NCERT Notes Class 7 Science Chapter 7: Heat Transfer in Nature के अंतर्गत ऊष्मा स्थानांतरण (Heat Transfer) की तीन मूलभूत विधियों—चालन (Conduction), संवहन (Convection) और विकिरण (Radiation)—के बीच के वैज्ञानिक अंतरों को स्पष्ट करता है। इसमें तरल और गैसीय माध्यमों में संवहन धाराओं (Convection Currents) के निर्माण को समझाया गया है, जो प्राकृतिक घटनाओं जैसे समुद्री समीर (Sea Breeze) और थल समीर (Land Breeze) के पीछे का मुख्य कारण हैं। इसके साथ ही, यह भी रेखांकित करता है कि किस प्रकार पृथ्वी द्वारा सौर विकिरण को अवशोषित व परावर्तित करने की प्रक्रिया वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण (Atmospheric Circulation), पवन प्रणालियों और वर्षा के पैटर्न को निर्धारित करती है।
ऊष्मा का चालन (Conduction of Heat)
धातु की पट्टी में ऊष्मा स्थानांतरण
- प्रयोग संरचना: एल्युमीनियम या लोहे की 15 सेमी लंबी पट्टी पर मोम की मदद से चार पिनों (I, II, III, IV) को समान दूरी (2 सेमी) पर चिपकाया जाता है।
- अवलोकन: मोमबत्ती से एक सिरे को गर्म करने पर सबसे पहले लौ के पास वाली पिन I गिरती है, फिर क्रम से II, III और IV गिरती हैं।
- चालन की परिभाषा: ऊष्मा का किसी वस्तु के गर्म हिस्से से ठंडे हिस्से की ओर स्थानांतरित होना चालन (Conduction) कहलाता है।
- कणों की स्थिति: ऊष्मा चालन के दौरान गर्म कण अपने पास वाले ठंडे कण को ऊष्मा स्थानांतरित करते हैं, लेकिन कण स्वयं अपना स्थान नहीं छोड़ते।
- सुचालक (Good Conductors): वे पदार्थ जो ऊष्मा को अपने में से आसानी से गुजरने देते हैं, उन्हें ऊष्मा का सुचालक कहते हैं।
- उदाहरण: धातुएँ (जैसे लोहा, एल्युमीनियम, स्टील)।
- अनुप्रयोग: रसोई में खाना पकाने के बर्तन धातुओं के बनाए जाते हैं।

- कुचालक या ऊष्मारोधी (Poor Conductors / Insulators): वे पदार्थ जो ऊष्मा को आसानी से अपने में से प्रवाहित नहीं होने देते, उन्हें कुचालक कहते हैं।
- उदाहरण: लकड़ी, काँच, मिट्टी (Clay) और चीनी मिट्टी (Porcelain)।
- अनुप्रयोग: चाय या कॉफी मिट्टी या चीनी मिट्टी के कपों में देर तक गर्म रहती है क्योंकि ये ऊष्मा के कुचालक हैं।
पदार्थों का वर्गीकरण
| क्र.सं. | पदार्थ (Material) | ऊष्मा का चालक (Good/Poor Conductor) |
| 1. | स्टील | Good conductor (सुचालक) |
| 2. | लकड़ी (Wood) | Poor conductor (कुचालक) |
| 3. | हवा (Air) | Poor conductor (कुचालक) |
वायु और ऊष्मारोधन का नियम
- ऊनी वस्त्रों का सिद्धांत: ऊनी कपड़ों के रेशों के बीच हवा फँसी रहती है।
- हवा का गुण: वायु ऊष्मा की खराब चालक (कुचालक) है।
- प्रभाव: वायु शरीर की ऊष्मा को बाहर जाने से रोकती है, जिससे ठंड में गर्मी का अहसास होता है।
- दो पतले कंबल बनाम एक मोटा कंबल: दो पतले कंबलों के बीच फँसी हवा की परत ऊष्मारोधी का काम करती है। यही कारण है कि दो पतले कंबल एक मोटे कंबल की तुलना में अधिक गर्मी देते हैं।

