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डेली कर्रेंट अफेयर्स

SC ने जनगणना में जाति गणना के खिलाफ याचिका खारिज की जनगणना 2027 में जातिगत गणना पर सर्वोच्च न्यायालय  भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि सरकार द्वारा जनगणना 2027 में जातिगत गणना को शामिल किए जाने में कुछ भी गलत नहीं है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि सरकारों को पिछड़े समुदायों और कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों की संख्या का पता होना चाहिए; यह नीतिगत मामला है। न्यायालय ने यह तय करने से इनकार कर दिया कि जातिगत गणना को जनगणना का हिस्सा होना चाहिए या नहीं, और स्पष्ट किया कि यह पूरी तरह से नीतिगत दायरे (पॉलिसी डोमेन) के अंतर्गत आता है। सुधाकर गुमुला द्वारा दायर याचिका में तर्क दिया गया था कि राजनेताओं और कॉर्पोरेट संस्थाओं द्वारा जातिगत डेटा का दुरुपयोग किया जा सकता है और इसका कोई ठोस औचित्य नहीं है। न्यायालय ने जातिगत गणना के खिलाफ दायर इस याचिका को खारिज कर दिया। जनगणना 2027 राजनीतिक मामलों की कैबिनेट समिति ने अप्रैल 2025 में जातिगत गणना को मंजूरी दी थी। इससे पहले, जनगणना 2011 तक, केवल अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) की ही व्यवस्थित रूप से गणना की जाती थी। जातिगत डेटा जनगणना 2027 के दूसरे चरण के दौरान एकत्र किया जाएगा। जनगणना के दो चरण मकान सूचीकरण प्रक्रिया (HLO): आवास की स्थिति, संपत्ति, सुविधाएं आदि। जनसंख्या गणना: जनसांख्यिकीय (demographic), सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक और जाति से जुड़े विवरण। अन्य बिंदु पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने जातिगत डेटा को “एकीकरण का एक साधन” बताया और इसकी तुलना समाज के एमआरआई (MRI) से की। आखिरी बार देशव्यापी व्यापक जातिगत जनगणना औपनिवेशिक भारत में 1931 में आयोजित की गई थी। भारत और इटली संबंध: ‘विशेष रणनीतिक साझेदारी’ भारत- इटली संबंध भारत-इटली संबंधों को अपग्रेड (उन्नत) करके ‘विशेष रणनीतिक साझेदारी’ (स्पेशल स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप) का दर्जा दिया गया है। सहयोग के क्षेत्र निम्नलिखित क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा दिया जाएगा: व्यापार और प्रौद्योगिकी (ट्रेड एंड टेक्नोलॉजी) रक्षा (डिफेंस) स्वच्छ ऊर्जा और नवाचार (क्लीन एनर्जी एंड इनोवेशन) सुरक्षित माध्यमों से कुशल और अकुशल श्रमिकों की गतिशीलता (मोबिलिटी) हस्ताक्षर किए गए प्रमुख समझौते डिफेंस इंडस्ट्रियल रोड मैप (रक्षा औद्योगिक रोड मैप) महत्वपूर्ण खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) में सहयोग पर समझौता ज्ञापन (MoU) इटली की ‘गार्डिया डी विनान्ज़ा’ और भारत के ‘प्रवर्तन निदेशालय’ (ED) के बीच समझौता दोनों देशों के संस्थानों और मंत्रालयों को जोड़ने वाला कृषि और कृषि अनुसंधान पर समझौता रणनीतिक और वैश्विक मुद्दे दोनों देशों ने ‘यूएनसीएलओएस’ (UNCLOS) के अनुरूप एक स्वतंत्र, खुले, शांतिपूर्ण और समृद्ध हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) क्षेत्र का समर्थन किया। हॉर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज) से होकर नौवहन की स्वतंत्रता और अबाधित वैश्विक प्रवाह का आह्वान किया। अफ्रीका सहयोग भारत और इटली ‘भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन-4’ से पहले अफ्रीकी भागीदारों के साथ त्रिपक्षीय परियोजनाओं पर सहमत हुए। सहयोग के क्षेत्र: डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) कृषि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचा नवीकरणीय ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी) इसे इटली की ‘मैट्टेई योजना’ और भारत की ‘अफ्रीका विकास साझेदारी’ से जोड़ा गया है। ऊपरी गंगा क्षेत्र में कोई नई जलविद्युत परियोजना नहीं ऊपरी गंगा बेसिन में जलविद्युत परियोजनाओं पर केंद्र का रुख केंद्र सरकार ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) को बताया कि “उत्तराखंड राज्य में गंगा नदी के ऊपरी हिस्सों में स्थित अलकनंदा और भागीरथी नदी बेसिनों में किसी भी अन्य नए जलविद्युत प्रोजेक्ट को अनुमति देने के पक्ष में नहीं।”। पर्यावरण, जल शक्ति और बिजली (विद्युत) मंत्रालयों ने एक संयुक्त हलफनामा (अफेडेविट) दायर कर इस प्रतिबंधात्मक दृष्टिकोण का समर्थन किया है। केवल वही सात परियोजनाएं जारी रहेंगी जो पहले से ही चालू हैं या काफी हद तक पूरी हो चुकी हैं। इससे पहले, बिजली मंत्रालय ने आठ अतिरिक्त परियोजनाओं (2024) का समर्थन किया था। स्वीकृत परियोजनाएं इन सात परियोजनाओं की कुल क्षमता 2,150 मेगावाट (MW) से अधिक है: 1,000 मेगावाट की टिहरी पंप्ड स्टोरेज परियोजना 520 मेगावाट की तपोवन विष्णुगाड परियोजना 444 मेगावाट की विष्णुगाड पीपलकोटी परियोजना 99 मेगावाट की सिंगोली भटवारी परियोजना 76 मेगावाट की फाटा ब्युंग परियोजना मदमहेश्वर परियोजना कालीगंगा-II परियोजना इनमें से चार परियोजनाएं चालू हो चुकी हैं; तीन परियोजनाएं 74 से 80 प्रतिशत तक पूरी हो चुकी हैं। सरकार ने भारी निवेश, निर्माण कार्य के उन्नत चरण में होने और भागीरथी पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (इको-सेंसिटिव जोन) से बाहर होने के कारण इन्हें जारी रखने को सही ठहराया। नई परियोजनाओं को खारिज करने के कारण एक के बाद एक लगातार बांधों का संचयी प्रभाव (क्युमुलेटिव इम्पैक्ट) हिमालय क्षेत्र की भूकंपीय संवेदनशीलता (सेसमिक फ्रैजिलिटी) बार-बार होने वाली आपदाएं: 2013 की केदारनाथ बाढ़ 2021 की ऋषिगंगा बाढ़ 2025 की धराली आकस्मिक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) सर्वोच्च न्यायालय की समिति 2024 में, न्यायालय ने कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। इसने 21 प्रस्तावित परियोजनाओं की समीक्षा की और पांच परियोजनाओं को शॉर्टलिस्ट (चयनित) किया था: बोवला नंदप्रयाग देवसारी भ्युंडार गंगा झालाकोटी उरगम-II केंद्र सरकार ने अंततः इन पांच परियोजनाओं को भी खारिज कर दिया। पृष्ठभूमि (बैकग्राउंड) यह मामला 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद शुरू हुआ था, जिसमें 5,000 से अधिक लोगों की जान चली गई थी। रवि चोपड़ा (2014) के नेतृत्व वाली विशेषज्ञ संस्था-I (Expert Body-I) ने 24 में से 23 परियोजनाओं को पर्यावरण के लिए हानिकारक पाया था। विनोद तारे के नेतृत्व वाले एक अन्य पैनल ने भी कई परियोजनाओं का विरोध किया था। बी.