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समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) UPSC and state

यहाँ समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) पर संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) मुख्य परीक्षा (Mains) के मानदंडों के अनुरूप अत्यधिक शोधित, व्यापक और संरचित नोट्स दिए गए हैं। इसे GS पेपर-2 (राजव्यवस्था, शासन और सामाजिक न्याय) को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, जिसमें समसामयिक डेटा, केस लॉ और नीतिगत आयामों का समावेश है। समान नागरिक संहिता (UCC): संवैधानिक, कानूनी और सामाजिक आयाम परिचय और पृष्ठभूमि (Introduction & Background) अवधारणा: UCC का अर्थ है पूरे देश के लिए एक समान कानून होना, जो सभी धार्मिक समुदायों पर उनके व्यक्तिगत मामलों जैसे विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेना और रखरखाव (Maintenance) में समान रूप से लागू हो। ऐतिहासिक विकास: लेक्स लोकी रिपोर्ट (1840): ब्रिटिश काल में अपराधों, साक्ष्यों और अनुबंधों के लिए कानूनों के संहिताकरण (Codification) की सिफारिश की गई, लेकिन व्यक्तिगत कानूनों को जानबूझकर छोड़ दिया गया। बी.एन. राव समिति (1941): हिंदू कानून को संहिताबद्ध करने के लिए गठित की गई, जिसने अंततः 1955-56 के ‘हिंदू कोड बिल’ का रूप लिया। संवैधानिक और कानूनी ढांचा (Constitutional & Legal Framework) A. राज्य के नीति निदेशक तत्व (DPSP) – अनुच्छेद 44 संविधान के भाग IV के तहत अनुच्छेद 44 राज्य को यह निर्देश देता है कि वह भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (UCC) सुरक्षित करने का प्रयास करेगा। सीमा: अनुच्छेद 37 के अनुसार, DPSP न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय (Enforceable) नहीं हैं, लेकिन देश के शासन में मूलभूत हैं। B. विधायी शक्ति और सातवीं अनुसूची समवर्ती सूची (प्रविष्टि 5): विवाह, तलाक, शिशु और नाबालिग, गोद लेना, वसीयत, अमूर्तता और विरासत जैसे विषय समवर्ती सूची (Concurrent List) के अंतर्गत आते हैं। प्रभाव: केंद्र (संसद) और राज्य विधानसभाएं दोनों इस पर कानून बनाने के लिए सक्षम हैं। उदाहरण: केंद्र की अनुपस्थिति में उत्तराखंड द्वारा राज्य स्तरीय कानून बनाना। C. वर्तमान कार्यान्वयन स्थिति (Current Status) गोवा नागरिक संहिता (1867): पुर्तगाली नागरिक संहिता पर आधारित, जो विवाह के पंजीकरण, संपत्ति के समान बंटवारे (Communion of Property) और बहुविवाह पर प्रतिबंध को लागू करती है। उत्तराखंड UCC अधिनियम (2024): स्वतंत्र भारत में राज्य स्तर पर UCC लागू करने वाला पहला राज्य। प्रमुख प्रावधान: लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य पंजीकरण, हलाला/इद्दात पर प्रतिबंध, और लड़कियों की शादी की उम्र (21 वर्ष – प्रस्तावित संरेखण)। अन्य राज्य: गुजरात, असम और मध्य प्रदेश ने इस दिशा में समितियों का गठन किया है। UCC के पक्ष में प्रमुख तर्क (Arguments in Favour of UCC) A. लैंगिक न्याय और महिला सशक्तिकरण (Gender Justice) अधिकांश व्यक्तिगत कानून पितृसत्तात्मक (Patriarchal) संरचनाओं पर आधारित हैं, जो महिलाओं के अधिकारों का हनन करते हैं। UCC लैंगिक समानता सुनिश्चित करेगा। मुस्लिम व्यक्तिगत कानून में बहुविवाह (Polygamy) और विरासत में असमानता (पुत्रों को पुत्रियों की तुलना में दोगुना हिस्सा) जैसी प्रथाएं मौजूद हैं। शायरा बानो बनाम भारत संघ (2017) में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि लैंगिक समानता और सम्मान का अधिकार (अनुच्छेद 21) धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) पर हावी होना चाहिए। B. धर्मनिरपेक्षता को सुदृढ़ करना (Strengthening Secularism) वास्तविक धर्मनिरपेक्षता के लिए राज्य और धर्म का अलगाव आवश्यक है। नागरिकों के साथ उनकी धार्मिक पहचान के बजाय एक ‘नागरिक’ के रूप में व्यवहार किया जाना चाहिए। संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 15 केवल धर्म के आधार पर किसी भी भेदभाव को रोकता है। C. राष्ट्रीय एकीकरण (National Integration) अलग-अलग व्यक्तिगत कानून समुदायों के बीच अलगाववाद की भावना को बढ़ावा देते हैं। एक समान नागरिक कानून साझा राष्ट्रीय पहचान और ‘एक राष्ट्र, एक कानून’ की भावना को मजबूत करेगा। D. कानूनी प्रणाली का सरलीकरण (Simplification of Legal System) वर्तमान में भारतीय अदालतें जटिल, अलिखित और प्राचीन धार्मिक ग्रंथों (जैसे शरिया, मिताक्षरा, दायभाग) की व्याख्या करने में उलझी रहती हैं। UCC न्याय वितरण प्रणाली को तेज और सरल बनाएगा। भारतीय अदालतों में 4.5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं; पारिवारिक विवादों का सरलीकरण इस बोझ को कम करेगा। चुनौतियाँ और विरोध में तर्क (Key Challenges & Counter-Arguments) A. धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से टकराव (Conflict with Art. 25-28) विरोधियों का तर्क है कि UCC अनुच्छेद 25 के तहत अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को अबाध रूप से मानने व आचरण करने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है। प्रति-तर्क: अनुच्छेद 25(2) राज्य को सामाजिक सुधार और धर्म से जुड़ी धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को विनियमित करने की अनुमति देता है। B. विविधता और सांस्कृतिक बहुलवाद पर संकट भारत एक बहु-सांस्कृतिक देश है। ‘एकरूपता’ (Uniformity) को ‘समानता’ (Equality) मान लेना विविधता को नष्ट कर सकता