NCERT Notes Class 6 Social science (Geography) Chapter 7: India’s Cultural Roots के अंतर्गत प्राचीन भारत में केवल भौतिक सीमाओं का विस्तार नहीं हुआ, बल्कि ज्ञान, सहिष्णुता, और सार्वभौमिक कल्याण (वसुधैव कुटुंबकम) के सिद्धांतों का जन्म हुआ। इसमें वैदिक काल के विचार मंतव्यों, उपनिषदों के आध्यात्मिक चिंतन, तथा जैन और बौद्ध धर्म के रूप में उभरे सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों का बुनियादी और सटीक विवरण मिलता है। यह अध्याय केवल ऐतिहासिक तथ्यों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह वर्तमान भारतीय समाज के नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों के मूल स्रोतों (Roots) को तलाशने का एक गंभीर प्रयास है।
वेद और वैदिक संस्कृति (The Vedas and Vedic Culture)
1. वेद क्या हैं? (What are the Vedas?)
- मूल अर्थ: ‘वेद’ शब्द संस्कृत के ‘विद्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है ‘ज्ञान’ (Knowledge)।
- संख्या व प्रकार: कुल चार वेद हैं — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ये भारत और विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथों में से हैं।
- स्वरूप व क्षेत्र: इसमें हज़ारों सूक्त (प्रार्थनाएँ/गीत) हैं जो लिखित न होकर मौखिक (orally) रूप से गाए और रटे जाते थे। इनकी रचना सप्त सैंधव क्षेत्र में हुई थी।
- समय काल: सबसे प्राचीन ‘ऋग्वेद’ का कालक्रम विशेषज्ञों के अनुसार 5वीं से दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व (BCE) के बीच माना जाता है।
- UNESCO मान्यता: बिना किसी बदलाव के सैकड़ों पीढ़ियों तक मौखिक रूप से याद रखने की इस अनूठी परंपरा के कारण, 2008 में UNESCO ने वैदिक संकीर्तन (Vedic chanting) को ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ (Intangible Cultural Heritage of Humanity) घोषित किया।
- रचनाकार व भाषा: इनकी रचना ऋषियों (पुरुष) और ऋषिकाओं (महिला द्रष्टाओं) द्वारा प्रारंभिक संस्कृत (Early Sanskrit) भाषा में की गई थी।
- प्रमुख देवता: इंद्र, अग्नि, वरुण, मित्र, सरस्वती, उषस आदि। ये सभी मिलकर ‘ऋत’ (ब्रह्मांडीय सत्य और व्यवस्था) को बनाए रखते हैं।
- मूल दर्शन:
- एकम सत् विप्रा बहुधा वदन्ति: सर्वोच्च वास्तविकता (सत्य) एक है, लेकिन ऋषि उसे कई नाम देते हैं।
- ऋग्वेद के अंतिम मंत्र मानवता की एकता और एकजुटता (समान विचार और संयुक्त हृदय) का आह्वान करते हैं।
2. वैदिक समाज (Vedic society)
- सामाजिक संरचना: प्रारंभिक वैदिक समाज विभिन्न ‘जन’ (कुलों/Clans) में विभाजित था। ऋग्वेद में ऐसे 30 से अधिक जनों का उल्लेख है (जैसे: भरत, पुरु, कुरु, यदु, तुर्वश आदि)।

- भौगोलिक स्थिति: ये जन उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भाग से जुड़े थे।
- शासन व्यवस्था: स्पष्ट जानकारी सीमित है, लेकिन प्रशासनिक/सामूहिक सभाओं के लिए ‘राजा’, ‘सभा’ और ‘समिति’ जैसे शब्दों का उल्लेख मिलता है।
- प्रमुख व्यवसाय: कृषि, बुनकर, कुम्हार, निर्माता (Builder), बढ़ई, चिकित्सक/वैद्य (Healer), नर्तक, नाई और पुरोहित आदि।
3. वैदिक विचारधाराएं/दर्शन
- धार्मिक क्रियाकांड: व्यक्तिगत और सामूहिक भलाई के लिए देवताओं को समर्पित यज्ञ परंपरा विकसित हुई। शुरुआत में दैनिक अनुष्ठान अग्नि (आग के देवता) को प्रार्थना और आहुति देने तक सीमित थे, जो समय के साथ जटिल होते गए।