पी. दास (2020) के नेतृत्व वाली विशेषज्ञ संस्था-II ने अधिक उदार दृष्टिकोण की सिफारिश की थी और संशोधनों के साथ 26 परियोजनाओं का समर्थन किया था। हालाँकि, केंद्र सरकार ने केवल सात परियोजनाओं को ही स्वीकार किया। यूएपीए (UAPA) के तहत जमानत पर सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) मुख्य मुद्दा गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम [यूएपीए] की धारा 43-D(5) के तहत यदि आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया (prima facie) मामला बनता है, तो जमानत मिलना मुश्किल हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप अक्सर बिना मुकदमे के लंबे समय तक कारावास भुगतना पड़ता है। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय ‘सैयद इफ्तिखार अंद्राबी बनाम एनआईए, जम्मू’ मामले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अंद्राबी को 5 साल और 9 महीने से अधिक की प्री-ट्रायल हिरासत (मुकदमे से पहले की जेल) के बाद जमानत दे दी। न्यायालय ने पुन: पुष्टि की: यूएपीए के मामलों में भी जमानत ही नियम होना चाहिए (और

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तीसरा भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन         पृष्ठभूमि (Background) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में भाग लिया। शामिल नॉर्डिक देश: डेनमार्क फिनलैंड आइसलैंड नॉर्वे स्वीडन द्विपक्षीय/क्षेत्रीय साझेदारी का उन्नयन (Upgrade) भारत और नॉर्डिक देशों ने अपने संबंधों को “हरित प्रौद्योगिकी और नवाचार रणनीतिक साझेदारी” (Green Technology and Innovation Strategic Partnership) के रूप में उन्नत करने का निर्णय लिया। सहयोग के क्षेत्र (Areas of Cooperation) सतत ऊर्जा (Sustainable Energy) समुद्री सहयोग (Maritime Cooperation) आर्कटिक / ध्रुवीय अनुसंधान (Arctic / Polar Research) साझा मूल्यों पर बल (Shared Values Highlighted) प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि”लोकतंत्र, कानून के शासन और बहुपक्षवाद के प्रति हमारी साझा प्रतिबद्धता हमें स्वाभाविक भागीदार बनाती है। प्राचीन डीएनए (DNA) और मानव विकास हजारों साल पहले रहने और मरने वाले लोग अपनी अस्थियों के अवशेष एक विरासत के रूप में छोड़ गए हैं। हाल के वर्षों में, वैज्ञानिकों ने इन अवशेषों से बड़ी संख्या में डीएनए (DNA) को अलग करके उनकी सीक्वेंसिंग (अनुक्रमण) की है। अमेरिका के हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में शोधकर्ताओं के एक दल ने पश्चिमी यूरेशिया (जिसमें यूरोप, रूस, मध्य एशिया, मध्य पूर्व और ईरान शामिल हैं) के 15,836 प्राचीन डीएनए अनुक्रमों की तुलना उन्हीं देशों के 6,438 आधुनिक लोगों के अनुक्रमों से की है। मुख्य निष्कर्ष (Key Findings) प्राकृतिक चयन (Natural Selection): तुलना से यह सामने आया कि पिछले 8,000 से 10,000 वर्षों (होलोसीन युग) के दौरान कई जीनों के वेरिएंट (समान रूप) की आवृत्ति (frequency) में निरंतर उतार-चढ़ाव आया है। कंप्यूटर सिमुलेशन और सांख्यिकीय तरीकों से यह सिद्ध हुआ है कि यह बदलाव आनुवंशिक विचलन (genetic drift) या जनसंख्या प्रवासन (migration) के बजाय प्राकृतिक चयन के कारण हुआ है। कार्बन डेटिंग (Carbon Dating): आयु निर्धारण की तकनीक वैज्ञानिक किसी कंकाल की आयु का पता लगाने के लिए उसकी हड्डियों और दांतों में कार्बन-14 (रेडियोधर्मी कार्बन) की सापेक्ष मात्रा मापते हैं। निर्माण: ऊपरी वायुमंडल में जब ब्रह्मांडीय किरणें (cosmic rays) नाइट्रोजन परमाणुओं से टकराती हैं, तो कार्बन-14 का निर्माण होता है। इसके रासायनिक गुण गैर-रेडियोधर्मी आइसोटोप (कार्बन-12 और कार्बन-13) के समान होते हैं। प्रक्रिया: जीवित रहने तक शरीर में कार्बन-14 का अनुपात वायुमंडल और भोजन (पौधों/पशुओं) के समान रहता है। मृत्यु के बाद यह स्तर गिरने लगता है क्योंकि रेडियोधर्मी क्षय (decay) के कारण यह पुनः नाइट्रोजन में बदलने लगता है। अर्ध-आयु (Half-life): कार्बन-14 की अर्ध-आयु 5,730 वर्ष होती है (यानी हर 5,730 वर्ष में इसकी मात्रा आधी हो जाती है)। 50,000 वर्षों के बाद, हड्डियों में इसकी मात्रा मृत्यु के समय की तुलना में केवल 2,000वां हिस्सा रह जाती है। विशिष्ट जीनों और लक्षणों का विश्लेषण रक्त समूह (Blood Types) मानव शरीर में ABO जीन की दो प्रतियां होती हैं, जो तीन वेरिएंट (A, B, और O) में आती हैं। शोध में पाया गया कि पिछले 6,000 वर्षों में पश्चिमी यूरेशियाई लोगों में B वेरिएंट की आवृत्ति बढ़ी है, जबकि A वेरिएंट में कमी आई है। ऐसा संभवतः बदलते रोगजनकों (pathogens) के प्रभाव से निपटने के लिए एक इष्टतम संतुलन बनाए रखने के कारण हुआ है। ग्लूटेन संवेदनशीलता और सीलिएक रोग (Coeliac Disease) HLA-DQB1 जीन का एक वेरिएंट लोगों को सीलिएक रोग के प्रति संवेदनशील बनाता है। इसमें गेहूं, जौ और राई में मौजूद ‘गूल्टेन’ के कारण प्रतिरक्षा प्रणाली छोटी आंत पर हमला कर देती है, जिससे उल्टी और पेट दर्द जैसी समस्याएं होती हैं। पिछले 4,000 वर्षों में इस रोगजनक वेरिएंट की आवृत्ति 0% से बढ़कर 20% हो गई है। हालांकि कृषि की शुरुआत 10,000 वर्ष पहले हुई थी, वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि यह वृद्धि केवल या मुख्य रूप से कृषि के उदय के कारण नहीं थी; इसके वास्तविक कारण अभी भी अज्ञात हैं। त्वचा का रंग और बाल (Skin and Hair Pigmentation) लगभग 8,000 वर्ष