है। अनुच्छेद 29(1): नागरिकों के किसी भी वर्ग को अपनी विशिष्ट संस्कृति, भाषा या लिपि को बनाए रखने का अधिकार देता है। C. जनजातीय अधिकार और संवैधानिक संरक्षण भारत की जनजातियों के अपने प्रथागत कानून (Customary Laws) हैं। UCC उनके अधिकारों और पहचान को खतरे में डाल सकता है। संवैधानिक सुरक्षा: 5वीं और 6वीं अनुसूची: असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों को विशेष स्वायत्तता प्राप्त है। अनुच्छेद 371A (नागालैंड) और 371G (मिजोरम): संसद का कोई भी कानून इनके प्रथागत कानूनों में तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकता जब तक कि वहां की राज्य विधानसभा इसकी अनुमति न दे। D. विधि आयोग (Law Commission) का रुख 21वां विधि आयोग (2018 – जस्टिस बीएस चौहान): स्पष्ट रूप से कहा कि इस चरण में UCC “न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय”। आयोग ने कहा कि विविधता का उत्सव मनाना चाहिए, और UCC के बजाय व्यक्तिगत कानूनों के भीतर मौजूद भेदभावपूर्ण प्रथाओं को संशोधित किया जाना चाहिए। 22वां विधि आयोग (वर्तमान): इसने इस मुद्दे की संवेदनशीलता को देखते हुए नए सिरे से जनता और हितधारकों से विचार मांगे हैं। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय (Landmark Judicial Pronouncements) वाद वर्ष मुख्य महत्व / सार शाह बानो बेगम मामला 1985 SC ने CrPC की धारा 125 के तहत तलाकशुदा मुस्लिम महिला के भरण-पोषण के अधिकार को बरकरार रखा और कहा कि UCC राष्ट्रीय एकीकरण में मदद करेगा। सरला मुद्गल मामला 1995 कोर्ट ने फैसला सुनाया कि पहली शादी को भंग किए बिना केवल दूसरी शादी के लिए इस्लाम अपनाना अवैध है। केंद्र से अनुच्छेद 44 पर काम करने का अनुरोध किया। शायरा बानो मामला 2017 सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को असंवैधानिक घोषित किया और मनमाने व्यक्तिगत कानूनों पर लैंगिक न्याय को प्राथमिकता दी। ‘एकरूपता’ बनाम ‘समानता’ (Uniformity vs Equality) UCC का वास्तविक उद्देश्य

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22 may 2026 daily current affairs in hindi

लद्दाख की विधायिका और संवैधानिक सुरक्षा उपायों की माँग मुख्य मुद्दा केंद्रीय गृह मंत्रालय का तर्क है कि लद्दाख को निम्नलिखित के बजाय अधिक जिलों की आवश्यकता है: एक विधायिका (विधानमंडल) छठी अनुसूची का संरक्षण सरकार निम्नलिखित कारणों का हवाला देती है: विरल (कम) आबादी रणनीतिक संवेदनशीलता केंद्र पर वित्तीय निर्भरता लेख का मुख्य तर्क प्रशासनिक विकेंद्रीकरण कभी भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व का स्थान नहीं ले सकता। जिले प्रशासन के साधन मात्र हैं, जबकि विधायिकाएँ लोकतांत्रिक आवाज़ और नीति निर्माण की शक्ति प्रदान करती हैं। जिलों और विधायिका के बीच अंतर जिला प्रशासन नीतियों को लागू करता है। नौकरशाही (ब्यूरोक्रेसी) के प्रति जवाबदेह होता है। केवल शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से पहुँचाने तक सीमित है। विधायिका कानून और नीतियां बनाती है। निम्नलिखित की रक्षा करती है: भूमि अधिकार जनसांख्यिकीय सुरक्षा उपाय पारिस्थितिक (पर्यावरणीय) हित रोजगार की प्राथमिकताएं सांस्कृतिक स्वायत्तता सीधे नागरिकों के प्रति जवाबदेह होती है। छठी अनुसूची की माँग वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्त होने और केंद्र शासित प्रदेश (UT) का दर्जा दिए जाने के बाद, कथित तौर पर निम्नलिखित के लिए राजनीतिक आश्वासन दिए गए थे: संवैधानिक सुरक्षा उपाय छठी अनुसूची का संरक्षण पूर्वोत्तर राज्यों के साथ तुलना लेख का तर्क है कि रणनीतिक संवेदनशीलता और वित्तीय निर्भरता ने देश में अन्य जगहों पर पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने से नहीं रोका: राज्य राज्य का दर्जा मिलने का वर्ष मुख्य बिंदु नागालैंड 1963 कम आबादी के बावजूद राज्य का दर्जा दिया गया। सिक्किम 1975 रणनीतिक रूप से संवेदनशील हिमालयी राज्य। मिजोरम 1987 प्रतिनिधित्व के माध्यम से सीमावर्ती क्षेत्रों का एकीकरण। अरुणाचल प्रदेश 1987 सीमा की संवेदनशीलता को ही सशक्तिकरण का कारण माना गया।   तर्क: भारत ने सीमावर्ती क्षेत्रों को केवल नौकरशाही या सैन्य उपस्थिति के माध्यम से नहीं, बल्कि राजनीतिक समावेश के माध्यम से एकीकृत किया है। वित्तीय निर्भरता का तर्क भारत के कई राज्य केंद्रीय हस्तांतरण (फंड) पर अत्यधिक निर्भर हैं, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं: बिहार असम पूर्वोत्तर के राज्य उत्तर प्रदेश इसलिए, आर्थिक आत्मनिर्भरता कभी भी लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के लिए कोई शर्त नहीं रही है। नवीकरणीय ऊर्जा और संसाधनों से जुड़ी चिंताएं लद्दाख भारत की नवीकरणीय ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी) की महत्वाकांक्षाओं का केंद्र है। चांगथांग के पांग क्षेत्र की परियोजनाएं लगभग 13 गीगावाट (GW) बिजली पैदा कर सकती हैं। मुख्य चिंताएं: भूमि अधिकार चांगपा चरवाहों के चरागाह (चरने के) अधिकार खनन और पर्यटन का विस्तार पारिस्थितिक स्थिरता (पर्यावरणीय संतुलन) स्थानीय रोजगार और रॉयल्टी लेख का तर्क है कि ऐसे मुद्दों के लिए निर्वाचित प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है, न कि केवल नौकरशाही प्रशासन की। व्यापक संवैधानिक तर्क भारत का संघवाद छठी अनुसूची जैसी विशिष्ट व्यवस्थाओं के माध्यम से विविधता को समाहित करता है। लेख का तर्क है कि: एक समान शासन हमेशा न्यायसंगत नहीं होता। लद्दाख पूर्ण लोकतांत्रिक