- उपनिषद: इन्होंने वैदिक अवधारणाओं को आगे बढ़ाया और दो नए सिद्धांत दिए:
- पुनर्जन्म (Rebirth)
- कर्म (हमारे कार्य और उनके परिणाम)
- वेदांत दर्शन: इसके अनुसार पूरी सृष्टि, मानव जीवन और ब्रह्मांड एक ही दिव्य तत्व हैं, जिसे ‘ब्रह्म’ या ‘तत’ कहा गया है।
- अहं ब्रह्मास्मि: “मैं ब्रह्म हूँ” (मैं दिव्य हूँ)।
- तत् त्वम् असि: “वह (ब्रह्म) तुम ही हो”।
- आत्मन (Atman): प्रत्येक जीव में निवास करने वाला आंतरिक ‘स्व’ या आत्मा, जो अंततः ‘ब्रह्म’ का ही हिस्सा है। इसी अंतःसंबंध के कारण ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ (सभी जीव सुखी और रोगमुक्त रहें) की प्रार्थना की गई।
- अन्य दर्शन व हिंदू धर्म की नींव: प्रथम सहस्राब्दी ईसा पूर्व (1st millennium BCE) की शुरुआत में कई अन्य विचार धाराएं उभरीं, जिनमें से एक ‘योग’ (Yoga) था (चेतना में ब्रह्म की प्राप्ति का माध्यम)। ये सभी मिलकर आज के ‘हिंदू धर्म’ का आधार बने।
बौद्ध धर्म (Buddhism)
- मूल प्रकृति: यह नास्तिक या गैर-वैदिक संप्रदाय था, जिसने वेदों के प्राधिकार (Authority of Vedas) को स्वीकार नहीं किया और अपनी स्वतंत्र प्रणाली विकसित की।
1. सिद्धार्थ गौतम का जीवन और ज्ञानोदय
- जन्म: लगभग 2.5 सहस्राब्दी पूर्व (अनुमानित 560 ईसा पूर्व / BCE), लुम्बिनी (वर्तमान नेपाल) में एक राजकुमार के रूप में।
- महाभिनिष्क्रमण (गृहत्याग): 29 वर्ष की आयु में महल का विलासितापूर्ण जीवन त्याग दिया।
- प्रेरक घटना (चार दृश्य): नगर भ्रमण के दौरान एक वृद्ध, एक बीमार व्यक्ति, एक मृत शरीर और अंत में एक शांत/प्रसन्न संन्यासी (Ascetic) को देखना।
- ज्ञान प्राप्ति (Enlightenment): बोधगया (बिहार) में एक पीपल के पेड़ के नीचे कई दिनों के ध्यान के बाद। ज्ञान प्राप्ति के बाद वे ‘बुद्ध’ कहलाए।
- दुःख का मूल कारण: बुद्ध ने महसूस किया कि अविद्या (Ignorance/अज्ञानता) और आसक्ति (Attachment) ही मानव दुखों का मूल कारण हैं।
2. बुद्ध की शिक्षाएँ और संगठन
- अहिंसा: बुद्ध ने अहिंसा पर बल दिया, जिसका मूल अर्थ ‘ग़ैर-चोट’ या ‘ग़ैर-क्षति’ (Non-hurting/Non-injuring) है।
- आंतरिक अनुशासन: नदी के पवित्र पानी से नहाने से कोई शुद्ध नहीं होता; शुद्ध वही है जिसमें सत्य और धर्म का निवास है।

- आत्म-विजय: रणभूमि में हजारों पुरुषों को जीतने से बेहतर स्वयं पर विजय प्राप्त करना है।
- संघ: बुद्ध ने अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए ‘संघ’ की स्थापना की। यह भिक्षुओं (Monks) और बाद में भिक्षुणियों (Nuns) का एक अनुशासित समुदाय था।
उपनिषदों की कहानियाँ
1. श्वेतकेतु और वास्तविकता का बीज
- स्रोत: छान्दोग्य उपनिषद।
- पात्र: ऋषि उद्दालक आरुणि और उनके पुत्र श्वेतकेतु।
- मूल सीख: अदृश्य होने के बावजूद ब्रह्म सर्वव्यापी है। जैसे बरगद के फल को खोलने पर उसका बीज खाली दिखता है पर उसमें विशाल पेड़ समाहित होता है, या जैसे मिट्टी से अलग-अलग बर्तन बनते हैं, वैसे ही सब कुछ एक ही सूक्ष्म मूल तत्व (ब्रह्म) से निकला है।
- महावाक्य: इस कहानी का अंत “तत् त्वम् असि” (You are That, श्वेतकेतु) से होता है।
2. नचिकेता और उसकी खोज
- स्रोत: कठ उपनिषद।
- पात्र: बालक नचिकेता और मृत्यु के देवता यम।
- मूल प्रश्न: “शरीर की मृत्यु के बाद क्या होता है?”