पहले, मनुष्यों ने उन जीन वेरिएंट्स का चयन करना शुरू किया जो हल्की त्वचा (lighter skin tones) और रंगीन बाल पैदा करते हैं। यह कम धूप वाले क्षेत्रों में विटामिन डी (Vitamin D) के संश्लेषण को बढ़ाने के लिए एक अनुकूलन (adaptation) था, विशेष रूप से उन किसानों के लिए जिनके आहार में इसकी कमी थी। प्राचीन जीन और आधुनिक लक्षण (Ancient Genes, Modern Traits) एचआईवी (HIV) प्रतिरोधक क्षमता: CCR5 जीन के Delta32 वेरिएंट की दो प्रतियां होने से व्यक्ति HIV-1 संक्रमण के प्रति पूरी तरह प्रतिरोधी हो जाता है। पश्चिमी यूरेशियाई लोगों में इस वेरिएंट की आवृत्ति 6,000 से 2,000 वर्ष पहले 2% से बढ़कर 8% हो गई थी। चूंकि HIV की उत्पत्ति केवल 20वीं सदी की शुरुआत में हुई थी, इसलिए यह स्पष्ट है कि अतीत में किसी अन्य अज्ञात प्राचीन रोगजनक (pathogen) के कारण यह चयन हुआ होगा। धूम्रपान (Smoking): यूरेशिया में धूम्रपान तब तक अज्ञात था जब तक कि क्रिस्टोफर कोलंबस 600 वर्ष से भी कम समय पहले अमेरिका से तंबाकू नहीं लाया था। इसके बावजूद, अध्ययन में पाया गया कि आज धूम्रपान की प्रवृत्ति से जुड़े जीन वेरिएंट्स के खिलाफ उस प्राचीन काल में भी प्राकृतिक चयन (selected against) काम कर रहा था। दक्षिण एशियाई (भारतीय) संदर्भ और भविष्य की आवश्यकता दक्षिण एशियाई आनुवंशिक संरचना: दक्षिण एशियाई (भारतीय) लोगों में मुख्य रूप से निम्नलिखित पूर्वजों का आनुवंशिक योगदान है: ईरानी नवपाषाण काल के किसान (Iranian Neolithic Farmers) और पश्चिमी स्टेप चरवाहे (Western steppe herders)। स्वदेशी पूर्वी यूरेशियाई पूर्वज, जिनमें प्राचीन पूर्वज दक्षिण भारतीय (Ancient Ancestral South Indians) शामिल हैं। पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशियाई तथा ऑस्ट्रेलियाई (Australasian) पूर्वज। मंगल ग्रह पर ‘ज्वान-वुल्फ प्रभाव’ (Zwan-Wolf Effect) की खोज ज्वान-वुल्फ प्रभाव (Zwan-Wolf Effect) क्या है? सौर पवन (Solar wind): सौर पवन सूर्य से बाहर की ओर बहने वाले आवेशित कणों (charged particles) की एक धारा है। जब यह सौर पवन किसी ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र (magnetic field) के निकट पहुँचती है, तो यह चुंबकीय सीमाओं के पास संकुचित (compressed) हो जाती है। इस संकुचन से एक दबाव प्रवणता पैदा होती है, जो आवेशित कणों को चुंबकीय क्षेत्र के साथ-साथ मुख्य धारा से दूर धकेल देती है। इसके परिणामस्वरूप, मुख्य धारा के निकट एक ऐसा क्षेत्र बनता है जहाँ आवेशित कणों का घनत्व (density) कम हो जाता है। इसी घटना को ‘ज्वान-वुल्फ प्रभाव’ कहा जाता है। अनुसंधान और नवीन खोज शोधकर्ताओं ने नासा (NASA) के मावेन (MAVEN) अंतरिक्ष यान का उपयोग करके मंगल ग्रह पर ‘ज्वान-वुल्फ प्रभाव’

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Nirman ias Current Affairs 9 September 2025

Topic : जम्मू–कश्मीर की राज्यसभा सीटों का विवाद     चर्चा में क्यों : हाल ही में केंद्र के कानून और न्याय मंत्रालय ने चुनाव आयोग (EC) के उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है जिसमें जम्मू-कश्मीर (J&K) की चार राज्यसभा सीटों की अवधि को क्रमबद्ध (staggered) करने के लिए राष्ट्रपति आदेश जारी करने की सिफारिश की गई थी।  इस फैसले के कारण 2021 से जम्मू-कश्मीर की कोई भी प्रतिनिधित्व राज्यसभा में नहीं है। UPSC पाठ्यक्रम:  प्रारंभिक परीक्षा: भारतीय राजनीति और शासन – संविधान, राजनीतिक व्यवस्था, पंचायती राज, सार्वजनिक नीति, अधिकार मुद्दे मुख्य परीक्षा: GS-II: संघ और राज्यों के कार्य और जिम्मेदारियाँ, संघीय ढांचे से संबंधित मुद्दे और चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर तक शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण और उसमें चुनौतियाँ।      पृष्ठभूमि 1. अनुच्छेद 370 और राज्य का पुनर्गठन संविधान का अनुच्छेद 370 जम्मू–कश्मीर को विशेष दर्जा प्रदान करता था।  इस प्रावधान के अंतर्गत राज्य की अपनी विधानसभा और संविधान था, जिसके आधार पर राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव किया जाता था। 5 अगस्त 2019 को भारत सरकार ने इस विशेष दर्जे को समाप्त कर दिया और जम्मू–कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 लागू किया। इसके परिणामस्वरूप राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजित किया गया: जम्मू–कश्मीर (विधानसभा सहित) लद्दाख (बिना विधानसभा) इस पुनर्गठन के बाद जम्मू–कश्मीर को राज्यसभा में चार सीटों का प्रतिनिधित्व मिला, जबकि लद्दाख को कोई सीट आवंटित नहीं हुई।  2. राज्यसभा सीटों का संवैधानिक प्रावधान (अनुच्छेद 80) भारतीय संविधान का अनुच्छेद 80 राज्यसभा की संरचना और सदस्यों की संख्या को परिभाषित करता है। राज्यसभा के सदस्य दो प्रकार से चुने जाते हैं: राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से निर्वाचित सदस्य – इनका चुनाव संबंधित राज्य या केंद्रशासित प्रदेश की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य करते हैं। राष्ट्रपति द्वारा नामित सदस्य – कला, साहित्य, विज्ञान और समाजसेवा जैसे क्षेत्रों से। संविधान के अनुसार प्रत्येक राज्य को जनसंख्या के आधार पर सीटें दी जाती हैं। पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के बाद जम्मू–कश्मीर को चार सीटें प्रदान की गईं। 3. जम्मू–कश्मीर के विशेष दर्जे के बाद सीटों की स्थिति अनुच्छेद 370 के हटने से पहले जम्मू–कश्मीर के राज्यसभा सांसद राज्य की विधान सभा द्वारा चुने जाते थे। 2019 में पुनर्गठन के बाद विधानसभा भंग कर दी गई और वहाँ राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। इसी दौरान, 2021 में चारों राज्यसभा सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो गया। चूँकि उस समय नई विधानसभा मौजूद नहीं थी, इसलिए नए सदस्यों का चुनाव संभव नहीं हुआ। यद्यपि सितंबर–अक्टूबर 2024 में विधानसभा चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं, फिर भी अब तक राज्यसभा चुनाव नहीं कराए गए हैं। इसके कारण जम्मू–कश्मीर पिछले चार वर्षों से राज्यसभा में पूरी तरह से प्रतिनिधित्व विहीन बना हुआ है।   