NCERT Notes Class 7 Social science (Geography) Chapter 8: How the Land Becomes Sacred के अंतर्गत विभिन्न धार्मिक परंपराओं (जैसे हिंदू, बौद्ध, जैन, सूफी और अन्य लोक पंथों) ने प्रकृति के विशिष्ट घटकों और ऐतिहासिक स्थलों को अपने विश्वासों के साथ जोड़कर ‘सांस्कृतिक परिदृश्य’ का निर्माण किया। इसमें तीर्थाटन की अवधारणा, पवित्र नदियों और पर्वत शिखरों के महत्व, संतों व ऋषियों के निवास स्थलों से जुड़े इतिहास और मंदिरों, स्तूपों, दरगाहों तथा मठों की स्थापना से भूमि के पवित्र बनने के कारणों को गहराई से समझाया गया है।और यह भी रेखांकित करता है कि कैसे ये पवित्र स्थल विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को आपस में जोड़कर राष्ट्रीय और सांस्कृतिक एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
‘पावनता’ क्या है? (What is ‘Sacredness’?)
- मूल अर्थ: धार्मिक या आध्यात्मिक महत्व की वस्तु, स्थान या मार्ग, जो गहरी श्रद्धा और पूज्यता जगाए।
- व्यापक दायरा: पवित्रता केवल धर्म से नहीं, बल्कि भूगोल, स्थानीय परंपराओं और आध्यात्मिक यात्राओं से भी जुड़ी है।
- तीर्थयात्रा (Pilgrimage): किसी पवित्र स्थान की विशेष आध्यात्मिक यात्रा।
- तीर्थ का प्रतीक:
- शाब्दिक अर्थ: नदी या जल निकाय को पार करने का स्थान।
- आध्यात्मिक अर्थ: साधारण सांसारिक जीवन से उच्च आध्यात्मिक जीवन की ओर पार उतरने का पवित्र स्थल।
बाहर से आए धर्मों के पवित्र स्थल (Religions of Foreign Origin)
- शामिल धर्म: इस्लाम, ईसाई, अहूदी, और पारसी।
- विशेषता: इन स्थानों पर लोग प्रार्थना, पूजा और विशेष अवसरों पर तीर्थयात्रा के लिए एकत्र होते हैं।
- सांस्कृतिक सद्भाव: अजमेर शरीफ दरगाह (राजस्थान) और वेलंकन्नी चर्च (तमिलनाडु) में सभी धर्मों के लोग जाते हैं।
भारत में जन्मे धर्मों के पवित्र स्थल (Indigenously Originated Religions)
1. बौद्ध धर्म
- सांची का महान स्तूप (मध्य प्रदेश): यह एक धातु स्तूप है, जहाँ बुद्ध या उनके शिष्यों के अवशेष (Relics) संरक्षित हैं।
- महाबोधि स्तूप (बोधगया, बिहार): बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति (Enlightenment) का स्थान; यहाँ प्रतिवर्ष 40 लाख से अधिक श्रद्धालु आते हैं।
2. सिख धर्म
- तख्त: सिख धर्म में आध्यात्मिक और धार्मिक सत्ता के प्रमुख केंद्र।

- प्रमुख तख्त:
- अकाल तख्त: स्वर्ण मंदिर परिसर (अमृतसर)।
- तख्त श्री पटना साहिब: पटना (बिहार)।
- तख्त श्री केशगढ़ साहिब: आनंदपुर।
- गुरुओं की यात्राएं: गुरु नानक देव जी ने हरिद्वार, प्रयाग, मथुरा, वाराणसी, अयोध्या और पुरी जैसे हिंदू व मुस्लिम स्थलों की आध्यात्मिक यात्राएं कीं।
पंडित जवाहरलाल नेहरू का कथन (1961)
- सांस्कृतिक एकता: बद्रीनाथ, केदारनाथ, अमरनाथ से लेकर कन्याकुमारी तक फैले प्राचीन तीर्थस्थल भारत को भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से एक सूत्र में बाँधते हैं।
