18 August 2025 Current Affair
पलामू टाइगर रिज़र्व चर्चा में क्यों? झारखंड के पालामू टाइगर रिज़र्व (PTR) में गौर (Bos gaurus) की आबादी में गंभीर गिरावट दर्ज की गई है। पलामू टाइगर रिज़र्व के बारे में पलामू टाइगर रिज़र्व झारखंड राज्य का एकमात्र बाघ संरक्षण क्षेत्र है। इसे वर्ष 1974 में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के प्रथम चरण में देश के शुरुआती 9 टाइगर रिज़र्व में शामिल किया गया। यह बेतला राष्ट्रीय उद्यान का एक हिस्सा है और अपनी जैव विविधता एवं संरक्षण इतिहास के लिए प्रसिद्ध है। भौगोलिक सीमा उत्तर में : गढ़वा ज़िला दक्षिण में : लातेहार और गुमला के वन क्षेत्र पूर्व में : लोहरदगा और रांची के पठारी भाग पश्चिम में : छत्तीसगढ़ की सीमा से सटे वन क्षेत्र भूगर्भीय संरचना यहाँ की प्रमुख चट्टानों में ग्नाइस, ग्रेनाइट, चूना पत्थर, क्वार्टज़ाइट और ऐंफिबोलाइट सम्मिलित हैं। गोंडवाना शैल संरचना में बलुआ पत्थर, शेल और हेमाटाइट पाई जाती हैं। यह क्षेत्र बॉक्साइट और कोयला जैसे खनिजों से समृद्ध है। भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार यह छोटानागपुर पठार पर लातेहार एवं गढ़वा जिलों में स्थित है। कुल क्षेत्रफल 1,129.93 वर्ग किलोमीटर है। कोर क्षेत्र : 414.08 वर्ग किलोमीटर (महत्वपूर्ण बाघ आवास)। बफर क्षेत्र : 715.85 वर्ग किलोमीटर। इसकी स्थलाकृति घाटियों, पहाड़ियों और समतल मैदानों से मिलकर बनी है। नदियाँ एवं जल स्रोत इस क्षेत्र से तीन प्रमुख नदियाँ बहती हैं : उत्तर कोयल (North Koel) बुरहा (Burha) – यह एकमात्र नदी है जो पूरे वर्ष प्रवाहित रहती है। औरंगा (Auranga) यहाँ कई प्राकृतिक जलभृत (Aquifers) पाए जाते हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में चुआन कहा जाता है। बरवाडीह के निकट तथा नामक सल्फर युक्त गर्म पानी का झरना भी मौजूद है। जलवायु एवं वर्षा यह क्षेत्र वृष्टि-छाया प्रभाव (Rain-shadow effect) के कारण सूखाग्रस्त माना जाता है। औसत वार्षिक वर्षा लगभग 1075 मिमी होती है। अधिकांश वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून से होती है, तथा दक्षिणी भागों में वर्षा की मात्रा उत्तरी भागों से अधिक है। वनस्पति यहाँ मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय आर्द्र एवं शुष्क पर्णपाती वन पाए जाते हैं। प्रमुख वृक्ष प्रजातियाँ : साल बांस (Bamboo) इस क्षेत्र में 970 पौधों की प्रजातियाँ, 17 घास की प्रजातियाँ तथा 56 औषधीय पौधों की प्रजातियाँ दर्ज की गई हैं। जीव-जंतु पालामू टाइगर रिज़र्व में प्रमुख जीव प्रजातियों में बाघ, एशियाई हाथी, तेंदुआ, ग्रे वुल्फ, गौर (Bos gaurus), स्लॉथ भालू (Sloth Bear) और चार सींग वाला मृग (Four-horned Antelope) पाए जाते हैं, जबकि अन्य प्रजातियों में भारतीय पैंगोलिन, ऊदबिलाव शामिल हैं। ऐतिहासिक महत्व 1932 में पलामू क्षेत्र में विश्व का पहला पगमार्क आधारित बाघ गणना सर्वेक्षण आयोजित किया गया था। इस सर्वेक्षण का नेतृत्व ब्रिटिश वन अधिकारी जे. डब्ल्यू. निकोल्सन ने किया था। यह घटना वन्यजीव संरक्षण और वैज्ञानिक प्रबंधन की दृष्टि से एक ऐतिहासिक पड़ाव मानी जाती है। वर्ष 1974 में पलामू को भारत सरकार द्वारा ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के अंतर्गत अधिसूचित किया गया और इसे देश के शुरुआती 9 टाइगर रिज़र्व में शामिल किया गया। इस प्रकार यह भारत के वन्यजीव संरक्षण इतिहास में विशेष स्थान रखता है। गौर (Bos gaurus) : भारतीय बाइसन गौर, जिसे भारतीय बाइसन (Indian Bison) के नाम से भी जाना जाता है, जंगली मवेशियों की सबसे बड़ी प्रजाति है। यह बोविडाए (Bovidae) परिवार का सदस्य