- मूल सीख: यम ने स्पष्ट किया कि आत्मन या ‘स्व’ सभी जीवों के भीतर छिपा है। यह अमर (Immortal) है; इसका न तो जन्म होता है और न ही मृत्यु।
3. गार्गी और याज्ञवल्क्य का शास्त्रार्थ
- स्रोत: बृहदारण्यक उपनिषद।
- पात्र: राजा जनक की सभा में विदुषी ऋषिका गार्गी और प्रख्यात ऋषि याज्ञवल्क्य।
- मूल सीख: गार्गी ने याज्ञवल्क्य से संसार और ब्रह्म के स्वरूप पर गहन प्रश्न पूछे। याज्ञवल्क्य ने समझाया कि ब्रह्म ही वह तत्व है जिसके कारण यह संसार, ऋतुएँ, नदियाँ और अन्य सभी चीजें संभव हैं। यह कहानी प्राचीन भारत में महिलाओं की उच्च बौद्धिक स्थिति को दर्शाती है।
जैन धर्म (Jainism)
- प्राचीनता: बौद्ध धर्म के समकालीन ही इसका विस्तार हुआ, लेकिन इसकी जड़ें अत्यधिक प्राचीन मानी जाती हैं।
- वर्धमान महावीर का जीवन:
- जन्म: छठी शताब्दी ईसा पूर्व (6th century BCE) के प्रारंभ में, बिहार के वैशाली के निकट एक शाही परिवार में।
- गृहत्याग व ज्ञान: 30 वर्ष की आयु में गृहत्याग किया। 12 वर्षों की कठोर तपस्या के बाद ‘अनंत ज्ञान’ या सर्वोच्च ज्ञान (कैवल्य) प्राप्त किया। ज्ञान प्राप्ति के बाद वे ‘महावीर’ (महान नायक) कहलाए।
जैन धर्म के तीन मुख्य स्तंभ/शिक्षाएँ:
- अहिंसा: सभी जीवित, सांस लेने वाले और संवेदनशील प्राणियों को चोट न पहुँचाना, न सताना और न ही उनका वध करना।
- अनेकांतवाद: सत्य या वास्तविकता के ‘कई पहलू’ या दृष्टिकोण होते हैं। किसी भी एक कथन से सत्य की पूर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती।
- अपरिग्रह: ‘गैर-स्वामित्व’ या भौतिक संपत्तियों से अनासक्ति (Detachment)। जीवन में केवल अत्यंत आवश्यक चीजों तक ही खुद को सीमित रखना।
- पारस्परिक निर्भरता: जैन दर्शन सभी जीवों (मनुष्यों से लेकर अदृश्य सूक्ष्मजीवों तक) के बीच अंतःसंबंध और अंतर्निर्भरता (Interconnectedness) पर जोर देता है।
जातक कथाएँ और जैन कहानियाँ
1. जातक कथाएँ
- महत्व: ये बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियाँ हैं जो बौद्ध मूल्यों को सरल भाषा में समझाती हैं।
- वानर-राज की कहानी: बुद्ध एक बार वानर-राज थे। अपने साथी बंदरों की जान बचाने के लिए उन्होंने नदी के पार खुद के शरीर को एक पुल (Bridge) के रूप में इस्तेमाल होने दिया। अत्यधिक चोटों के कारण उनकी मृत्यु हो गई।
- पुरातात्विक साक्ष्य: इस वानर-राज की कहानी को मध्य प्रदेश के भरहुत (MP) में एक प्राचीन पत्थर के पैनल पर उकेरा गया है।

2. रोहिणेय की जैन कहानी
- मूल विषय: रोहिणेय नामक एक कुशल चोर महावीर के उपदेश सुनकर हृदय परिवर्तन का अनुभव करता है, अपने अपराध स्वीकार करता है और भिक्षु बन जाता है।
- मूल सीख: यह कहानी ‘सम्यक कर्म, सम्यक सोच’ और हर व्यक्ति को सुधरने का ‘दूसरा मौका’ (Second Chance) मिलने के महत्व को दर्शाती है।
भिक्षु, गुफाएं और अन्य दर्शन
- प्रचार-प्रसार: बौद्ध और जैन दोनों धर्मों के भिक्षुओं (और भिक्षुणियों) ने अपने उपदेशों को फैलाने के लिए देश भर में यात्राएं कीं।
