असीम रहस्यों और अनंत विस्तार को अपने भीतर समेटे हुए The Universe (ब्रह्मांड) अति सूक्ष्म कणों से लेकर विशालकाय आकाशगंगाओं और खगोलीय पिंडों का एक विराट स्वरूप है। अंतरिक्ष विज्ञान (Cosmology) के अंतर्गत ब्रह्मांड का अध्ययन सदियों से मानव जिज्ञासा का केंद्र रहा है। लगभग 13.8 अरब वर्ष पूर्व हुए ‘बिग बैंग’ (महाविस्फोट) से उत्पन्न हुआ हमारा ब्रह्मांड आज भी निरंतर विस्तारित हो रहा है। इसके इसी विस्मयकारी जीवन चक्र, तारों के जन्म, और सौरमंडल की गतियों को समझना आधुनिक विज्ञान का सबसे बड़ा रोमांच है।
ब्रह्मांड का परिचय
- परिभाषा: ब्रह्मांड एक अत्यधिक विशाल क्षेत्र की कल्पना है, जिसमें अत्यन्त सूक्ष्म कण से लेकर विशालकाय ब्रह्माण्डीय पिण्ड स्थित हैं। ब्रह्मांड को कॉसमॉस (COSMOS) की भी संज्ञा दी गयी है।
- विस्तार व सीमा: ब्रह्मांड की क्षेत्र सीमा निर्धारित करना एक कल्पना मात्र ही कार्य है, परन्तु खगोलशास्त्रियों का यह मानना है कि लगभग 100 बिलियन आकाशगंगाएँ मिलकर ब्रह्मांड का निर्माण करती हैं तथा प्रत्येक आकाशगंगा में लगभग 100 बिलियन तारे होते हैं।
- खगोल विज्ञान (Cosmology): ब्रह्मांड का वृहत् पैमाने पर अध्ययन ‘अंतरिक्ष विज्ञान’ (Cosmology) कहलाता है।
ब्रह्मांड से संबंधित ऐतिहासिक एवं आधुनिक परिकल्पनाएँ
(A) भू-केन्द्रीय परिकल्पना (Geocentric Concept)
- प्रतिपादक: सर्वप्रथम यूनानी खगोलशास्त्री क्लाडियम टॉलमी (140 AD) ने अपनी पुस्तक ‘अल्मागास्ट’ (Almagast) में यूनानियों द्वारा एकत्रित की गयी खगोलिकी की समस्त जानकारी को क्रमबद्ध किया।
- अल्मागेस्ट का अर्थ: अल्मागेस्ट शब्द का अर्थ ‘एक विशाल कार्य’ होता है।
- अवधारणा: इसी पुस्तक में इन्होंने ‘भू-केन्द्रीय परिकल्पना’ (Geocentric concept) का उल्लेख किया, जिसके अनुसार ब्रह्मांड का केन्द्र पृथ्वी है तथा पृथ्वी के चारों ओर अन्य ग्रह परिक्रमा कर रहे हैं। यह अवधारणा व्यक्तियों के समक्ष बहुत अधिक समय तक बनी रही।
(B) सूर्य-केन्द्रीय परिकल्पना (Heliocentric Concept)
- प्रतिपादक: आधुनिक खगोलिकी के जनक निकोलस कॉपरनिकस (1473-1543) ने ‘सूर्य-केन्द्रीय परिकल्पना’ (Heliocentric Concept) का प्रतिपादन किया।
- अवधारणा: इस परिकल्पना के अनुसार, सूर्य ब्रह्मांड के केन्द्र पर स्थित है तथा इसके चारों ओर ग्रह परिक्रमा कर रहे हैं। इस परिकल्पना ने ब्रह्मांड के अध्ययन की दिशा ही बदल दी।
(C) उत्तरवर्ती अध्ययन एवं हब्बल का नियम
- विलियम हर्शेल (1805 ई०): ब्रिटिश भूगोलवेत्ता हर्शेल ने दूरबीन की सहायता से ब्रह्मांड का अध्ययन कर यह निष्कर्ष दिया कि सौर परिवार हमारी आकाशगंगा का एक सूक्ष्म अंग मात्र है।
- एडविन हब्बल (1920 ई०): अमेरिकी भूगोलवेत्ता एडविन हब्बल ने अपने अध्ययन में यह पाया कि सभी आकाशगंगाओं के मध्य दूरी बढ़ती जा रही है, जिसके कारण शीतल रिक्त स्थान की निरन्तर वृद्धि हो रही है। इन्होंने यह स्पष्ट किया कि एक दृष्टिपथ में दृष्टिगोचर होने वाले ब्रह्मांड का व्यास 250 करोड़ प्रकाश वर्ष है, जिसमें असंख्य आकाशगंगाएँ विद्यमान हैं।