जम्मू–कश्मीर की राज्यसभा सीटों पर हालिया विवाद और संवैधानिक पहलू हालिया विवाद (Recent Developments) 1. कानून मंत्रालय और चुनाव आयोग के बीच मतभेद चुनाव आयोग ने वर्ष 2025 में यह सुझाव दिया कि जम्मू–कश्मीर की चार राज्यसभा सीटों के कार्यकाल को क्रमबद्ध (staggered) करने के लिए राष्ट्रपति आदेश जारी किया जाए, ताकि सभी सीटें एक साथ रिक्त न हों।  लेकिन कानून और न्याय मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और कहा कि वर्तमान कानून, विशेषकर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of People Act, 1951) में इस प्रकार के आदेश का कोई प्रावधान मौजूद नहीं है।  मंत्रालय का यह भी कहना था कि यदि ऐसा करना है तो संसद को विधायी संशोधन करना होगा और यह प्रावधान केवल जम्मू–कश्मीर के लिए नहीं बल्कि उन सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए लागू होना चाहिए जिनकी राज्यसभा सीटों का कार्यकाल एक साथ समाप्त होता है।  2. राज्यसभा चुनावों की प्रक्रिया और जम्मू–कश्मीर की विशेष परिस्थिति राज्यसभा के चुनाव अनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Proportional Representation by means of Single Transferable Vote) के आधार पर होते हैं, जिसमें संबंधित राज्य या केंद्रशासित प्रदेश की विधान सभा के निर्वाचित सदस्य मतदान करते हैं।  जम्मू–कश्मीर में वर्ष 2019 में पुनर्गठन अधिनियम लागू होने के बाद विधानसभा भंग कर दी गई और राष्ट्रपति शासन लागू हो गया।  इस अवधि में वर्ष 2021 में चारों राज्यसभा सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो गया और नई विधानसभा के अभाव में चुनाव नहीं हो सका।  सितंबर–अक्टूबर 2024 में विधानसभा चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं, लेकिन अब तक राज्यसभा चुनाव नहीं कराए गए हैं।  इस कारण जम्मू–कश्मीर पिछले चार वर्षों से राज्यसभा में प्रतिनिधित्व से वंचित है।  संवैधानिक और कानूनी पहलू   1. अनुच्छेद 324 – चुनाव आयोग की स्वतंत्रता भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को स्वतंत्र रूप से चुनाव कराने की शक्ति प्रदान करता है।  इस अनुच्छेद में स्पष्ट किया गया है कि चुनाव आयोग संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण करेगा।  हालांकि, जब चुनावी प्रक्रिया किसी विशेष कानून, जैसे कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 द्वारा सीमित हो जाती है, तब चुनाव आयोग अपने अधिकार का उपयोग केवल उसी दायरे में कर सकता है। यही कारण है कि जम्मू–कश्मीर के मामले में चुनाव आयोग को राष्ट्रपति आदेश की आवश्यकता पड़ी, जिसे कानून मंत्रालय ने अस्वीकार कर दिया।  2. अनुच्छेद 80(4) और राज्यसभा चुनाव भारतीय संविधान का अनुच्छेद 80(4) यह प्रावधान करता है कि राज्यसभा के सदस्य राज्य की विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा चुने जाएंगे।  इसका अर्थ यह है कि जब तक विधानसभा अस्तित्व में नहीं होगी, तब तक राज्यसभा चुनाव संभव नहीं हो सकते।  जम्मू–कश्मीर के मामले में यह स्थिति वर्ष 2019 से 2024 तक बनी रही, जिसके कारण राज्यसभा चुनाव टल गए और क्षेत्र राज्यसभा में प्रतिनिधित्व से वंचित हो गया।  3. सुप्रीम कोर्ट और संविधान पीठ के प्रासंगिक निर्णय केशवानंद भारती बनाम राज्य केरल (1973): इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994): इस फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति शासन केवल अस्थायी उपाय है और लोकतांत्रिक संस्थाओं की बहाली शीघ्र की जानी चाहिए। जम्मू–कश्मीर पुनर्गठन से संबंधित याचिकाएँ (2020–2023): संविधान पीठ ने यह माना कि संसद के पास पुनर्गठन करने का अधिकार है, किंतु लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को लंबे समय तक बाधित करना संविधान की भावना के विपरीत है। जम्मू–कश्मीर की राज्यसभा सीटों पर विवाद के प्रमुख मुद्दे (Key Issues) 1. प्रतिनिधित्व का अभाव और लोकतांत्रिक घाटा जम्मू–कश्मीर की चार राज्यसभा सीटें 2021 से रिक्त हैं, जिसके कारण इस केंद्रशासित

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2 September 2025 Current Affairs

  Topic : भारत का कैंसर मैप: एक विश्लेषण     चर्चा में क्यों :  विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, “वर्तमान में 30% से 50% कैंसर को जोखिम कारकों से बचाव और प्रभावी रोकथाम रणनीतियों के माध्यम से रोका जा सकता है।” भारत में कैंसर की व्यापकता पर आधारित एक हालिया रिपोर्ट से यह सामने आया है कि कैंसर एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है, जिसमें क्षेत्रीय असमानताएं और सामाजिक-आर्थिक कारण प्रमुख भूमिका निभाते हैं। UPSC पाठ्यक्रम: प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय महत्व की समसामयिक घटनाएँ। मुख्य परीक्षा: सामान्य अध्ययन II, III: स्वास्थ्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित मुद्दे- विकास और उनके अनुप्रयोग पृष्ठभूमि भारत में कैंसर की निगरानी के लिए ICMR–नेशनल सेंटर फॉर डिज़ीज़ इन्फ़ॉर्मेटिक्स एंड रिसर्च (NCDIR) द्वारा कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम संचालित किया जाता है।  इस कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 1981 में की गई थी और इसका उद्देश्य कैंसर की घटनाओं, मृत्यु दर और उपचार की सफलता का आकलन करना है। संविधान के अनुसार जन स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है, किंतु अनुच्छेद 47 के अंतर्गत राज्य को पोषण और जनस्वास्थ्य सुधार की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है।  अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट ने स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार माना है।  