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India: Geographical Distribution /Physiographic for UPSC in Hindi

भारत के अनूठे और विविध भू-भाग को समझने के लिए India: Geographical Distribution / Physiographic (भारत: भौगोलिक वितरण / भू-आकृतिक विभाजन) का अध्ययन सबसे महत्वपूर्ण है। देश की भौगोलिक संरचना को मुख्य रूप से छह प्रमुख भौतिक प्रदेशों में बांटा गया है—हिमालय की गगनचुंबी पर्वत श्रृंखलाएँ, सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का उपजाऊ मैदान, प्राचीन और खनिज संपन्न प्रायद्वीपीय पठार, शुष्क थार मरुस्थल, समृद्ध तटीय मैदान और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण द्वीप समूह। यह विविध भौगोलिक वितरण न केवल देश की जलवायु और अपवाह तंत्र को बल्कि यहाँ की अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक ताने-बाने को भी गहराई से प्रभावित करता है।

भू-आकृति की दृष्टि से भारत में काफी विविधता है और इसमें लगभग सभी प्रकार के स्थल रूप पाये जाते हैं:

  • एक ओर इसके उत्तर में विशाल हिमालय की पर्वतमालाएँ हैं, तो दूसरी ओर दक्षिण में विस्तृत हिन्द महासागर
  • एक ओर दक्षिण में ऊँचा-नीचा और कटा-फटा दक्कन का पठार है, तो वहीं उत्तर में विशाल और समतल सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान
  • थार के विस्तृत मरूस्थल में जहाँ विविध मरुस्थलीय स्थल रूप पाये जाते हैं, तो दूसरी ओर समुद्र तटीय तथा द्वीप समूह में भी व्यापक विविधता विद्यमान है।

इस प्रकार की भौगोलिक आकृतियों को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:

  1. उत्तरी पर्वतीय समूह / हिमालय पर्वत श्रृंखला
  2. उत्तरी मैदान
  3. प्रायद्वीपीय पठार
  4. भारतीय मरुस्थल
  5. तटीय मैदान
  6. द्वीप समूह
  • सीमा: इसकी स्थिति देश के उत्तरी सीमान्त के सहारे, पूर्व में ‘भारत-म्यांमार’ सीमा से लेकर पश्चिम में ‘भारत-पाकिस्तान सीमा’ तक विस्तृत है।
  • लम्बाई व चौड़ाई: पूर्व से पश्चिम इसकी लम्बाई लगभग 2500 कि.मी. तथा चौड़ाई 240 से 320 कि.मी. के औसत में है। (पूर्व की अपेक्षा पश्चिम में चौड़ाई अधिक है)।
  • क्षेत्रफल: इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 5 लाख वर्ग कि.मी. है।
  • क्षेत्रीय चौड़ाई में अंतर: इसकी चौड़ाई पूर्व (अरूणाचल प्रदेश) में 150 कि.मी. तथा पश्चिम (जम्मू-कश्मीर) में 400 कि.मी. है।
    • कारण: इसका मुख्य कारण पश्चिम की अपेक्षा पूर्व में अधिक दबाव-बल (Compressional Force) का होना है। यही वजह है कि माउंट एवरेस्ट और कंचनजंघा जैसी ऊँची-ऊँची चोटियाँ पूर्वी हिमालय में विद्यमान हैं।
  • प्लेट टेक्टॉनिक सिद्धांत: हिमालय पर्वत का निर्माण यूरेशियाई प्लेट (अंगारालैण्ड) तथा इंडिक-प्लेट (गोंडवाना लैण्ड) के आपस में टकराने से हुआ है।
  • टेथिस भू-सन्नति सिद्धांत: प्लेट-टेक्टॉनिक सिद्धांत से पहले यह माना जाता रहा कि हिमालय की उत्पत्ति टेथिस सागर में जमें मलबे में दबाव पड़ने से हुई है; हालाँकि इस मत की मान्यता अभी भी है। अतः हम टेथिस सागर को ‘हिमालय का गर्भ गृह’ या ‘जन्म स्थल’ कह सकते हैं।
  • आयु एवं प्रकार: हिमालय विश्व के नवीनतम् मोड़दार पर्वतों (वलित पर्वत/Fold Mountains) में से एक है। इसका निर्माण अल्पाइन भूसंचलन के तहत टर्शियरी काल (Tertiary Period) में हुआ था।
  • अक्षसंघीय मोड़ (Syntaxial Bend): इस पर्वत श्रेणी के पश्चिमी भाग में ‘नंगा पर्वत’ के निकट एवं पूर्वी भाग में ‘मिश्मी पहाड़ी या नामचा बरवा’ के निकट दो तीव्र अक्षसंघीय मोड़, ‘हेयरपिन टर्न’ की भांति मिलते हैं। ये प्रायद्वीपीय पठारी भाग के उत्तर-पूर्वी दबाव के कारण निर्मित हुए हैं।
  • आकार व ढाल: हिमालय की पर्वत श्रेणियाँ प्रायद्वीपीय पठार की ओर उत्तल (Convex) एवं तिब्बत की ओर अवतल (Concave) हो गई हैं। इस प्रकार हिमालय का मुख्य अक्ष ‘चापाकार’ (Arch) रूप में पश्चिम में सिन्धु नदी से पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी के बीच फैला है।

