समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) UPSC and state
यहाँ समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) पर संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) मुख्य परीक्षा (Mains) के मानदंडों के अनुरूप अत्यधिक शोधित, व्यापक और संरचित नोट्स दिए गए हैं। इसे GS पेपर-2 (राजव्यवस्था, शासन और सामाजिक न्याय) को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, जिसमें समसामयिक डेटा, केस लॉ और नीतिगत आयामों का समावेश है। समान नागरिक संहिता (UCC): संवैधानिक, कानूनी और सामाजिक आयाम परिचय और पृष्ठभूमि (Introduction & Background) अवधारणा: UCC का अर्थ है पूरे देश के लिए एक समान कानून होना, जो सभी धार्मिक समुदायों पर उनके व्यक्तिगत मामलों जैसे विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेना और रखरखाव (Maintenance) में समान रूप से लागू हो। ऐतिहासिक विकास: लेक्स लोकी रिपोर्ट (1840): ब्रिटिश काल में अपराधों, साक्ष्यों और अनुबंधों के लिए कानूनों के संहिताकरण (Codification) की सिफारिश की गई, लेकिन व्यक्तिगत कानूनों को जानबूझकर छोड़ दिया गया। बी.एन. राव समिति (1941): हिंदू कानून को संहिताबद्ध करने के लिए गठित की गई, जिसने अंततः 1955-56 के ‘हिंदू कोड बिल’ का रूप लिया। संवैधानिक और कानूनी ढांचा (Constitutional & Legal Framework) A. राज्य के नीति निदेशक तत्व (DPSP) – अनुच्छेद 44 संविधान के भाग IV के तहत अनुच्छेद 44 राज्य को यह निर्देश देता है कि वह भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (UCC) सुरक्षित करने का प्रयास करेगा। सीमा: अनुच्छेद 37 के अनुसार, DPSP न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय (Enforceable) नहीं हैं, लेकिन देश के शासन में मूलभूत हैं। B. विधायी शक्ति और सातवीं अनुसूची समवर्ती सूची (प्रविष्टि 5): विवाह, तलाक, शिशु और नाबालिग, गोद लेना, वसीयत, अमूर्तता और विरासत जैसे विषय समवर्ती सूची (Concurrent List) के अंतर्गत आते हैं। प्रभाव: केंद्र (संसद) और राज्य विधानसभाएं दोनों इस पर कानून बनाने के लिए सक्षम हैं। उदाहरण: केंद्र की अनुपस्थिति में उत्तराखंड द्वारा राज्य स्तरीय कानून बनाना। C. वर्तमान कार्यान्वयन स्थिति (Current Status) गोवा नागरिक संहिता (1867): पुर्तगाली नागरिक संहिता पर आधारित, जो विवाह के पंजीकरण, संपत्ति के समान बंटवारे (Communion of Property) और बहुविवाह पर प्रतिबंध को लागू करती है। उत्तराखंड UCC अधिनियम (2024): स्वतंत्र भारत में राज्य स्तर पर UCC लागू करने वाला पहला राज्य। प्रमुख प्रावधान: लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य पंजीकरण, हलाला/इद्दात पर प्रतिबंध, और लड़कियों की शादी की उम्र (21 वर्ष – प्रस्तावित संरेखण)। अन्य राज्य: गुजरात, असम और मध्य प्रदेश ने इस दिशा में समितियों का गठन किया है। UCC के पक्ष में प्रमुख तर्क (Arguments in Favour of UCC) A. लैंगिक न्याय और महिला सशक्तिकरण (Gender Justice) अधिकांश व्यक्तिगत कानून पितृसत्तात्मक (Patriarchal) संरचनाओं पर आधारित हैं, जो महिलाओं के अधिकारों का हनन करते हैं। UCC लैंगिक समानता सुनिश्चित करेगा। मुस्लिम व्यक्तिगत कानून में बहुविवाह (Polygamy) और विरासत में असमानता (पुत्रों को पुत्रियों की तुलना में दोगुना हिस्सा) जैसी प्रथाएं मौजूद हैं। शायरा बानो बनाम भारत संघ (2017) में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि लैंगिक समानता और सम्मान का अधिकार (अनुच्छेद 21) धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) पर हावी होना चाहिए। B. धर्मनिरपेक्षता को सुदृढ़ करना (Strengthening Secularism) वास्तविक धर्मनिरपेक्षता के लिए राज्य और धर्म का