भारत का अपवाह तंत्र (Drainage System of India) देश की भौगोलिक संरचना, कृषि और अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है। भारतीय नदी प्रणाली को मुख्य रूप से दो भागों में वर्गीकृत किया गया है—पहला, हिमालयी अपवाह तंत्र, जिसमें वर्षभर बहने वाली गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी विशाल नदियाँ शामिल हैं; और दूसरा, प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र, जिसमें गोदावरी, कृष्णा, नर्मदा और तापी जैसी मौसमी नदियाँ आती हैं। यह समृद्ध जल तंत्र न केवल सिंचाई और जल-विद्युत का मुख्य स्रोत है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का भी आधार है।
भारत का अपवाह तंत्र (Drainage System)
मुख्य अवधारणाएँ एवं परिभाषाएँ
- अपवाह तंत्र (Drainage System): अपवाह तंत्र से अभिप्राय नदियों के उस तंत्र जाल से है जिससे धरातलीय जल प्रवाहित होता है। विभिन्न दिशाओं से छोटी-छोटी जल धाराएँ आकर एक साथ मिल जाती हैं तथा एक मुख्य धारा (नदी) का निर्माण करती हैं। अंततः इनका निकास किसी बड़े जलाशय जैसे झील, समुद्र या महासागर में होता है।
- अपवाह द्रोणी (Drainage Basin): एक नदी तंत्र द्वारा जिस क्षेत्र में जल प्रवाहित होता है, उसे एक ‘अपवाह द्रोणी’ कहते हैं।
- जल विभाजक (Water Divide): कोई भी ऊँचा क्षेत्र जैसे पर्वत या उच्चभूमि जो दो पड़ोसी अपवाह द्रोणियों को एक दूसरे से अलग करती है, उसे ‘जल विभाजक’ कहा जाता है।
नदियों का महत्त्व
भारत जैसे उष्ण और मौसमी वर्षा वाले देश के लिए इन नदियों का विशेष महत्त्व है:
- इन्हीं के किनारे भारतीय सभ्यता का विकास हुआ और आज भी देश की समृद्धि में इनका विशिष्ट योगदान है।
- भारत के प्रसिद्ध धार्मिक स्थान, व्यापारिक केंद्र और महानगर इन्हीं नदियों के किनारे पर स्थित हैं।
- भारतीय नदियों का सिंचाई के साथ-साथ जल विद्युत उत्पादन में भी प्रमुखता से योगदान है।
अपवाह तंत्र को प्रभावित करने वाले कारक
किसी भी क्षेत्र का अपवाह तंत्र व प्रतिरूप (Pattern) निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करता है:
- चट्टानों का स्वरूप व संरचना
- स्थलाकृति एवं ढाल
- प्रवाहित जल की मात्रा
- अपवाह की अवधि
नदी द्रोणियों का वर्गीकरण
भारत में 4000 से अधिक छोटी एवं बड़ी नदियाँ मिलती हैं। इनके क्षेत्र के आधार पर अंतर निम्न प्रकार है:
- नदी द्रोणी (River Basin): बड़ी नदियों के जल ग्रहण क्षेत्र को नदी द्रोणी कहा जाता है। इन्हें 23 वृहद् नदी द्रोणियों में विभाजित किया गया है।
- जल संभर (Watershed): छोटी नदियों व नालों द्वारा अपवाहित क्षेत्र को जल संभर कहा जाता है। इन्हें 200 लघुस्तरीय द्रोणियों में विभाजित किया गया है।
आकार की दृष्टि से भारतीय नदियों की श्रेणियाँ
| श्रेणी | अपवाह क्षेत्र (प्रति नदी बेसिन) | नदी बेसिनों की संख्या | देश के कुल जल में हिस्सेदारी |
| बड़ी नदियाँ | 20,000 वर्ग कि.मी. से अधिक | 14 | संयुक्त रूप से बड़ी और मध्यम नदियाँ मिलकर कुल जल मात्रा का 90% भाग संजोए रखती हैं। |
| मध्यम नदियाँ | 2,000 से 20,000 वर्ग कि.मी. | 44 | |
| छोटी नदियाँ | 2,000 वर्ग कि.मी. से कम | अत्यधिक | शेष हिस्सा |
उत्पत्ति के आधार पर भारतीय अपवाह तंत्र
उत्पत्ति के आधार पर भारत के अपवाह तंत्र को दो मुख्य भागों में विभाजित किया जा सकता है:
