रोगेल अपने वजन से 300-500 गुना अधिक पानी सोख सकता है। इसका उपयोग डायपर और सेनेटरी नैपकिन में भी होता है।
- तापमान-संवेदनशील व्यवहार: कम तापमान पर ये कण सूज जाते हैं और दवा को अपने अंदर जमा कर लेते हैं।
- कैंसर उपचार में उपयोग: 34 °C से अधिक तापमान होने पर (जो शरीर के तापमान से थोड़ा कम है) ये कण सिकुड़ जाते हैं। इससे ट्यूमर जैसे लक्षित स्थल पर दवा सीधे बाहर निकल जाती है।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| घटक / बिंदु | महत्वपूर्ण तथ्य |
| अनुसंधान संस्था | रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट (RRI), बैंगलोर (DST का स्वायत्त संस्थान) |
| प्रमुख शोधकर्ता | सोनाली कावले (मुख्य लेखिका) और रंजिनी बंद्योपाध्याय |
| प्रकाशन पत्रिका | जर्नल ऑफ कोलाइड एंड इंटरफेस साइंस |
| मुख्य प्रयुक्त सामग्री | थर्मो-रेस्पॉन्सिव माइक्रोगेल कण |
| दवा छोड़ने का तापमान | 34 °C से अधिक (शरीर के औसत तापमान से थोड़ा कम) |
‘पीएम-जनमन’ और ‘DA-JGUA’: जनजातीय विकास पहलों की प्रगति समीक्षा और नई पहलों की घोषणा
- प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय महत्व की समसामयिक घटनाएं, जनजातीय कल्याण योजनाएं (PM-JANMAN, DA-JGUA)।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 2 & 3): विकास प्रक्रियाएं और विकास उद्योग, अति संवेदनशील वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं, विकेंद्रीकरण और संस्थागत ढांचा, समावेशी समृद्धि और कृषि आजीविका।
चर्चा में क्यों?
जनजातीय कार्य मंत्रालय (MoTA) की सचिव रंजना चोपड़ा की अध्यक्षता में ‘पीएम-जनमन’ और ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’ (DA-JGUA) जैसी प्रमुख योजनाओं की समीक्षा बैठक आयोजित की गई। इस उच्च स्तरीय बैठक का मुख्य उद्देश्य निधि उपयोग को गति देना, कार्यान्वयन की बाधाओं को दूर करना और जनजातीय समुदायों के लिए शुरू की गई नई पहलों को साझा करना था।
मुख्य बिंदु: बैठक में घोषित 4 प्रमुख विकास पहलें
1. ITDA दिशा-निर्देश और विकेंद्रीकरण रोडमैप
- संस्थागत ढांचा: एकीकृत जनजातीय विकास एजेंसियों/परियोजनाओं (ITDAs/ITDPs) के लिए व्यापक परिचालन दिशानिर्देश जारी किए गए हैं।
- उद्देश्य: जिला और ब्लॉक स्तर पर केंद्रीय और राज्य की योजनाओं के समन्वय (Convergence) को मजबूत करना। इससे निर्णय प्रक्रिया में विकेंद्रीकरण को बढ़ावा मिलेगा।
2. ‘आदि दर्पण’ का विमोचन
- विषय-वस्तु: ‘आदि दर्पण’ मंत्रालय की सभी योजनाओं की प्रगति, जनजातीय समुदायों के विकास प्रोफाइल और जमीनी वास्तविकताओं को प्रदर्शित करने वाला एक व्यापक संग्रह (Compendium) है।
- उपयोगिता: यह डेटा-आधारित नियोजन (Data-driven planning) में मदद करेगा और सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता लाएगा।
3. डिस्ट्रिक्ट एग्री DPR चैलेंज पुरस्कार
- कृषि आजीविका: जनजातीय किसानों की आय बढ़ाने के लिए गुणवत्तापूर्ण और क्रियान्वयन योग्य कृषि डीपीआर (Detailed Project Reports) आमंत्रित की गई थीं।
- विजेता जिले: वायनाड (केरल), पलाकड़ (केरल), दीमा हसाओ (असम), और पालघर (महाराष्ट्र)।
4. रानी दुर्गावती आदिवासी महिला सम्मेलन
- महिला सशक्तिकरण: जनजातीय महिला उद्यमियों के लिए ‘राष्ट्रीय रानी दुर्गावती आदिवासी महिला सम्मेलन’ की घोषणा की गई।

- मुख्य फोकस: यह मंच आदिवासी महिला उद्यमियों को बाजार लिंकेज, क्रेडिट सहायता (ऋण), कौशल विकास और मेंटरशिप प्रदान करेगा।
5. अन्य समीक्षाधीन स्वास्थ्य एवं क्षमता निर्माण पहलें
- स्वास्थ्य पहल: सिक्ल सेल रोग (Sickle Cell Disease) के सेंटर ऑफ कॉम्पिटेंस और CSIR-NBRI बायोरिफाइनरी/बायोरीसोर्स पहल की समीक्षा की गई।
- आदि कर्मयोगी अभियान: आदि सेवा केंद्रों पर पंजीकरण और स्वयंसेवकों के प्रशिक्षण हेतु तैयार iGOT माइक्रोसाइट का प्रदर्शन किया गया।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| घटक / बिंदु | महत्वपूर्ण तथ्य |
| प्रशासनिक मंत्रालय | जनजातीय कार्य मंत्रालय (MoTA) |
| मुख्य समीक्षाधीन योजनाएं | PM-JANMAN एवं धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (DA-JGUA) |
| जारी संकलन | आदि दर्पण – डेटा और प्रगति रिपोर्ट |
| DPR चैलेंज विजेता जिले | वायनाड, पलाकड़ (केरल); दीमा हसाओ (असम); पालघर (महाराष्ट्र) |
| महिला कॉन्क्लेव | रानी दुर्गावती आदिवासी महिला सम्मेलन |
पेप्टाइड आधारित पीजोइलेक्ट्रिक बायोमटेरियल्स: आत्म-संचालित (Self-Powered) हेल्थकेयर उपकरणों की दिशा में बड़ी सफलता
- प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्व की वैज्ञानिक एवं तकनीकी घटनाएं, बायो-टेक्नोलॉजी, नैनो-टेक्नोलॉजी, एडवांस्ड मटेरियल्स।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 3): विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियां, देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास, स्वास्थ्य क्षेत्र में नैनो-टेक्नोलॉजी और बायोमटेरियल्स का अनुप्रयोग।
चर्चा में क्यों?
भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के तहत स्वायत्त संस्थान सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज (CeNS), बैंगलोर के शोधकर्ताओं ने एक अनूठी उपलब्धि हासिल की। IISER कोलकाता और JNCASR के सहयोग से उन्होंने पेप्टाइड्स (प्रोटीन के निर्माण ब्लॉक) का उपयोग करके उच्च दक्षता वाले पीजोइलेक्ट्रिक बायोमटेरियल्स विकसित करने की तकनीक खोज निकाली है। यह खोज मानव शरीर की स्वाभाविक गतिविधियों जैसे- दिल की धड़कन, सांस लेने या चलने से बिजली पैदा कर इम्प्लांटेबल मेडिकल डिवाइसेज को सेल्फ-पावर्ड (Self-Powered) बनाने का रास्ता साफ करती है।
मुख्य बिंदु: तकनीक का आधार, आणविक तंत्र और व्यावहारिक अनुप्रयोग
1. पीजोइलेक्ट्रिक सामग्री और वर्तमान चुनौती
- मूल सिद्धांत: पीजोइलेक्ट्रिक सामग्रियां दबाव, मुड़ने या खींचने जैसे यांत्रिक बल (Mechanical Force) को विद्युत ऊर्जा (Electrical Energy) में बदल देती हैं।
- पारंपरिक सीमा: व्यावसायिक पीजोइलेक्ट्रिक सामग्रियां आमतौर पर सिरेमिक से बनाई जाती हैं। ये भंगुर (Brittle), पर्यावरण के लिए हानिकारक और मानव शरीर के अनुकूल (Biocompatible) नहीं होती हैं।
- बायोमटेरियल विकल्प: पेप्टाइड-आधारित सामग्रियां सुरक्षित, बायोडिग्रेडेबल और मानव ऊतकों के अनुकूल होती हैं, लेकिन इनसे मजबूत पीजोइलेक्ट्रिक प्रदर्शन प्राप्त करना अब तक एक बड़ी चुनौती थी।
2. आणविक स्विच (Molecular Switch) और असेंबली तकनीक
- अणु बदले बिना परिवर्तन: शोधकर्ताओं ने पेप्टाइड की रासायनिक संरचना को बदले बिना केवल उनके संयोजन (Assembly) को नियंत्रित करने का तरीका खोजा।
- को-सॉल्वेंट का प्रभाव: पानी में पेप्टाइड अणु नैनोफाइबर बनाते हैं जिनमें कोई पीजोइलेक्ट्रिक प्रतिक्रिया नहीं होती। केवल 1% उपयुक्त को-सॉल्वेंट मिलाने से ये अणु एक सुव्यवस्थित सुप्रामोलेक्युलर संरचना में बदल जाते हैं।
- गैर-सेंट्रोसिमेट्रिक संरचना: इस नियंत्रित स्व-संयोजन (Chiral Self-Assembly) से आणविक द्विध्रुव (Molecular Dipoles) एक Non-Centrosymmetric संरचना में संरेखित हो जाते हैं, जो पीजोइलेक्ट्रिसिटी की अनिवार्य शर्त है।
- उच्च गुणांक: तैयार पेप्टाइड नैनोमटेरियल ने ~30 pm V⁻¹ का उच्च पीजोइलेक्ट्रिक गुणांक प्रदर्शित किया, जो पेप्टाइड-आधारित सामग्री के लिए एक बेहतरीन प्रदर्शन है।
3. व्यावहारिक अनुप्रयोग और दूरगामी लाभ
- सेल्फ-पावर्ड मेडिकल डिवाइसेज: पेसमेकर, इम्प्लांटेबल मेडिकल सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक स्किन (E-skin) बिना किसी बाहरी बैटरी के शरीर की गतिविधियों से ऊर्जा प्राप्त कर सकेंगे।

- पर्यावरण के अनुकूल: हानिकारक सिरेमिक पीजोइलेक्ट्रिक सामग्रियों का एक हरित और टिकाऊ विकल्प (Sustainable Soft Electronics) प्रदान करता है।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| घटक / बिंदु | महत्वपूर्ण तथ्य |
| शोध संस्थाएं | CeNS बैंगलोर (DST का संस्थान), IISER कोलकाता, JNCASR बैंगलोर |
| प्रमुख शोधकर्ता | डॉ. गौतम घोष और अर्पणा रमेश (CeNS) |
| प्रयुक्त आधार सामग्री | पेप्टाइड्स (प्रोटीन की मूलभूत इकाइयाँ) |
| स्वीचिंग कारक | 1% उपयुक्त को-सॉल्वेंट का प्रयोग |
| पीजोइलेक्ट्रिक गुणांक | लगभग 30 pm V⁻¹ |