- मूल भावना: उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम की तीर्थयात्राएं “एक देश और एक संस्कृति” की भावना को जीवंत रखती हैं।
प्रमुख शब्दावली एवं अवधारणाएं
| शब्द | शाब्दिक अर्थ | आध्यात्मिक / व्यावहारिक महत्व |
| श्राइन | पवित्र स्थल | ईश्वर, पवित्र अवशेष या संत से जुड़ा पूजा स्थल |
| अवशेष | अस्ति-धातु / अवशेष | संत या आध्यात्मिक पुरुष के शरीर/वस्तु के भाग |
| तीर्थ | नदी पार करने का स्थान | संसार रूपी सागर को पार करने का माध्यम |
| तख्त | सिंहासन / सत्ता केंद्र | सिख धर्म में आध्यात्मिक शासन व मार्गदर्शन का केंद्र |
तीर्थयात्राएं (Pilgrimages)
- अर्थ व स्वरूप: तीर्थयात्रा केवल एक भौतिक यात्रा नहीं है। यह एक आंतरिक और आध्यात्मिक यात्रा है, जिसका अपना एक आचार-संहिता (Code of Conduct) होता है।
- 3,000 वर्षों की निरंतरता: आधुनिक परिवहन साधनों के बिना भी भारतीय 3,000 से अधिक वर्षों से पूरे उपमहाद्वीप की यात्राएं करते रहे हैं। इससे भारत का संपूर्ण भूगोल पवित्र माना जाने लगा।
- धर्मपाल का विवरण: इतिहासकार धर्मपाल ने लखनऊ के ग्रामीणों का उदाहरण दिया है। वे 3 महीने की रामेश्वरम यात्रा से लौटकर, दिल्ली में रुके बिना सीधे हरिद्वार के लिए निकले थे। यह स्थान-विशेष के प्रति समर्पण और निरंतर यात्रा की प्राचीन परंपरा को दर्शाता है।
जैन परंपरा में तीर्थ
- तीर्थंकर: शाब्दिक अर्थ ‘तीर्थ बनाने वाला’। वे महापुरुष जो सांसारिक जीवन से उच्च आध्यात्मिक जीवन की ओर पार उतरने का मार्ग दिखाते हैं। जैन धर्म में इन्हें धर्म का सर्वोच्च उपदेशक माना जाता है।
- पवित्र स्थल: तीर्थंकरों के मोक्ष प्राप्ति स्थल या उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं से जुड़े स्थान।
- प्रकृति से जुड़ाव: वे वृक्ष, तालाब, पहाड़ और पहाड़ियाँ जहाँ तीर्थंकरों ने ध्यान किया, वे पवित्र माने जाते हैं।
- प्रमुख जैन तीर्थ:
- माउंट आबू (राजस्थान)
- गिरनार (गुजरात)
- शत्रुंजय पहाड़ी (सौराष्ट्र, गुजरात)
प्रमुख क्षेत्रीय एवं पर्वतीय तीर्थ (Regional & Mountain Pilgrimages)
- शबरीमला मंदिर (केरल):
- देवता: भगवान अयप्पा।
- विशेषता: प्रतिवर्ष 1 करोड़ से अधिक श्रद्धालु आते हैं। पहाड़ी रास्तों और जंगलों का कठिन पैदल मार्ग आंतरिक आध्यात्मिक कठिनाइयों का प्रतीक है।
- पंढरपुर वारी:
- राज्य: महाराष्ट्र।
- परंपरा: 800 साल पुरानी वार्षिक पैदल यात्रा।
- स्वरूप: श्रद्धालु 21 दिनों तक पैदल चलकर पंढरपुर स्थित प्रसिद्ध विठोबा मंदिर पहुँचते हैं।
अन्य पवित्र स्थल
- प्रकृति में ईश्वर का वास: हिंदू, लोक और जनजातीय परंपराओं में पर्वत, नदियां, वृक्ष, पौधे, पशु और पत्थर तक पूजनीय हैं।
- भूदेवी की अवधारणा: नदियों को ‘देवी’ माना जाता है। पूरी पृथ्वी को ‘माता’ या ‘भूदेवी’ के रूप में पूजा जाता है।
- कला में प्रकटीकरण: बेलूर मंदिर (कर्नाटक) की मूर्तिकला में भगवान विष्णु के वराह अवतार को राक्षस का वध कर भूदेवी को बचाते हुए दर्शाया गया है।