क. हिमालयी अपवाह तंत्र
हिमालय क्षेत्र की नदियाँ बारहमासी होती हैं और इनका मुख्य स्रोत ग्लेशियर और मानसून दोनों हैं।
मुख्य अपवाह प्रतिरूप (Patterns):
- पूर्ववर्ती अपवाह (Antecedent Drainage): इसमें नदियों का निर्माण पहले व स्थल खंड का उत्थान बाद में हुआ। नदियाँ इस स्थलीय खंड को काटकर ‘महाखड्ड’ या ‘गॉर्ज’ का निर्माण करते हुए प्रवाहित होती हैं। उदाहरण: सिंधु, सतलज, ब्रह्मपुत्र आदि।
- अक्रमवर्ती अपवाह (Insequent Drainage): इस अपवाह का कोई निश्चित क्रम नहीं होता। ब्रह्मपुत्र की सहायक दिहांग तथा लोहित नदियाँ विपरीत दिशा से आकर ब्रह्मपुत्र में मिल जाती हैं।
- खण्डित या आंतरिक अपवाह (Intermittent Drainage): उत्तर भारत के विशाल मैदान में पहुँचने के पूर्व भाबर क्षेत्र में नदियाँ विलीन हो जाती हैं, जिसे खण्डित या विलुप्त अपवाह कहा जाता है।
- मालाकार या गुम्फित अपवाह: नदियाँ समुद्र में गिरने से पूर्व अनेक शाखाओं में विभाजित होकर डेल्टा बनाती हैं, जिससे गुम्फित या मालाकार अपवाह का निर्माण होता है।
- समानान्तर अपवाह (Parallel Drainage): इसमें नदियाँ समान ऊँचाई से निकलकर समानान्तर और समान दूरी तक बहती हैं। उदाहरण: लघु हिमालय से निकलने वाली सभी नदियाँ जो उत्तरी मैदान में बहती हैं।
- आयताकार अपवाह (Rectangular Drainage): इसमें सहायक नदियाँ मुख्य नदी में समकोण पर आकर मिलती हैं, किंतु यह प्रणाली अनुवर्ती प्रणाली से भिन्न होती है। उदाहरण: कोसी व उसकी सहायक नदियाँ।
हिमालयी नदियों की मुख्य विशेषताएँ:
- सदानीरा प्रकृति: ये नदियाँ वर्ष भर जल से पूर्ण रहती हैं क्योंकि इनका स्रोत ग्लेशियर से जुड़ा है।
- जल स्तर में दो बार वृद्धि: प्रथम बार ग्रीष्म ऋतु में बर्फ पिघलने से और द्वितीय बार दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा से जल बढ़ता है।
- समुद्र में निकास: हिमालयी क्षेत्र से असंख्य नदियाँ निकलती हैं, परन्तु मुख्यतः दो धाराएँ ही समुद्र में मिलती हैं—(i) मेघना की धारा, (ii) सिंधु की धारा। अन्य नदियाँ इन्हीं में मिल जाती हैं।
- विशाल द्रोणियाँ और बेसिन: इन नदियों के बेसिन बहुत बड़े हैं। उदाहरण: गंगा बेसिन (8.6 लाख वर्ग कि.मी.), यमुना बेसिन (3.6 लाख वर्ग कि.मी.)।
- गहरे गॉर्ज: पूर्ववर्ती नदियों के कारण गहरे गॉर्ज बने हैं, जैसे लद्दाख-जास्कर श्रृंखला के मध्य ‘बुंजी’ नामक स्थान पर बना 5300 मीटर गहरा ‘सिंधु गॉर्ज’।
- बाढ़ की संभावना: अपरदन (Erosion) अधिक होने से नदी घाटी में निक्षेपण (Siltation) होता रहता है, जो बाढ़ का मुख्य कारण बनता है। ये मार्ग परिवर्तन (जैसे कोसी, घाघरा) के लिए भी विख्यात हैं।
- मैदानी भाग में नौगम्य: मैदानों में ये नदियाँ लंबी दूरी तय करती हैं, नौकायान के अनुकूल हैं तथा ‘विसर्प’ (Meanders), गोखुर झील (Ox-bow lake) और प्राकृतिक तटबंध बनाती हैं।
- विशाल डेल्टा: ये नदियाँ विश्व के सबसे बड़े डेल्टाओं का निर्माण करती हैं, जैसे—गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा।
ख. प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र
प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर करती हैं और तुलनात्मक रूप से अधिक पुरानी हैं।
मुख्य अपवाह प्रतिरूप (Patterns):
