14 August 2026 PIB Summary for UPSC in Hindi Pdf के अंतर्गत पारंपरिक सोवा-रिग्पा चिकित्सा प्रणाली में उत्कृष्ट योगदान हेतु डॉ. पदमा गुरमेत को प्राप्त यूटी लद्दाख राज्य पुरस्कार, भारत के पहले रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPM) मैन्युफैक्चरिंग मिशन, अंतर्राष्ट्रीय मानकों के आधार पर पर्यटन स्थलों के एकीकृत विकास हेतु SASCI योजना, अंतरिक्ष सततता को बढ़ावा देने वाले ISRO के ‘डेब्रिस फ्री स्पेस मिशन’, महिला पुलिस व सुरक्षा अधिकारियों हेतु ‘साइबरशक्ति’ क्षमता निर्माण कार्यक्रम, SMILE-Beggary पुनर्वास योजना, आयुष व पारंपरिक औषधियों के वैश्विक मानकीकरण हेतु “One Herb, One Standard” पहल, तथा दूरस्थ क्षेत्रों तक शुद्ध खाद्य सुनिश्चित करने वाली मोबाइल फूड टेस्टिंग प्रयोगशालाओं के लिए भारत की पहली प्रत्यायन योजना (Accreditation Scheme) का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
डॉ. पदमा गुरमेत को सोवा-रिग्पा चिकित्सा में उत्कृष्ट सेवा के लिए यूटी लद्दाख राज्य पुरस्कार
- प्रारंभिक परीक्षा: भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियां (आयुष), सोवा-रिग्पा, लद्दाख की सांस्कृतिक विरासत और प्रमुख संस्थाएं।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 2 & 3): स्वास्थ्य एवं सामाजिक क्षेत्र का विकास, आयुष प्रणालियों का संवर्धन, पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण और क्षेत्रीय विकास।
चर्चा में क्यों?
लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोवा-रिग्पा, लेह के निदेशक डॉ. पदमा गुरमेत को वर्ष 2025 के ‘यूटी लद्दाख राज्य पुरस्कार’ से सम्मानित किया। यह पुरस्कार उन्हें लद्दाख की पारंपरिक ‘सोवा-रिग्पा’ चिकित्सा प्रणाली के संरक्षण, प्रचार और विकास में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया गया है। इस राज्य पुरस्कार समारोह में वर्ष 2022 से 2025 के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में अनुकरणीय सेवा देने वाली 36 हस्तियों को सम्मानित किया गया।
मुख्य बिंदु: सोवा-रिग्पा प्रणाली और राष्ट्रीय संस्थान का योगदान
1. पुरस्कार का महत्व और दृष्टिकोण
- उत्कृष्टता का सम्मान: इस पुरस्कार का मुख्य उद्देश्य समाज पर सकारात्मक प्रभाव डालने वाले व्यक्तियों के योगदान को पहचानना है।
- युवाओं के लिए प्रेरणा: यह पहल केंद्र शासित प्रदेश के युवाओं को पारंपरिक ज्ञान और सामाजिक कल्याण के क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।
2. सोवा-रिग्पा चिकित्सा प्रणाली क्या है?
- प्राचीन चिकित्सा पद्धति: ‘सोवा-रिग्पा’ (भोट भाषा में अर्थ: ‘आरोग्य का विज्ञान’) दुनिया की सबसे पुरानी और जीवित पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में से एक है।
- क्षेत्रीय प्रसार: यह मुख्य रूप से हिमालयी क्षेत्रों जैसे लद्दाख, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश (लाहुल-स्पीति) और पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग क्षेत्र में प्रचलित है।
- सिद्धांत: यह प्रणाली आयुर्वेद, बौद्ध दर्शन और चीनी चिकित्सा सिद्धांतों का एक अनूठा मिश्रण है, जो शरीर और मन के संतुलन पर केंद्रित है।
3. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोवा-रिग्पा (NISR), लेह
- स्थापना व नोडल मंत्रालय: यह संस्थान आयुष मंत्रालय (Ministry of Ayush) के तहत लेह में स्थापित एक स्वायत्त संस्था है।
- भूमिका: यह सोवा-रिग्पा पद्धति में उच्च शिक्षा, अनुसंधान, जड़ी-बूटी संरक्षण और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने वाली शीर्ष संस्था है।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| घटक / बिंदु | महत्वपूर्ण तथ्य |
| पुरस्कार प्राप्तीकर्ता | डॉ. पदमा गुरमेत (निदेशक, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोवा-रिग्पा)। |
| सम्मानित संस्था/संस्थान | नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोवा-रिग्पा (NISR), लेह। |
| नोडल मंत्रालय | आयुष मंत्रालय (Ministry of Ayush)। |
| सोवा-रिग्पा का अर्थ | ‘आरोग्य का विज्ञान’ (Science of Healing)। |
| अन्य नाम | इसे आमतौर पर ‘अमची चिकित्सा प्रणाली’ (Amchi System) भी कहा जाता है। |
भारत का पहला रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPM) मैन्युफैक्चरिंग मिशन
- प्रारंभिक परीक्षा: खनिज संसाधन, दुर्लभ मृदा तत्व (Rare Earth Elements), भारी उद्योग मंत्रालय की योजनाएं।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 3): औद्योगिक नीति, प्रौद्योगिकी का स्वदेशीकरण, आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा और नेट ज़ीरो 2070।
चर्चा में क्यों?