जनजातीय एवं पारिस्थितिक पवित्र स्थल
| जनजाति / क्षेत्र | स्थान | धार्मिक व सांस्कृतिक मान्यता |
| डोंगरिया कोंध जनजाति | नियम डोंगर पहाड़ी (नियमगिरि श्रेणी, ओडिशा) | यह पहाड़ी उनके सर्वोच्च देवता ‘नियम राजा’ का निवास स्थान है। यहाँ पेड़ काटना सख्त मना है। |
| सिक्किम सरकार (2000 का दशक) | राज्य की पवित्र चोटियाँ, गुफाएँ, झीलें व गर्म चश्मे | इन्हें किसी भी प्रकार के नुकसान से बचाने के लिए ‘पवित्र स्थल’ के रूप में अधिसूचित किया गया। |
| टोडा जनजाति | नीलगिरी पहाड़ियाँ (तमिलनाडु) | पर्वतीय चोटियों, शोला वनों, आर्द्रभूमियों, विशिष्ट पत्थरों व पौधों को पवित्र मानती है। |
पावन भू-भाग से अवगत होना (Becoming Aware of Sacred Geography)
- पवित्र भूगोल (Sacred Geography): भारत भर में फैले और आपस में जुड़े तीर्थस्थलों के जाल से बना एक सांस्कृतिक ढाँचा।
- चार धाम यात्रा:
- भारत के चारों कोनों (उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम) में जानबूझकर स्थापित किए गए हैं।
- इसका मुख्य उद्देश्य श्रद्धालुओं को पूरे उपमहाद्वीप से जोड़ना था।
- 12 ज्योतिर्लिंग:
- भगवान शिव को समर्पित अत्यधिक शुभ और पवित्र स्थान।
- प्रत्येक ज्योतिर्लिंग की अपनी अनूठी पौराणिक कथा और नाम है।
- 51 शक्ति पीठ:
- संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप (वर्तमान भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान) में फैले हुए हैं।
- पौराणिक पृष्ठभूमि: सती के आत्मदाह के बाद शिव के क्रोध को शांत करने हेतु विष्णु ने सती के शरीर को चक्र से काटा था। जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे, वे शक्ति पीठ बने।
- प्रतीकात्मक अर्थ: यह कथा यह दर्शाती है कि संपूर्ण भारत भूमि देवी माँ (दिव्य शक्ति) का ही स्वरूप या शरीर है।
यात्राओं का उद्देश्य एवं सांस्कृतिक एकीकरण
- विविधता का अनुभव: तीर्थयात्री जब उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम की यात्रा करते थे, तब वे विभिन्न भाषाओं, पहनावे, खान-पान और रीति-रिवाजों से परिचित होते थे।
- समानता का अहसास: विविधताओं के बीच भी उन्हें पूरे देश में एक अंतर्निहित सांस्कृतिक समानता दिखाई देती थी।
- यात्रा के अन्य उद्देश्य:
- व्यापारिक आवाजाही: व्यापारी और शिल्पकार वस्तुओं के आदान-प्रदान हेतु यात्रा करते थे।
- ज्ञान व वाद-विवाद: विद्वान और संत अपने विचारों के प्रसार, ज्ञानार्जन तथा श्रेष्ठ आचार्यों से शास्त्रार्थ हेतु यात्रा करते थे।

- विचारों का आदान-प्रदान: अलग-अलग उद्देश्यों से यात्रा करने वालों के मार्ग अक्सर एक ही होते थे। इससे नए विचार उपजे, पुरानी मान्यताओं का परिमार्जन हुआ और संपूर्ण उपमहाद्वीप में सांस्कृतिक एकीकरण सुदृढ़ हुआ।
भारत के प्रमुख पवित्र नेटवर्क
| नेटवर्क | कुल संख्या | भौगोलिक विस्तार | सांस्कृतिक व आध्यात्मिक महत्व |