अलगाव आवश्यक है। नागरिकों के साथ उनकी धार्मिक पहचान के बजाय एक ‘नागरिक’ के रूप में व्यवहार किया जाना चाहिए। संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 15 केवल धर्म के आधार पर किसी भी भेदभाव को रोकता है। C. राष्ट्रीय एकीकरण (National Integration) अलग-अलग व्यक्तिगत कानून समुदायों के बीच अलगाववाद की भावना को बढ़ावा देते हैं। एक समान नागरिक कानून साझा राष्ट्रीय पहचान और ‘एक राष्ट्र, एक कानून’ की भावना को मजबूत करेगा। D. कानूनी प्रणाली का सरलीकरण (Simplification of Legal System) वर्तमान में भारतीय अदालतें जटिल, अलिखित और प्राचीन धार्मिक ग्रंथों (जैसे शरिया, मिताक्षरा, दायभाग) की व्याख्या करने में उलझी रहती हैं। UCC न्याय वितरण प्रणाली को तेज और सरल बनाएगा। भारतीय अदालतों में 4.5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं; पारिवारिक विवादों का सरलीकरण इस बोझ को कम करेगा। चुनौतियाँ और विरोध में तर्क (Key Challenges & Counter-Arguments) A. धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से टकराव (Conflict with Art. 25-28) विरोधियों का तर्क है कि UCC अनुच्छेद 25 के तहत अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को अबाध रूप से मानने व आचरण करने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है। प्रति-तर्क: अनुच्छेद 25(2) राज्य को सामाजिक सुधार और धर्म से जुड़ी धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को विनियमित करने की अनुमति देता है। B. विविधता और सांस्कृतिक बहुलवाद पर संकट भारत एक बहु-सांस्कृतिक देश है। ‘एकरूपता’ (Uniformity) को ‘समानता’ (Equality) मान लेना विविधता को नष्ट कर सकता है। अनुच्छेद 29(1): नागरिकों के किसी भी वर्ग को अपनी विशिष्ट संस्कृति, भाषा या लिपि को बनाए रखने का अधिकार देता है। C. जनजातीय अधिकार और संवैधानिक संरक्षण भारत की जनजातियों के अपने प्रथागत कानून (Customary Laws) हैं। UCC उनके अधिकारों और पहचान को खतरे में डाल सकता है। संवैधानिक सुरक्षा: 5वीं और 6वीं अनुसूची: असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों को विशेष स्वायत्तता प्राप्त है। अनुच्छेद 371A (नागालैंड) और 371G (मिजोरम): संसद का कोई भी कानून इनके प्रथागत कानूनों में तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकता जब तक कि वहां की राज्य विधानसभा इसकी अनुमति न दे। D. विधि आयोग (Law Commission) का रुख 21वां विधि आयोग (2018 – जस्टिस बीएस चौहान): स्पष्ट रूप से कहा कि इस चरण में UCC “न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय”। आयोग ने कहा कि विविधता का उत्सव मनाना चाहिए, और UCC के बजाय व्यक्तिगत कानूनों के भीतर मौजूद भेदभावपूर्ण प्रथाओं को संशोधित किया जाना चाहिए। 22वां विधि आयोग (वर्तमान): इसने इस मुद्दे की संवेदनशीलता को देखते हुए नए सिरे से जनता और हितधारकों से विचार मांगे हैं। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय (Landmark Judicial Pronouncements) वाद वर्ष मुख्य महत्व / सार शाह बानो बेगम मामला 1985 SC ने CrPC की धारा 125 के तहत तलाकशुदा मुस्लिम महिला के भरण-पोषण के अधिकार को बरकरार रखा और कहा कि UCC राष्ट्रीय एकीकरण में मदद करेगा। सरला मुद्गल मामला 1995 कोर्ट ने फैसला सुनाया कि पहली शादी को भंग किए बिना केवल दूसरी शादी के लिए इस्लाम अपनाना अवैध है। केंद्र से अनुच्छेद 44 पर काम करने का अनुरोध किया। शायरा बानो मामला 2017 सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को असंवैधानिक घोषित किया और मनमाने व्यक्तिगत कानूनों पर लैंगिक न्याय को प्राथमिकता दी। ‘एकरूपता’ बनाम ‘समानता’ (Uniformity vs Equality) UCC का वास्तविक उद्देश्य