- अनुगामी अपवाह (Consequent Drainage): ये नदियाँ सामान्यतः क्षेत्रीय ढाल के अनुरूप बहती हैं। दक्षिण भारत में अधिकतम नदियाँ पश्चिमी घाट से निकलकर पूर्व की ओर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। उदाहरण: गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, पेरियार आदि।
- परवर्ती अपवाह (Subsequent Drainage): ये नदियाँ अपनतियों (Folds) के अक्षों का अनुसरण करती हैं और अनुवर्ती नदी से समकोण पर मिलती हैं। उदाहरण: चम्बल, केन, बेतवा आदि।
- अध्यारोपित अपवाह (Superimposed Pattern): इन नदियों का विकास उस क्षेत्र में पाई जाने वाली वर्तमान चट्टानों की संरचना के अनुरूप नहीं होता। उदाहरण: दामोदर, स्वर्णरेखा, चम्बल, बनास आदि।
- आयताकार अपवाह: विंध्य क्षेत्र की नदियों में इस प्रकार का प्रतिरूप दिखाई देता है।
- जालीदार अपवाह (Trellis Drainage): इसे स्वभावोत्भूत अपवाह तंत्र भी कहा जाता है, जहाँ मुख्य नदियाँ एक-दूसरे के समानांतर बहती हैं और सहायक नदियाँ उनसे समकोण पर मिलती हैं।
- अरीय अपवाह (Radial Drainage): जब किसी केंद्रीय उच्च भाग या पहाड़ी से नदियाँ निकलकर चारों दिशाओं में प्रवाहित होती हैं। उदाहरण: सौराष्ट्र, नीलगिरि, अमरकंटक की पहाड़ियाँ तथा राँची का पठार।
प्रायद्वीपीय नदियों की मुख्य विशेषताएँ:
- ऋतुनिष्ठ (Seasonal): ये नदियाँ मौसमी होती हैं। दक्षिण-पश्चिम मानसून से इनमें जल बढ़ता है। (विशेष अपवाद: कावेरी नदी का निचला हिस्सा लौटते मानसून यानी उत्तर-पूर्वी मानसून से भी वर्षा प्राप्त करता है)।
- छोटी व उथली घाटियाँ: कम दूरी तय करने के कारण इनकी द्रोणियाँ छोटी और घाटियाँ उथली (Shallow) होती हैं।
- गैर-नौगम्य: जल प्रपातों की अधिकता और जल की मात्रा घटने-बढ़ने के कारण ये सामान्यतः नौकागमन के अनुकूल नहीं होतीं (केवल डेल्टाई क्षेत्रों को छोड़कर)।
- कठोर चट्टानें और भ्रंश घाटियाँ: ये नदियाँ कठोर चट्टानी भागों से बहती हैं। नर्मदा और तापी जैसी नदियाँ ‘भ्रंश घाटियों’ (Rift Valleys) से होकर बहती हैं, जिससे इनका मार्ग सीधा व रेखीय होता है।
- एश्चुएरी का निर्माण: पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ प्रायः ‘ज्वारनदमुख’ (Estuary) बनाती हैं, जबकि पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ छोटे डेल्टा बनाती हैं।
भारत की विस्तृत जल-विभाजक प्रणाली
संपूर्ण भारत की अपवाह प्रणाली को मुख्य रूप से अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और आंतरिक अपवाह क्षेत्रों में बाँटा गया है।
आंतरिक अपवाह क्षेत्र: जब नदियाँ किसी सागर में न मिलकर आंतरिक भागों (मरूस्थल या झील) में ही विलुप्त हो जाती हैं। यह क्षेत्र मुख्य रूप से उत्तरी कश्मीर, दक्षिणी-पूर्वी असम और पश्चिमी राजस्थान तक सीमित है, जिसका कुल क्षेत्रफल लगभग 1.6 लाख वर्ग कि.मी. है। उदाहरण: लूनी, घग्गर, रूपनगढ़, मेढ़ा आदि।
मुख्य जल-विभाजक रेखा (The Great Indian Watershed)
भारत के कुल अपवाह का लगभग 3/4 भाग (75%) बंगाल की खाड़ी में गिरता है और शेष अरब सागर तथा आंतरिक तंत्र का हिस्सा है। इन दोनों बड़े अपवाह तंत्रों के बीच की विभाजक रेखा निम्नलिखित मार्ग का अनुसरण करती है:
- उत्तरी भाग: यह रेखा हिमालय के उत्तर में स्थित कैलाश पर्वत (मानसरोवर झील) से आरंभ होकर कामेत पर्वत से होती हुई शिमला के पूर्वी भाग को स्पर्श करती है।