समावेश चाहता है, अलगाव नहीं। निष्कर्ष यह बहस मूल रूप से निम्नलिखित के बारे में है: राजनीतिक स्वायत्तता (एजेंसी); लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व सीमावर्ती आबादी पर विश्वास राष्ट्रीय सुरक्षा और संवैधानिक सशक्तिकरण के बीच संतुलन लेख विधायी प्रतिनिधित्व और संवैधानिक सुरक्षा उपायों को लद्दाख के दीर्घकालिक एकीकरण और सम्मान के लिए आवश्यक मानता है। जाति जनगणना और जनगणना 2027 सर्वोच्च न्यायालय का रुख भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने जनगणना 2027 में जातिगत गणना को रोकने की मांग करने वाली एक याचिका को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि सरकारों को यह पता होना चाहिए कि कितने लोग पिछड़े हैं और उन्हें कल्याणकारी सहायता की आवश्यकता है। सरकार की नीति में बदलाव अप्रैल 2025 में, भारत सरकार ने जनगणना 2027 के साथ-साथ जातिगत गणना कराने की घोषणा की। यह वर्ष 1931 के बाद से पहली देशव्यापी जातिगत गणना है। ऐतिहासिक संदर्भ स्वतंत्रता के बाद, सरकारों ने जातिविहीन समाज को बढ़ावा देने के लिए पूर्ण जातिगत गणना से परहेज किया। साथ ही, निम्नलिखित के लिए जातीय पहचान को बनाए रखा गया: आरक्षण राजनीतिक प्रतिनिधित्व कल्याणकारी नीतियां इसने एक लंबे समय से चला आ रहा विरोधाभास पैदा किया: सामाजिक रूप से जाति को समाप्त करने का प्रयास। प्रशासनिक रूप से जाति का निरंतर उपयोग। जनगणना 2027 का महत्व जनगणना मूल रूप से 2021 में होनी थी, लेकिन निम्नलिखित कारणों से इसमें देरी हुई: कोविड-19 (COVID-19) महामारी लॉजिस्टिक (प्रबंधन संबंधी) मुद्दे जातिगत गणना दूसरे चरण में होगी: प्रत्येक व्यक्ति अपनी जातिगत पहचान दर्ज कराएगा। इससे पहले की जनगणनाओं में मुख्य रूप से केवल अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की स्थिति ही दर्ज की जाती थी। पिछले प्रयासों में समस्याएं वर्ष 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) को बड़े मुद्दों का सामना करना पड़ा था: 46 लाख से अधिक जातियों के नाम दर्ज हो गए। डेटा में लगभग 8 करोड़ त्रुटियां (गलतियाँ) पाई गईं। परिणाम: डेटासेट अविश्वसनीय हो गया। अधिकांश निष्कर्षों को कभी भी पूरी तरह से प्रकाशित नहीं किया गया। वर्तमान चुनौतियाँ सरकार को निम्नलिखित विकसित करना होगा: एक मानकीकृत (स्टैंडर्ड) जाति वर्गीकरण सटीक कार्यप्रणाली (मेथोडोलॉजी) त्रुटिहीन डिजिटल प्रोसेसिंग जाति जनगणना को लेकर बहस पक्ष में तर्क कल्याणकारी योजनाओं का बेहतर लक्षित (टार्गेटेड) कार्यान्वयन। प्रतिनिधित्व में सुधार। अधिक सटीक सामाजिक-आर्थिक योजना। विपक्ष में तर्क यह जातिगत पहचान को और मजबूत कर सकती है और जाति उन्मूलन के लक्ष्य में बाधा बन सकती है। जातिगत आधार पर राजनीतिक लामबंदी (पोलराइजेशन) का जोखिम। व्यापक संवैधानिक प्रश्न यदि सामाजिक-आर्थिक संकेतकों के साथ जोड़ा जाए, तो जाति जनगणना कल्याण और प्रतिनिधित्व के लिए उपयोगी हो सकती है। इसके साथ ही, जाति का उन्मूलन एक दीर्घकालिक संवैधानिक लक्ष्य बना रहना चाहिए। नागरिकों के पास खुद को जातिविहीन (बिना किसी जाति के) घोषित करने का विकल्प भी होना चाहिए। बीसीसीआई और आरटीआई (RTI) बहस भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) एक निजी, व्यावसायिक रूप से संचालित संस्था है जिसे कोई प्रत्यक्ष सरकारी फंडिंग नहीं मिलता है। बीसीसीआई का तर्क है कि सूचना के अधिकार (RTI) के तहत खुलासे से उसकी प्रतिस्पर्धी जानकारी उजागर हो सकती है, प्रशासनिक लचीलापन कम हो सकता है और राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ सकता है। बीसीसीआई के पास पहले से ही भ्रष्टाचार विरोधी तंत्र मौजूद हैं और वह न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है। पारदर्शिता की मांग क्यों बनी हुई है? बीसीसीआई का भारत में क्रिकेट पर प्रभावी रूप से एकाधिकार (मोनोपॉली) है। इसे निम्नलिखित का लाभ मिलता है: राष्ट्रीय प्रतीकवाद (देश का प्रतिनिधित्व) मैचों के दौरान पुलिस की

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डेली कर्रेंट अफेयर्स

SC ने जनगणना में जाति गणना के खिलाफ याचिका खारिज की जनगणना 2027 में जातिगत गणना पर सर्वोच्च न्यायालय  भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि सरकार द्वारा जनगणना 2027 में जातिगत गणना को शामिल किए जाने में कुछ भी गलत नहीं है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि सरकारों को पिछड़े समुदायों और कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों की संख्या का पता होना चाहिए; यह नीतिगत मामला है। न्यायालय ने यह तय करने से इनकार कर दिया कि जातिगत गणना को जनगणना का हिस्सा होना चाहिए या नहीं, और स्पष्ट किया कि यह पूरी तरह से नीतिगत दायरे (पॉलिसी डोमेन) के अंतर्गत आता है। सुधाकर गुमुला द्वारा दायर याचिका में तर्क दिया गया था कि राजनेताओं और कॉर्पोरेट संस्थाओं द्वारा जातिगत डेटा का दुरुपयोग किया जा सकता है और इसका कोई ठोस औचित्य नहीं है। न्यायालय ने जातिगत गणना के खिलाफ दायर इस याचिका को खारिज कर दिया। जनगणना 2027 राजनीतिक मामलों की कैबिनेट समिति ने अप्रैल 2025 में जातिगत गणना को मंजूरी दी थी। इससे पहले, जनगणना 2011 तक, केवल अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) की ही व्यवस्थित रूप से गणना की जाती थी। जातिगत डेटा जनगणना 2027 के दूसरे चरण के दौरान एकत्र किया जाएगा। जनगणना के दो चरण मकान सूचीकरण प्रक्रिया (HLO): आवास की स्थिति, संपत्ति, सुविधाएं आदि। जनसंख्या