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति (Origin of The Universe)
ब्रह्मांड की उत्पत्ति से संबंधित मुख्य रूप से निम्नलिखित चार अवधारणाएँ प्रस्तुत की गई हैं:
- स्पंदन ब्रह्मांड सिद्धांत (Pulsating Universe Theory): डॉ. एलन संडेजा महोदय द्वारा प्रतिपादित।
- सतत् या स्थिर दृष्टि सिद्धांत (Steady State Theory): हर्मन बॉडी एवं थामस गोल्ड द्वारा प्रतिपादित।
- स्फीति सिद्धांत (Inflationary Theory): एलेन गूथ महोदय द्वारा 1980 में प्रस्तुत।
- बिग बैंग सिद्धांत (Big Bang Theory): जॉर्ज लैमेन्तेयर द्वारा प्रतिपादित।
ब्रह्मांड की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धांत (सर्वमान्य मत)
- महाविस्फोट सिद्धांत (Big Bang Theory): ब्रह्मांड की उत्पत्ति के सम्बन्ध में दिए गए सिद्धांतों में जॉर्ज लैमेन्तेयर द्वारा प्रतिपादित “महाविस्फोट या बिग बैंग सिद्धांत” सर्वाधिक मान्य है।
- प्रारंभिक अवस्था: इस परिकल्पना के अनुसार प्रारंभ में ब्रह्मांड, द्रव्य तथा ऊर्जा का अत्यन्त घनीभूत संयुक्त पिण्ड था। इस समय ब्रह्मांड का आयतन अति सूक्ष्म तथा तापमान एवं घनत्व अनन्त था।
- विस्फोट का समय: आज से लगभग 13.8 अरब वर्ष पूर्व इस गर्म, सघन बिन्दु में नाभिकीय विखण्डन के कारण भयंकर विस्फोट हुआ, जिसे “ब्रह्मांड विस्फोट या बिग-बैंग” कहा गया।
डाप्लर प्रभाव (Doppler Effect)
- ब्रह्मांड विस्तार का प्रमाण: ब्रह्मांड के विस्तार हेतु प्रमाण ‘डाप्लर अभिरक्त विस्थापन सिद्धांत’ (Doppler Infrared Displacement Theory) पर आधारित है।
- उत्पत्ति: डाप्लर अभिरक्त विस्थापन की उत्पत्ति किसी प्रकाश उत्सर्जक वस्तु और प्रेक्षक की सापेक्षिक गतियों के परिणाम स्वरूप होती है।
- लाल विस्थापन (Red Shift): यदि प्रकाश स्रोत हमसे दूर की ओर गतिशील हो, तो प्रकाश का तरंगदैर्ध्य (Wavelength) दीर्घवृत्त (बड़ा) हो जाता है, अर्थात् प्रकाश लाल वर्ण की ओर विचलित हो जाता है।
- परिभाषा: इस प्रकार प्रकाश के लाल विस्थापन अथवा नीला विस्थापन की घटनाओं को संयुक्त रूप से ‘डाप्लर प्रभाव’ कहते हैं।
आकाशगंगा एवं संबंधित खगोलीय पिंड
- आकाशगंगा (Galaxy): ब्रह्मांड में अनुमानतः 100 अरब आकाशगंगाएँ हैं। आकाशगंगा असंख्य तारों का विशाल पुंज होने के साथ ही इनमें धूल व गैसें भी पाई जाती हैं।
- मंदाकिनी: हमारी आकाशगंगा को ‘मंदाकिनी’ कहा जाता है। इसकी आकृति सर्पिल (Spiral) है।
- मिल्की वे (Milky Way): रात के समय दिखने वाले तारों का समूह है, जो हमारी आकाशगंगा का भाग है। इसे ‘ऐरावत पथ’ या ‘दुग्ध मेखला’ नाम से भी जाना जाता है।
- एन्ड्रोमेडा (देवयानी): यह हमारी आकाशगंगा के सबसे निकट की आकाशगंगा है।
- ऑरियन नेबुला: यह हमारी आकाशगंगा के सबसे शीतल एवं चमकीले तारों का समूह है।
तारे की परिभाषा एवं प्रारंभिक विकास (आद्य तारा)
- तारा: जिनमें अपना स्वयं का प्रकाश और ऊर्जा होती है, वे तारे कहलाते हैं।