| चार धाम | 4 | उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम भारत | भारत के चारों कोनों को सांस्कृतिक रूप से जोड़ना |
| ज्योतिर्लिंग | 12 | संपूर्ण भारत | भगवान शिव के विशेष स्वरूपों की पूजा |
| शक्ति पीठ | 51 | भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान आदि | संपूर्ण उपमहाद्वीप की भूमि को देवी स्वरूप मानना |
पावन पारिस्थितिकी (Sacred Ecology)
- पुण्यक्षेत्र: तीर्थ आमतौर पर नदियों, झीलों, वनों या पर्वतों पर स्थित होते हैं। प्राकृतिक परिदृश्य को ही पवित्र स्थान या ‘पुण्यक्षेत्र’ माना जाता है।
- संरक्षण की भावना: जब प्रकृति को पवित्र माना जाता है, तब उसका संरक्षण स्वतः होने लगता है।
- त्रिवेणी संगम: इस अवधारणा में भूगोल, संस्कृति और अध्यात्म तीनों का अद्भुत मिश्रण दिखता है।
नदियाँ और संगम
- वैदिक काल से पूजा: ऋग्वेद के ‘नदीस्तुति सूक्त’ में प्राचीन उत्तर-पश्चिम भारत की 19 प्रमुख नदियों की स्तुति की गई है।
- संस्कार और श्लोक: आज भी धार्मिक अनुष्ठानों में जल का छिड़काव करते समय 7 पवित्र नदियों का आह्वान किया जाता है:गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।नर्मदे सिंधु कावेरी जलेस्मिन सन्निधिं कुरु॥(गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी नदियाँ इस जल में सन्निकिध हों।)
- सभ्यता की जीवनरेखा: नदियां, उनके उद्गम स्थल, सहायक नदियां और उनके तटवर्ती क्षेत्र तीर्थों के रूप में पूजे जाते हैं। लोग इन्हें ‘गंगा जी’ या ‘यमुना जी’ कहकर सम्मान देते हैं।
प्रयागराज और यूनेस्को विरासत
- प्रयागराज: यहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का पवित्र संगम है।
- कुंभ मेला चक्र: हर 6 वर्ष में अर्धकुंभ और 12 वर्ष में महाकुंभ आयोजित होता है।
- वैश्विक मान्यता: यूनेस्को ने कुंभ मेले को ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ (Intangible Cultural Heritage) की सूची में शामिल किया है।
- जन-भागीदारी: 2025 के कुंभ मेले में लगभग 66 करोड़ लोगों की अभूतपूर्व भागीदारी का अनुमान लगाया गया था।
कुंभ मेला
- पौराणिक उत्पत्ति: कुंभ मेले की उत्पत्ति ‘अमृत मंथन’ की कथा से जुड़ी है।

- अमृत कलश: अमरता देने वाले अमृत को प्राप्त करने के लिए देवों और असुरों ने क्षीर सागर का मंथन किया। असुरों से अमृत बचाने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर कुंभ (कलश) छीन लिया।
- 4 पवित्र स्थान: अमृत की छलकती बूंदें चार स्थानों पर गिरीं:
- हरिद्वार (गंगा)
- प्रयागराज (संगम)
- नाशिक (गोदावरी)
- उज्जैन (शिप्रा)
- महत्व: इन चार स्थानों पर निर्धारित शुभ मुहूर्त में नदियों में स्नान करना अत्यधिक पुण्यदायी माना जाता है।
नदियों और कुंभ का संक्षिप्त विवरण
| स्थान | संबंधित नदी | पौराणिक व सांस्कृतिक महत्व |
| हरिद्वार | गंगा | अमृत की बूंद गिरने का स्थान, कुंभ स्थल |
| प्रयागराज | त्रिवेणी संगम (गंगा, यमुना, सरस्वती) | यूनेस्को अमूर्त विरासत, कुंभ मेला |