पारंपरिक और आधुनिक वास्तुकला में ऊष्मारोधन
- उत्तराखंड (मोरी ब्लॉक, उत्तरकाशी) की पारंपरिक शैली:
- यहाँ अत्यधिक ठंड और बर्फबारी से बचने के लिए दोहरी लकड़ी की दीवारें बनाई जाती हैं।
- लकड़ी की दीवारों के बीच गोबर और मिट्टी भरी जाती है।
- लकड़ी और मिट्टी दोनों ऊष्मा के कुचालक हैं, जो अंदर की गर्मी को बाहर जाने से रोकते हैं।
- खोखली ईंटों का उपयोग (Hollow Bricks):
- आधुनिक घरों की बाहरी दीवारों में खोखली ईंटों का प्रयोग किया जाता है।
- ईंटों के खोखलेपन में बंद हवा (Trapped air) कुचालक की तरह काम करती है, जिससे मकान सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडे रहते हैं।
संवहन (Convection)
गैसों और द्रवों (तरल पदार्थों) में ऊष्मा का स्थानांतरण संवहन (Convection) विधि द्वारा होता है।
संवहन के प्रमुख सिद्धांत और प्रयोग
- गर्म हवा का व्यवहार: हवा गर्म होने पर फैलती (Expands) है, अधिक जगह घेरती है, हलकी (Lighter) हो जाती है और ऊपर उठती है।
- बैलून का उदाहरण: धूप में आंशिक रूप से फूला गुब्बारा गर्म होकर हवा के फैलाव के कारण और बड़ा हो जाता है।
- धुएँ का ऊपर उठना: धुआँ गर्म गैसों और छोटे ठोस कणों का मिश्रण है। आसपास की हवा से गर्म होने के कारण यह ऊपर उठता है।
- द्रवों (Liquids) में संवहन (पोटेशियम परमैंगनेट प्रयोग):
- बीकर के तली का पानी गर्म होकर फैलता है, हल्का होता है और ऊपर उठता है।
- ऊपर और किनारों का ठंडा व भारी पानी नीचे आकर उसकी जगह लेता है।
- यह चक्र तब तक चलता है जब तक पूरा पानी गर्म न हो जाए।
- संवहन की परिभाषा: ऊष्मा स्थानांतरण की वह प्रक्रिया जिसमें कण स्वयं एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर गति करते हैं।
थल समीर और समुद्र समीर

तटीय क्षेत्रों में भूमि और जल के विषम तापन (Differential Heating) के कारण संवहन धाराएँ बनती हैं।

- तापन का नियम: मिट्टी (भूमि) पानी की तुलना में तेजी से गर्म होती है और तेजी से ठंडी भी होती है।
थल समीर और समुद्र समीर की तुलना
| कारक | समुद्र समीर (Sea Breeze) | थल समीर (Land Breeze) |
| समय | दिन के समय (Daytime) | रात के समय (Nighttime) |
| क्रिया विधि | भूमि तेजी से गर्म होती है – गर्म हवा ऊपर उठती है – समुद्र से ठंडी हवा भूमि की ओर आती है | भूमि तेजी से ठंडी होती है – समुद्र का पानी गर्म रहता है – भूमि से ठंडी हवा समुद्र की ओर चलती है |
| दिशा | समुद्र से स्थल की ओर (Sea to Land) | स्थल से समुद्र की ओर (Land to Sea) |
| अनुप्रयोग | तटीय मकानों की खिड़कियाँ समुद्र की ओर बनाई जाती हैं | तटीय हवाओं की दिशा रात में पूरी तरह बदल जाती है |
विकिरण (Radiation)
ऊष्मा स्थानांतरण की तीसरी मुख्य विधि विकिरण (Radiation) है।
- परिभाषा: गर्म वस्तु से ठंडी वस्तु तक बिना किसी भौतिक माध्यम के ऊष्मा का पहुँचना विकिरण कहलाता है।