गणना: जनसांख्यिकीय (demographic), सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक और जाति से जुड़े विवरण। अन्य बिंदु पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने जातिगत डेटा को “एकीकरण का एक साधन” बताया और इसकी तुलना समाज के एमआरआई (MRI) से की। आखिरी बार देशव्यापी व्यापक जातिगत जनगणना औपनिवेशिक भारत में 1931 में आयोजित की गई थी। भारत और इटली संबंध: ‘विशेष रणनीतिक साझेदारी’ भारत- इटली संबंध भारत-इटली संबंधों को अपग्रेड (उन्नत) करके ‘विशेष रणनीतिक साझेदारी’ (स्पेशल स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप) का दर्जा दिया गया है। सहयोग के क्षेत्र निम्नलिखित क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा दिया जाएगा: व्यापार और प्रौद्योगिकी (ट्रेड एंड टेक्नोलॉजी) रक्षा (डिफेंस) स्वच्छ ऊर्जा और नवाचार (क्लीन एनर्जी एंड इनोवेशन) सुरक्षित माध्यमों से कुशल और अकुशल श्रमिकों की गतिशीलता (मोबिलिटी) हस्ताक्षर किए गए प्रमुख समझौते डिफेंस इंडस्ट्रियल रोड मैप (रक्षा औद्योगिक रोड मैप) महत्वपूर्ण खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) में सहयोग पर समझौता ज्ञापन (MoU) इटली की ‘गार्डिया डी विनान्ज़ा’ और भारत के ‘प्रवर्तन निदेशालय’ (ED) के बीच समझौता दोनों देशों के संस्थानों और मंत्रालयों को जोड़ने वाला कृषि और कृषि अनुसंधान पर समझौता रणनीतिक और वैश्विक मुद्दे दोनों देशों ने ‘यूएनसीएलओएस’ (UNCLOS) के अनुरूप एक स्वतंत्र, खुले, शांतिपूर्ण और समृद्ध हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) क्षेत्र का समर्थन किया। हॉर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज) से होकर नौवहन की स्वतंत्रता और अबाधित वैश्विक प्रवाह का आह्वान किया। अफ्रीका सहयोग भारत और इटली ‘भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन-4’ से पहले अफ्रीकी भागीदारों के साथ त्रिपक्षीय परियोजनाओं पर सहमत हुए। सहयोग के क्षेत्र: डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) कृषि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचा नवीकरणीय ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी) इसे इटली की ‘मैट्टेई योजना’ और भारत की ‘अफ्रीका विकास साझेदारी’ से जोड़ा गया है। ऊपरी गंगा क्षेत्र में कोई नई जलविद्युत परियोजना नहीं ऊपरी गंगा बेसिन में जलविद्युत परियोजनाओं पर केंद्र का रुख केंद्र सरकार ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) को बताया कि “उत्तराखंड राज्य में गंगा नदी के ऊपरी हिस्सों में स्थित अलकनंदा और भागीरथी नदी बेसिनों में किसी भी अन्य नए जलविद्युत प्रोजेक्ट को अनुमति देने के पक्ष में नहीं।”। पर्यावरण, जल शक्ति और बिजली (विद्युत) मंत्रालयों ने एक संयुक्त हलफनामा (अफेडेविट) दायर कर इस प्रतिबंधात्मक दृष्टिकोण का समर्थन किया है। केवल वही सात परियोजनाएं जारी रहेंगी जो पहले से ही चालू हैं या काफी हद तक पूरी हो चुकी हैं। इससे पहले, बिजली मंत्रालय ने आठ अतिरिक्त परियोजनाओं (2024) का समर्थन किया था। स्वीकृत परियोजनाएं इन सात परियोजनाओं की कुल क्षमता 2,150 मेगावाट (MW) से अधिक है: 1,000 मेगावाट की टिहरी पंप्ड स्टोरेज परियोजना 520 मेगावाट की तपोवन विष्णुगाड परियोजना 444 मेगावाट की विष्णुगाड पीपलकोटी परियोजना 99 मेगावाट की सिंगोली भटवारी परियोजना 76 मेगावाट की फाटा ब्युंग परियोजना मदमहेश्वर परियोजना कालीगंगा-II परियोजना इनमें से चार परियोजनाएं चालू हो चुकी हैं; तीन परियोजनाएं 74 से 80 प्रतिशत तक पूरी हो चुकी हैं। सरकार ने भारी निवेश, निर्माण कार्य के उन्नत चरण में होने और भागीरथी पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (इको-सेंसिटिव जोन) से बाहर होने के कारण इन्हें जारी रखने को सही ठहराया। नई परियोजनाओं को खारिज करने के कारण एक के बाद एक लगातार बांधों का संचयी प्रभाव (क्युमुलेटिव इम्पैक्ट) हिमालय क्षेत्र की भूकंपीय संवेदनशीलता (सेसमिक फ्रैजिलिटी) बार-बार होने वाली आपदाएं: 2013 की केदारनाथ बाढ़ 2021 की ऋषिगंगा बाढ़ 2025 की धराली आकस्मिक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) सर्वोच्च न्यायालय की समिति 2024 में, न्यायालय ने कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। इसने 21 प्रस्तावित परियोजनाओं की समीक्षा की और पांच परियोजनाओं को शॉर्टलिस्ट (चयनित) किया था: बोवला नंदप्रयाग देवसारी भ्युंडार गंगा झालाकोटी उरगम-II केंद्र सरकार ने अंततः इन पांच परियोजनाओं को भी खारिज कर दिया। पृष्ठभूमि (बैकग्राउंड) यह मामला 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद शुरू हुआ था, जिसमें 5,000 से अधिक लोगों की जान चली गई थी। रवि चोपड़ा (2014) के नेतृत्व वाली विशेषज्ञ संस्था-I (Expert Body-I) ने 24 में से 23 परियोजनाओं को पर्यावरण के लिए हानिकारक पाया था। विनोद तारे के नेतृत्व वाले एक अन्य पैनल ने भी कई परियोजनाओं का विरोध किया था। बी.पी. दास (2020) के नेतृत्व वाली विशेषज्ञ संस्था-II ने अधिक उदार दृष्टिकोण की सिफारिश की थी और संशोधनों के साथ 26 परियोजनाओं का समर्थन किया था। हालाँकि, केंद्र सरकार ने केवल सात परियोजनाओं को ही स्वीकार किया। यूएपीए (UAPA) के तहत जमानत पर सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) मुख्य मुद्दा गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम [यूएपीए] की धारा 43-D(5) के तहत यदि आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया (prima facie) मामला बनता है, तो जमानत मिलना मुश्किल हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप अक्सर बिना मुकदमे के लंबे समय तक कारावास भुगतना पड़ता है। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय ‘सैयद इफ्तिखार अंद्राबी बनाम एनआईए, जम्मू’ मामले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अंद्राबी को 5 साल और 9 महीने से अधिक की प्री-ट्रायल हिरासत (मुकदमे से पहले की जेल) के बाद जमानत दे दी। न्यायालय ने पुन: पुष्टि की: यूएपीए के मामलों में भी जमानत ही नियम होना चाहिए (और