| नाशिक | गोदावरी | दक्षिण भारत का प्रमुख कुंभ स्थल |
| उज्जैन | शिप्रा | कुंभ स्थल, धार्मिक व ज्योतिषीय महत्व |
पर्वत और वन (Mountains and Forests)
- स्वर्ग का द्वार: दुनिया भर में पर्वतों को ऊँचाई के कारण पृथ्वी से स्वर्ग का प्रतीकात्मक मार्ग माना गया है।
- शारीरिक व मानसिक परीक्षा: पहाड़ी चोटियों पर बने तीर्थों की कठिन यात्रा श्रद्धालुओं की शारीरिक क्षमता और मानसिक दृढ़ता की परीक्षा लेती है।
- प्रमुख पर्वतीय तीर्थ:
- माउंट कैलाश (तिब्बत)
- तिरुवन्नमलाई (तमिलनाडु)
- वैष्णो देवी मंदिर (कटरा, जम्मू-कश्मीर)
- भगवान बालाजी (तिरुमला पहाड़ियाँ, आंध्र प्रदेश)
वृक्ष, वन और पवित्र उपवन
- पीपल वृक्ष (Ficus religiosa):
- हिंदू, बौद्ध, सिख और जैन धर्म में समान रूप से पवित्र माना जाता है।
- इसका वनस्पति नाम Ficus religiosa है (Latin में ‘religiosa’ का अर्थ पवित्र है)।
- सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ाव: मोहनजोदड़ो से मिली सील (Seal) पर पीपल की पत्तियों का स्पष्ट अंकन है।
- चिकित्सकीय व पारिस्थितिक महत्व: पत्तियां त्वचा रोगों में और छाल पेट की बीमारियों में उपयोगी है। यह पूरे साल हरा-भरा रहकर जीवों को आश्रय देता है।
- बोधि वृक्ष (बोधगया): महाबोधि मंदिर का वृक्ष उसी मूल वृक्ष का वंशज माना जाता है जिसके नीचे बुद्ध को ज्ञान मिला था।
- महाकाव्यों का क्षेत्रीय प्रभाव:
- रामायण और महाभारत के पात्रों से जुड़े स्थल भारत के लगभग हर ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्र में मिलते हैं।
- उदाहरण: बस्तर (छत्तीसगढ़) में श्री राम के आगमन को याद करने वाला एक प्रसिद्ध मंदिर है।

- पवित्र उपवन (Sacred Groves):
- स्थानीय जनजातीय व ग्रामीण समुदायों द्वारा शिकार, पेड़ काटने और खनन से संरक्षित प्राचीन जंगल।
- इन्हें स्थानीय देवताओं का निवास स्थान (जैसे मेघालय में Ryngkew या Basa) माना जाता है।
- लाभ: जैव विविधता (Flora & Fauna) और जल निकायों (Waterbodies) का प्राकृतिक संरक्षण होता है।
भारत में पवित्र उपवनों के क्षेत्रीय नाम
| राज्य / भाषा | पवित्र उपवन का स्थानीय नाम |
| मलयलम (केरल) | कावु |
| तमिलनाडु | कोविल काडु |
| कन्नड़ (कर्नाटक) | देवरे काडु |
| मराठी (महाराष्ट्र) | देवराई |
| खासी (मेघालय) | ख्लाव क्यंतंग |
| हिमाचल प्रदेश (हिंदी) | देव वन |
| झारखंड | सरना |
| छत्तीसगढ़ | देवगुड़ी |
| राजस्थान | ओरण |
तंजावुर का पारिस्थितिक उदाहरण
- चमगादड़ का संरक्षण: तंजावुर (तमिलनाडु) के स्थानीय ग्रंथों के अनुसार, उपवन के देवता फल खाने वाले चमगादड़ों की रक्षा करते हैं।
- पारिस्थितिक भूमिका: चमगादड़ परागण (Pollination) और बीज प्रसार (Seed dispersal) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह मनुष्य, प्रकृति और धर्म के अनूठे संतुलन को दिखाता है।
तीर्थयात्रा से व्यापार तक
