Star Formation: Stages of Stellar Evolution and Life Cycle गैसों के बादलों से ‘आद्य तारा’ (Proto Star) बनने की प्रक्रिया से शुरू होकर, नाभिकीय संलयन के संतुलन, रक्त दानव (Red Giant) अवस्था और अंततः सुपरनोवा विस्फोट के बाद द्रव्यमान के आधार पर श्वेत वामन या न्यूट्रॉन तारा बनने तक का सफर, खगोल विज्ञान का एक अद्भुत और विस्मयकारी अध्याय है।
तारे की परिभाषा एवं प्रारंभिक विकास (आद्य तारा)
- तारा: जिनमें अपना स्वयं का प्रकाश और ऊर्जा होती है, वे तारे कहलाते हैं।
- आद्य तारा (Proto Star) का निर्माण:
- घूर्णन के परिणामस्वरूप ब्रह्मांड में मौजूद गैसों का बादल प्रभावित होता है।
- परस्पर गुरुत्वाकर्षण के कारण परमाणुओं में परस्पर टक्करों की संख्या बढ़ जाती है तथा सिकुड़ते हुए बादल के आंतरिक ताप में वृद्धि होने लगती है।
- गुरुत्वाकर्षण प्रभाव से संकुचित इस बादल को आद्य तारा (Proto Star) कहते हैं।
तारे के विकास की मुख्य अवस्थाएँ एवं जीवन चक्र
(A) मुख्य/साम्य अवस्था
- आद्य तारा के बाद ही तारे के विकास की मुख्य अवस्था प्रारम्भ होती है।
- आगे की अवस्था में आद्य तारा और संकुचित होता है, परन्तु परस्पर गुरुत्वाकर्षण बढ़ जाने के कारण आंतरिक ताप व दाब की वृद्धि से केन्द्र में नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
- इस प्रक्रिया के कारण हाइड्रोजन, हीलियम में बदलने लगता है तथा इससे मुक्त ऊर्जा तारे को और सिकुड़ने से रोक देती है। इस समय तारा संतुलन की अवस्था में आ जाता है।
- वर्तमान स्थिति: हमारा सूर्य वर्तमान में ऐसी ही साम्य (संतुलन) अवस्था से गुजर रहा है।
(B) रक्त दानव अवस्था (Red Giants)
- धीरे-धीरे केन्द्र का सम्पूर्ण हाइड्रोजन हीलियम में परिवर्तित हो जाता है।
- परिणामतः केन्द्र के द्वारा मुक्त ऊर्जा में कमी आती है और तारा पुनः सिकुड़ने का प्रयास करता है।
- परन्तु, अभी तारे के बाहरी भाग में हाइड्रोजन का हीलियम में परिवर्तन जारी रहता है और ऊर्जा विकिरित होती रहती है। धीरे-धीरे तारा ठण्डा होकर लाल रंग का दिखने लगता है, जिसे रक्त दानव (Red Giants) कहा जाता है।
(C) सुपरनोवा विस्फोट (Supernova)
- अब केंद्र में हीलियम कार्बन में तथा कार्बन भारी पदार्थ जैसे लोहे में बदल जाता है।
- केन्द्र से भारी मात्रा में ऊर्जा का स्थानान्तरण तारे के बाहरी भाग में होता है। इस ऊर्जा से तारे का बाह्य भाग विस्फोट से उड़ जाता है, जिसे सुपरनोवा (Supernova) कहते हैं।
सुपरनोवा विस्फोट के बाद तारे का भविष्य (चंद्रशेखर सीमा)
सुपरनोवा विस्फोट के पश्चात् तारे का भविष्य उसके बचे हुए द्रव्यमान पर निर्भर करता है, जिसे दो भागों में समझा जा सकता है (जहाँ Ms = सूर्य का द्रव्यमान / Mass of Sun है):
स्थिति 1: यदि द्रव्यमान 1.4 Ms से कम हो