- माध्यम की आवश्यकता: चालन और संवहन के विपरीत, विकिरण के लिए किसी भी माध्यम (थोस, द्रव, गैस) की आवश्यकता नहीं होती।
- उदाहरण:
- आग या अलाव (Fireplace) के पास बैठने पर गर्मी महसूस होना।
- सूर्य की ऊष्मा का पृथ्वी तक पहुँचना।
- उत्सर्जन (Emission): सभी गर्म वस्तुएँ ऊष्मा का विकिरण करती हैं।
- उदाहरण: चूल्हे से हटाया गया गर्म बर्तन विकिरण द्वारा आसपास की हवा को ऊष्मा देकर ठंडा होता है।
कपड़ों के रंग और ऊष्मा का अवशोषण
- हल्के/सफेद रंग के कपड़े (गर्मी में उपयुक्त):
- ये अपने ऊपर पड़ने वाली अधिकांश ऊष्मीय विकिरण को परावर्तित (Reflect) कर देते हैं।
- इससे शरीर ठंडा रहता है।
- गहरे/काले रंग के कपड़े (सर्दी में उपयुक्त):
- ये ऊष्मीय विकिरण को अधिक अवशोषित (Absorb) करते हैं।
- इससे शरीर में गर्मी बनी रहती है।
तीन विधियों का एक साथ अवलोकन
जब एक बर्तन में पानी गर्म किया जाता है, तो तीनों विधियाँ एक साथ काम करती हैं:
- चालन (Conduction): बर्नर की लौ से बर्तन की धातु में ऊष्मा का जाना।
- संवहन (Convection): बर्तन के भीतर पानी का नीचे से ऊपर गर्म होकर घूमना।
- विकिरण (Radiation): बर्तन और लौ के आसपास हवा में गर्मी का अहसास होना।
ऊष्मा स्थानांतरण की तीनों विधियों का सारांश
चालन, संवहन और विकिरण की तुलना
| आधार | चालन (Conduction) | संवहन (Convection) | विकिरण (Radiation) |
| कणों की गति | कण अपना स्थान नहीं छोड़ते। | कण स्वयं एक स्थान से दूसरे स्थान गति करते हैं। | कणों की कोई भूमिका नहीं होती। |
| माध्यम की आवश्यकता | माध्यम अनिवार्य है (मुख्यतः ठोस)। | माध्यम अनिवार्य है (द्रव व गैस)। | किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं। |
| मुख्य उदाहरण | धातु के चम्मच का गर्म होना। | पानी का उबलना, थल/समुद्र समीर। | सूर्य की धूप, अलाव की सेक। |
बुखारी और ऊष्मा का अनुप्रयोग
- पारंपरिक हीटर (बुखारी): हिमालयी क्षेत्रों (जैसे जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड) में कमरों को गर्म रखने के लिए लोहे के चूल्हे का उपयोग होता है, जिसे ‘बुखारी’ कहते हैं।
- संरचना: इसमें लकड़ी या कोयला जलाया जाता है और धुएँ को बाहर निकालने के लिए एक लंबी चिमनी/पाइप लगी होती है।
- बहुउपयोगी: इसके समतल ऊपरी हिस्से का उपयोग खाना पकाने के लिए भी किया जाता है।
- तीनों विधियों का समावेश: बुखारी से कमरे को गर्म करने और खाना पकाने में चालन, संवहन और विकिरण तीनों प्रक्रियाएँ एक साथ शामिल होती हैं।
- सूर्य और वाष्पीकरण: सूर्य पृथ्वी पर ऊष्मा का मुख्य स्रोत है। सूर्य का विकिरण जल निकायों (महासागरों, झीलों) और गीले कपड़ों से जल के वाष्पीकरण (Evaporation) की दर को तेज करता है, जो जल चक्र (Water Cycle) का आधार है।
जल चक्र (Water Cycle)
प्रकृति में जल ठोस (बर्फ/ग्लेशियर), द्रव (समुद्र/नदियाँ) और गैस (जलवाष्प) – इन तीन अवस्थाओं में मौजूद रहता है।