- आद्य तारा (Proto Star) का निर्माण:
- घूर्णन के परिणामस्वरूप ब्रह्मांड में मौजूद गैसों का बादल प्रभावित होता है।
- परस्पर गुरुत्वाकर्षण के कारण परमाणुओं में परस्पर टक्करों की संख्या बढ़ जाती है तथा सिकुड़ते हुए बादल के आंतरिक ताप में वृद्धि होने लगती है।
- गुरुत्वाकर्षण प्रभाव से संकुचित इस बादल को आद्य तारा (Proto Star) कहते हैं।
तारे के विकास को विस्तार से पढने के लिए यहाँ click करें
सौरमंडल (Solar System)
सौरमंडल में चारों ओर भ्रमण करने वाले ग्रह, उपग्रह, धूमकेतु, उल्काएँ तथा क्षुद्रग्रह आदि सभी को शामिल किया जाता है। सूर्य जो कि सौरमंडल का जन्मदाता है, सम्पूर्ण सौरमंडल को ऊर्जा एवं प्रकाश प्रदान करता है। सूर्य की ऊर्जा का स्रोत उसके केन्द्र में हाइड्रोजन परमाणुओं का नाभिकीय संलयन द्वारा हीलियम में बदलना है। सूर्य हमारे सौरमंडल के केन्द्र में स्थित है।
सौरमंडल (Solar System): विस्तार से पढने के लिए यहाँ click करें
सौरमंडल के ग्रह (Planets of Solar System)
ग्रह की परिभाषा एवं सामान्य विशेषताएँ
- नवीन परिभाषा (IAU अनुसार): ऐसे पिंड जो सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हों, जिनमें स्वयं का इतना गुरुत्वाकर्षण बल हो कि वे लगभग गोलाकार (निश्चित आकार) हो सकें और उनकी कक्षा किसी अन्य ग्रह की कक्षा को न तो काटती हो और न ही अतिव्यापित (Overlap) करती हो, ग्रह कहलाते हैं।
- प्रकाश एवं ऊष्मा: इनका अपना प्रकाश नहीं होता; ये सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाशित होते हैं और ऊष्मा प्राप्त करते हैं।
- परिक्रमा की दिशा: सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा पश्चिम से पूर्व दिशा में करते हैं, परन्तु शुक्र (Venus) व अरुण (Uranus) इसके अपवाद हैं—ये सूर्य के चारों ओर पूर्व से पश्चिम दिशा में परिक्रमा करते हैं।
ग्रहों का वर्गीकरण
- आंतरिक ग्रह (Inner / Terrestrial Planets): इसके अन्तर्गत बुध, शुक्र, पृथ्वी एवं मंगल आते हैं। सूर्य से निकटता के कारण ये भारी पदार्थों से निर्मित हुए हैं।
- बाह्य ग्रह (Outer / Jovian Planets): इसके अन्तर्गत बृहस्पति, शनि, अरुण एवं वरुण आते हैं। ये हल्के पदार्थों (गैसों) से बने होते हैं। आकार में बड़े होने के कारण इन्हें ‘ग्रेट प्लैनेट्स’ भी कहा जाता है।
सूर्य से दूरी एवं आकार के अनुसार ग्रहों का क्रम
- सूर्य से दूरी के अनुसार बढ़ता क्रम: 1. बुध→ 2. शुक्र→3. पृथ्वी → 4. मंगल →5. बृहस्पति → 6. शनि → 7. अरुण → 8. वरुण।
- आकार के अनुसार घटता (अवरोही) क्रम: 1. बृहस्पति > 2. शनि > 3. अरुण > 4. वरुण > 5. पृथ्वी > 6. शुक्र > 7. मंगल > 8. बुध।
- द्रव्यमान के अनुसार घटता (अवरोही) क्रम: 1. बृहस्पति > 2. शनि > 3. वरुण > 4. अरुण > 5. पृथ्वी > 6. शुक्र > 7. मंगल > 8. बुध।
सभी 8 ग्रहों का विस्तृत विवरण यहाँ पढ़ें
उपग्रह (Satellite)
- परिभाषा: वे आकाशीय पिंड जो अपने-अपने ग्रहों की परिक्रमा के साथ-साथ सूर्य की परिक्रमा भी करते हैं, उपग्रह कहलाते हैं।