- वह अपनी नाभिकीय ऊर्जा खोकर श्वेत वामन (White Dwarf) में बदल जाता है। इसे ‘जीवाश्म तारा’ भी कहते हैं।
- अंततः श्वेत वामन ठंडा होकर काला वामन (Black Dwarf) में परिवर्तित हो जाता है।
स्थिति 2: यदि द्रव्यमान 1.4 Ms से अधिक हो
- परमाणुओं में मुक्त घूमते हुए इलेक्ट्रॉन अत्यधिक वेग पाकर बाहर चले जाते हैं तथा केवल न्यूट्रॉन बचे रह जाते हैं।
- इस अवस्था को न्यूट्रॉन तारा या पल्सर (Pulsar) कहते हैं।
प्रमुख तारे एवं उनकी विशेषताएँ
- सिरियस या डॉग स्टार (Sirius / Dog Star): यह रात्रि के समय पृथ्वी से दिखाई देने वाला सबसे चमकीला तारा है, जो सूर्य की अपेक्षा 20 गुना अधिक चमकता है तथा इसका द्रव्यमान सूर्य की तुलना में दो गुना है। यह पृथ्वी से लगभग 9 प्रकाश वर्ष दूर है।
- प्रॉक्सिमा सेन्चुरी (Proxima Centauri): यह सौरमंडल के सर्वाधिक निकट स्थित तारा है, जो सूर्य के सबसे निकट का तारा है। यह लगभग 4.3 प्रकाश वर्ष दूर है।
- ध्रुव तारा (Pole Star): पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव के सापेक्ष सदैव स्थिर यह तारा ध्रुव से व्यक्ति के सिर के ऊपर दृष्टिगोचर होता है। इसी तारे के समकक्ष वेगा स्टार इसके निकट ही स्थित है, जो ध्रुव तारे के समकक्ष बिंबित हैं।
- स्पंदन तारे (Pulsating Star): ऐसे तारे जिनमें फैलने व सिकुड़ने की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है, स्पंदन तारे कहलाते हैं। सेफायड ऐसा ही तारा है।
चन्द्रशेखर सीमा
- परिभाषा: किसी अघूर्णनशील श्वेत वामन तारे का सीमाकारी द्रव्यमान ही ‘चंद्रशेखर सीमा’ कहलाता है। यह कुछ हद तक तारे के संघटन पर निर्भर करता है।
- संघटन के आधार पर सीमा:
- हीलियम युक्त श्वेत वामन के लिए: 1.44 सौर द्रव्यमान
- कार्बन संघटन वाले श्वेत वामन के लिए: 1.40 सौर द्रव्यमान
- लौह संघटनयुक्त श्वेत वामन के लिए: 1.11 सौर द्रव्यमान
- अपवाद: यदि श्वेत वामन तारे में एक तीव्र गति से घूर्णन करता क्रोड हो, तो यह सीमा पर्याप्त रूप से बढ़ जाती है।
- परिणाम: यदि किसी तारे का द्रव्यमान इस सीमा से अधिक हो, तो वह अति गुरुत्वाकर्षण के कारण न्यूट्रॉन तारे में या फिर कृष्ण छिद्र (ब्लैक होल) में परिवर्तित हो जाता है, क्योंकि इसका पदार्थ इसके गुरुत्व बल का विरोध करने में सक्षम नहीं होता है।
ब्लैक होल (कृष्ण विवर)
- निर्माण: कृष्ण विवर में परिवर्तित होने के लिए तारे का विशेष द्रव्यमान वाला होना आवश्यक है।
- विशेषताएँ: कृष्ण विवर उच्च घनत्व वाला क्षेत्र होता है। इसका गुरुत्वाकर्षण इतना अधिक होता है कि प्रकाश भी वापस नहीं आ सकता।
- विकिरण संबंधी मत: सामान्यतः यह माना जाता है कि यह कोई विकिरण भी उत्सर्जित नहीं करता। परन्तु स्टीफन हॉकिन्स के अनुसार ब्लैक होल भी विकिरण उत्सर्जित करते हैं।