भारी उद्योग मंत्रालय (MHI) ने ‘सिनटर्ड रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPM) योजना’ के तहत ग्लोबल टेंडर में 20 दिग्गज कंपनियों की बोलियां प्राप्त कीं। इस योजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नवंबर 2025 में मंजूरी दी थी। इसके माध्यम से भारत में एकीकृत ‘NdFeB REPM’ निर्माण सुविधाएं स्थापित की जाएंगी। यह कदम देश को क्रिटिकल मिनरल्स और आधुनिक तकनीक में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर है।
मुख्य बिंदु: योजना की संरचना, उद्देश्य और रणनीतिक महत्व
1. योजना का वित्तीय ढांचा और लक्ष्य
- कुल बजट: ₹7,280 करोड़ का वित्तीय परिव्यय।
- उत्पादन क्षमता: भारत में कुल 6,000 मीट्रिक टन प्रति वर्ष (MTPA) क्षमता स्थापित करने का लक्ष्य है।
- आवंटन मॉडल: वैश्विक प्रतिस्पर्धी बोली से 5 लाभार्थियों का चयन होगा। प्रत्येक को अधिकतम 1,200 MTPA क्षमता मिलेगी।
- समयसीमा (7 वर्ष): संयंत्र स्थापना के लिए 2 वर्ष की गेस्टेशन अवधि और बिक्री पर इंसेंटिव (Disbursement) के लिए अगले 5 वर्ष।
2. प्रमुख बोलीदाता और निजी क्षेत्र की भागीदारी
- इस टेंडर में कोल इंडिया, एल एंड टी, रीन्यू प्राइवेट लिमिटेड और एटेरो रीसाइक्लिंग जैसी 20 प्रमुख कंपनियों व कंसोर्टियम ने आवेदन किया है।
- यह सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की साझा भागीदारी को दर्शाता है।
3. REPM का उपयोग और भारत के लिए महत्व
- अत्यधिक शक्तिशाली चुंबक: ‘सिनटर्ड नियोडिमियम-आयरन-बोरॉन’ (NdFeB) दुनिया के सबसे शक्तिशाली चुंबकों में से एक हैं।
- प्रमुख अनुप्रयोग:
- इलेक्ट्रिक वाहन (EVs): ड्राइव मोटर के निर्माण में।
- नवीकरणीय ऊर्जा: पवन टर्बाइन (Wind Turbines) में।
- अन्य क्षेत्र: रक्षा प्रणाली, एयरोस्पेस और हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक्स।
- आयात निर्भरता में कमी: NdPr ऑक्साइड से लेकर तैयार मैग्नेट तक संपूर्ण घरेलू वैल्यू चेन बनेगी। इससे विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता घटेगी।
- नेट ज़ीरो 2070 लक्ष्य: यह मिशन हरित ऊर्जा तकनीकों को सुरक्षित करके भारत के जलवायु लक्ष्यों का समर्थन करता है।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| घटक / बिंदु | महत्वपूर्ण तथ्य |
| नोडल मंत्रालय | भारी उद्योग मंत्रालय (MHI)। |
| कुल योजना बजट | ₹7,280 करोड़। |
| लक्ष्य क्षमता | 6,000 MTPA (5 लाभार्थी, प्रत्येक 1,200 MTPA)। |
| योजना की कुल अवधि | 7 वर्ष (2 वर्ष सेटअप + 5 वर्ष इंसेंटिव)। |
| मुख्य प्रयुक्त सामग्री | NdFeB (नियोडिमियम-आयरन-बोरॉन)। |
SASCI योजना: वैश्विक स्तर के प्रतिष्ठित पर्यटन केंद्रों का विकास
- प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय योजनाएं, SASCI योजना, पर्यटन मंत्रालय, प्रमुख सांस्कृतिक एवं भौगोलिक स्थल।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 2 & 3): केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध (राजकोषीय संघवाद), अवसंरचना विकास (पर्यटन), रोजगार सृजन और सतत विकास।
चर्चा में क्यों?