है और अपनी विशालकाय काया, शक्तिशाली रूप तथा सामाजिक झुंड आधारित जीवन शैली के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। वितरण गौर का मूल निवास क्षेत्र दक्षिण एशिया और दक्षिण–पूर्व एशिया है। भारत में इनकी उपस्थिति मुख्यतः निम्न क्षेत्रों में पाई जाती है : मध्य भारत झारखंड पश्चिमी घाट (केरल और कर्नाटक सहित) पूर्वोत्तर भारत के घने वन क्षेत्र आवास गौर का प्राकृतिक निवास घने और नम वनों में होता है। ये सदैव हरे (Evergreen), अर्ध-सदैव हरे (Semi-evergreen) और आर्द्र पर्णपाती (Moist deciduous) वनों में निवास करते हैं। इन्हें घासभूमि और खुले क्षेत्र विशेष रूप से उपयुक्त लगते हैं। इनका प्रमुख निवास क्षेत्र प्रायः 1500–1800 मीटर से नीचे की ऊँचाई वाले पहाड़ी इलाके होते हैं। इन्हें निर्बाध वन क्षेत्र और पर्याप्त जलस्रोत आवश्यक रूप से चाहिए होते हैं। संरक्षण स्थिति IUCN रेड लिस्ट में गौर (Bos gaurus) को संकटग्रस्त (Vulnerable) श्रेणी में शामिल किया गया है। साइट्स (CITES) में गौर को परिशिष्ट–I (Appendix I) में सूचीबद्ध किया गया है, जिसके तहत इसके अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर कड़ा नियंत्रण लागू है। भारत के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अंतर्गत गौर को अनुसूची–I (Schedule I) में रखा गया है, जिसके अंतर्गत इसे सर्वोच्च स्तर की कानूनी सुरक्षा प्राप्त है। पारिस्थितिक महत्त्व गौर वनों में पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में सहायक हैं। यह बाघ और तेंदुए जैसे शीर्ष शिकारी जीवों के लिए एक प्रमुख शिकार प्रजाति है। शाकाहारी होने के कारण ये वनस्पति संरचना का संतुलन बनाए रखने और बीज प्रसार (Seed dispersal) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके संरक्षण से संपूर्ण वन्यजीव तंत्र का स्वास्थ्य और जैव विविधता सुरक्षित रहती है। प्रमुख खतरे वनों की कटाई, खनन और कृषि विस्तार के कारण वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास लगातार सिकुड़ता जा रहा है। अवैध शिकार और मानव अतिक्रमण से वन्यजीवों की संख्या में तेजी से गिरावट आ रही है। पालतू पशुओं से रोग संक्रमण, विशेषकर रिंडरपेस्ट और फुट एंड माउथ डिज़ीज़ (FMD), वन्यजीवों के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर रहा है। आवासीय विखंडन के कारण वन्यजीव छोटे और अलग-थलग समूहों में सीमित हो गए हैं, जिससे उनकी आनुवंशिक विविधता घट रही है और भविष्य में उनका अस्तित्व और अधिक संकटग्रस्त हो सकता है। प्रश्न: निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए : पलामू टाइगर रिज़र्व भारत के शुरुआती नौ टाइगर रिज़र्व में से एक है जिसे 1974 में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के अंतर्गत अधिसूचित किया गया था। गौर (Bos gaurus) को IUCN रेड लिस्ट में संकटग्रस्त (Vulnerable), साइट्स (CITES) के परिशिष्ट–I तथा भारत के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची–I में शामिल किया गया है। पलामू टाइगर रिज़र्व में बहने वाली तीन प्रमुख नदियों में से केवल बुरहा (Burha) नदी ही बारहमासी है। उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? (a) केवल 1 और 2 (b) केवल 2 और 3 (c) केवल 1 और 3 (d) 1, 2 और 3 उत्तर: (d) 1, 2 और 3 व्याख्या: कथन 1 सही है – पलामू टाइगर रिज़र्व देश के पहले 9 टाइगर रिज़र्व में शामिल है। कथन 2 सही है – गौर को IUCN में Vulnerable, CITES Appendix I और भारत के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची–I में रखा गया है। कथन 3 सही है – पलामू टाइगर रिज़र्व में उत्तर कोयल, औरंगा