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तीसरा भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन         पृष्ठभूमि (Background) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में भाग लिया। शामिल नॉर्डिक देश: डेनमार्क फिनलैंड आइसलैंड नॉर्वे स्वीडन द्विपक्षीय/क्षेत्रीय साझेदारी का उन्नयन (Upgrade) भारत और नॉर्डिक देशों ने अपने संबंधों को “हरित प्रौद्योगिकी और नवाचार रणनीतिक साझेदारी” (Green Technology and Innovation Strategic Partnership) के रूप में उन्नत करने का निर्णय लिया। सहयोग के क्षेत्र (Areas of Cooperation) सतत ऊर्जा (Sustainable Energy) समुद्री सहयोग (Maritime Cooperation) आर्कटिक / ध्रुवीय अनुसंधान (Arctic / Polar Research) साझा मूल्यों पर बल (Shared Values Highlighted) प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि”लोकतंत्र, कानून के शासन और बहुपक्षवाद के प्रति हमारी साझा प्रतिबद्धता हमें स्वाभाविक भागीदार बनाती है। प्राचीन डीएनए (DNA) और मानव विकास हजारों साल पहले रहने और मरने वाले लोग अपनी अस्थियों के अवशेष एक विरासत के रूप में छोड़ गए हैं। हाल के वर्षों में, वैज्ञानिकों ने इन अवशेषों से बड़ी संख्या में डीएनए (DNA) को अलग करके उनकी सीक्वेंसिंग (अनुक्रमण) की है। अमेरिका के हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में शोधकर्ताओं के एक दल ने पश्चिमी यूरेशिया (जिसमें यूरोप, रूस, मध्य एशिया, मध्य पूर्व और ईरान शामिल हैं) के 15,836 प्राचीन डीएनए अनुक्रमों की तुलना उन्हीं देशों के 6,438 आधुनिक लोगों के अनुक्रमों से की है। मुख्य निष्कर्ष (Key Findings) प्राकृतिक चयन (Natural Selection): तुलना से यह सामने आया कि पिछले 8,000 से 10,000 वर्षों (होलोसीन युग) के दौरान कई जीनों के वेरिएंट (समान रूप) की आवृत्ति (frequency) में निरंतर उतार-चढ़ाव आया है। कंप्यूटर सिमुलेशन और सांख्यिकीय तरीकों से यह सिद्ध हुआ है कि यह बदलाव आनुवंशिक विचलन (genetic drift) या जनसंख्या प्रवासन (migration) के बजाय प्राकृतिक चयन के कारण हुआ है। कार्बन डेटिंग (Carbon Dating): आयु निर्धारण की तकनीक वैज्ञानिक किसी कंकाल की आयु का पता लगाने के लिए उसकी हड्डियों और दांतों में कार्बन-14 (रेडियोधर्मी कार्बन) की सापेक्ष मात्रा मापते हैं। निर्माण: ऊपरी वायुमंडल में जब ब्रह्मांडीय किरणें (cosmic rays) नाइट्रोजन परमाणुओं से टकराती हैं, तो कार्बन-14 का निर्माण होता है। इसके रासायनिक गुण गैर-रेडियोधर्मी आइसोटोप (कार्बन-12 और कार्बन-13) के समान होते हैं। प्रक्रिया: जीवित रहने तक शरीर में कार्बन-14 का अनुपात वायुमंडल और भोजन (पौधों/पशुओं) के समान रहता है। मृत्यु के बाद यह स्तर गिरने लगता है क्योंकि रेडियोधर्मी क्षय (decay) के कारण यह पुनः नाइट्रोजन में बदलने लगता है। अर्ध-आयु (Half-life): कार्बन-14 की अर्ध-आयु 5,730 वर्ष होती है (यानी हर 5,730 वर्ष में इसकी मात्रा आधी हो जाती है)। 50,000 वर्षों के बाद, हड्डियों में इसकी मात्रा मृत्यु के समय की तुलना में केवल 2,000वां हिस्सा रह जाती है। विशिष्ट जीनों और लक्षणों का विश्लेषण रक्त समूह (Blood Types) मानव शरीर में ABO जीन की दो प्रतियां होती हैं, जो तीन वेरिएंट (A, B, और O) में आती हैं। शोध में पाया गया कि पिछले 6,000 वर्षों में पश्चिमी यूरेशियाई लोगों में B वेरिएंट की आवृत्ति बढ़ी है, जबकि A वेरिएंट में कमी आई है। ऐसा संभवतः बदलते रोगजनकों (pathogens) के प्रभाव से निपटने के लिए एक इष्टतम संतुलन बनाए रखने के कारण हुआ है। ग्लूटेन संवेदनशीलता और सीलिएक रोग (Coeliac Disease) HLA-DQB1 जीन का एक वेरिएंट लोगों को सीलिएक रोग के प्रति संवेदनशील बनाता है। इसमें गेहूं, जौ और राई में मौजूद ‘गूल्टेन’ के कारण प्रतिरक्षा प्रणाली छोटी आंत पर हमला कर देती है, जिससे उल्टी और पेट दर्द जैसी समस्याएं होती हैं। पिछले 4,000 वर्षों में इस रोगजनक वेरिएंट की आवृत्ति 0% से बढ़कर 20% हो गई है। हालांकि कृषि की शुरुआत 10,000 वर्ष पहले हुई थी, वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि यह वृद्धि केवल या मुख्य रूप से कृषि के उदय के कारण नहीं थी; इसके वास्तविक कारण अभी भी अज्ञात हैं। त्वचा का रंग और बाल (Skin and Hair Pigmentation) लगभग 8,000 वर्ष पहले, मनुष्यों ने उन जीन वेरिएंट्स का चयन करना शुरू किया जो हल्की त्वचा (lighter skin tones) और रंगीन बाल पैदा करते हैं। यह कम धूप वाले क्षेत्रों में विटामिन डी (Vitamin D) के संश्लेषण को बढ़ाने के लिए एक अनुकूलन (adaptation) था, विशेष रूप से उन किसानों के लिए जिनके आहार में इसकी कमी थी। प्राचीन जीन और आधुनिक लक्षण (Ancient Genes, Modern Traits) एचआईवी (HIV) प्रतिरोधक क्षमता: CCR5 जीन के Delta32 वेरिएंट की दो प्रतियां होने से व्यक्ति HIV-1 संक्रमण के प्रति पूरी तरह प्रतिरोधी हो जाता है। पश्चिमी यूरेशियाई लोगों में इस वेरिएंट की आवृत्ति 6,000 से 2,000 