- मध्य भाग: इसके बाद यह अरावली पर्वत के बीचों-बीच उदयपुर तक जाती है। अरावली इन दोनों अपवाह तंत्रों के बीच एक उत्तम जल-विभाजक है।
- दक्षिणी-मध्य भाग: उदयपुर से दक्षिण में इंदौर के निकट से होते हुए यह रेखा नर्मदा घाटी के उत्तर-पूर्व में मुड़ती है और मैकाल व महादेव की पहाड़ियों के दक्षिणी भाग से गुजरती है।
- दक्षिणी भाग: यहाँ से यह पश्चिम में अजंता की पहाड़ियों से होती हुई सीधे ‘पश्चिमी घाट’ के सहारे उसके समानांतर सुदूर दक्षिण में कन्याकुमारी तक विस्तृत है।
हिमालयी अपवाह तंत्र
हिमालयी अपवाह तंत्र का अध्ययन, सुविधा की दृष्टि से तीन मुख्य नदी तंत्रों के माध्यम से किया जा सकता है।
1. सिन्धु नदी तंत्र – इसे विस्तार से पढने के लिए यहाँ Click करें
11. गंगा नदी तंत्र – इसे विस्तार से पढने के लिए यहाँ Click करें
III. ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र – इसे विस्तार से पढने के लिए यहाँ Click करें
प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र (Peninsular Drainage System)
मुख्य विशेषताएँ एवं सामान्य परिचय
- प्राचीनता: हिमालयी नदी तंत्र की तुलना में प्रायद्वीपीय नदी तंत्र प्राचीन है।
- मुख्य जल-विभाजक: पश्चिमी घाट प्रायद्वीपीय भारत में प्रमुख जल-विभाजक है।
- प्रवाह की दिशा: अधिकांश नदियाँ पश्चिमी घाट से निकलकर पूर्व व दक्षिण-पूर्व की ओर प्रवाहित होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं, जिसमें महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी प्रमुख हैं।
- पश्चिम की ओर बहने वाली मुख्य नदियाँ: नर्मदा और तापी (ताप्ती) प्रायद्वीपीय भारत की दो मुख्य नदियाँ हैं, जो अपवाद स्वरूप पश्चिम की ओर बहती हुई अरब सागर में गिरती हैं (इसका कारण इन नदियों का भ्रंश घाटी में प्रवाहित होना है)।
- अन्य प्रवाह: कुछ अन्य नदियाँ प्रायद्वीपीय पठार से निकलकर उत्तर की तरफ गंगा नदी तंत्र का भाग बनती हैं। इसके अतिरिक्त, अरावली और मध्य भारत से निकलने वाली कुछ नदियाँ (लूनी, साबरमती, माही) कच्छ के रण और खम्बात की खाड़ी में गिरती हैं।
- तीव्र ढाल: पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढाल से कई छोटी-छोटी नदियाँ निकलती हैं और तीव्र ढाल बनाती हुई अरब सागर में गिरती हैं।
प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र: विस्तार से पढने के लिए यहाँ click करें
महत्वपूर्ण भौगोलिक परिभाषाएँ
डेल्टा (Delta): नदी जब सागर या झील में गिरती है तो वेग में अत्यधिक कमी के कारण उसके मुहाने पर मलबा का निक्षेप होने लगता है, जिससे वहाँ विशेष प्रकार के स्थलरूप का निर्माण होता है, जिसे ‘डेल्टा’ कहते हैं। ज्यादातर बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ ‘डेल्टा’ का निर्माण करती हैं।
एश्चुअरी / ज्वार नदमुख (Estuary): नदी के जल में तीव्र प्रवाह के कारण जब उसके मुहाने पर साथ लाये गए मलबे का निक्षेप नहीं होता है, तथा नदी जल के साथ मलबा भी समुद्र में गिर जाता है, तो नदी का मुहाना उथला होने के बजाय गहरा हो जाता है। ऐसे गहरे मुहाने को ही ज्वारनदमुख कहा जाता है। ज्यादातर अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ एश्चुअरी का निर्माण करती हैं।