केंद्रीय पर्यटन और संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने राज्यसभा में SASCI योजना के क्रियान्वयन की जानकारी दी। भारत सरकार ने देश के पर्यटन स्थलों को वैश्विक स्तर के आइकॉनिक केंद्रों में बदलने के लिए वित्त वर्ष 2024-25 में 23 राज्यों की 40 परियोजनाओं के लिए ₹3,295.76 करोड़ की शत-प्रतिशत (100%) केंद्रीय वित्तीय सहायता स्वीकृत की है। इसके अतिरिक्त, संशोधित दिशा-निर्देशों के तहत नागालैंड, मिजोरम और हिमाचल प्रदेश को ₹250-250 करोड़ की विशेष सहायता जारी की गई है।
मुख्य बिंदु: योजना की संरचना, मानदंड और डिजिटल निगरानी
1. वित्तपोषण और नया नीतिगत बदलाव
- 100% केंद्रीय वित्तपोषण: 2024-25 में मंजूर सभी 40 प्रोजेक्ट्स शत-प्रतिशत केंद्रीय सहायता पर आधारित हैं।
- संशोधित नियम (2025-26): व्यय विभाग (Department of Expenditure) के नए नियमों के तहत जिन राज्यों ने 2024-25 में पार्ट-III के तहत फंड नहीं लिया, उन्हें 2025-26 के पार्ट-II में पर्यटन परियोजनाओं के लिए ₹250 करोड़ तक की विशेष सहायता मिलेगी।
2. परियोजनाओं के चयन के प्रमुख मानदंड
पर्यटन मंत्रालय ने राज्यों द्वारा सौंपी गई विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) का मूल्यांकन इन मानकों पर किया:
- कनेक्टिविटी व क्षमता: साइट तक पहुँच, मौजूद पर्यटन ढांचा और क्षेत्र की वहन क्षमता (Carrying Capacity)।
- आर्थिक प्रभाव: पर्यटकों की संख्या और उनके खर्च में वृद्धि, नए रोजगार के अवसर और निजी निवेश को आकर्षित करने की क्षमता।
3. अंतर-मंत्रालयी समन्वय और ‘PMIS’ डिजिटल प्लेटफॉर्म
- संस्थागत ढांचा: केंद्रीय स्वीकृति व निगरानी समिति (CSMC) में नागरिक उड्डयन, सड़क परिवहन, रेल, संस्कृति, पर्यावरण और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) सहित प्रमुख मंत्रालयों के प्रतिनिधि शामिल हैं।
- PMIS प्लेटफॉर्म: परियोजनाओं की रीयल-टाइम मॉनिटरिंग और पारदर्शी रिपोर्टिंग के लिए ‘प्रोग्राम मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम (PMIS)’ नाम से एक एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किया गया है।
4. देश की प्रमुख स्वीकृत पर्यटन परियोजनाएं (राज्यवार झलक)
- आंध्र प्रदेश: गंडीकोटा किला और अखाड़ा गोदावरी (हवलॉक ब्रिज)।
- गुजरात: धोर्डो में टेंटेड सिटी (100% पूर्ण होने वाला एकमात्र प्रोजेक्ट)।
- महाराष्ट्र: सिंधुदुर्ग में INS-गुलदार अंडरवाटर म्यूजियम व पनडुब्बी पर्यटन; नासिक में राम-काल पथ।
- मध्य प्रदेश: ओरछा हेरिटेज विकास और भोपाल में अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर।
- उत्तर प्रदेश: बटेश्वर (आगरा) विकास और श्रावस्ती में एकीकृत बौद्ध पर्यटन।
- उत्तराखंड: ऋषिकेश में राफ्टिंग बेस स्टेशन।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| घटक / बिंदु | महत्वपूर्ण तथ्य |
| योजना का पूरा नाम | राज्यों को पूंजीगत निवेश के लिए विशेष सहायता (SASCI)। |
| नोडल मंत्रालय | पर्यटन मंत्रालय (वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग के सहयोग से)। |
| 2024-25 कुल बजट | ₹3,295.76 करोड़ (23 राज्यों में 40 प्रोजेक्ट्स)। |
| डिजिटल ट्रैकिंग टूल | PMIS (प्रोग्राम मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम)। |
| पहला पूर्ण प्रोजेक्ट | धोर्डो (गुजरात) टेंटेड सिटी और कन्वेंशन सेंटर। |
अंतरिक्ष कचरा प्रबंधन एवं ISRO का ‘डेब्रिस फ्री स्पेस मिशन’
- प्रारंभिक परीक्षा: ISRO, अंतरिक्ष कचरा (Space Debris), LEO उपग्रह तारामंडल, ‘डेब्रिस फ्री स्पेस मिशन’, IS4OM, IADC और UN-COPUOS।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 3): विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियां, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष कचरा प्रबंधन, अंतर्राष्ट्रीय संधियां और अंतरिक्ष सुरक्षा।
चर्चा में क्यों?
केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने राज्यसभा में जानकारी दी कि ISRO लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में सैटेलाइट इंटरनेट नेटवर्क (जैसे स्टारलिंक, वनवेब) के कारण तेजी से बढ़ते अंतरिक्ष कचरे (Space Debris) से निपटने के लिए ठोस कदम उठा रहा है। ISRO का फ्लैगशिप ‘डेब्रिस फ्री स्पेस मिशन’ (DFSM) और एक्टिव डेब्रिस रिमूवल (ADR) जैसी तकनीकें भारत की अंतरिक्ष संपत्तियों को सुरक्षित करने और अंतरिक्ष के सतत उपयोग में अहम भूमिका निभा रही हैं।
मुख्य बिंदु: अंतरिक्ष कचरा, चुनौतियां और भारत का सुरक्षा ढांचा
1. LEO उपग्रहों की बढ़ती संख्या से उपजी चुनौतियां
- टक्कर का बढ़ता जोखिम: इंटरनेट उपग्रहों के तारामंडलों (Constellations) में हजारों उपग्रह एक साथ काम करते हैं। यदि कोई उपग्रह कक्षा में खराब होकर अनियंत्रित हो जाए, तो दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता है।
- अदृश्य कचरे का खतरा: छोटे आकार का कचरा ट्रैकिंग सिस्टम की पकड़ में नहीं आता। इससे टकराने पर उपग्रह पूरी तरह नष्ट हो सकता है।
- केसलर सिंड्रोम: एक भी टक्कर से उपजे मलबे की श्रृंखला अन्य उपग्रहों को नष्ट कर सकती है, जिससे पूरी कक्षा इस्तेमाल के लायक नहीं रहेगी।
2. ISRO की पहल: डेब्रिस फ्री स्पेस मिशन (DFSM)
- लक्ष्य: भारत के सभी भावी अंतरिक्ष मिशनों को ऐसा बनाना जिससे संचालन समाप्त होने के बाद कक्षा में कोई मलबा न बचे।
- एक्टिव डेब्रिस रिमूवल (ADR): पुराने या निष्क्रिय उपग्रहों को तकनीक के जरिए कक्षा से हटाकर पृथ्वी के वायुमंडल में लाकर नष्ट करना।
- IN-SPACe दिशानिर्देश (2024): भारत के निजी और सरकारी सभी स्पेस ऑपरेटरों को ‘पोस्ट-मिशन डिस्पोजल’ के नियमों का अनिवार्य पालन करना होगा।
3. अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत की भागीदारी
- IADC (Inter-Agency Space Debris Coordination Committee): ISRO 1996 से इसका सक्रिय सदस्य है। यह संस्था स्पेस डेब्रिस की निगरानी और गाइडलाइंस तैयार करती है।
- UN-COPUOS: भारत संयुक्त राष्ट्र की ‘बाहरी अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग की समिति’ और इसके SSA (स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस) कार्य समूह में तकनीकी योगदान देता है।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| घटक / बिंदु | महत्वपूर्ण तथ्य |
| IADC सदस्यता | ISRO वर्ष 1996 से IADC का सदस्य है (IADC की स्थापना 1993 में हुई थी)। |
| IS4OM | ISRO का ‘सिस्टम फॉर सेफ एंड सस्टेनेबल स्पेस ऑपरेशन्स मैनेजमेंट’ (स्पेस डेब्रिस ट्रैकिंग सेंटर)। |
| ADR | एक्टिव डेब्रिस रिमूवल। |
| भारतीय अंतरिक्ष नीति | अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत ‘एंड-ऑफ-लाइफ’ निपटान नियमों का पालन अनिवार्य बनाती है। |
| IN-SPACe NGP 2024 | निजी अंतरिक्ष कंपनियों के लिए पोस्ट-मिशन डिस्पोजल नियम लागू करता है। |
महिला अधिकारियों की साइबर सुरक्षा क्षमता निर्माण हेतु साइबरशक्ति कार्यक्रम
- प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय योजनाएं, साइबरशक्ति कार्यक्रम, गृह मंत्रालय / सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की पहल, महिला सशक्तिकरण।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 2 & 3): सरकारी नीतियों का प्रभाव, महिला सशक्तिकरण, आंतरिक सुरक्षा, साइबर सुरक्षा ढांचा और अपराध नियंत्रण।
चर्चा में क्यों?