- मौसमी संतुलन: गर्मियों में सूर्य के विकिरण से बर्फ पिघलकर नदियों के माध्यम से समुद्र में जाती है, जबकि सर्दियों में ताज़ा हिमपात इसे पुन: भर देता है।
- जल चक्र के 4 मुख्य चरण:
- वाष्पीकरण (Evaporaton): सूर्य की गर्मी से जलाशयों का पानी वाष्प बनकर ऊपर उठता है।
- वाष्पोत्सर्जन (Transpiration): पेड़-पौधों की पत्तियों से जलवाष्प वायुमंडल में मुक्त होता है।
- संघनन (Condensation): ऊपर उठकर जलवाष्प ठंडा होता है और बादलों का निर्माण करता है।
- वर्षण (Precipitation): बादल वर्षा, बर्फ (Snow) या ओलों (Hail) के रूप में जल को पुनः धरातल पर लाते हैं।
- महत्व: जल चक्र पृथ्वी पर कुल जल की मात्रा को संरक्षित रखता है और जल स्रोतों का पुनर्भरण करता है।
वराहमिहिर और मौसमी पूर्वानुमान
- परिचय: छठी शताब्दी ईस्वी (6th Century CE) के प्रसिद्ध खगोलशास्त्री और गणितज्ञ।
- स्थान: उज्जैनी (वर्तमान उज्जैन, मध्य प्रदेश)।
- प्रमुख ग्रंथ: बृहत्संहिता।

- योगदान: इन्होंने बादलों के निर्माण, हवा के पैटर्न, नक्षत्रों और चंद्रमा की स्थिति जैसे प्राकृतिक कारकों के आधार पर मौसमी वर्षा (Seasonal Rainfall) का पूर्वानुमान लगाने की विधियाँ दीं।
भूजल रिसाव और जलभृत
वर्षा का जल मिट्टी और चट्टानों से होकर ज़मीन के नीचे रिसता है, जिसे हम कुओं या हैंडपंपों के माध्यम से बाहर निकालते हैं।
मृदा के प्रकार और जल रिसाव की दर
| कणों का प्रकार | रिसाव की गति (Seepage Rate) | कारण (Particle Spacing) |
| बजरी (Gravel) | सबसे तेज़ (Fastest) | कणों के बीच बड़े, खुले व जुड़े हुए छिद्र होते हैं। |
| रेत (Sand) | मध्यम (Slow) | बजरी की तुलना में छोटे छिद्र होते हैं। |
| चिकनी मिट्टी (Clay) | सबसे धीमी (Slowest) | कण अत्यधिक बारीक और सघन होते हैं। |
- अंतःस्यंदन (Infiltration): सतह का जल मिट्टी और चट्टानों के छिद्रों से होकर ज़मीन के नीचे रिसना ‘इन्फिल्ट्रेशन’ कहलाता है।
- जलभृत (Aquifer): भूमिगत चट्टानों और अवसादों (Sediment) की वे परतें जिनमें जल जमा होता है, उन्हें एक्विफर कहते हैं।
- भूजल ह्रास के कारण: बढ़ती जनसंख्या द्वारा अत्यधिक दोहन, कंक्रीट के पक्के निर्माण और घटते वन क्षेत्र।
- समाधान: वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) और रीचार्ज पिट्स (Recharge Pits)।
आइस स्तूप और जल संरक्षण
- समस्या: लद्दाख में वसंत ऋतु (Spring) के दौरान तापमान कम होने से ग्लेशियर नहीं पिघलते, जिससे खेती के लिए पानी की भारी कमी हो जाती है।
- तकनीक: सर्दियों में पर्वतीय धाराओं के पानी को भूमिगत पाइपों से लाकर ठंडी हवा में फुहारे (Spray) के रूप में छोड़ा जाता है।
- संरचना: गिरते ही पानी जमकर एक शंक्वाकार (Cone-shaped) बर्फ का ढांचा बना लेता है, जिसे ‘आइस स्तूप’ कहते हैं।
- लाभ: कम सतह क्षेत्र (Low surface area) के कारण यह धीरे-धीरे पिघलता है और वसंत व गर्मी में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराता है।