हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में पैदल यात्रियों के जीवन को सुरक्षित करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षित फुटपाथों पर चलने की स्वतंत्रता अब मात्र एक सुविधा नहीं, बल्कि एक मौलिक अधिकार है। ‘Right to Walk’ को अनुच्छेद 21 और 19 के अंतर्गत मान्यता दी गई है। यह लेख UPSC के दृष्टिकोण से इस निर्णय के महत्व, मोटर वाहन अधिनियम की कमियों और सुरक्षित शहरी नियोजन पर इसके प्रभावों का संपूर्ण विश्लेषण करता है।
- सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2 (GS Paper 2): भारतीय संविधान- महत्वपूर्ण प्रावधान, मौलिक अधिकारों का विस्तार; न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism); वैधानिक और नियामक निकाय (Statutory & Regulatory Bodies)।
- सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-3 (GS Paper 3): बुनियादी ढांचा (Infrastructure): सड़क और शहरी नियोजन; समावेशी विकास और आपदा/सड़क सुरक्षा प्रबंधन।
चर्चा में क्यों? (Why in News?)
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने मनियार इलियाज़ उर्फ शेख रियाज़ बनाम पी. अय्यप्पन व अन्य (2026) मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ‘चिह्नित और सुरक्षित फुटपाथों पर चलने के अधिकार’ (Right to Walk on Safe and Demarcated Footpaths) को एक मौलिक अधिकार (Fundamental Right) घोषित किया है।
यह निर्णय देश में बढ़ते सड़क हादसों और पैदल यात्रियों की असुरक्षा को देखते हुए एक बड़ा प्रशासनिक और विधिक (Legal) मील का पत्थर है।
पैदल यात्रियों की मौतों में अप्रत्याशित वृद्धि (The Grim Statistics)
न्यायालय ने इस फैसले को देश में पैदल यात्रियों की बढ़ती संवेदनशीलता और जान के खतरे के संदर्भ में रेखांकित किया। हालिया आंकड़ों के अनुसार:
- मृत्यु दर में भारी उछाल: वर्ष 2015 से 2024 के बीच पैदल यात्रियों की मौतों में लगभग 163% की विनाशकारी वृद्धि दर्ज की गई है।
- कुल मौतों में हिस्सेदारी: कुल सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों में पैदल चलने वालों की हिस्सेदारी 9.5% से दोगुनी से अधिक बढ़कर 20.61% हो गई है।
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के मुख्य बिंदु (Core Principles of the Judgment)
1. बहुआयामी संवैधानिक आधार (Constitutional Foundations)
सुप्रीम कोर्ट ने ‘राइट टू वॉक’ को संविधान के भाग III के कई अनुच्छेदों के एक एकीकृत मिश्रण के रूप में स्थापित किया है:
- अनुच्छेद 19(1)(d): इसके तहत गारंटीकृत ‘स्वतंत्र रूप से संचरण के अधिकार’ का यह एक अभिन्न अंग है।
- अनुच्छेद 21: सुरक्षित वातावरण में बिना किसी जानलेवा खतरे के चलना गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का हिस्सा है।
- अनुच्छेद 19(1)(a), (b), और (c): चलना केवल गति (Motion) नहीं है, बल्कि यह अभिव्यक्ति (Expressional), सभा/एकत्रित होने (Congregational) और संघ बनाने (Associational) के अधिकारों को भी व्यावहारिक रूप प्रदान करता है।
2. वाहनों के विशेषाधिकार पर पूर्ण प्राथमिकता (Absolute Priority over Vehicles)
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हालांकि चलने की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त निर्बंधन (Reasonable Restrictions) लागू हो सकते हैं, लेकिन:
- निर्दिष्ट फुटपाथों का उपयोग करने का पैदल यात्रियों का अधिकार, मोटर वाहनों की आवाजाही और उनके विशेषाधिकारों पर सर्वोपरि (Precedence) होगा।
- सार्वजनिक स्थानों (Public Spaces) पर वाहन चालकों का एकाधिकार नहीं हो सकता।
[सड़क पर प्राथमिकता का नया नियम]
पैदल यात्री (Pedestrians) ──► सर्वोच्च प्राथमिकता (फुटपाथ पर पहला अधिकार)
▲
│ (Override)
मोटर वाहन (Motorized Vehicles) ──► द्वितीयक विशेषाधिकार
3. कानूनी रूप से लागू करने योग्य कर्तव्य (Enforceable Correlative Duty)