सरकार ने महिला सशक्तिकरण पर संसदीय स्थायी समिति (2026) की सिफारिशों पर संज्ञान लेते हुए ‘साइबरशक्ति’ कार्यक्रम के विस्तार को हरी झंडी दी है। अक्टूबर 2024 में दो साल के लिए शुरू की गई इस योजना का मुख्य उद्देश्य महिला पुलिसकर्मियों और सरकारी महिला अधिकारियों को साइबर सुरक्षा में दक्ष बनाना है। मई 2026 में साइबर सुरक्षा वर्किंग ग्रुप द्वारा इसके दूसरे चरण की सिफारिश के बाद, अब इस पहल को व्यापक स्तर पर लागू करने की तैयारी है। इसके तहत ऑनलाइन और ऑफलाइन प्रशिक्षण के माध्यम से महिला अधिकारियों का कौशल विकास किया जा रहा है, ताकि वे साइबर अपराधों से प्रभावी ढंग से निपट सकें।
मुख्य बिंदु: कार्यक्रम का दायरा, तालिम का ढांचा और आंकड़े
1. ‘साइबरशक्ति’ कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य
- क्षमता निर्माण: महिला सरकारी अधिकारियों, महिला पुलिस कर्मियों और साइबर सेल कर्मियों के साइबर कौशल को बढ़ाना।
- पीड़ितों की सहायता: साइबर अपराध की शिकार महिलाओं से निपटने वाली महिला अधिकारियों को तकनीकी रूप से दक्ष बनाना।
2. प्रशिक्षण का मॉडल और व्यापकता
- प्रशिक्षण का तरीका: यह दो तरह से दिया जाता है:
- 2-सप्ताह ऑनलाइन ट्रेनिंग: वर्चुअल इंस्ट्रक्टर-लेड ट्रेनिंग (VILT) मोड।
- 1-सप्ताह ऑफलाइन ट्रेनिंग: आवासीय (Residential) प्रशिक्षण कार्यक्रम।
- वेबिनार और संवेदीकरण: प्रशिक्षण के अलावा 573 से अधिक महिला प्रतिभागियों ने साइबर सुरक्षा जागरूकता वेबिनार में भाग लिया।
3. अब तक की प्रगति और राज्यवार आंकड़े
- कुल प्रशिक्षित अधिकारी: 2024 से अब तक कुल 978 महिला सरकारी अधिकारियों को प्रशिक्षित किया जा चुका है।
- राज्यों की स्थिति (694 कुल):
- गुजरात: 81 (राज्यों में सबसे अधिक)
- कर्नाटक: 73
- तमिलनाडु: 64
- महाराष्ट्र: 53
- उत्तर प्रदेश: 45
- केंद्र शासित प्रदेश (284 कुल):
- दिल्ली: 249 (यूटी में सबसे अधिक)
प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| घटक / बिंदु | महत्वपूर्ण तथ्य |
| कार्यक्रम का नाम | साइबरशक्ति |
| प्रारंभ वर्ष | अक्टूबर 2024 (प्रथम चरण: 2 वर्ष) |
| लक्ष्य समूह | महिला पुलिस अधिकारी, साइबर सेल कर्मी और महिला सरकारी कर्मचारी |
| प्रशिक्षण मोड | VILT ऑनलाइन (2 सप्ताह) + ऑफलाइन रेसिडेंशियल (1 सप्ताह) |
| सर्वाधिक प्रशिक्षित (राज्य) | गुजरात (81) |
| सर्वाधिक प्रशिक्षित (UT) | दिल्ली (249) |
SMILE-Beggary योजना: भिक्षावृत्ति में लगे लोगों के लिए पुनर्वास ढांचा
- प्रारंभिक परीक्षा: सामाजिक न्याय, SMILE योजना, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, कमजोर वर्ग (Vulnerable Sections)।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 2): अति संवेदनशील वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं, गरीबी व भुखमरी से जुड़े मुद्दे, सामाजिक न्याय, सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख दिशानिर्देश।
चर्चा में क्यों?
सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री बी.एल. वर्मा ने लोकसभा में ‘स्माइल-बैगरी’ योजना की प्रगति साझा की। 23 अक्टूबर 2023 को अपनी शुरुआत से लेकर 31 जुलाई 2026 तक इस योजना के तहत ₹45.59 करोड़ जारी किए जा चुके हैं। इसमें से ₹40.04 करोड़ सीधे लागू करने वाले निकायों को दिए गए। इस पहल से अब तक 10,446 लोगों का पुनर्वास हुआ है, जिनमें 2,824 बच्चे शामिल हैं। इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर शेल्टर होम के लिए नए मॉडल दिशानिर्देश भी लागू किए गए हैं।
मुख्य बिंदु: पुनर्वास ढांचा, कौशल विकास और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
1. बच्चों और वयस्कों के लिए अलग पुनर्वास रणनीति
- बच्चों पर केंद्रित प्रयास: बचाए गए 2,824 बच्चों को व्यावसायिक प्रशिक्षण के बजाय उम्र के अनुकूल शिक्षा, देखभाल, काउंसलिंग और परिवार से मिलाने पर जोर दिया जा रहा है।
- वयस्कों का कौशल विकास (Vocational Training): 7,622 वयस्क लाभार्थियों को बढ़ईगीरी, सिलाई, हाउसकीपिंग, ई-रिक्शा संचालन और खाना पकाने जैसे स्थानीय रोजगार से जोड़ा गया।
- वित्तीय सहायता व स्वयं सहायता समूह (SHG): लाभार्थियों को SHG गठित करने में मदद दी जा रही है। उन्हें टिफिन स्टॉल, सब्जी ठेले और मसाले/अचार बनाने जैसे स्वरोजगार के लिए बैंकों से क्रेडिट लिंक कराया जा रहा है।
2. राज्यवार पुनर्वास की स्थिति (शीर्ष राज्य)
- तमिलनाडु: 1,557 वयस्क लाभार्थियों के पुनर्वास के साथ देश में सबसे आगे है।
- अन्य प्रमुख राज्य: मध्य प्रदेश (1,135), उत्तर प्रदेश (884), और महाराष्ट्र (817) का स्थान इसके बाद आता है।
3. सुप्रीम कोर्ट का आदेश और मॉडल गाइडलाइंस (13 अप्रैल 2026)
- एम.एस. पट्टर बनाम दिल्ली एनसीटी राज्य मामला (2025): इस फैसले के अनुपालन में सामाजिक न्याय मंत्रालय ने शेल्टर होम के लिए मॉडल दिशानिर्देश बनाए।
- राष्ट्रीय परामर्श समिति: इसमें कानून, स्वास्थ्य, शहरी विकास, महिला व बाल विकास मंत्रालय, NHRC और NGO शामिल थे।
- न्यूनतम मानक: इन दिशानिर्देशों का मकसद बुनियादी ढांचा, पोषण, मुफ्त कानूनी सहायता, बाल व लैंगिक संवेदनशीलता और रहने की मानवीय स्थिति तय करना है।
4. टेक-संचालित निगरानी प्रणाली
- समर्पित मोबाइल ऐप: भिक्षावृत्ति में लगे लोगों की पहचान, प्रोफाइलिंग और व्यापक सर्वेक्षण के लिए एक विशेष मोबाइल ऐप बनाया गया है।
- डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम: राज्यों को हर निवासी के स्वास्थ्य, कौशल विकास, परिवार से मिलन और रीलीज़ का रियल-टाइम डेटा नेशनल ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज करना अनिवार्य है।

- द्विवार्षिक ऑडिट (Third-Party Audit): प्रत्येक शेल्टर होम का हर 2 साल में कम से कम एक बार इंफ्रास्ट्रक्चर और सोशल ऑडिट होगा। यह ऑडिट भवन की सुरक्षा, दिव्यांग-अनुकूल व्यवस्था और ओवरक्राउडिंग रोकने के मानकों की जांच करेगा।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| घटक / बिंदु | महत्वपूर्ण तथ्य |
| योजना का पूरा नाम | SMILE (Support for Marginalized Individuals for Livelihood and Enterprise) |
| नोडल मंत्रालय | सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय। |
| योजना की शुरुआत | 23 अक्टूबर 2023 (Beggary Sub-scheme) |
| कुल पुनर्वास (31 जुलाई 2026 तक) | 10,446 व्यक्ति (7,622 वयस्क + 2,824 बच्चे)। |
| शीर्ष पुनर्वास वाला राज्य | तमिलनाडु (1,557 वयस्क)। |
| सुप्रीम कोर्ट केस | एम.एस. पट्टर बनाम दिल्ली एनसीटी राज्य (2025)। |
“One Herb, One Standard” पहल: पारंपरिक दवाओं की गुणवत्ता और विश्वसनीयता का सुदृढ़ीकरण