वर्ष पहले 2% से बढ़कर 8% हो गई थी। चूंकि HIV की उत्पत्ति केवल 20वीं सदी की शुरुआत में हुई थी, इसलिए यह स्पष्ट है कि अतीत में किसी अन्य अज्ञात प्राचीन रोगजनक (pathogen) के कारण यह चयन हुआ होगा। धूम्रपान (Smoking): यूरेशिया में धूम्रपान तब तक अज्ञात था जब तक कि क्रिस्टोफर कोलंबस 600 वर्ष से भी कम समय पहले अमेरिका से तंबाकू नहीं लाया था। इसके बावजूद, अध्ययन में पाया गया कि आज धूम्रपान की प्रवृत्ति से जुड़े जीन वेरिएंट्स के खिलाफ उस प्राचीन काल में भी प्राकृतिक चयन (selected against) काम कर रहा था। दक्षिण एशियाई (भारतीय) संदर्भ और भविष्य की आवश्यकता दक्षिण एशियाई आनुवंशिक संरचना: दक्षिण एशियाई (भारतीय) लोगों में मुख्य रूप से निम्नलिखित पूर्वजों का आनुवंशिक योगदान है: ईरानी नवपाषाण काल के किसान (Iranian Neolithic Farmers) और पश्चिमी स्टेप चरवाहे (Western steppe herders)। स्वदेशी पूर्वी यूरेशियाई पूर्वज, जिनमें प्राचीन पूर्वज दक्षिण भारतीय (Ancient Ancestral South Indians) शामिल हैं। पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशियाई तथा ऑस्ट्रेलियाई (Australasian) पूर्वज। मंगल ग्रह पर ‘ज्वान-वुल्फ प्रभाव’ (Zwan-Wolf Effect) की खोज ज्वान-वुल्फ प्रभाव (Zwan-Wolf Effect) क्या है? सौर पवन (Solar wind): सौर पवन सूर्य से बाहर की ओर बहने वाले आवेशित कणों (charged particles) की एक धारा है। जब यह सौर पवन किसी ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र (magnetic field) के निकट पहुँचती है, तो यह चुंबकीय सीमाओं के पास संकुचित (compressed) हो जाती है। इस संकुचन से एक दबाव प्रवणता पैदा होती है, जो आवेशित कणों को चुंबकीय क्षेत्र के साथ-साथ मुख्य धारा से दूर धकेल देती है। इसके परिणामस्वरूप, मुख्य धारा के निकट एक ऐसा क्षेत्र बनता है जहाँ आवेशित कणों का घनत्व (density) कम हो जाता है। इसी घटना को ‘ज्वान-वुल्फ प्रभाव’ कहा जाता है। अनुसंधान और नवीन खोज शोधकर्ताओं ने नासा (NASA) के मावेन (MAVEN) अंतरिक्ष यान का उपयोग करके मंगल ग्रह पर ‘ज्वान-वुल्फ प्रभाव’

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2 September 2025 Current Affairs

  Topic : भारत का कैंसर मैप: एक विश्लेषण     चर्चा में क्यों :  विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, “वर्तमान में 30% से 50% कैंसर को जोखिम कारकों से बचाव और प्रभावी रोकथाम रणनीतियों के माध्यम से रोका जा सकता है।” भारत में कैंसर की व्यापकता पर आधारित एक हालिया रिपोर्ट से यह सामने आया है कि कैंसर एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है, जिसमें क्षेत्रीय असमानताएं और सामाजिक-आर्थिक कारण प्रमुख भूमिका निभाते हैं। UPSC पाठ्यक्रम: प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय महत्व की समसामयिक घटनाएँ। मुख्य परीक्षा: सामान्य अध्ययन II, III: स्वास्थ्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित मुद्दे- विकास और उनके अनुप्रयोग पृष्ठभूमि भारत में कैंसर की निगरानी के लिए ICMR–नेशनल सेंटर फॉर डिज़ीज़ इन्फ़ॉर्मेटिक्स एंड रिसर्च (NCDIR) द्वारा कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम संचालित किया जाता है।  इस कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 1981 में की गई थी और इसका उद्देश्य कैंसर की घटनाओं, मृत्यु दर और उपचार की सफलता का आकलन करना है। संविधान के अनुसार जन स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है, किंतु अनुच्छेद 47 के अंतर्गत राज्य को पोषण और जनस्वास्थ्य सुधार की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है।  अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट ने स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार माना है।  इस प्रकार कैंसर नियंत्रण केंद्र और राज्यों के बीच सहयोगात्मक संघवाद (Cooperative Federalism) का विषय है। 1. भारत में कैंसर का मौजूदा परिदृश्य भारत में कैंसर के मामलों पर आधारित 43 कैंसर रजिस्ट्री के विश्लेषण से यह सामने आया है कि किसी व्यक्ति के जीवनकाल में कैंसर विकसित होने का जोखिम लगभग 11 प्रतिशत है।  वर्ष 2024 में अनुमानित 15.6 लाख नए कैंसर मामलों और लगभग 8.74 लाख मौतों की सूचना दर्ज की गई।  ये रजिस्ट्री देश की 10 से 18 प्रतिशत आबादी को कवर करती हैं और 23 राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों में संचालित होती हैं। 2. 2015–2019 का कैंसर डेटा और रुझान साल 2015 से 2019 के बीच एकत्र किए गए आंकड़ों में लगभग 7.08 लाख कैंसर मामलों और 2.06 लाख मौतों को दर्ज किया गया।  इस अध्ययन को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) दिल्ली, टाटा मेमोरियल और अड्यार कैंसर संस्थान जैसे प्रमुख शोध संस्थानों के विशेषज्ञों ने पूरा किया।  कोविड-19 महामारी के प्रभाव के कारण वर्ष 2020 के आंकड़े इसमें शामिल नहीं किए गए। 3. लिंग आधारित असमानताएँ भारत में महिलाओं में कैंसर के 51.1 प्रतिशत मामले दर्ज किए गए, लेकिन मौतों का प्रतिशत केवल 45 रहा।  इसका कारण यह है कि महिलाओं में पाए जाने वाले प्रमुख कैंसर जैसे स्तन और गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर आसानी से पहचाने और इलाज किए जा सकते हैं।  इसके विपरीत पुरुषों में सामान्य कैंसर जैसे फेफड़े और पेट का कैंसर देर से पकड़ में आते हैं और इनका परिणाम अपेक्षाकृत अधिक घातक होता है। 4. पुरुषों में मुँह का कैंसर पुरुषों में अब मुँह का कैंसर सबसे सामान्य कैंसर बन चुका है।  