- प्रशासनिक बाध्यता: यदि कोई सड़क मौजूद है, तो सार्वजनिक निकायों पर एक कानूनी कर्तव्य लागू होता है कि वे पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित फुटपाथों का सीमांकन, निर्माण और रखरखाव करें।
- जवाबदेह संस्थाएं: इसके लिए शहरी विकास प्राधिकरण (UDAs), नगर निगम, नगरपालिकाएं और पंचायतें सीधे तौर पर उत्तरदायी (Duty-bearers) हैं।
- स्वतंत्र संवैधानिक उपचार: यदि ये संस्थाएं सुरक्षित फुटपाथ देने में विफल रहती हैं, तो नागरिक उनके खिलाफ संवैधानिक और कानूनी उपचार (Restitutionary Remedies) का दावा कर सकते हैं। यह व्यवस्था मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत मिलने वाले मुआवजे से पूरी तरह स्वतंत्र और अलग होगी।
4. मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की तीखी आलोचना
सर्वोच्च न्यायालय ने मौजूदा कानून की सीमाओं को उजागर करते हुए कहा कि:
- वाहन-केंद्रित नीति: मोटर वाहन अधिनियम (MVA) पैदल यात्रियों के अधिकारों को कमजोर करता है क्योंकि यह ‘वाहन’ को प्राथमिक विषय मानता है, जबकि इंसानी और पैदल यात्रियों के हितों को केवल ‘प्रासंगिक या गौण’ (Incidental) मानता है।
- आधुनिक शासन की मांग: कोर्ट ने इस वाहन-केंद्रित सोच को बदलने और पैदल यात्रियों के अधिकारों की रक्षा और योजना के लिए डोमेन विशेषज्ञों से युक्त एक स्वतंत्र, पूर्णकालिक नियामक संस्था (Independent Regulator) के गठन पर जोर दिया।
न्यायालय का सुओ मोटो हस्तक्षेप और निर्देश
न्यायालय ने इस फैसले के व्यावहारिक क्रियान्वयन के लिए अपनी रजिस्ट्री को सीधे निर्देश दिए हैं कि निर्णय की प्रति निम्नलिखित को भेजी जाए:
- प्रमुख मंत्रालय: आवास और शहरी मामले मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, तथा सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (ताकि वे आवश्यक कानूनी ढांचा शुरू कर सकें)।
- भारतीय विधि आयोग (Law Commission of India): ताकि वह पैदल यात्रियों के अधिकारों की सुरक्षा, जवाबदेही तय करने और कानूनी उपचारों के प्रावधान के लिए एक नए समर्पित वैधानिक ढांचे (Statutory Framework) की जांच और निर्माण कर सके।
पूर्व के महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय (Past Supreme Court Verdicts)
| मामला (Case Law) | न्यायिक सिद्धांत और निर्णय |
| ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे नगर निगम (1985) | कोर्ट ने माना था कि फुटपाथ प्राथमिक रूप से पैदल यात्रियों के चलने के लिए हैं और बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के वहां रहने वालों को अचानक बेदखल नहीं किया जा सकता क्योंकि आजीविका का अधिकार (अनुच्छेद 21) महत्वपूर्ण है। |
| सोदान सिंह बनाम नई दिल्ली नगर पालिका समिति (1989) | कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फुटपाथों पर व्यापार करने का अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(g)) पूर्ण नहीं है। पैदल यात्रियों के सुरक्षित और निर्बाध आवागमन का अधिकार सर्वोपरि है। |
‘न्यायिक विस्तार’ (Judicial Expansion) और न्यायिक सक्रियता
न्यायिक विस्तार का औचित्य: यह क्यों आवश्यक है? (Arguments in Favour)
न्यायपालिका द्वारा मौलिक अधिकारों के दायरे को बढ़ाने के पीछे ठोस सामाजिक और विधिक तर्क रहे हैं:
- ‘जीवंत दस्तावेज’ (Living Document) के रूप में संविधान: 1950 में संविधान निर्माताओं के लिए डिजिटल निजता (Privacy) या आधुनिक वाहनों के कारण होने वाले सड़क हादसों की कल्पना करना असंभव था। न्यायपालिका ने ‘संवैधानिक गतिकी’ (Constitutional Dynamism) को अपनाते हुए संविधान को समय के अनुरूप प्रासंगिक बनाए रखा है।
- ‘अस्तित्व’ से ‘गरिमापूर्ण जीवन’ की ओर: न्यायपालिका ने मेनका गांधी वाद (1978) के बाद यह स्थापित किया कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अर्थ केवल “पशुवत अस्तित्व” (Mere Animal Existence) नहीं है, बल्कि इसमें एक मानवीय गरिमा के साथ जीने के सभी आवश्यक तत्व शामिल हैं। इसी के तहत स्वच्छ पर्यावरण, शिक्षा और अब सुरक्षित चलने के अधिकार को जोड़ा गया है।