इस प्रकार कैंसर नियंत्रण केंद्र और राज्यों के बीच सहयोगात्मक संघवाद (Cooperative Federalism) का विषय है। 1. भारत में कैंसर का मौजूदा परिदृश्य भारत में कैंसर के मामलों पर आधारित 43 कैंसर रजिस्ट्री के विश्लेषण से यह सामने आया है कि किसी व्यक्ति के जीवनकाल में कैंसर विकसित होने का जोखिम लगभग 11 प्रतिशत है।  वर्ष 2024 में अनुमानित 15.6 लाख नए कैंसर मामलों और लगभग 8.74 लाख मौतों की सूचना दर्ज की गई।  ये रजिस्ट्री देश की 10 से 18 प्रतिशत आबादी को कवर करती हैं और 23 राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों में संचालित होती हैं। 2. 2015–2019 का कैंसर डेटा और रुझान साल 2015 से 2019 के बीच एकत्र किए गए आंकड़ों में लगभग 7.08 लाख कैंसर मामलों और 2.06 लाख मौतों को दर्ज किया गया।  इस अध्ययन को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) दिल्ली, टाटा मेमोरियल और अड्यार कैंसर संस्थान जैसे प्रमुख शोध संस्थानों के विशेषज्ञों ने पूरा किया।  कोविड-19 महामारी के प्रभाव के कारण वर्ष 2020 के आंकड़े इसमें शामिल नहीं किए गए। 3. लिंग आधारित असमानताएँ भारत में महिलाओं में कैंसर के 51.1 प्रतिशत मामले दर्ज किए गए, लेकिन मौतों का प्रतिशत केवल 45 रहा।  इसका कारण यह है कि महिलाओं में पाए जाने वाले प्रमुख कैंसर जैसे स्तन और गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर आसानी से पहचाने और इलाज किए जा सकते हैं।  इसके विपरीत पुरुषों में सामान्य कैंसर जैसे फेफड़े और पेट का कैंसर देर से पकड़ में आते हैं और इनका परिणाम अपेक्षाकृत अधिक घातक होता है। 4. पुरुषों में मुँह का कैंसर पुरुषों में अब मुँह का कैंसर सबसे सामान्य कैंसर बन चुका है।  यह फेफड़ों के कैंसर से भी अधिक पाया जा रहा है। तम्बाकू सेवन में कमी (2009–10 में 34.6% से घटकर 2016–17 में 28.6% तक) आने के बावजूद मुँह के कैंसर में वृद्धि देखी जा रही है।  इसका कारण तम्बाकू के प्रभाव का लंबी अवधि में सामने आना और शराब जैसे अन्य जोखिम कारक हैं। 5. पूर्वोत्तर भारत : कैंसर का हॉटस्पॉट पूर्वोत्तर भारत, विशेषकर मिज़ोरम, देश का कैंसर हॉटस्पॉट है।  यहाँ पुरुषों में जीवनकाल का जोखिम 21.1 प्रतिशत और महिलाओं में 18.9 प्रतिशत तक दर्ज किया गया है।  इसके पीछे उच्च तम्बाकू सेवन, अस्वस्थ आहार (फर्मेंटेड मांस, धूम्रित भोजन, अत्यधिक मसाले और गर्म पेय) तथा मानव पैपिलोमा वायरस (HPV), Helicobacter pylori और हेपेटाइटिस जैसी संक्रामक बीमारियों की अधिकता जिम्मेदार है। 6. कैंसर का भौगोलिक वितरण कैंसर का वितरण भारत के विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार से दिखाई देता है। हैदराबाद में स्तन कैंसर की दर सबसे अधिक 54 प्रति 1,00,000 है। ऐज़ॉल में गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर 27.1 प्रति 1,00,000 पर सबसे अधिक है। श्रीनगर में पुरुषों में फेफड़ों का कैंसर 39.5 प्रति 1,00,000 पाया गया जबकि महिलाओं में ऐज़ॉल में इसकी दर 33.7 है। अहमदाबाद में पुरुषों में मुँह का कैंसर सबसे अधिक 33.6 है, जबकि महिलाओं में ईस्ट खासी हिल्स में यह दर 13.6 पाई गई। श्रीनगर में प्रोस्टेट कैंसर की दर 12.7 प्रति 1,00,000 दर्ज की गई। कैंसर क्या है? कैंसर बीमारियों का एक व्यापक समूह है,जो शरीर में कोशिकाओं के अनियंत्रित विकास और विभाजन के कारण होने वाली बीमारी है।  यह तब होता है जब सामान्य कोशिकाओं के DNA में उत्परिवर्तन होता है, जिससे अनियंत्रित कोशिका विभाजन होता है।   कैंसर के 100 से अधिक प्रकार हैं, और वे शरीर के लगभग किसी भी भाग में हो सकते हैं। ट्यूमर: कैंसर कोशिकाओं का एक समूह ट्यूमर बना सकता है, जो सौम्य (गैर-कैंसरयुक्त) या घातक (कैंसरयुक्त) हो सकता है। मेटास्टेसिस: घातक ट्यूमर मूल स्थान से शरीर के अन्य क्षेत्रों में फैल सकता है। कैंसर के प्राथमिक कारण कैंसर के विकास में कई जोखिम कारक योगदान करते हैं, लेकिन सटीक कारण अक्सर अज्ञात रहता है। कुछ प्राथमिक कारणों में शामिल हैं: तम्बाकू का उपयोग: धूम्रपान सबसे महत्वपूर्ण जोखिम कारक है, विशेष रूप से फेफड़े, मुँह, गले और एसोफैजियल कैंसर के लिए। रेडिएशन एक्सपोजर:  एक्स-रे, रेडॉन गैस और पराबैंगनी किरणों के संपर्क में आना शामिल है, जो DNA  को नुकसान पहुंचा सकते हैं। संक्रमण: मानव पेपिलोमावायरस (HPV) और हेपेटाइटिस B और C जैसे वायरस गर्भाशय ग्रीवा और यकृत कैंसर जैसे कैंसर का कारण बन सकते हैं। आनुवंशिकी: विरासत में मिली आनुवंशिक उत्परिवर्तन, जैसे कि BRCA1 और BRCA2 जीन, स्तन और डिम्बग्रंथि के कैंसर के जोखिम को बढ़ाते हैं। पर्यावरणीय कारक: रसायनों (एस्बेस्टस, बेंजीन) और प्रदूषकों के संपर्क में आने से कैंसर हो सकता है। जीवनशैली कारक: खराब आहार, शारीरिक निष्क्रियता, शराब का सेवन और मोटापा कई प्रकार के कैंसर से जुड़े हैं। आयु: मस्तिष्क ट्यूमर वृद्ध वयस्कों में अधिक आम है, लेकिन यह किसी भी उम्र में हो सकता है। कुछ प्रकार, जैसे मेडुलोब्लास्टोमा, बच्चों में अधिक आम हैं। ब्रेन कैंसर के बारे में         ब्रेन कैंसर का मतलब है मस्तिष्क में असामान्य कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि, जिससे ट्यूमर का निर्माण होता है।  ये ट्यूमर या तो प्राथमिक (मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले) या द्वितीयक (मेटास्टेटिक, शरीर के अन्य भागों से फैलने वाले) हो सकते हैं।  प्राथमिक ब्रेन कैंसर मस्तिष्क की

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मिनिकॉय द्वीप : 27 August Current Affairs