उत्तरी पर्वतीय प्रदेश को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जा सकता है:

  1. हिमालय पर्वतीय प्रदेश – इसे विस्तार से पढने के लिए यहाँ Click करें।
  2. ट्रांस हिमालय पर्वतीय प्रदेश इसे विस्तार से पढने के लिए यहाँ Click करें।
  3. पूर्वांचल की पहाड़ियाँ – इसे विस्तार से पढने के लिए यहाँ Click करें
  • स्थिति: यह मैदान उत्तरी पर्वतीय प्रदेश एवं दक्षिण के पठारी भाग के मध्य स्थित है।
  • लम्बाई व चौड़ाई: यह लगभग 2400 कि.मी. लम्बाई तथा 100 से 320 कि.मी. औसत चौड़ाई में विस्तृत है।
  • क्षेत्रफल: यह मैदान लगभग 7 लाख वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैला है।
  • भू-गर्भिक आयु: इस विशाल मैदान की उत्पत्ति भौगोलिक रूप से एक नवीन घटना (लगभग 50 लाख वर्ष पूर्व) मानी जाती है।
  • गर्त का निर्माण: हिमालय के निर्माण के क्रम में हिमालय एवं प्रायद्वीपीय पठार के मध्य एक विशाल गर्त का निर्माण हुआ।
  • अवसादीकरण: कालान्तर में इसे हिमालय एवं प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र की नदियों द्वारा लाये गये अवसादों के निक्षेपण से भर दिया गया। यह अवसादीकरण की प्रक्रिया आज भी निरन्तर जारी है और धीरे-धीरे इसकी मोटाई में वृद्धि हो रही है।

प्रादेशिक विभिन्नताओं के आधार पर इस मैदान को निम्नलिखित भागों में बांटा जा सकता है:

  1. सिन्धु का मैदान
  2. पंजाब का मैदान
  3. राजस्थान का मैदान
  4. गंगा का मैदान
  5. असम का मैदान

प्रादेशिक विभाजन को विस्तार से पढने के लिए यहाँ Click करें

  • स्थिति व आकार: प्रायद्वीपीय पठार देश का एक अति प्राचीन भू-भाग है, जो गंगा-सतलज के मैदान के दक्षिण में एक त्रिभुजाकार आकृति में फैला है; जिसका आधार उत्तर में गंगा-सतलज के मैदान की तरफ तथा शीर्ष बिन्दु सुदूर दक्षिण में कन्याकुमारी के निकट स्थित है।
  • क्षेत्रफल: यह देश का सबसे बड़ा भौतिक भाग है, जो लगभग 16 लाख वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैला है।
  • आयाम (लम्बाई व चौड़ाई): उत्तर से दक्षिण को इसकी अधिकतम् लम्बाई लगभग 1700 कि.मी. और पूर्व से पश्चिम अधिकतम् चौड़ाई 1400 कि.मी. है।
  • ऊँचाई: इसकी सामान्य ऊँचाई लगभग 600-900 मीटर है, परन्तु दक्षिण में स्थित ‘अनाई मुड़ी’ नामक चोटी (इसकी सर्वाधिक ऊँची चोटी) की ऊँचाई 2695 मीटर है।
  • ढाल: पठार का सामान्य ढाल उत्तर तथा उत्तर-पश्चिम से दक्षिण व दक्षिण-पूर्व को पाया जाता है।
  • भौगोलिक सीमाएं:
    • उत्तरी सीमा पर: अरावली, सतपुड़ा, विंध्याचल, कैमूर व राजमहल की पहाड़ियाँ।
    • पश्चिमी सीमा पर: पश्चिमी घाट पर्वत।
    • पूर्वी सीमा पर: पूर्वी घाट के उच्च प्रदेश स्थित हैं।
  • राज्यों में विस्तार: इसका विस्तार दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उड़ीसा, गुजरात, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु राज्यों के अधिकांश भाग पर है।
  • चट्टानें व काल: यह पठार प्राचीन गोंडवाना लैण्ड का ही एक भाग है, जो प्राचीन काल (आर्कियन काल) की कठोर आग्नेय व रूपान्तरित चट्टानों से बना हुआ है।
  • कटा-फटा स्वरूप: मौसमी क्षरण की क्रियाओं के फलस्वरूप इसका धरातलीय स्वरूप काफी कटा-फटा हो गया है; जैसे—
    • बिहार व झारखण्ड में छोटानागपुर का पठार
    • पश्चिम में मालवा का पठारलावा का पठार
    • दक्षिण का मुख्य पठार
  • अफ्रीका से भारत के अलग होने के क्रम में अरब सागर के रूप में भ्रंश घाटी का निर्माण हुआ है और भ्रंश कगार के रूप में पश्चिमी घाट पर्वत बच गया है। प्रायद्वीपीय भारत के पश्चिमी तट की तीव्र ढाल उस भ्रंश को दर्शाती है।