- मार्गों का संगम: तीर्थयात्रियों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए व्यापारी तीर्थ मार्गों पर केंद्रित हुए। इससे व्यापारिक मार्ग और तीर्थ मार्ग एक-दूसरे से जुड़ गए।
- प्राचीन भारत के 2 मुख्य मार्ग:
- उत्तरापथ: भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्से को पूर्वी भारत से जोड़ता था।
- दक्षिणपथ: कौशांबी से शुरू होकर उज्जैन होते हुए प्रतिष्ठान (पैठण, महाराष्ट्र) तक जाता था।
- व्यापारिक वस्तुएं: मोती, शंख, सोने-हीरे के सिक्के, सूती वस्त्र, मसाले और चंदन।
भारत से बाहर के पावन भू-भाग (Sacred Geography beyond India)
- वैश्विक अवधारणा: पवित्र भूगोल (Sacred Geography) की सोच सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है; प्राचीन ग्रीस में भी पर्वतों और पवित्र उपवनों (Sacred Groves) को पूजनीय माना जाता था।
- नेटिव अमेरिकन मान्यता: अमरीका के मूल निवासी (Native Americans) प्रकृति को पवित्र मानते थे और उसके साथ उनका एक गहरा आत्मिक संबंध था।
- न्यूजीलैंड की माओरी जनजाति:
- न्यूजीलैंड के मूल निवासी माओरी ‘तारानाकी मौंगा’ पर्वत को अपना पूर्वज और पवित्र मानते हैं।
- कानूनी अधिकार: माओरी समुदाय के प्रयासों से हाल ही में इस पर्वत को कानूनन एक जीवित मनुष्य के समान अधिकार और उत्तरदायित्व प्रदान किए गए हैं।
- संरक्षण व्यवस्था: संकटग्रस्त नदियों या पहाड़ों की रक्षा के लिए समुदाय के बुजुर्ग उनकी आवाज (प्रतिनिधि) बनते हैं, जिससे इन पवित्र स्थलों का शोषण रोका जा सके।
पवित्र स्थलों का पुनरुद्धार और संरक्षण
- पारंपरिक संतुलन बनाम आधुनिक तनाव:
- मनुष्य और पवित्र भूगोल के बीच का सामंजस्य हज़ारों वर्षों से भारतीय सभ्यता की ताकत रहा है।
- आज अत्यधिक प्रदूषण और मानवीय गतिविधियों के कारण यमुना, महानदी और कावेरी जैसी पवित्र नदियाँ अत्यधिक प्रदूषित हो चुकी हैं।
- पर्यावरणीय संघर्ष और जन-आंदोलन:
- जब नदियों का अत्यधिक दोहन होता है या पवित्र पहाड़ों पर ‘विकास’ के नाम पर खतरा मंडराता है, तब लोग पर्यावरण और अपनी सांस्कृतिक आस्था की रक्षा के लिए आवाज उठाते हैं।
- सतत विकास में प्रासंगिकता:
- आज वैश्विक स्तर पर सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण एक बड़ी चुनौती है।
- ‘पवित्र भूगोल’ की जीवन-दृष्टि प्रकृति को केवल संसाधन न मानकर पूजनीय मानती है, जो आधुनिक पर्यावरण संरक्षण में बड़ा योगदान दे सकती है।
वैश्विक पवित्र भूगोल व कानूनी अधिकार
| देश / समुदाय | स्थान / प्राकृतिक संसाधन | सांस्कृतिक मान्यता एवं कानूनी स्थिति |
| न्यूजीलैंड (माओरी) | तारानाकी मौंगा पर्वत | पर्वत को पूर्वज माना; कानूनन ‘जीवित मनुष्य’ का दर्जा मिला |
| प्राचीन ग्रीस | पर्वत व पवित्र उपवन | प्राचीन धार्मिक व सांस्कृतिक आस्था के केंद्र |
| नेटिव अमेरिकन | संपूर्ण प्रकृति | प्रकृति के साथ पवित्र व अटूट आत्मिक संबंध |
| भारत | पवित्र नदियाँ (यमुना, कावेरी आदि) | धार्मिक महत्व, लेकिन वर्तमान में अत्यधिक प्रदूषण का शिकार |