 मिनिकॉय द्वीप  चर्चा में क्यों 25–26 अगस्त 2025 को लक्षद्वीप के मिनिकॉय द्वीप पर खुले मैदान में जमा कचरे में आग लग गई।  मिनिकॉय द्वीप के बारे में मिनिकॉय, जिसे स्थानीय रूप से मालिकु (Maliku) कहा जाता है, लक्षद्वीप का दूसरा सबसे बड़ा और सबसे दक्षिणी द्वीप है।  इसका आकार अर्धचंद्राकार (crescent-shaped) माना जाता है, और यही विशिष्ट आकृति इसे द्वीपीय भू-आकृति के दृष्टि से अलग पहचान देती है।  द्वीप का कुल भू-क्षेत्रफल लगभग 4.80 वर्ग किलोमीटर दर्ज है। भौगोलिक स्थिति मिनिकॉय नौ-डिग्री चैनल (9° Channel) के पास स्थित है, जो विश्व के व्यस्ततम समुद्री मार्गों में से एक माना जाता है।  यह द्वीप मालदीव के उत्तरीतम द्वीप से लगभग 130 किलोमीटर की दूरी पर और कोच्चि से लगभग 398 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थित है, जिसके कारण इसका सामरिक तथा समुद्री परिवहन महत्त्व और बढ़ जाता है।   लैगून व स्थलाकृति द्वीप के पश्चिमी भाग में विशाल लैगून स्थित है, जिसकी अधिकतम चौड़ाई लगभग 6 किलोमीटर तक बताई जाती है।  इस लैगून में दो प्रवेशद्वार एक पश्चिमी ओर और दूसरा उत्तरी छोर पर निर्धारित हैं, तथा लैगून का क्षेत्रफल लगभग 30.60 वर्ग किलोमीटर माना जाता है।  मिनिकॉय की लंबाई लगभग 11 किलोमीटर है, जबकि समुद्र-तल से ऊँचाई पश्चिम की ओर करीब 2 मीटर और पूर्वी हिस्से में लगभग 3–4 मीटर तक आँकी गई है। ऐतिहासिक धरोहर मिनिकॉय का ऐतिहासिक लाइटहाउस (प्रकाश-स्तंभ) भारत के प्राचीन प्रकाश-स्तंभों में गिना जाता है।  इसका औपचारिक उद्घाटन 2 फ़रवरी 1885 को ब्रिटिश शासनकाल में किया गया था।  यह प्रकाश-स्तंभ आज भी समुद्री नौवहन के लिए एक महत्त्वपूर्ण मार्गदर्शक चिह्न के रूप में कार्य करता है। सामाजिक संरचना मिनिकॉय के सुव्यवस्थित गाँव पारम्परिक रूप से “अवाह (Avah)” कहलाते हैं ।  प्रत्येक अवाह का नेतृत्व मूपन/बोडुकाका (Moopan/Bodukaka) के हाथों में होता है, जो सामुदायिक जीवन और निर्णय-प्रक्रिया का केंद्र होता है, और हर गाँव का अपना गाँव-घर (Village House) निर्धारित रहता है।  द्वीप पर कुल 10 गाँव सूचीबद्ध हैं— बादा, आउमागु, बोडुआथिरी, रममेदु, सेदिवालु, अलूदी, फुंहिलोल, कुदेही, फ़ालेस्सेरी और केंडिपार्टी—जिनकी ग्राम्य संरचना और समुदाय-केंद्रित व्यवस्थाएँ मिनिकॉय की विशिष्ट सामाजिक पहचान को दर्शाती हैं। भाषा-परिदृश्य लक्षद्वीप के अधिकांश द्वीपों में जहाँ मलयालम प्रमुखतः बोली जाती है, वहीं मिनिकॉय में “महाल/धिवेही (Mahl/Dhivehi)” भाषा प्रचलित है।  धिवेही थाना (Thaana) लिपि में लिखी जाती है। मिनिकॉय भारत का एकमात्र ऐसा समुदाय माना जाता है जहाँ महल/धिवेही भाषा स्थानीय बोलचाल और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम है, जबकि हिंदी और अंग्रेज़ी का प्रयोग भी प्रशासनिक एवं शैक्षिक संदर्भों में देखा जाता है। लोक-संस्कृति मिनिकॉय की सांस्कृतिक पहचान उसके लोक-नृत्यों और समुद्री परम्पराओं से सजीव रूप में सामने आती है।  यहाँ के प्रमुख नृत्य लावा (Lava), थाारा/थारा (Thaara), डंडी (Dandi), फुली (Fuli) और बंडिया (Bandiya) माने जाते हैं।  द्वीप की पारम्परिक जाहधोनी (Jahadhoni) नावें—अतिथि-स्वागत, उत्सवों और द्वीपीय पिकनिक के अवसरों पर स्थानीय जीवन-पद्धति और समुद्री संस्कृति का सौंदर्यपूर्ण प्रतीक प्रस्तुत करती हैं। ===================================  प्रश्न :मिनिकॉय द्वीप के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए : यह लक्षद्वीप का दूसरा सबसे बड़ा और सबसे दक्षिणी द्वीप है, जिसे स्थानीय रूप से “मालिकु” कहा जाता है। यहाँ पर प्रचलित स्थानीय भाषा मलयालम है, जबकि हिंदी और अंग्रेज़ी का प्रयोग नहीं किया जाता। इसका ऐतिहासिक लाइटहाउस, जो 1885 में ब्रिटिश शासनकाल में शुरू हुआ था, आज भी समुद्री नौवहन के लिए महत्त्वपूर्ण है। उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? A. केवल 1 और 2 B. केवल 2 और 3 C. केवल 1 और 3 D. 1, 2 और 3 सभी उत्तर : C. केवल 1 और 3  व्याख्या: कथन 1 सही है → मिनिकॉय लक्षद्वीप का दूसरा सबसे बड़ा तथा सबसे दक्षिणी द्वीप है, जिसे “मालिकु” कहा जाता है। कथन 2 गलत है → यहाँ पर महाल/धिवेही भाषा बोली जाती है, न कि मलयालम। साथ ही प्रशासनिक व शैक्षिक संदर्भों में हिंदी और अंग्रेज़ी का भी प्रयोग होता है। कथन 3 सही है → मिनिकॉय का लाइटहाउस (1885) ब्रिटिश काल में बना था और आज भी समुद्री नौवहन हेतु मार्गदर्शक चिह्न है।              

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UPSC ESSAY PAPER MODEL ANSWER 2025

सत्य कोई रंग नहीं जानता है। Truth knows no color.   1893 में दक्षिण अफ्रीका के पीटरमैरिट्ज़बर्ग में एक युवा मोहनदास गांधी को केवल उनकी त्वचा के रंग के कारण ट्रेन से उतार दिया गया था। उस एक घटना ने गांधी के जीवन की दिशा बदल दी और उन्हें मानव समता के सार्वभौमिक सत्य का बोध कराया। यह ऐतिहासिक प्रसंग दर्शाता है कि पूर्वाग्रह जहाँ विभाजन पैदा करते हैं, वहीं सत्य स्वयं किसी “रंग” – जाति, नस्ल या किसी भी भेद – को नहीं जानता। सरल शब्दों में “सत्य कोई रंग नहीं जानता है” का आशय है कि सत्य निष्पक्ष, सार्वभौमिक एवं सबके लिए समान होता है। सत्य की यह निष्पक्षता ही न्याय, समानता, नैतिकता जैसे अन्य मानवीय मूल्यों का आधार बनती है।  दार्शनिक दृष्टिकोण दार्शनिक रूप से सत्य की अवधारणा लगभग सभी सभ्यताओं में सर्वोच्च मूल्य के रूप में स्थापित रही है। प्राचीन भारतीय उपनिषदों में कहा गया है “सत्यमेव जयते” अर्थात सत्य की ही अंततः विजय होती है। सत्य को कालातीत और परम धर्म माना गया है। महात्मा गांधी ने सत्य को ईश्वर का रूप माना और अंततः निष्कर्ष दिया कि “सत्य ही ईश्वर है” – अर्थात सत्य से बढ़कर कोई आराध्य नहीं। इसी तरह पश्चिमी दर्शन में इमैनुएल कांट के नैतिक दर्शन (कर्तव्यवादी दर्शन) में कहा गया कि नैतिक नियम सार्वभौमिक होते हैं और इन पर किसी व्यक्ति-विशेष या परिस्थिति का रंग नहीं चढ़ना चाहिए। सत्य अपने आप में निरपेक्ष है, उसका कोई व्यक्तिगत या सामूहिक पक्षपातपूर्ण “वर्गीकरण” नहीं होता। लेकिन दार्शनिक चिंतन में यह भी प्रतिपादित किया गया है कि यद्यपि अंतिम सत्य निष्पक्ष हो सकता है, practically मनुष्यों की सत्य तक पहुँच भिन्न हो सकती है। माइकल फूको जैसे विचारकों ने तर्क दिया कि समाज में जो कुछ “सत्य” माना जाता है, वह अक्सर सत्ता संरचनाओं द्वारा निर्धारित