- प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय पहल, आयुष मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, PCIM&H, IPC, “One Herb, One Standard” पहल, औषधीय पौधे।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 2 & 3): स्वास्थ्य क्षेत्र का विकास, सरकारी नीतियां, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस, पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियां, वैज्ञानिक मानकीकरण, वैश्विक निर्यात एवं व्यापार।
चर्चा में क्यों?
नई दिल्ली के कर्तव्य भवन में आयुष मंत्रालय के अंतर्गत PCIM&H और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत IPC ने “One Herb, One Standard” पहल को लागू करने के लिए अपने समझौता ज्ञापन (MoU) का नवीनीकरण किया। इस अवसर पर आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रतापराव जाधव ने घोषणा की कि यह तीन साल का नवीनीकृत समझौता औषधीय पौधों के लिए एकीकृत वैज्ञानिक मानक स्थापित करेगा। यह पहल भारतीय पारंपरिक दवाओं की वैश्विक विश्वसनीयता और निर्यात क्षमता बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
मुख्य बिंदु: पहल का उद्देश्य, अंतर-मंत्रालयी सहयोग और आर्थिक प्रभाव
1. “One Herb, One Standard” पहल का मूल उद्देश्य
- एकीकृत मानक (Uniform Standards): आयुर्वेद, सिद्ध, सोवा-रिगपा, यूनानी, होम्योपैथी और आधुनिक फार्माकोपोइया में इस्तेमाल होने वाली एक ही जड़ी-बूटी के अलग-अलग मानकों को समाप्त कर एक साझा वैज्ञानिक मानक तय करना।
- भ्रम का निवारण: विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों के बीच एक ही औषधीय पौधे के मानकों में विरोधाभास खत्म होगा। इससे उत्पादकों, निर्यातकों और टेस्टिंग लैब्स को स्पष्ट दिशानिर्देश मिलेंगे।
2. संस्थागत साझेदारी और तीन-वर्षीय फ्रेमवर्क
- दो प्रमुख मंत्रालयों का सहयोग: आयुष मंत्रालय की PCIM&H और स्वास्थ्य मंत्रालय की IPC मिलकर काम कर रही हैं।
- सफल पहला चरण (2022 से): वर्ष 2022 में शुरू हुए इस सहयोग के पहले चरण में औषधीय पौधों के 50 मोनोग्राफ सफलतापूर्वक विकसित किए गए थे।
- अगला लक्ष्य: नया तीन-वर्षीय समझौता भारतीय मानकों को अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता आवश्यकताओं के अनुरूप बनाएगा, जिससे वैश्विक फार्मा बाजार में भारतीय उत्पादों की स्वीकार्यता बढ़ेगी।
3. ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और वैश्विक लाभ
- व्यापार में सुगमता: स्पष्ट और सार्वभौमिक मानकों से दवा निर्माताओं और निर्यातकों के लिए विनियामक प्रक्रियाएं (Regulatory processes) सरल और पारदर्शी होंगी।

- वैश्विक मानक-निर्धारक के रूप में भारत: यह कदम भारत की जैव विविधता का संरक्षण करते हुए देश को पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में एक विश्वसनीय वैश्विक लीडर बनाएगा।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| घटक / बिंदु | महत्वपूर्ण तथ्य |
| पहल का नाम | “One Herb, One Standard” (एक जड़ी-बूटी, एक मानक) |
| संबंधित निकाय | PCIM&H (आयुष मंत्रालय) + IPC (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय) |
| नवीनीकरण अवधि | 3 वर्ष (पहले चरण 2022 की सफलता के बाद) |
| प्रथम चरण की उपलब्धि | 50 औषधीय पौधों के मोनोग्राफ विकसित किए गए |
| शामिल प्रणालियां | आयुर्वेद, सिद्ध, सोवा-रिगपा, यूनानी, होम्योपैथी व एलोपैथी |
मोबाइल फूड टेस्टिंग प्रयोगशालाओं के लिए भारत की पहली प्रत्यायन योजना (Accreditation Scheme)
- प्रारंभिक परीक्षा: NABL, QCI, DPIIT, मोबाइल फूड टेस्टिंग प्रयोगशालाएं, ‘गुणवत्ता समन्वय’ पहल।
- मुख्य परीक्षा (GS Paper 2 & 3): खाद्य सुरक्षा, उपभोक्ता संरक्षण, गुणवत्ता अवसंरचना, नियामक समन्वय, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस।
चर्चा में क्यों?