प्रायद्वीपीय पठार मुख्य रूप से पहाड़ियों एवं पठारों में विभक्त है:

  1. अरावली पर्वत
  2. पश्चिमी घाट पर्वत (सहयाद्री श्रेणी)
  3. पूर्वी घाट पर्वत
  4. आंतरिक पर्वत

प्रायद्वीपीय पठार का वर्गीकरण: विस्तार से पढने के लिए यहाँ Click करें

स्थिति, विस्तार एवं जलवायु

  • स्थिति: राजस्थान का उत्तर पश्चिमी भाग (अरावली पहाड़ी के पश्चिमी किनारे) काफी शुष्क व रेतीला है, इसी भाग को ‘थार का मरुस्थल’ कहा जाता है।
  • वर्षा: इस भाग में प्रति वर्ष 150 मिमी. से भी कम वर्षा होती है।
  • आकार: यह लगभग 650 कि.मी. लम्बा और 360 कि.मी. चौड़ा है।

भारतीय मरुस्थल: विस्तार से पढने के लिए यहाँ click करें

सामान्य परिचय एवं विस्तार

  • विस्तार: दक्षिण के प्रायद्वीपीय पठार के किनारे पश्चिम में कच्छ के रन से लेकर कोमोरिन अन्तरिप होते हुए पूर्व में गंगा-ब्रह्मपुत्र के डेल्टाई प्रदेश तक समुद्र तटीय मैदान का विस्तार पाया जाता है।
  • स्थिति: ये मैदान पश्चिमी व पूर्वी घाट एवं समुद्र के मध्य विस्तृत हैं।
  • निर्माण: इनका निर्माण नदियों व लहरों द्वारा लाई गई मिट्टी एवं अन्य अवसादों के निक्षेपण द्वारा हुआ है।
  • विभाजन: ये क्रमशः पश्चिमी समुद्रतटीय मैदानपूर्वी समुद्रतटीय मैदान के रूप में जाने जाते हैं।

तटीय मैदान : विस्तार से यहाँ पढ़ें

  • द्वीप समूह: किसी सागर, महासागर या झील में स्थित द्वीपों की श्रृंखला को ‘द्वीप समूह’ कहते हैं। भारत के अण्डमान-निकोबार व लक्षद्वीप इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
  • द्वीप: स्थलमण्डल के ऐसे भाग होते हैं जिनके चारों ओर सागरीय जल का प्रसार होता है। ये मुख्य रूप से समुद्र में जलमग्न पर्वतों के भाग होते हैं।
  • कुल संख्या: भारत में कुल 1000 से अधिक द्वीप हैं जो बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में स्थित हैं।
  • भौगोलिक उत्पत्ति के आधार पर वर्गीकरण:
    • बंगाल की खाड़ी के द्वीप: म्यांमार की अराकान योमा की विस्तारित निमज्जित (डूबी हुई) श्रेणी के शिखर हैं।
    • अरब सागर के द्वीप: ये प्रवाल भित्तियों (Coral Reefs) के जमाव हैं, जो ज्वालामुखी द्वीपों पर संग्रहीत हैं।
    • अपतटीय द्वीप (Offshore Islands): इसके अतिरिक्त गंगा के मुहाने, मन्नार की खाड़ी एवं पूर्वी और पश्चिमी तटों के सहारे डेल्टा जमाओं से निर्मित कई अपतटीय द्वीप स्थित हैं।

द्वीप, द्वीप समूह एवं भारतीय द्वीप: विस्तार से पढने के लिए यहाँ click करें

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