होता है। इसी प्रकार जर्मन दर्शनशास्त्री फ्रेडरिक नीत्शे ने कहा था, “यहाँ कोई तथ्य नहीं, केवल व्याख्याएँ हैं” – अर्थात अनेक बार सत्य को विभिन्न दृष्टिकोणों से देखा-परखा जाता है। उदाहरणार्थ, औपनिवेशिक शासकों ने भारत के शोषण को अपना “सभ्यता मिशन” कहकर प्रस्तुत किया, जो उनकी विकृत व्याख्या थी। इन दृष्टांतों से स्पष्ट होता है कि मानव मन अपने पूर्वाग्रहों या हितों के कारण सत्य को “रंगीन चश्मे” से देख सकता है। फिर भी, दार्शनिक आदर्श के रूप में सत्य किसी रंग-भेद को नहीं मानता – अंतिम सत्य सार्वभौमिक और निष्पक्ष ही रहेगा, भले ही उसकी प्राप्ति का मार्ग जटिल हो। कानूनी एवं संवैधानिक परिप्रेक्ष्य   चित्र: न्याय की देवी (Lady Justice) की एक प्रतिमा, जिसमें आँखे ढकी (पट्टीबंध) हैं और हाथों में तराज़ू व तलवार धारण किए हुए हैं। यह दृष्टांत दर्शाता है कि न्याय अंधा (निष्पक्ष) होता है और सत्य व न्याय का तराज़ू सभी के लिए समान रूप से तुला रहना चाहिए। वास्तव में, कानून के शासन में सत्य का कोई रंग नहीं होना चाहिए – कानून सभी व्यक्तियों के साथ समान बर्ताव करे, चाहे उनकी जाति, धर्म, लिंग, भाषा कुछ भी हो। इसी सिद्धांत को भारतीय संविधान में “न्याय और समता” के रूप में प्रतिपादित किया गया है। संविधान का अनुच्छेद 14 सभी व्यक्तियों को क़ानून के समक्ष समानता का अधिकार सुनिश्चित करता है। समान रूप से, अनुच्छेद 15 राज्य द्वारा केवल धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव निषिद्ध करता है। ये संवैधानिक प्रावधान इसी बात पर ज़ोर देते हैं कि न्यायिक सत्य किसी पूर्वाग्रह या “रंग” से प्रभावित नहीं होना चाहिए। कानूनी प्रक्रिया में भी सत्य की निष्पक्षता को संरक्षित रखने के प्रतीक मिलते हैं। न्यायालयों में गवाही से पहले गीता या धर्मग्रंथ को हाथ में लेकर सत्य बोलने की शपथ दिलाई जाती है, ताकि सत्य ही सामने आए। यदि कोई जानबूझकर झूठी गवाही दे, तो उसे कानून की दृष्टि में अपराध (कसम तोड़ना/झूठी गवाही) माना जाता है – यह सिद्धांत भी सत्य की पवित्रता स्थापित करता है। न्याय की देवी की आँखों पर पट्टी इसी ओर संकेत करती है कि न्याय करते समय न्यायाधीश को यह नहीं देखना चाहिए कि आरोपी या पीड़ित किस धर्म-जाति के हैं; न्याय केवल तथ्यों और सत्य पर आधारित हो। उदाहरण के लिए, एक अमीर एवं प्रभावशाली व्यक्ति दोषी हो तो कानूनी सत्य को उसकी हैसियत का “रंग” नहीं ढकना चाहिए, उसे भी कानून से वही सज़ा मिले जो किसी सामान्य व्यक्ति को मिलती। यह कारण है कि न्यायपालिका में निष्पक्षता (Ipartiality) को सबसे बड़ा गुण माना गया है। वर्तमान समय में सरकार की पारदर्शिता (transparency) भी “सत्य के रंगहीन” रहने से जुड़ी है। सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) इसी आदर्श पर बना कि जनता को सत्य जानने का अधिकार है, और सरकारी तंत्र को किसी भेदभाव या छिपाव के बिना जानकारी देनी चाहिए। कुल मिलाकर, एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधि का राज तभी स्थापित रह सकता है जब सत्यनिष्ठा हो और कानून सबको बराबर समझे – अर्थात सत्य किसी का पक्ष लेकर रंग न बदले। ऐतिहासिक दृष्टांत इतिहास गवाह है कि समय-समय पर कुछ लोग या व्यवस्थाएं सत्य को अपने “रंग” में रंगने की चेष्टा करती रहीं, किन्तु अंततः निष्पक्ष सत्य की ही विजय होती आई है। अमेरिका में 19वीं शताब्दी के दौरान रंगभेद और दासप्रथा का जोर था, लेकिन सुधारक फ्रेडरिक डग्लस जैसे नेताओं ने उद्घोष किया – “सही (न्याय) का कोई लिंग नहीं और सत्य का कोई रंग नहीं है”, परमात्मा हम सबका पिता है और हम सब भाई-बंधु हैं। यह प्रसिद्ध कथन 1847 में दिए गए डग्लस के उसी उद्धरण से लिया गया है जो दर्शाता है कि समानता और मानव अधिकार जैसे सत्य शाश्वत हैं, उन्हें नस्ल या लिंग के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता। इसी भावना को आगे बढ़ाते हुए अमेरिका में अब्राहम लिंकन ने 1863 में दासप्रथा उन्मूलन (मुक्ति उद्घोषणा) किया। लिंकन ने सिद्धांततः यह स्वीकार किया कि सभी मनुष्य बराबर हैं, और काले-गोरे का भेद असत्य एवं अन्याय है। यह सत्य कि “सभी जन समान हैं” किसी रंग-भेद को नहीं जानता था और इसी ने आगे चलकर अमेरिका में बराबरी के अधिकार दिलाने में नींव रखी। भारतीय संदर्भ में भी अनेक ऐतिहासिक घटनाएँ इस कथन को पुष्ट करती हैं। महात्मा गांधी के लिए “सत्याग्रह” केवल राजनीतिक उपाय नहीं बल्कि नैतिक सिद्धांत था – सत्याग्रह का अर्थ ही है “सत्य के प्रति आग्रह”। गांधीजी ने कहा था, “कोई

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NIRMAN IAS 25 August CA 2025 Hindi

Topic जन विश्वास 2.0 : विश्वास आधारित शासन की दिशा में कदम परिचय जन विश्वास (संशोधन विधेयक), 2025 जिसे जन विश्वास 2.0 भी कहा जाता है, हाल ही में लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। यह विधेयक जन विश्वास अधिनियम, 2023 का विस्तार है।  वर्ष 2023 में पारित कानून के अंतर्गत 42 अधिनियमों की 183 धाराओं को अपराधमुक्त किया गया था। नए विधेयक का उद्देश्य 16 केंद्रीय अधिनियमों में संशोधन कर छोटे अपराधों और अनुपालनों को अपराधमुक्त बनाना तथा दंड प्रावधानों को अधिक युक्तिसंगत करना है।  इससे न केवल नागरिकों के जीवन में सरलता आएगी बल्कि व्यापार करना भी आसान होगा पृष्ठभूमि : जन विश्वास 2.0 की आवश्यकता 1. कानूनों में अत्यधिक अपराधीकरण विदि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी की रिपोर्ट बताती है कि 882 केंद्रीय कानूनों में से 370 में 7,305 अपराध परिभाषित हैं। इनमें से 75% अपराध ऐसे क्षेत्रों से जुड़े हैं जो मूल आपराधिक न्याय प्रणाली का हिस्सा नहीं हैं, जैसे– कराधान, नौवहन, वित्तीय संस्थान और नगरपालिका शासन। 2. असंगत दंड कई बार बहुत छोटे कार्यों पर भी गिरफ्तारी हो सकती है। उदाहरण: सड़क पर गाय का दूध निकालना या पालतू कुत्ते को घुमाने में लापरवाही। यह स्थिति अपराध और दंड के अनुपात (Proportionality) के सिद्धांत का उल्लंघन करती है। 