- आवास (Monasteries/Viharas): उन्होंने दूर-दराज के क्षेत्रों में नए मठ बनाए या चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाओं (Rock-cut caves) में कठोर जीवन बिताया, जहाँ वे पत्थरों के बिस्तरों पर सोते थे।
- एलोरा की गुफाएं (Ellora Caves): महाराष्ट्र में 6ठी से 10वीं शताब्दी ईस्वी (CE) के बीच चट्टानों को काटकर बनाई गईं।
- प्रीलिम्स फैक्ट: यहाँ हिंदू, बौद्ध और जैन तीनों ही विचारधाराओं की गुफाएं एक साथ सह-अस्तित्व में मिलती हैं।
- चार्वाक या लोकायत स्कूल :
- यह एक पूर्णतः भौतिकवादी दर्शन था।
- इनका मानना था कि केवल भौतिक संसार का ही अस्तित्व है, इसलिए मृत्यु के बाद कोई जीवन नहीं होता।
लोक और जनजातीय जड़ें (Folk and Tribal Roots)
- सांस्कृतिक आदान-प्रदान: भारत की लिखित पाठ्य परंपराओं (Textual traditions) और मौखिक परंपराओं (Oral traditions) के बीच हमेशा से एक जीवंत संबंध रहा है। लोक (Folk) और जनजातीय (Tribal) परंपराओं ने मुख्यधारा के दर्शन (जैसे हिंदू धर्म) के साथ देवी-देवताओं, कथाओं और अनुष्ठानों का स्वतंत्र रूप से आदान-प्रदान किया है।
1. सांस्कृतिक आत्मसात और आदान-प्रदान के उदाहरण (Cultural Exchange Examples)
- भगवान जगन्नाथ (पुरी, ओडिशा): परंपरा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ मूल रूप से एक जनजातीय देवता (Tribal Deity) थे, जिन्हें बाद में मुख्यधारा में पूजा जाने लगा। भारत भर में पूजी जाने वाली मातृ-देवी (Mother-Goddess) के विभिन्न रूपों के साथ भी ऐसा ही है।
- महाकाव्यों का जनजातीय संस्करण: भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से लेकर तमिलनाडु तक की कई जनजातियों ने हिंदू देवी-देवताओं को अपनाया है और उनके पास महाभारत और रामायण के अपने विशिष्ट जनजातीय संस्करण मौजूद हैं।
2. प्रकृति पूजा और चेतना (Nature Worship and Consciousness)
- समान अवधारणा: लोक, जनजातीय और हिंदू मतों में प्रकृति के तत्वों (पर्वत, नदी, पेड़, पौधे, जानवर और पत्थर) को पवित्र माना जाता है क्योंकि उनके पीछे चेतना (Consciousness) का वास माना गया है।
- टोडा जनजाति:
- क्षेत्र: तमिलनाडु की नीलगिरि पहाड़ियाँ (Tamil Nadu)।
- सांस्कृतिक विशेषता: नीलगिरि पर्वत श्रृंखला की 30 से अधिक चोटियों को ये देवी-देवताओं का निवास स्थान मानते हैं। ये चोटियाँ इतनी पवित्र हैं कि टोडा लोग कभी उनकी तरफ उंगली से इशारा भी नहीं करते।
3. जनजातीय समाज में ‘सर्वोच्च ईश्वर’ की अवधारणा (Concept of Supreme Divinity)
कई देवी-देवताओं की पूजा के बावजूद, विभिन्न जनजातियों में एक ‘सर्वोच्च सत्ता’ या ‘परमेश्वर’ की स्पष्ट अवधारणा मिलती है:
| जनजाति / क्षेत्र | सर्वोच्च देवता (Supreme Deity) | विशेषता |
| अरुणाचल प्रदेश की जनजातियाँ | दोन्यी-पोलो | सूर्य (Donyi) और चंद्रमा (Polo) का संयुक्त रूप, जिन्हें सर्वोच्च भगवान का दर्जा प्राप्त है। |
| मध्य भारत (Central India) | खंडोबा | मध्य भारत के कुछ हिस्सों में पूजे जाने वाले प्रमुख देव। |
| पूर्वी भारत (Munda & Santhal) | सिंगबोंगा | मुंडा और संथाल जनजातियों के सर्वोच्च देवता, जिन्होंने इस पूरे संसार की रचना की। |