यह फेफड़ों के कैंसर से भी अधिक पाया जा रहा है। तम्बाकू सेवन में कमी (2009–10 में 34.6% से घटकर 2016–17 में 28.6% तक) आने के बावजूद मुँह के कैंसर में वृद्धि देखी जा रही है।  इसका कारण तम्बाकू के प्रभाव का लंबी अवधि में सामने आना और शराब जैसे अन्य जोखिम कारक हैं। 5. पूर्वोत्तर भारत : कैंसर का हॉटस्पॉट पूर्वोत्तर भारत, विशेषकर मिज़ोरम, देश का कैंसर हॉटस्पॉट है।  यहाँ पुरुषों में जीवनकाल का जोखिम 21.1 प्रतिशत और महिलाओं में 18.9 प्रतिशत तक दर्ज किया गया है।  इसके पीछे उच्च तम्बाकू सेवन, अस्वस्थ आहार (फर्मेंटेड मांस, धूम्रित भोजन, अत्यधिक मसाले और गर्म पेय) तथा मानव पैपिलोमा वायरस (HPV), Helicobacter pylori और हेपेटाइटिस जैसी संक्रामक बीमारियों की अधिकता जिम्मेदार है। 6. कैंसर का भौगोलिक वितरण कैंसर का वितरण भारत के विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार से दिखाई देता है। हैदराबाद में स्तन कैंसर की दर सबसे अधिक 54 प्रति 1,00,000 है। ऐज़ॉल में गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर 27.1 प्रति 1,00,000 पर सबसे अधिक है। श्रीनगर में पुरुषों में फेफड़ों का कैंसर 39.5 प्रति 1,00,000 पाया गया जबकि महिलाओं में ऐज़ॉल में इसकी दर 33.7 है। अहमदाबाद में पुरुषों में मुँह का कैंसर सबसे अधिक 33.6 है, जबकि महिलाओं में ईस्ट खासी हिल्स में यह दर 13.6 पाई गई। श्रीनगर में प्रोस्टेट कैंसर की दर 12.7 प्रति 1,00,000 दर्ज की गई। कैंसर क्या है? कैंसर बीमारियों का एक व्यापक समूह है,जो शरीर में कोशिकाओं के अनियंत्रित विकास और विभाजन के कारण होने वाली बीमारी है।  यह तब होता है जब सामान्य कोशिकाओं के DNA में उत्परिवर्तन होता है, जिससे अनियंत्रित कोशिका विभाजन होता है।   कैंसर के 100 से अधिक प्रकार हैं, और वे शरीर के लगभग किसी भी भाग में हो सकते हैं। ट्यूमर: कैंसर कोशिकाओं का एक समूह ट्यूमर बना सकता है, जो सौम्य (गैर-कैंसरयुक्त) या घातक (कैंसरयुक्त) हो सकता है। मेटास्टेसिस: घातक ट्यूमर मूल स्थान से शरीर के अन्य क्षेत्रों में फैल सकता है। कैंसर के प्राथमिक कारण कैंसर के विकास में कई जोखिम कारक योगदान करते हैं, लेकिन सटीक कारण अक्सर अज्ञात रहता है। कुछ प्राथमिक कारणों में शामिल हैं: तम्बाकू का उपयोग: धूम्रपान सबसे महत्वपूर्ण जोखिम कारक है, विशेष रूप से फेफड़े, मुँह, गले और एसोफैजियल कैंसर के लिए। रेडिएशन एक्सपोजर:  एक्स-रे, रेडॉन गैस और पराबैंगनी किरणों के संपर्क में आना शामिल है, जो DNA  को नुकसान पहुंचा सकते हैं। संक्रमण: मानव पेपिलोमावायरस (HPV) और हेपेटाइटिस B और C जैसे वायरस गर्भाशय ग्रीवा और यकृत कैंसर जैसे कैंसर का कारण बन सकते हैं। आनुवंशिकी: विरासत में मिली आनुवंशिक उत्परिवर्तन, जैसे कि BRCA1 और BRCA2 जीन, स्तन और डिम्बग्रंथि के कैंसर के जोखिम को बढ़ाते हैं। पर्यावरणीय कारक: रसायनों (एस्बेस्टस, बेंजीन) और प्रदूषकों के संपर्क में आने से कैंसर हो सकता है। जीवनशैली कारक: खराब आहार, शारीरिक निष्क्रियता, शराब का सेवन और मोटापा कई प्रकार के कैंसर से जुड़े हैं। आयु: मस्तिष्क ट्यूमर वृद्ध वयस्कों में अधिक आम है, लेकिन यह किसी भी उम्र में हो सकता है। कुछ प्रकार, जैसे मेडुलोब्लास्टोमा, बच्चों में अधिक आम हैं। ब्रेन कैंसर के बारे में         ब्रेन कैंसर का मतलब है मस्तिष्क में असामान्य कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि, जिससे ट्यूमर का निर्माण होता है।  ये ट्यूमर या तो प्राथमिक (मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले) या द्वितीयक (मेटास्टेटिक, शरीर के अन्य भागों से फैलने वाले) हो सकते हैं।  प्राथमिक ब्रेन कैंसर मस्तिष्क की

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5 August 2025 Current Affairs

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना में बड़ा बदलाव: बटालियन स्तर पर ड्रोन तैनात   चर्चा में क्यों : मई 2025 में पाहलगाम आतंकी हमले के बाद चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर से मिली सीख के आधार पर भारतीय सेना अब संगठनात्मक पुनर्गठन करने जा रही है। इसमें ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम को बटालियन स्तर पर मानक हथियार बनाना शामिल है।  इसमें नई लाइट कमांडो बटालियन, रुद्र ब्रिगेड, आधुनिक आर्टिलरी यूनिट और विशेष ड्रोन यूनिट भी बनाई जाएंगी। UPSC पाठ्यक्रम: मुख्य विषय: आईटी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टेक्नोलॉजी, जैव-टेक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित मुद्दों के क्षेत्र में जागरूकता। ड्रोन क्या हैं? ड्रोन, जिन्हें मानव रहित हवाई वाहन (UAV) के रूप में भी जाना जाता है, वे विमान हैं जो बिना किसी मानव पायलट के संचालित हो सकते हैं।  उन्हें या तो दूर से नियंत्रित किया जा सकता है या स्वायत्त रूप से उड़ाया जा सकता है जब उनकी उड़ान योजनाओं को GPS और सॉफ़्टवेयर-नियंत्रित सिस्टम का उपयोग करके प्रोग्राम किया जाता है। ड्रोन का वर्गीकरण ड्रोन नियम, 2021 के तहत ड्रोन का वर्गीकरण उनके वजन के आधार पर किया गया है। 1. नैनो ड्रोन :  वजन सीमा: 250 ग्राम या उससे कम। मुख्य विशेषताएँ: ये सबसे छोटे ड्रोन हैं, हल्के वजन के हैं और अक्सर शौकिया उड़ान और फ़ोटोग्राफ़ी जैसे मनोरंजक उद्देश्यों के लिए उपयोग किए जाते हैं। नियमन:  कम जोखिम और छोटे आकार की वजह से, इन पर न्यूनतम नियामक शर्तें लागू होती हैं। 