- विशेषता: ग्रहों की भाँति इनमें भी अपना प्रकाश नहीं होता और ये सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं।
- संख्यात्मक तथ्य: सबसे अधिक उपग्रह शनि के हैं। पृथ्वी का एकमात्र उपग्रह चन्द्रमा है।
ग्रहों के उपग्रहों की विवरणात्मक सारणी
| क्रम सं. | ग्रह | उपग्रहों की संख्या | उपग्रहों के नाम |
| 1 | बुध | 0 | — |
| 2 | शुक्र | 0 | — |
| 3 | पृथ्वी | 1 | चन्द्रमा |
| 4 | मंगल | 2 | फोबोस, डिमोस |
| 5 | बृहस्पति | 79 | गैनीमीड (Ganymede), कैलिस्टो, यूरोपा आदि। |
| 6 | शनि | 82 | टाइटन, रेहा (Rhea), इथापेटस, डिओन आदि। |
| 7 | अरुण | 27 | टाइटेनिया (Titania), ओबेरॉन, उम्ब्रियल (Umbriel), एरियल, मिरांडा आदि। |
| 8 | वरुण | 13 | ट्राइटन (Triton) (सबसे बड़ा), नेरोड (Neried) |
चन्द्रमा (Moon) एवं उसके भौतिक लक्षण
- वायुमंडल: चन्द्रमा पर वायुमंडल नहीं पाया जाता।
- दृश्यता का नियम: चूँकि चन्द्रमा का परिक्रमण काल एवं घूर्णन काल एक समान है, इसलिए हमें चन्द्रमा का सदैव एक ही पृष्ठ (भाग) दिखाई पड़ता है।
- उच्चतम पर्वत: चन्द्रमा का उच्चतम पर्वत लीबनिट्ज पर्वत है, जो कि चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर स्थित है।
- नक्षत्र दिन (सिडेरल): अन्य तारों की परिक्रमा में लगने वाला समय (नक्षत्र मास) 27 दिन, 7 घंटे 43 मिनट, 11.6 सेकेंड है।
चन्द्रमा के सांख्यिकीय आँकड़े
- पृथ्वी से दूरी: * न्यूनतम दूरी (उपभू दूरी): 3,64,000 किमी.
- अधिकतम दूरी (अपभू दूरी): 4,06,700 किमी.
- औसत दूरी: 3,84,365 किमी.
- अक्षीय गति: 3,680 किमी/घंटा
- व्यास: 3,476 किमी (पृथ्वी के व्यास का 0.27 गुना)
- द्रव्यमान: पृथ्वी के द्रव्यमान का 0.0123 गुना
- औसत घनत्व: 3,340 किग्रा./घन मीटर (पृथ्वी के औसत घनत्व का 0.60 गुना)
- सतह का तापक्रम: दिन में 127°C तथा रात में -173°C
- वृत्तीय गति (सतह पर): 17 किमी/सेकेंड
भारत के चन्द्र अन्वेषण अभियान (चन्द्रयान)
(A) चन्द्रयान-1
- प्रक्षेपण तिथि व स्थान: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन उपग्रह प्रक्षेपण केन्द्र से 22 अक्टूबर, 2008 को इसका प्रक्षेपण किया।
- प्रक्षेपण यान: ध्रुवीय अंतरिक्ष प्रक्षेपण यान (PSLV-C11X) के माध्यम से भेजा गया।
- विशेष उपलब्धि: इस अभियान में भारत निर्मित मानव रहित अंतरिक्ष यान “मून इम्पैक्ट प्रोब” को चन्द्रमा की सतह पर उतारा गया।
(B) चन्द्रयान-2
- प्रक्षेपण विवरण: यह चन्द्रयान-1 के बाद दूसरा चन्द्र अन्वेषण अभियान है, जिसे इसरो (ISRO) ने 22 जुलाई, 2019 को सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र (श्रीहरिकोटा) से जीएसएलवी मार्क III M-1 राकेट से प्रक्षेपित किया था।
- उद्देश्य: इस अभियान से चंद्रमा के दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्र के अब तक अछूते भाग के बारे में जानकारी प्राप्त हो सकेगी।
- बनावट व वजन: तकनीकी रूप से 3850 किलोग्राम के चन्द्रयान-2 को तीन भागों में विभाजित किया गया था:
- आर्बिटर
- लैंडर (विक्रम)
- रोवर (प्रज्ञान)
- अभियान का घटनाक्रम: 20 अगस्त 2019 को 23 दिन पृथ्वी की परिक्रमा करने के बाद यह यान चन्द्रमा की कक्षा में प्रवेश कर गया। लेकिन अगले चरण में 7 सितम्बर, 2019 को चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग के दौरान निर्धारित गंतव्य से 2.1 किमी. पहले इसरो का लैंडर से सम्पर्क टूट गया।
- आर्बिटर के कार्य: इस परिप्रेक्ष्य में इसरो ने कहा कि चन्द्रयान-2, आर्बिटर के रूप में एक वर्ष तक चंद्रमा की परिक्रमा करता रहेगा। आर्बिटर का मुख्य कार्य:
- चन्द्रमा का मानचित्रण करना।
- सौर विकिरण का परीक्षण करना।
- मैग्नीशियम, एल्युमीनियम, सिलिकॉन एवं कैल्शियम आदि प्रमुख तत्वों की उपस्थिति का परीक्षण करना।
- चन्द्रमा के ध्रुवीय क्षेत्रों में पानी (बर्फ) की मात्रा का मात्रात्मक अनुमान लगाना।
उल्काश्म तथा उल्का पिंड (Meteors & Shooting Stars)
- उल्काश्म: अंतरिक्ष में घूमते हुए धूल एवं गैस के पिंड जब पृथ्वी के समीप से गुजरते हैं, तो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण तेजी से पृथ्वी की ओर आते हैं। पृथ्वी के वायुमंडल में आने के कारण घर्षण से ये चमकने लगते हैं एवं पृथ्वी पर पहुँचने से पूर्व ही जलकर राख हो जाते हैं, तो इन्हें उल्काश्म कहते हैं।
- उल्का पिंड: वे पिंड जो वायुमंडल के घर्षण से पूर्णतः जल नहीं पाते और चट्टानों के रूप में पृथ्वी पर आ गिरते हैं, उन्हें उल्का पिंड कहते हैं।
ब्लू मून (Blue Moon) परिघटना
- परिभाषा: जब एक ही महीने में दो पूर्णिमाएँ होती हैं, तो दूसरी पूर्णिमा का चाँद ब्लू मून (Blue moon) कहा जाता है।
- कारण: इसका नीले रंग से कोई सम्बन्ध नहीं होता है। वस्तुतः इसका मुख्य कारण दो पूर्णिमाओं के बीच के अंतराल का 31 दिनों से कम होना है। ऐसा हर दो-तीन वर्ष पर होता है।
- ऐतिहासिक घटनाएँ:
- ब्लू मून की घटना वर्ष 2015 में देखी गई।
- जनवरी 2018 में ब्लू मून की घटना 2 जनवरी व 31 जनवरी के बीच देखी गई।
- ब्लू मून ईयर: जब किसी वर्ष विशेष में दो या अधिक माह ब्लू मून के होते हैं, तो इसे ‘ब्लू मून ईयर’ कहते हैं।
विगत वर्षों में सिविल सर्विसेज की परीक्षा में आए हुए प्रश्न
प्रश्न 1. ‘क्षुद्रग्रहों’ के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- क्षुद्रग्रह सूर्य की परिक्रमा करने वाले विभिन्न आकारों के चट्टानों के मलबे (Rocky Debris) हैं।
- अधिकांश क्षुद्रग्रह छोटे हैं, किन्तु कुछ का व्यास 1000 किमी. तक बड़ा है।
- क्षुद्रग्रहों की कक्षा बृहस्पति और शनि की कक्षाओं के मध्य स्थित हैं।
उपर्युक्त दिए गए कथनों में से कौन-सा कथन सत्य है?
- (a) 1 और 2
- (b) 2 और 3
- (c) 1, 2 और 3
- (d) 1 और 3
उत्तर: (a) 1 और 2
व्याख्या: उपर्युक्त दिए गए कथनों में से केवल 1 और 2 सत्य हैं, जबकि कथन 3 असत्य है। क्षुद्रग्रहों (Asteroids) की कक्षा मंगल एवं बृहस्पति की कक्षाओं के मध्य स्थित है।
प्रश्न 2. निम्नलिखित में से कौन उल्का से संबंधित है?