नई दिल्ली के होटल अशोक में आयोजित ‘गुणवत्ता समन्वय’ समारोह के दौरान क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया (QCI) के घटक निकाय NABL ने मोबाइल फूड टेस्टिंग प्रयोगशालाओं के लिए देश की पहली प्रत्यायन योजना (Accreditation Scheme) लॉन्च की। इस अवसर पर उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (DPIIT) के सचिव अमरदीप सिंह भाटिया और NABL व QCI के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। कार्यक्रम में बहुस्तरीय समझौता ज्ञापनों (MoU Exchange) का आदान-प्रदान भी हुआ, जिसका उद्देश्य खाद्य परीक्षण में नियामक दक्षता और गुणवत्ता बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है।
मुख्य बिंदु: योजना की विशेषताएं, संस्थागत ढांचा और प्रभाव
1. मोबाइल फूड टेस्टिंग प्रत्यायन योजना की प्रमुख विशेषताएं
- सुलभ व विश्वसनीय परीक्षण: इसका उद्देश्य दूरदराज और स्थानीय समुदायों तक अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप खाद्य परीक्षण सेवाएं पहुंचाना है।
- त्वरित नियामक कार्रवाई: पारंपरिक प्रयोगशालाओं से बाहर एकीकृत परीक्षण प्रणाली मिलने से खाद्य सुरक्षा निगरानी तेज होगी। इससे मिलावट पर लगाम लगेगी और उपभोक्ता विश्वास बढ़ेगा।
2. ‘गुणवत्ता समन्वय’ और एकीकृत मूल्यांकन ढांचा (IAF)
- नियामक एकीकरण: विभिन्न नियामक निकायों और कमोडिटी बोर्डों के बीच समन्वय स्थापित किया गया है।
- दोहराव में कमी: एकीकृत मूल्यांकन ढांचे (Integrated Assessment Framework) से बार-बार होने वाले परीक्षणों के दोहराव को रोका जा सकेगा। इससे समय और लागत दोनों की बचत होगी।

- ईज ऑफ डूइंग बिजनेस: गुणवत्ता और अनुपालन के उच्च मानकों को बनाए रखते हुए कारोबारी सुगमता को बढ़ावा मिलेगा।
3. प्रमुख संस्थाएं और उनका दायित्व
- NABL: नेशनल एक्रिडिटेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लेबोरेटरीज (योजना की रूपरेखा तैयार करने वाला निकाय)।
- QCI: क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया (भारत में गुणवत्ता इकोसिस्टम की शीर्ष संस्था)।
- DPIIT: वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के तहत नोडल विभाग।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| घटक / बिंदु | महत्वपूर्ण तथ्य |
| योजना का नाम | मोबाइल फूड टेस्टिंग लेबोरेटरीज के लिए प्रत्यायन योजना |
| प्रारंभकर्ता निकाय | NABL (QCI का एक घटक बोर्ड) |
| संबंधित विभाग | DPIIT, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय |
| समारोह का नाम | ‘गुणवत्ता समन्वय’ (Gunvatta Samanvaya) |
| मुख्य उद्देश्य | दूरदराज तक गुणवत्तापूर्ण खाद्य परीक्षण और नियामक एकीकरण |