- कार्यपालिका की निष्क्रियता को भरना (Filing Legislative Vacuum): जब विधायिका या कार्यपालिका बदलते समय की समस्याओं (जैसे सड़क सुरक्षा या डेटा सुरक्षा) पर कानून बनाने में देरी करती हैं, तो न्यायपालिका नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आती है। उदाहरण के लिए, पुट्टास्वामी मामले (2017) में निजता के अधिकार की घोषणा ने आगे चलकर ‘डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम’ (DPDP Act) की नींव रखी।
2न्यायिक विस्तार की चुनौतियाँ और आलोचना (Counter-Arguments / Criticisms)
अधिकारों के इस निरंतर विस्तार को लेकर विधि विशेषज्ञों और आलोचकों द्वारा कई गंभीर चिंताएं भी जताई जाती हैं:
- शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) का उल्लंघन: भारतीय संविधान कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन पर आधारित है। आलोचकों का मानना है कि जब कोर्ट नए अधिकार घोषित करता है और सरकारों को नीतियां बदलने का निर्देश देता है (जैसे विशेष रेगुलेटर बनाना), तो वह अप्रत्यक्ष रूप से विधायिका के क्षेत्र में प्रवेश करता है, जिसे ‘न्यायिक अतिक्रमण’ (Judicial Overreach) भी कहा जाता है।
- व्यावहारिक क्रियान्वयन की समस्या (Enforceability Crisis): किसी अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित करना आसान है, लेकिन उसे ज़मीन पर लागू करने के लिए भारी वित्तीय और बुनियादी संसाधनों की आवश्यकता होती है। ‘राइट टू वॉक’ को लागू करने के लिए देश की हर सड़क के साथ फुटपाथ बनाना होगा, जिसके लिए नगर निगमों के पास वित्तीय बजटीय क्षमता का अभाव है। इससे न्यायपालिका के आदेशों की अवहेलना का खतरा बढ़ता है।
- अधिकारों का अवमूल्यन (Dilution of Rights): कुछ न्यायविदों का तर्क है कि यदि हर बुनियादी नागरिक सुविधा या इच्छा को ‘मौलिक अधिकार’ घोषित कर दिया जाएगा, तो मौलिक अधिकारों की जो अपनी एक विशेष “पवित्रता और सर्वोच्चता” है, वह धीरे-धीरे कमज़ोर (Dilute) हो सकती है।
पूर्व के कुछ प्रमुख विस्तारवादी निर्णय (Milestone Judgments)
न्यायपालिका ने दशकों से इन अनुच्छेदों का दायरा बढ़ाया है:
| मामला (Case) | विस्तारित अधिकार (Expanded Right) | संबद्ध अनुच्छेद |
| मेनका गांधी वाद (1978) | विदेश यात्रा का अधिकार और “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” को “न्यायोचित और निष्पक्ष” होना चाहिए। | अनुच्छेद 21 |
| के.एस. पुट्टास्वामी वाद (2017) | निजता का अधिकार (Right to Privacy) को मौलिक अधिकार माना गया। | अनुच्छेद 21 |
| अनुराधा भसीन वाद (2020) | इंटरनेट तक पहुंच और इंटरनेट के माध्यम से व्यापार/अभिव्यक्ति को मौलिक अधिकार का हिस्सा माना गया। | अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(g) |
| मनियार इलियाज़ वाद (2026) | चिह्नित और सुरक्षित फुटपाथ पर चलने का अधिकार। | अनुच्छेद 19(1)(d) और 21 |
आगे की राह (Way Forward)
न्यायिक विस्तारवाद अपने आप में त्रुटिपूर्ण नहीं है, बशर्ते वह एक सीमा के भीतर हो।
- न्यायिक संयम (Judicial Restraint): न्यायपालिका को अधिकारों की घोषणा करते समय राज्यों की वित्तीय और प्रशासनिक सीमाओं का ध्यान रखना चाहिए। नीतियां बनाने का काम अंतिम रूप से कार्यपालिका पर ही छोड़ दिया जाना चाहिए।
- संवैधानिक समन्वय (Constitutional Harmony): कोर्ट द्वारा अधिकार घोषित किए जाने के बाद विधायिका को त्वरित कदम उठाते हुए (जैसे विधि आयोग और विभिन्न मंत्रालयों को दिए गए निर्देशों के तहत) मजबूत विधायी ढांचे का निर्माण करना चाहिए ताकि अधिकार केवल कागजों पर न रहें।
निष्कर्ष: न्यायपालिका द्वारा किया गया यह विस्तार भारतीय नागरिकों को बदलते समय के खतरों से सुरक्षा कवच प्रदान करता है। हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कार्यपालिका इन अधिकारों को कितनी संजीदगी से नीतिगत स्तर पर लागू करती है।