3. व्यापार में रुकावट ORF रिपोर्ट 2022 के अनुसार: 1,536 व्यापारिक कानूनों में से 50% से अधिक में जेल की सजा का प्रावधान है। 69,233 अनुपालनों में से 37.8% में कारावास शामिल है। इस प्रकार, उद्यमिता, रोजगार सृजन और GDP वृद्धि प्रभावित होती है। 4. न्यायपालिका पर दबाव राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के अनुसार जिला अदालतों में 3.6 करोड़ से अधिक आपराधिक मामले लंबित हैं। इनमें से 2.3 करोड़ मामले एक वर्ष से अधिक पुराने हैं। छोटे-छोटे प्रक्रियात्मक मामलों के कारण गंभीर अपराधों पर न्याय में देरी होती है। जन विश्वास विधेयक 2025 के प्रमुख प्रावधान 1. संशोधन का दायरा कुल 355 प्रावधानों में संशोधन का प्रस्ताव। 288 प्रावधान अपराधमुक्त। 67 प्रावधान नागरिकों के जीवन को आसान बनाने हेतु बदले जाएंगे। 2. शामिल अधिनियम इन 16 केंद्रीय अधिनियमों में संशोधन होगा, जिनमें शामिल हैं:  मोटर वाहन अधिनियम, 1988 भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 केंद्रीय रेशम बोर्ड अधिनियम, 1948 सड़क परिवहन निगम अधिनियम, 1950 चाय अधिनियम, 1953 अपरेंटिस अधिनियम, 1961 दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 नई दिल्ली नगर परिषद अधिनियम, 1994 विद्युत अधिनियम, 2003 वस्त्र समिति अधिनियम, 1963 कोयर, जूट और अन्य औद्योगिक अधिनियम जन विश्वास अधिनियम, 2023 (पूरक संशोधन सहित) आदि। 3. प्रथम अपराधी के लिए प्रावधान पहली बार अपराध करने वालों के लिए चेतावनी और सुधार नोटिस जारी किया जाएगा। उदाहरण: ग़ैर-मानक वज़न और माप रखने पर पहले ₹1 लाख का जुर्माना था, अब सुधार का अवसर दिया जाएगा। 4. कारावास धाराओं का हटना छोटे प्रक्रियात्मक या तकनीकी अपराधों पर अब जेल की सजा नहीं होगी। उदाहरण: विद्युत अधिनियम, 2023 में गैर-अनुपालन पर पहले 3 माह की सजा थी, अब इसे केवल जुर्माने में बदला गया है। 5. दंड का युक्तिकरण हर 3 वर्ष में स्वतः 10% दंड वृद्धि का प्रावधान। फोकस अब जेल की बजाय आर्थिक दंड पर रहेगा। सरकार का तर्क यह विधेयक “न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन” की अवधारणा को मजबूत करता है। यह मेक इन इंडिया, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और न्यायिक सुधारों को समर्थन देता है। यह कानून तुच्छ अपराधों को अपराध घोषित करने वाले अप्रासंगिक और पुराने प्रावधानों को हटाने का प्रयास है।  विधेयक का महत्व यह विधेयक व्यवसाय करने की सरलता और नागरिकों के दैनिक जीवन को सहज बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। छोटे-छोटे अनुपालन उल्लंघनों के लिए कठोर दंड समाप्त कर भरोसेमंद शासन का वातावरण बनाया गया है। नागरिकों और उद्यमियों के बीच छोटे अपराधों या तकनीकी त्रुटियों के लिए दंडात्मक भय समाप्त होगा। इससे प्रशासन और जनता के बीच विश्वास-आधारित संबंध मजबूत होंगे। छोटे और प्रक्रियागत मामलों को अब प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा ही सुलझाया जा सकेगा। इससे न्यायालयों पर अनावश्यक मुकदमों का बोझ घटेगा और न्यायिक प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सकेगी। व्यवसाय करने वालों के लिए पूर्वानुमेय और भरोसेमंद माहौल तैयार होगा। इससे निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा, नई आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलेगा और सतत विकास को गति मिलेगी। निष्कर्ष जन विश्वास 2.0 वर्तमान में लोकसभा की सिलेक्ट कमेटी द्वारा समीक्षा में है और रिपोर्ट अगले सत्र में प्रस्तुत की जाएगी। यदि यह लागू होता है तो: अदालतों में लंबित मामलों का बोझ घटेगा। नागरिकों और सरकार के बीच विश्वास बढ़ेगा। भारत की छवि एक व्यापार-अनुकूल और निवेश-अनुकूल देश के रूप में और सशक्त होगी। Q. जन विश्वास (संशोधन) विधेयक, 2025 के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए : इस विधेयक के अंतर्गत कुल 355 प्रावधानों में संशोधन का प्रस्ताव किया गया है। विधेयक में 288 प्रावधानों को अपराधमुक्त किया गया है। यह विधेयक केवल भारतीय दंड संहिता, 1860 से संबंधित प्रावधानों को ही संशोधित करता है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? A. केवल 1 और 2 B. केवल 2 और 3 C. केवल 1 और 3 D. 1, 2 और 3 उत्तर : A (केवल 1 और 2) व्याख्या कथन 1 सही है : जन विश्वास 2.0 के अंतर्गत कुल 355 प्रावधानों में संशोधन का प्रस्ताव है। कथन 2 सही है : इनमें से 288 प्रावधान अपराधमुक्त किए जाएंगे। कथन 3 गलत है : यह विधेयक केवल भारतीय दंड संहिता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें 16 केंद्रीय अधिनियम (जैसे – RBI अधिनियम 1934, औषधि अधिनियम 1940, मोटर वाहन अधिनियम 1988, विद्युत अधिनियम 2003, MSME अधिनियम 2006, लीगल मेट्रोलॉजी अधिनियम 2009 आदि) को शामिल किया गया है। ड्रेक पैसेज (Drake Passage) चर्चा में क्यों :  हाल ही में यह क्षेत्र 7.5 तीव्रता के भूकंप और सुनामी चेतावनी के कारण समाचारों में चर्चा का विषय बना, जिससे तटीय इलाकों में अलर्ट और जनजीवन प्रभावित हुआ। ड्रेक पैसेज (Drake Passage) के बारे में ड्रेक पैसेज दक्षिण अमेरिका के केप हॉर्न (Cape Horn) और अंटार्कटिका के साउथ शेटलैंड द्वीप समूह के बीच स्थित एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है।  यह मार्ग न केवल भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि ऐतिहासिक और जलवायु संबंधी दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। भौगोलिक स्थिति ड्रेक पैसेज दक्षिण अमेरिका के केप हॉर्न और अंटार्कटिका के साउथ शेटलैंड द्वीप समूह के बीच स्थित है। इसकी चौड़ाई लगभग 800 किलोमीटर है। यह दक्षिणी महासागर (Southern Ocean) का सबसे संकरा भाग माना जाता है। यह मार्ग दक्षिण-पश्चिम अटलांटिक महासागर और दक्षिण-पूर्व प्रशांत महासागर को जोड़ता है। नामकरण और ऐतिहासिक महत्व इस जलमार्ग का नाम

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