- (a) पूँछहीन धूमकेतु
- (b) तारामंडल का भाग
- (c) बाह्य अंतरिक्ष से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रविष्ट हुए द्रव्य का अंश
- (d) तीव्र गति से चलता तारा
उत्तर: (c) बाह्य अंतरिक्ष से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रविष्ट हुए द्रव्य का अंश
व्याख्या: उल्का बाह्य अंतरिक्ष से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रविष्ट हुए द्रव्य का अंश होता है। यह एक ठोस आकाशीय पिण्ड होता है, जो वायुमंडल में प्रवेश करते ही घर्षण से जलने के कारण चमकने लगता है। इन्हें ‘टूटा हुआ तारा’ (Shooting Star) भी कहा जाता है। जबकि वे पिण्ड जो वायुमंडल के घर्षण से पूर्णतः जल नहीं पाते और चट्टानों के रूप में पृथ्वी पर आ गिरते हैं, उन्हें उल्का पिण्ड (Meteorites) कहते हैं।
प्रश्न 3. मंगल और बृहस्पति की कक्षाओं के बीच सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करने वाले शैल के टुकड़ों के समूह को क्या कहते हैं?
- (a) धूमकेतु
- (b) उल्का
- (c) उल्कापिण्ड
- (d) क्षुद्रग्रह
उत्तर: (d) क्षुद्रग्रह
व्याख्या: मंगल एवं बृहस्पति के मध्य क्षेत्र में सूर्य की परिक्रमा करने वाले अपेक्षाकृत छोटे पिण्ड को क्षुद्रग्रह (Asteroids) कहते हैं। इनकी उत्पत्ति ग्रहों के विस्फोट के फलस्वरूप टूटे हुए खण्डों से हुई है।
प्रश्न 4. निम्नलिखित में से कौन-सा एक तारा पृथ्वी के सर्वाधिक निकट है?
- (a) सूर्य
- (b) ध्रुवतारा
- (c) एल्फा सेंचुरी
- (d) लुब्धक
उत्तर: (a) सूर्य
व्याख्या: सूर्य पृथ्वी का सबसे निकटतम तारा है। पृथ्वी पर सूर्य का प्रकाश पहुँचने में लगभग 8 मिनट 16.6 सेकेण्ड लगते हैं। सूर्य का आयतन पृथ्वी से 13 लाख गुना अधिक पाया जाता है।
प्रश्न 5. सूर्य से दूरी के क्रम में, निम्नलिखित में से कौन-से दो ग्रह, मंगल और यूरेनस के बीच हैं?
- (a) पृथ्वी और बृहस्पति
- (b) बृहस्पति और शनि
- (c) शनि और पृथ्वी
- (d) शनि और अरुण
उत्तर: (b) बृहस्पति और शनि
व्याख्या: सूर्य से दूरी के बढ़ते क्रम में बृहस्पति और शनि ग्रह, मंगल (Mars) और यूरेनस (अरुण) के बीच स्थित हैं।
प्रश्न 6. निम्नलिखित में से कौन-से ग्रह के सर्वाधिक प्राकृतिक उपग्रह या चन्द्र हैं? (वर्ष 2009 के प्रश्न के संदर्भ में)
- (a) मंगल
- (b) बृहस्पति
- (c) शनि
- (d) शुक्र
उत्तर: (c) शनि
व्याख्या: वर्तमान डेटा के अनुसार शनि ग्रह के सर्वाधिक उपग्रह हैं, जबकि बृहस्पति दूसरा सर्वाधिक उपग्रह वाला ग्रह है।
- शनि की विशेषताएँ: शनि सर्वाधिक चपटा ग्रह है। इसके चारों ओर पूर्ण विकसित वलय/रिंग/छल्ला पाया जाता है। यह ग्रह पीले तारे के समान दृष्टिगत होता है तथा इसको ‘गैसों का गोला’ भी कहा जाता है। वर्तमान में इसके उपग्रहों की संख्या 82 हो गई है, जिसमें टाइटन सबसे बड़ा उपग्रह है।
- बृहस्पति की विशेषताएँ: बृहस्पति सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है। यह तारा एवं ग्रह दोनों के गुणों से युक्त होता है, क्योंकि इसके पास स्वयं की रेडियो ऊर्जा है; इसलिए इसे तारा सदृश ग्रह भी कहते हैं। वर्तमान में इसके ज्ञात उपग्रहों की संख्या 79 है, जिनमें गैनीमीड सबसे बड़ा उपग्रह है।