2. माइक्रो ड्रोन: वजन सीमा: 250 ग्राम से 2 किलोग्राम तक। मुख्य विशेषताएँ: नैनो ड्रोन से थोड़े बड़े, माइक्रो ड्रोन छोटे पैमाने के वाणिज्यिक संचालन, जैसे हवाई फ़ोटोग्राफ़ी, सर्वेक्षण या निरीक्षण के लिए उपयुक्त हैं। नियमन: नैनो ड्रोन की तुलना में संचालन के लिए अतिरिक्त अनुमतियों की आवश्यकता होती है। 3. छोटा ड्रोन: वजन सीमा: 2 किलोग्राम से 25 किलोग्राम तक। मुख्य विशेषताएँ: इन ड्रोन का उपयोग उन्नत वाणिज्यिक अनुप्रयोगों, जैसे कि कृषि (कीटनाशकों का छिड़काव), मानचित्रण और वितरण सेवाओं के लिए किया जाता है। विनियमन: ऑपरेटरों को विस्तृत अनुमति और परिचालन अनुपालन की आवश्यकता होती है। 4. मध्यम ड्रोन: वजन सीमा: 25 किलोग्राम से अधिक और 150 किलोग्राम तक। मुख्य विशेषताएँ: मध्यम ड्रोन का उपयोग औद्योगिक और रक्षा अनुप्रयोगों में किया जाता है, जैसे कि महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे की निगरानी या टोही। विनियमन: इन ड्रोन का दुरुपयोग या गलत तरीके से इस्तेमाल किए जाने पर अधिक नुकसान होने की संभावना के कारण ये सख्त विनियमन के अधीन हैं। 5. बड़ा ड्रोन: वजन सीमा: 150 किलोग्राम से अधिक। मुख्य विशेषताएँ: बड़े ड्रोन मुख्य रूप से सैन्य और औद्योगिक उद्देश्यों, जैसे कि कार्गो परिवहन, निगरानी या लड़ाकू मिशनों के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। विनियमन: उनके आकार और क्षमताओं के कारण, उन्हें व्यापक अनुमति और प्रमाणन सहित उच्चतम स्तर के विनियामक अनुपालन की आवश्यकता होती है। ड्रोन प्रणाली का विकास भारत खुफिया, निगरानी और टोही (आईएसआर) संचालन को बढ़ाने के लिए अपने मानव रहित हवाई वाहन (यूएवी) क्षमताओं को सक्रिय रूप से आगे बढ़ा रहा है।  तापस ड्रोन आर्चर सशस्त्र यूएवी मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस भारत की आधुनिक युद्ध रणनीति में ड्रोन की भूमिका भारत की सैन्य रणनीति अब ड्रोन-केंद्रित युद्ध पर आधारित होती जा रही है। इस बदलाव के पीछे मुख्य कारण घरेलू अनुसंधान एवं विकास (R&D) में तेजी, ड्रोन आयात पर 2021 से लागू प्रतिबंध और ड्रोन एवं उनके कंपोनेंट्स के लिए उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना है। सितंबर 2021 में शुरू हुई इस PLI योजना के तहत 2021-22 से 2023-24 तक तीन वित्तीय वर्षों में कुल ₹120 करोड़ का प्रावधान किया गया। इस योजना ने घरेलू उत्पादन और AI-आधारित स्वायत्त ड्रोन तकनीक को बढ़ावा दिया। भविष्य के युद्ध अब AI-आधारित स्वायत्त ड्रोन और नेटवर्क-सेंट्रिक ऑपरेशन पर अधिक निर्भर होंगे और भारत इसके लिए मजबूत आधार तैयार कर रहा है। बटालियन स्तर पर ड्रोन यूनिट मई 2025 में पाहलगाम आतंकी हमले के बाद संचालित ऑपरेशन सिंदूर ने स्पष्ट कर दिया कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन का उपयोग निर्णायक है। इस अभियान से सीख लेकर भारतीय सेना ने निर्णय लिया कि इंफेंट्री, आर्मर्ड और आर्टिलरी बटालियनों में UAV और काउंटर-UAV सिस्टम को मानक हथियार बनाया जाएगा। वर्तमान में ड्रोन को द्वितीयक हथियार के रूप में प्रयोग किया जाता है और इनके संचालन के लिए सैनिकों को उनके मूल कार्यों से हटाना पड़ता है। नई संरचना के तहत हर यूनिट में समर्पित ड्रोन ऑपरेटिंग टीम बनाई जाएगी, जिससे सैनिक विशेष प्रशिक्षण लेकर केवल ड्रोन संचालन पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे। इंफेंट्री बटालियनों में पलटन और कंपनी स्तर पर निगरानी ड्रोन लगाए जाएंगे और इसके लिए लगभग 70 सैनिकों को पुनः आवंटित किया जाएगा। ड्रोन खरीद और सप्लाई चेन का संस्थानीकरण भारतीय सेना का उद्देश्य ड्रोन और अगली पीढ़ी के उपकरणों को मानक सैन्य वस्तु के रूप में शामिल करना है। इस कदम से ड्रोन की नियमित खरीद सुनिश्चित होगी और एक स्थायी सप्लाई चेन विकसित होगी। इससे आपातकालीन या एड-हॉक खरीद पर निर्भरता कम होगी और लंबी अवधि के लिए सतत युद्ध क्षमता विकसित की जा सकेगी। भैरव लाइट कमांडो बटालियन का गठन भारतीय सेना 30 नई लाइट कमांडो बटालियनों का गठन कर रही है, जिन्हें भैरव बटालियन कहा जाएगा। प्रत्येक बटालियन में 250 सैनिक होंगे, जो विशेष मिशनों के लिए प्रशिक्षित होंगे। इन बटालियनों को विभिन्न कमांड्स के अंतर्गत तैनात किया जाएगा ताकि विशेष क्षेत्रों में तेज़ी से आक्रामक कार्रवाई की जा सके। रुद्र ब्रिगेड : स्वतंत्र और समन्वित युद्ध संरचना भारतीय सेना मौजूदा ब्रिगेड्स को पुनर्गठित कर रुद्र ब्रिगेड बनाएगी। इन ब्रिगेड्स में इंफेंट्री, आर्मर्ड, आर्टिलरी, UAVs और लॉजिस्टिक तत्व एकीकृत होंगे। रुद्र ब्रिगेड को इस तरह तैयार किया जाएगा कि वह विविध भौगोलिक परिस्थितियों में स्वतंत्र रूप से संचालन कर सके। यह संरचना पारंपरिक और हाइब्रिड दोनों प्रकार के युद्धों के लिए उपयुक्त होगी। आर्टिलरी का आधुनिकीकरण : ड्रोन बैटरियां और दिव्यास्त्र यूनिट भारतीय सेना की आर्टिलरी रेजिमेंट में बड़े बदलाव किए जा रहे हैं। नई योजना के तहत दो विस्तारित गन बैटरियां और तीसरी ड्रोन बैटरी बनाई जाएगी, जिसमें निगरानी और लड़ाकू ड्रोन शामिल होंगे। दिव्यास्त्र बैटरियां बनाई जाएंगी, जिनमें लंबी दूरी की तोपें, लूटेरिंग म्यूनिशन और एंटी-ड्रोन सिस्टम शामिल होंगे। इन बैटरियों का उद्देश्य गहराई वाले क्षेत्रों में लक्ष्य को भेदना और क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना होगा। आर्मर्ड, मैकेनाइज्ड इन्फेंट्री और इंजीनियरिंग यूनिट्स का पुनर्गठन आर्मर्ड और मैकेनाइज्ड इन्फेंट्री में रिकॉन्नेसेंस प्लाटून को निगरानी और स्ट्राइक ड्रोन से लैस किया जाएगा। इंजीनियर

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